scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

आवरण कथाः जनरल रावत का अधूरा एजेंडा

देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की असमय मौत उनके उत्तराधिकारी पर आजादी के बाद देश के सबसे अहम सैन्य सुधारों की एक बड़ी चुनौती छोड़ गई. नए सैन्य सुपर चीफ के विशालकाय दायित्व की एक झलक.

X
जनरल बिपिन रावत जनरल बिपिन रावत

रायसीना पहाड़ी की ओर ले जाने वाले राजपथ पर इन दिनों भारी निर्माण गतिविधि जारी है. अंग्रेजों के बनाए नॉर्थ और साउथ ब्लॉक की जगह केंद्र सरकार के नए ठिकाने सेंट्रल विस्टा के निर्माण के लिए अर्थ मूवर दिन-रात जुटे हुए हैं. साउथ ब्लॉक के बेसमेंट में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के कार्यालय में अभी भी सदमा और हैरानी पसरी हुई है.

8 दिसंबर को भयावह हेलिकॉप्टर दुर्घटना के बाद से ग़मगीन माहौल तारी है. उस दुर्घटना में देश के पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका, दो हेलिकॉप्टर पायलट, उनके रक्षाकर्मी और निजी स्टॉफ के साथ उनके सैन्य सलाहकार ब्रिगेडियर लखविंदर सिंह लिद्दड़ की मृत्यु हो गई. देश के सर्वोच्च रक्षा अधिकारी जनरल रावत हाल तक देश के लिए सबसे अहम सैन्य सुधारों पर काम कर रहे थे.

इसके तहत 17 भिन्न-भिन्न सेना के इकलौते अंगों की कमान को थिएटर कमान कही जाने वाली पांच युद्धक संरचनाओं में बदलना, बेमानी हो चले सैन्य साजो सामान खरीद सिस्टम को दुरुस्त करना, और स्वदेशी हथियार उत्पादन पर जोर देने जैसे कार्यक्रम शामिल थे. उनके सामने बड़ी चुनौती भविष्य की जंग के लिए सशस्त्र बलों को तैयार करना थी.

मसलन, जब दुश्मन (चीन समझें) ऊंचे पहाड़ों पर सीधे गोला दागने की जगह शुरू में साइबर हमला करेगा, भारत के पॉवरग्रिड और हवाई तथा जमीनी यातायात व्यवस्था को ठप कर देगा. जनरल रावत ने इंडिया टुडे  से अपनी आखिरी बातचीत में कहा, ''भविष्य में आप यह भी जान नहीं पाएंगे कि जंग शुरू हो गई है’’ (देखें, 'हमें बदलाव मंजूर नहीं....’).

आवरण कथाः जनरल रावत का अधूरा एजेंडा
आवरण कथाः जनरल रावत का अधूरा एजेंडा

जनरल रावत को 10 दिसंबर को दिल्ली छावनी में भावभीनी सैन्य विदाई दी गई. इस दौरान 17 तोपों की सलामी दी गई और हर रंग-पांत के राजनैतिक नेता और हजारों लोगों की भीड़ मौजूद थी. कई पुराने सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, यह ऐसी विदाई थी, जैसी 2008 में तत्कालीन सरकार ने फील्ड मार्शल मानेकशॉ को भी देनी मंजूर नहीं की थी.

जनरल रावत की सीडीएस के पद पर नियुक्ति 31 दिसंबर, 2019 को हुई थी, जिस दिन वे सेना प्रमुख के पद से रिटायर हुए थे. उन्हें देश के सैन्य तंत्र में सुधार के लिए तीन साल का समय मिला था. इन सुधारों की पहली बार सिफारिश 2000 में करगिल समीक्षा समिति और 2001 में मंत्री-समूह की रिपोर्ट में की गई थी. इसका गठन पिछले सालों में हुए युद्ध की वजहों की समीक्षा करने के लिए किया गया था.

इन रिपोर्टों में ब्रिटिश-कालीन सैन्य तंत्र का पूरी तरह कायाकल्प करने की सिफारिश की गई थी. सबसे अहम सिफारिशों में से एक, पूर्व रक्षा राज्यमंत्री अरुण सिंह की अगुआई में कार्य दल की है. उस कार्य दल ने सुपर चीफ जैसे पद सीडीएस की सिफारिश की थी, जो सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों के ऊपर होगा.

सीडीएस ज्वाइंटमैनशिप (साझा तंत्र) को बढ़ावा देगा, यह एक सैन्य शब्दावली है, जिसके मायने सेना के तीनों अंगों के बीच प्रशिक्षण, हथियारों की आमद, और युद्ध में साझापन है. ज्वाइंटमैनशिप का सबसे अहम पहलू थिएटर कमान का गठन होगा, जिसमें सेना के तीनों अंग एक ही कमांडर के अधीन होंगे.

अपने पहले सीडीएस की असमय आखिरी विदाई के बाद सरकार ने अब उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उत्तराधिकारी के चयन की प्रक्रिया शुरू की है. यह पद की विचित्रता और कार्य की भारी चुनौतियों के मद्देनजर मुश्किल-सा काम है.

देश के सबसे लंबे समय तक कार्यरत चार सितारों वाले अधिकारी जनरल रावत 35 साल पहले दिवंगत जनरल कृष्णस्वामी सुंदरजी के बाद सेना के सबसे प्रभावी मुखिया भी थे. उनकी मृत्यु के बाद उनके शुरू किए गए सुधारों के भविष्य पर भी वाजिब आशंकाएं उभरीं हैं. अब सुधारों के राजनैतिक सूत्रधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह दायित्व आन पड़ा है कि वे आगे आएं और लोगों को आश्वस्त करें कि सुधारों का एजेंडा पहले की तरह जारी रहेगा.

आवरण कथाः जनरल रावत का अधूरा एजेंडा
आवरण कथाः जनरल रावत का अधूरा एजेंडा

उस झकझोर देने वाली दुर्घटना के महज तीन दिन बाद प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले के एक कार्यक्रम में कहा, ''जनरल बिपिन रावत जहां कहीं भी हों, आने वाले दिनों में वे देखेंगे कि भारत नए संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है.’’ प्रधानमंत्री ने आश्वस्त किया कि थल सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच तालमेल को मजबूत करने का अभियान सशस्त्र बलों को अधिक 'आत्मनिर्भर’ बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ेगा.

उनके शब्दों में यह निहित है कि अहम योजनाओं में सीडीएस कितने महत्वपूर्ण थे. बतौर सीडीएस, जनरल रावत के 23 महीने के कार्यकाल के कुछ कम चर्चित पहलुओं में यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी के 7, लोक कल्याण मार्ग आवास पर उनकी बैठकें हुआ करती थीं, जिसमें मोदी और वे ही रहा करते थे. घंटों चलने वाली ये बगैर तयशुदा बैठकें अक्सर थोड़ी मोहलत पर बुलाई जाती थीं और मोटे तौर पर महीने में एक बार हुआ करती थीं.

इन बैठकों में सीडीएस रावत प्रधानमंत्री को अनेक मुद्दों-मसलों की जानकारी दिया करते थे, जो जरूरी नहीं कि सिर्फ रक्षा मामलों तक सीमित हों. सबसे अहम तो यह था कि जनरल रावत प्रधानमंत्री को सेना के तीनों अंगों के बीच सामंजस्य बढ़ाने की अपनी योजनाओं से वाकिफ करते थे.

इसमें हैरान होने की भी कोई बात नहीं है. दुनिया भर में राजनैतिक नेतृत्व ने ही सैन्य सुधारों को आगे बढ़ाया है. अभी तक दुनिया में बड़ी सेनाओं में भारत की सेना इकलौती है, जिसने बेरुखी दिखाने वाले राजनैतिक तबके की वजह से अपनी कार्यशैली नहीं बदली है. लगभग एक दशक पहले तक चीन भी इस दायरे में था.

राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पहले बड़े कदमों में भारी-भरकम पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) का आकार घटाकर उसे 21वीं सदी की जंग लड़ने लायक छरहरी, फुर्तीली सेना में तब्दील करना था. लद्दाख में 2020 के बसंत में उतरी पीएलए की मेकेनाइज्ड टुकड़ियां इसी बदलाव का नतीजा थीं. यह बहस का विषय है कि क्या भारत में वैसे ही सुधार चीन की भारी आक्रामक तैनाती के लिए ढाल बन पाएंगे? लेकिन कम से कम ये दुश्मन की चालों का अंदाजा लगाने के लिए हमारी सेना को तैयार जरूर करेंगे.

बदलाव के कदम
भारतीय सेना और नौसेना के प्रमुख साउथ ब्लॉक की पहली मंजिल पर वूड-पैनल की भव्य सज्जा वाले दफ्तरों में बैठते हैं. अपने-अपने झंडों से विभूषित उनकी विशाल बॉलकनियों से लुटियन दिल्ली की एक सरसरी-सी झलक मिलती है. अधिकतम तीन साल के कार्यकाल वाले इन पदाधिकारियों को फौरन एहसास हो गया कि देश की तंग नजरिए वाली औपनिवेशिक दौर की सेना किस कदर बदलाव से मुंह चुराती है.

इन पदाधिकारियों के पास सार्थक असर डालने के लिए समय बहुत कम है. 2020 तक देश का रक्षा मंत्रालय 1947 में अंग्रेजों की बनाई रवायत के मुताबिक ही काम करता था. यह मॉडल लॉर्ड-लुई माउंटबेटन और उनके सेना प्रमुख हेस्टिंग्स इस्मे का बनाया हुआ था.

देश में इस मौके पर रक्षा सुधार सिर्फ दो परमाणु शक्ति संपन्न दुश्मन देशों के साथ अनसुलझे सीमा विवाद की वजह से ही नहीं, बल्कि रक्षा पर खर्च होने वाली रकम के लिए भी जरूरी हैं. सैन्य खर्च के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है, मगर इसकी असंतुलित, जवान आधारित सेना अत्याधुनिक सैन्य साजो सामान खरीदने के बदले रक्षा पेंशन पर ज्यादा खर्च करना मुनासिब समझती है.

सेना के तीनों अंग एक ही लड़ाई लड़ने के लिए खुद की योजनाएं, प्रशिक्षण और साजो सामान की खरीद अलग-अलग करते हैं. निष्क्रिय-से सैन्य-औद्योगिक परिसर की वजह से महंगे आयात और विदेशी सप्लायरों पर निर्भरता धीरे-धीरे बढ़ती गई है. साथ ही घरेलू रक्षा उद्योग भी ठप्प-सा हो गया है.

प्रधानमंत्री का 15 अगस्त 2019 को सीडीएस की नियुक्ति का ऐलान एक मायने में चौंकाने वाले कदम के रूप में आया था. इसकी वजह यह थी कि उस साल सेना के तीनों अंगों के प्रमुख एक कमजोर किस्म के चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के स्थायी चेयरमैन पर ही राजी हुए थे. एक उच्च रक्षा अधिकारी का कहना है कि प्रधानमंत्री ने उनकी सिफारिश को पूरी तरह से खारिज कर दिया और रक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी के नोट पर उसकी जगह 'चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ’ लिख दिया.

(जनरल रावत का ऐसा मानना था कि 2016 से 2019 के बीच सेना प्रमुख के तीन साल के कार्यकाल में उन्होंने थल सेना में सुधार की जो कोशिशें कीं, उसी के बल पर ही उन्हें यह शीर्ष पद हासिल हुआ था. उन्होंने दूसरे मामलों के अलावा एकीकृत युद्धक टुकड़ियां हल्की फुर्तीली जंगी संरचनाएं तैयार कीं और बेकार खर्चों में कटौती की रूपरेखा भी बनाई.)

जनरल रावत ने दो साल पहले देश के पहले सीडीएस का पद संभाला, तो उन्हें साउथ ब्लॉक की दूसरी मंजिल पर बड़े कार्यालय की पेशकश की गई थी. लेकिन उन्होंने बेसमेंट को चुना, क्योंकि वहां उनके सचिवालय के लिए जगह थी और एक कॉन्फ्रेंस रूम था, जैसा कि वे सेना के तीनों अंगों के साथ समन्वय के लिए चाहते थे.

उनका निजी दफ्तर, रूम नंबर दो, कम ऊंचाई वाला और दो सेना प्रमुखों के कार्यालय के विजिटर रूम से भी छोटा था. इकलौती विलासिता का साधन उसके साथ जुड़ा टॉयलेट था. एक हैरान आम विजिटर ने जनरल रावत के स्टाफ से पूछा, ''आपके सीडीएस तो निहायत ही कबूतरखाने जैसे कमरे में बैठते हैं.’’ सीडीएस दिन में 16 घंटे, हफ्ते में छह दिन काम में जुटे रहते और उनका ज्यादातर समय एक स्टडी टेबल पर गुजरता, वही स्टडी टेबल जिसका इस्तेमाल एक वक्त देश के पहले चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा किया करते थे.

जनरल रावत सेना प्रमुखों के अलावा राजनयिकों, उद्योगपतियों और सेना के पूर्व अधिकारियों वगैरह से भी मिला करते थे. उनके दरवाजे पर लगी हरी बत्ती गाहे-बगाहे ही जलती थी, जो यह सूचित करती थी कि वे किसी मीटिंग में नहीं हैं. जब हरी बत्ती जलती तो उनका स्टाफ समझ जाता था कि बॉस का 10 मिनट का लंच ब्रेक है.

उनके अधिकारों का दायरा कुछ इतना आश्चर्यजनक था (देखें रक्षा सुधार का राजमार्ग) था कि अभी हो रही एक बैठक में वे किसी थिएटर कमान के ठिकाने पर बहस करते, तो दूसरी बैठक में सैन्य आवासों की लिफ्ट लॉबी में मार्बल के बदले कडप्पा स्टोन लगाने की दलील पेश करते.

हालांकि सीडीएस के पद पर विचार तो 2001 से ही चल रहा था लेकिन सैन्य मामलों के विभाग (डीएमए) का गठन ऐसा नया मुकाम साबित हुआ, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था. सचिव के रैंक के साथ जनरल रावत ने उन तमाम प्रशासकीय जिम्मेदारियों को संभाला, जो पहले असैनिक रक्षा सचिव के जिम्मे होती थीं.

हाइब्रिड यानी कि मिली-जुली प्रकृति का डीएमए अपनी तरह का पहला महकमा है, जिसमें अफसरशाह और सैन्य अधिकारी दोनों होते हैं. इससे लंबे समय से चली आ रही सेना की वह शिकायत दूर हुई कि उसे रक्षा मंत्रालय से दूर रखा जाता है और 'संबद्ध कार्यालय’ माना जाता है. इस तरह बतौर सीडीएस और डीएमए सचिव के नाते जनरल रावत के व्यक्तित्व को अलग करना असंभव-सा है, जिन दोनों पदों पर वे 23 महीने रहे.

रक्षा सचिव से उनके टकराव भी हुए. रावत ने सैन्य साजोसामान की खरीद के मामले को रक्षा विभाग से हासिल कर लेने की बड़ी कोशिश की, लेकिन वे इसमें नाकाम रहे. सरकार ने उन्हें तीन साल के लिए जो मुख्य काम सौंपा था, वह मौजूदा 17 अलग-अलग सैन्य कमानो को महज पांच थिएटर कमानो में बदलना था. इस साल तक उनके गठन की उनकी पहली कोशिश वायु सेना की आशंका के चलते नाकाम हो गई. वायु सेना को डर था कि उसके लड़ाकू स्क्वाड्रन बिखर जाएंगे और उन्हें थल सेना के प्रभुत्व वाले थिएटर कमान से जोड़ दिया जाएगा.

साउथ ब्लॉक के मध्य में रूम नं. 12डी में रक्षा मंत्रालय के गुफानुमा कॉन्फ्रेंस हाल की हल्के ढलान वाली सीटें उसके किसी सिनेमा हाल जैसा होने का आभास दिलाती हैं. उसी हाल में सेना के तीनों अंगों की बेहद उत्तेजक प्रजेंटेशंस के दौरान वायु सेना के नाराज अधिकारियों के तीखे वाणों का मुकाबला इकलौते जनरल रावत कर रहे थे.

थिएटर कमान के गठन की प्रक्रिया इस साल टल गई और उसे एक कमांडर-इन-चीफ की अगुआई में सेना के तीनों अंगों से एक-एक अधिकारी वाले चार अलग-अलग अध्ययन समूहों के जिम्मे सौंप दिया गया. इन सबको अपनी रिपोर्ट दिसंबर के अंत तक सीडीएस को सौंपनी है. जनरल रावत के तहत दूसरी बड़ी सुधार प्रक्रिया एकीकृत क्षमता विकास योजना या आइसीडीपी शुरू हुई.

इसमें देश के सुरक्षा खतरों का वास्तविक आकलन, उपलब्ध बजट और ऐसे खतरों से निबटने के लिए जरूरी सैन्य साजोसामान की समीक्षा शामिल है. ऐसी सैन्य योजना पहले कभी नहीं बनाई गई. इसके तहत दस वर्षीय क्षमता विकास योजना होगी, जिसमें पांच साल की रक्षा क्षमता खरीद योजना और दो साल की तात्कालिक योजना होगी.

एक रक्षा अधिकारी उनके किए को कुछ इस तरह बयां करते हैं, ''बाकी लोग बस बैंगनी (सेना के तीनों अंगों के संगठन का रंग) सोचते हैं, रावत ने बैंगनी कर दिखाया.’’ जनरल रावत ने सशस्त्र बलों में कोविड-19 की सावधानियों के लिए समन्वय स्थापित किया, आयात न की जाने वाली रक्षा सामग्रियों की 'सकारात्मक स्वदेशी फेहरिस्त’ तैयार कराई, बेहिसाब बढ़ते पेंशन बिल को घटाने का तरीका निकाला, और टुअर ऑफ ड्यूटी जैसी अवधारणा लेकर आए (जिसके तहत युवा दो साल की सैन्य सेवा कर सकते हैं).

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि सीडीएस कार्यालय और डीएमए की स्थापना और उसे सुचारू ढंग से चलाना है. एक उच्च रक्षा अधिकारी के शब्दों में कहें तो ''यह विराट चमत्कारी उपलब्धि है.’’ वे कहते हैं, ''अगला जो भी इस पद पर आता है, वह इस सिस्टम को काम करता हुआ पाएगा.’’

आगे की राह
अगले सीडीएस को जनरल रावत के शुरू किए सुधारों पर अमल करने का भगीरथ प्रयास सरकार से मिली समय अवधि के भीतर करना होगा. दिसंबर के अंत तक चारों कमांडर-इन-चीफ थिएटर कमान के गठन के बारे में अपनी अलग-अलग रिपोर्ट सौंप देंगे. उसके बाद नए सीडीएस को उसकी व्यावहारिकता का आकलन चार महीने की अवधि में आंतरिक बहस और विचार-विमर्श के जरिए करना होगा. अगर वे इस प्रक्रिया से संतुष्ट हुए तो उसे अप्रैल 2022 में सरकार के सामने पेश करना होगा.

चार थिएटरों में थल सेना केंद्रित पश्चिमी और पूर्वी थिएटर कमान, वायु सेना के प्रभुत्व वाला वायु रक्षा कमान और नौसेना का नेशनल मेरिटाइम कमान शामिल है. (पांचवें उत्तरी कमान की योजना चीन की सीमा पर तैनाती के मद्देनजर ठंडे बस्ते में डाल दी गई है.) उसके बाद जनरल रावत की महत्वाकांक्षी समय-सीमा के मुताबिक, सरकार अगस्त 2022 में इन चारों कमान की घोषणा करेगी और उनका गठन 2023 तक पूरा होगा. अब यह सब कहना तो आसान है, लेकिन करना बहुत ही कठिन, वैसे अब यह माना जा रहा है कि वायु सेना वैसा विरोध नहीं करेगी, जैसा रावत के वक्त हुआ.

जनरल रावत के दृढ़ निश्चयी आशावाद को देखते हुए ये विशालकाय बदलाव हैं, जिन्हें बेहद कम समय में अंजाम देना है. अमेरिका को ज्वाइंटमैनशिप के मॉडल को स्थायी बनाने में करीब दो दशक लगे हैं. भारत अब यही कुछेक साल में करने की कोशिश कर रहा है. साउथ ब्लॉक में इसके कुछ पक्के समर्थक भी समय-सीमा पर सवाल उठाते हैं.

एक सज्जन पूछते हैं, ''अगर यह (थिएटर कमानो का गठन) एक किलोमीटर के दायरे में स्थित सेना के तीनों अंगों के मुख्यालय के बीच समस्या बना हुआ है और उसका समाधान नहीं निकल पा रहा है तो काफी दूर बैठे चार कमानों के मुखिया (सी-इन-सी) भला कैसे कर पाएंगे?’’

आइसीडीपी पर अमल भी भारी चुनौती होगा. ऐसी साझा योजना और खरीद प्रक्रिया पर अमल करने में अमेरिका को 17 साल लगे. इस समीक्षा की योजना से जुड़े एक अधिकारी चेतावनी देते हैं कि यह प्रक्रिया भारत में 'खून-खच्चर’ करवा सकती है. वे कहते हैं, ''सेना के अंगों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता तो जैसी है, वैसी ही रहेगी, ऐसे में हर कोई किसी खास काम के लिए दूसरे से ज्यादा मिशन रवाना करेगा.’’ इससे तो समीक्षा प्रक्रिया का मूल मकसद ही बेमानी हो जाएगा. अब जरूरत होगी कि नया सीडीएस आए और चीजों को दुरुस्त करे.

रक्षा विशेषज्ञ रियर एडमिरल सुदर्शन श्रीखंडे (रिटायर) कहते हैं, ''यह वास्तविक और तत्काल जरूरत है कि उनके शुरू किए सुधारों को जारी रखा जाए. खासकर साझा और सक्रिय कमान के गठन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए. हालांकि उनके मूल विचारों पर कुछ लोगों के सकारात्मक सुझावों और मतभेदों को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

जनरल रावत के उत्तराधिकारी और चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी को साथ मिलकर, जहां जरूरी हो, प्रस्ताव में फेरबदल करना चाहिए और समयावधि को लेकर उनके संकल्प को भी पूरा करना चाहिए.’’

नए सीडीएस की चुनौतियों की फेहरिस्त भी काफी लंबी-चौड़ी है. रक्षा मंत्रालय के थिंक टैंक मनोहर पर्रीकर-आइडीएसए से जुड़े कर्नल विवेक चड्ढा कहते हैं कि इसमें 'सेना के किसी अंग विशेष के नजरिए से सोचने के तरीके में बदलाव लाकर तेजी से साझा तंत्र की सोच वाले रास्ते पर बढऩा होगा.’ ''इसमें यह भी मुमकिन है कि विरोधाभासी पुराने रुख और नजरिए को भी बदलना पड़े.’’ इसी मामले में नए सीडीएस को जरूरी सुधार एजेंडे पर अमल के लिए सरकार के मुखर समर्थन की दरकार होगी.

सिंगापुर स्थित नानयांग टेक्नोलॉजिकल युनिवर्सिटी के दक्षिण एशिया कार्यक्रम में एसोसिएट प्रोफेसर अनित मुखर्जी कहते हैं, ''प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री को रक्षा सुधारों पर अपने नजरिए को सार्वजनिक रूप से दोहराने की दरकार है. इसकी जरूरत इसलिए है कि जो अभी भी सुधारों का विरोध कर रहे हैं, वे विरोध छोड़ दें.’’ बहरहाल, सशस्त्र बलों के अगले सुधार प्रमुख के लिए बदलाव का चुनौतीपूर्ण एजेंडा और मुश्किल विरासत पलकें बिछाए खड़ी है.

मोर्चेबंदी
लद्दाख में चीन से लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर के-9 वज्र सेल्फ-प्रोपेल्ड होवित्जर तोप की तैनाती

''जरूरी है कि जनरल रावत के उत्तराधिकारी और चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी साथ मिलकर, जहां जरूरी हो, प्रस्तावों में फेरबदल करें और उन्हीं के जैसी संकल्पशक्ति दिखाएं.’’
रियर एडमिरल सुदर्शन श्रीखंडे (रिटायर) 
रक्षा विशेषज्ञ

''अब यह जरूरी लग सकता है कि सेना के अंग विशेष के नजरिए से फौरी तौर पर साझा नजरिए की ओर बढ़ा जाए.’’
कर्नल विवेक चड्ढा (रिटायर) 
मनोहर पर्रीकर-आइडीएसए

''प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री को रक्षा सुधारों पर अपने नजरिए को सार्वजनिक तौर पर दोहराने की दरकार है, ताकि जो अब भी विरोध कर रहे हैं, वे विरोध बंद करें.’’
प्रोफेसर अनित मुखर्जी
सान्यांग टेक्नोलॉजिकल युनिवर्सिटी, सिंगापुर

''भविष्य के युद्धों में आप यह जान भी नहीं पाएंगे कि जंग शुरू हो गई है क्योंकि दुश्मन, मोर्चे पर आने के पहले साइबर हमले से आपके पावरग्रिड को ठप कर सकता है.’’

''बजट के प्रावधानों में गड़बड़ है. किसी एक सेना के लिए खास उपकरण खरीदे गए और  इस्तेमाल हुए बिना ही पुराने पड़ गए.’’

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें