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आवरण कथाः आंख में खटकने का खामियाजा

भारत में दलित स्त्रियां जातिगत और लैंगिक हिंसा खास तौर पर बलात्कार की गहरी चपेट में. आखिर किस वजह से वे हर बार इतनी कमजोर साबित होती हैं.

भारत में दलित स्त्रियां जातिगत और लैंगिक हिंसा खास तौर पर बलात्कार की गहरी चपेट में. भारत में दलित स्त्रियां जातिगत और लैंगिक हिंसा खास तौर पर बलात्कार की गहरी चपेट में.

अखबारों न्यूज चैनलों की सुर्खियों और सोशल मीडिया पर चारों ओर तैरते ब्योरों, सबमें एक ही तो पहलू है, जाना-पहचाना. एक दलित युवती, जिसने अभी 20 की उम्र भी पार नहीं की थी, घसीटकर खेलों में ले जाई जाती है, कथित तौर पर चार ऊंची जातियों के लड़कों के हाथों बलात्कार का शिकार होती है और रीढ़ की हड्डी तोड़कर मरने के लिए अकेली छोड़ दी जाती है.

उसकी मां चीखें सुनती है, लहूलुहान बेटी को खोजती है, परिवार पहले थाने भागता है, फिर उसे अलीगढ़ के एक अस्पताल ले जाता है, जब उसकी हालत और बिगड़ जाती है, तो उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया जाता है, दो हफ्ते तमाम तकलीफें झेलने के बाद वहां वह अपनी चोटों के आगे हार मानकर अंतत: दम तोड़ देती है.

उसी रात उसका शव वापस लाया जाता है और कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस उसका अंतिम संस्कार कर देती है. परिवार कहता है कि उससे पूछा तक नहीं गया. पुलिस का दावा है कि कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगडऩे से रोकने के लिए उसने ऐसा किया.

यह हौलनाक हादसा उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के बूलगढ़ी गांव में हुआ. वैसे, यह बड़ी आसानी से देश का कोई दूसरा हिस्सा—राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, केरल या तेलंगाना—भी हो सकता था. जिस दिन हाथरस की पीड़िता ने दम तोड़ा, राजस्थान के अजमेर जिले की एक दलित महिला आगे आई और उसने तीन आदमियों पर सामूहिक बलात्कार का आरोप लगाया.

चौबीस घंटे बाद उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में 22 साल की एक दलित लड़की दो मुस्लिम नौजवानों के हाथों बलात्कार का शिकार होती है और मौत के घाट उतार दी जाती है. अक्तूबर की 2 तारीख को बिहार के गया जिले की एक दलित किशोरी चार आदमियों के हाथों कथित तौर पर बलात्कार के बाद खुदकुशी कर लेती है. महज एक हफ्ते बाद, राजस्थान के अलवर जिले में राज्य की एक निचली अदालत गुर्जर समुदाय के चार लोगों को पिछले वर्ष 19 साल की एक दलित लड़की के साथ उसके मंगेतर के सामने सामूहिक बलात्कार का दोषी करार देती है.

अगस्त में केरल के एर्णाकुलम में 75 बरस की एक बुजुर्ग दलित महिला के साथ बर्बरता से सामूहिक बलात्कार किया जाता है और उसके गुप्तांगों को क्षत-विक्षत कर दिया जाता है. अगस्त 2019 में मुंबई में उस वक्त आक्रोश का उफान आ जाता है जब अपने चार दोस्तों के हाथों कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई, 19 बरस की दलित लड़की बहुत-सी अंदरूनी चोटों की वजह से अपने गृहनगर औरंगाबाद में दम तोड़ देती है.

ये घटनाएं महज अपने वीभत्स ब्योरों में ही अलहदा हैं, उनकी पटकथा समान है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की सालाना रिपोर्ट 'भारत में अपराध: 2019’ के मुताबिक, उस साल भारत में दर्ज हुए बलात्कार के 32,033 मामलों में से करीब 11 फीसद पीड़िताएं दलित थीं.

मतलब: भारत में हर दिन 10 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2009 से 2019 के बीच देश में बलात्कार के मामलों में थोड़ी-सी 5 फीसद की कमी आई, वहीं दलित महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले करीब 159 फीसद बढ़कर 1,346 से 3,486 पर पहुंच गए (देखें: दलित महिला होने का अभिशाप).

भारत में दलित महिलाएं तिहरी मार झेल रही हैं—औरत होने की मार, दलित होने की मार और गरीब होने की मार. असल में सवर्ण जातियां दलितों के तेज राजनैतिक, आर्थिक और शैक्षिक उभार को अपने ऊपर तंज के रूप में लेते हुए उसे सबक सिखाना चाहती हैं, और दलित स्त्रियों का शरीर इसके लिए उन्हें माकूल औजार के रूप में दिखता है.

अव्वल तो शर्म और बेइज्जती का एहसास इन स्त्रियों को ज्यादातर मौकों पर ऐसे मामलों की रिपोर्ट लिखवाने से रोकता है. फिर जब वे कानून लागू करने वाली एजेंसियों के पास जाती भी हैं, तो पुलिस एफआइआर (प्राथमिकी) दर्ज करने में आनाकानी करती है, या तो अपराध के आंकड़े कम रखने के राजनैतिक दबाव में, या फिर खुद अपने जातिगत या लैंगिक पूर्वाग्रहों की वजह से, खासकर इस बात को देखते हुए कि वे भी तो आखिर इसी सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से आए हैं.

और अगर वे सरकारी तंत्र को किसी न किसी तरह हरकत में लाने में कामयाब हो भी जाती हैं, तो उनके लिए इंसाफ पाने की संभावनाएं बहुत कम ही होती हैं—दलितों के खिलाफ बलात्कार के मामलों में दोषसिद्धि की दर महज 32 फीसद है. 1989 का अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों की रोकथाम) कानून—जिसने एससी और एसटी के खिलाफ अपराधों को गैर-जमानती बनाया और मुकदमों के लिए विशेष अदालतों का प्रावधान किया—अपने इरादों में चाहे जितना ताकतवर हो, अमल में कमजोर बना हुआ है. दोषसिद्धि की समग्र दर बहुत कम 33 फीसद है और इस कठोर कानून के तहत दर्ज 94 फीसद मामले मुकदमे और जांच के अलग-अलग चरणों में लंबित हैं.

दलित औरतें इतनी मजबूर क्यों हैं?
राजनैतिक और आर्थिक अनिश्चय के बढ़ते माहौल में सवर्ण तबके में शोषित वर्गों के लिए सकारात्मक कदमों के प्रति नाराजगी बढऩे लगी है, चाहे वह राजनैतिक प्रतिनिधित्व का मामला हो या शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का. 2008 में परिसीमन के बाद लोकसभा की 543 सीटों में से 84 अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हो गईं. इसी तरह हर राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटें हैं. मसलन, हाथरस की विधानसभा और लोकसभा दोनों सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं. इससे अगड़ी जातियों में बहुत-से लोग नाखुश हैं.

राजनैतिक दल भी दलितों को शह देने में एक-दूसरे से होड़ करते हैं. मसलन, उत्तर प्रदेश में भाजपा की 2014 और 2019 के लगातार दो आम चुनावों और 2017 के विधानसभा चुनावों में जीत में अनुसूचित जातियों की अहम भूमिका थी. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के एक अध्ययन के मुताबिक, 2019 में एक-तिहाई से ज्यादा या 34 फीसद दलितों ने भाजपा को वोट दिया, जबकि 2014 में एक-चौथाई या 24 फीसद दलित वोट ही भगवा पार्टी को मिला था. बदले में भाजपा ने दलित नायकों के गुणगान से लेकर दलित समुदाय के रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाकर उन्हें तोहफा दिया.

भाजपा ने पार्टी संगठन में दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए दूसरी पार्टियों से दलित नेताओं को लाने में भी संकोच नहीं किया. फिर, केंद्र सरकार ने अनुसूचित जातियों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की योजनाओं पर भी ध्यान दिया. सितंबर में मोदी सरकार ने तीन साल में करीब 1,000 दलित स्टार्ट-अप शुरू करने के लिए 'आंबेडकर सोशल इनोवेशन इनक्यूबेशन मिशन’ की शुरुआत की.

उत्तर प्रदेश सरकार ने एससी/एसटी उद्यमियों के प्रोत्साहन के लिए नीति बनाने की खातिर तीन सदस्यीय समिति का भी गठन किया है. चौथी एमएसएमई गणना के मुताबिक, देश में दलित 17 फीसद एमएसएमई (कुटीर, छोटे और मझोले उद्यम) की मिल्कियत रखते हैं. ग्रामीण भारत में यह 20 फीसद है जबकि शहरी भारत में 14 फीसद.

यह बात दीगर है कि इन सबके बावजूद अनुसूचित जातियां लगभग सभी पैमाने पर सबसे बदतर हालात में हैं. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) की भारतीय श्रम और रोजगार रिपोर्ट, 2014 के आंकड़ों से पता चलता है कि खपत और खर्च के पांच पैमानों में से दो सबसे निचले पायदान पर 50 फीसद अनुसूचित जातियों की आबादी है.

इन पायदानों पर सवर्ण हिंदू 20 फीसद हैं. फिर सावित्री बाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी और भारतीय दलित अध्ययन संस्थान, दिल्ली के 2015 से 2017 के बीच किए साझा अध्ययन में पाया गया कि देश की कुल संपत्ति में ऊंची जातियों की हिस्सेदारी 41 फीसद से ज्यादा है जबकि अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी महज 7.6 फीसद है.

2015 के श्रम ब्यूरो रोजगार-बेरोजगार सर्वे के मुताबिक, कम से कम ग्रेजुएट की डिग्री रखने वाले दलितों में बेरोजगारी दर 19 फीसद है जबकि अगड़ी जातियों में 11 फीसद.

हालांकि निचली जातियों को किसी तरह की रियायत से अगड़ी जातियों में विरोध और रंजिश बढ़ती जाती है. और महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीडऩ औकात बताने का ताकतवर तरीका बन गया है. स्त्री अधिकारों की पैरोकार, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर आयशा किदवई कहती हैं, ''महिलाओं के प्रति यौन हिंसा प्रभुत्व जताने, अपमान और शोषण करने का प्रतीक है.

ताकत के खेल का सबसे मुफीद तरीका यौन शोषण और जातिगत भेदभाव है.’’ जेएनयू में प्रोफेसर तथा भारतीय दलित अध्ययन संस्थान की पूर्व निदेशक संघमित्रा शील आचार्य कहती हैं कि दलित स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा ''कमजोर और वंचित दलितों को यौनकर्म और जाति दोनों तरह से डराने-धमकाने का तरीका है. दलित स्त्री से बलात्कार दलितों को संदेश है कि वे सामाजिक पायदान के सबसे निचले स्तर पर हैं. यह सिर्फ मर्दानगी का नशा नहीं है, क्योंकि दलित पुरुषों के गैर-दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार के कोई मामले नहीं हैं.’’

चार राज्यों में 500 दलित स्त्रियों के साथ हुई हिंसा के एक अध्ययन 'दलित विमेन स्पीक आउट’ से खुलासा होता है कि 54 फीसद के साथ शरीरिक हिंसा हुई, 46 फीसद यौन हिंसा की शिकार हुईं, 43 फीसद घरेलू हिंसा, 23 फीसद बलात्कार और 62 फीसद गाली-गलौज की शिकार हुईं. एक दूसरा अध्ययन सेंटर फॉर दलित राइट्स ग्रुप का है. इसमें 2004 से 2013 के बीच देश के 16 जिलों में दलित महिलाओं और लड़कियों के साथ यौन हिंसा की 100 घटनाओं के अध्ययन में पाया गया कि 46 फीसद पीडि़ता 18 साल से कम उम्र की थीं और 85 फीसद तक 30 साल से कम उम्र की थीं.

दिल्ली के एक थिंक टैंक रिसर्च ऐंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज में फेलो, प्रोफेसर अमिताभ कुंडू इस शोषण में एक आर्थिक वजह भी जोड़ते हैं. उनके मुताबिक, बर्बाद करने या उठा ले जाने जैसी कोई दूसरी संपत्ति न होने से दलितों में महिलाएं हिंसा का प्रमुख शिकार बनती हैं. वे कहते हैं, ''दलितों के पास धन-संपत्ति ज्यादा नहीं होती. इसलिए महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा उस समुदाय को अपमानित करने का आसान तरीका है.’’

समाजशास्त्रियों के मुताबिक, निचली जातियों के प्रति हिकारत के साथ पुरुष प्रधान समाज में गहरे धंसी स्त्री-घृणा मिलकर पुरुषों को महिलाओं का किसी तरह का प्रतिरोध या 'अवहेलना’ बेहद हिंसक बना देती है. नई दिल्ली के एम्स में मनोचिकित्सक डॉ. एस.के. खंडेलवाल का कहना है कि ऐसी सामाजिक भावना किसी के साथ दुर्व्यव्यहार दुर्व्यवहार करने या उसका शोषण करने को जायज ठहराती है क्योंकि शोषण का शिकार मनुष्य नहीं रह जाता, बल्कि कोई 'पापी’ हो जाता है, जो 'दंड’ का भागी है.

भारतीय दलित अध्ययन संस्थान के चेयरमैन तथा जेएनयू के मानद प्रोफेसर सुखदेव थोराट कहते हैं, ''यह सब मिलकर 'अछूतों’ को अपमानित करने की ख्वाहिश में बदल गया है. इसी वजह से ऐसे मामले हम देखते हैं कि किसी महिला का उसके पति, बेटे या भाई की आंखों के सामने बलात्कार किया जाता है.’’ अपमान करने की ख्वाहिश सिर्फ यौन हिंसा से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि यौन अंगों को क्षतिग्रस्त करने और दूसरे बर्बर कृत्यों से भारी दर्द और नुक्सान करने से पूरी होती है.

पुरुष प्रधान समाज और गहरे धंसे जातिगत भेदभाव से उपजी समाज में जायज ठहराने की भावना से भी संभावित अपराधियों को शह मिलती है. सत्ता में बैठे लोग अक्सर महिलाओं के खिलाफ अपराधों को सामान्य-सा बता देते हैं. कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि लड़कों से 'गलती’ हो जाती है.

अब भाजपा नेता रंजीत श्रीवास्तव ने कहा है कि हाथरस की पीड़िता जैसी औरतें अक्सर बाजरे के खेतों में अंधेरे में जाती हैं. हाथरस में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा जैसे संगठन खुलकर आरोपियों के पक्ष में आ गए हैं, जो ठाकुर जाति के हैं.

 

जाति एकमात्र कारण नहीं 
हालांकि, कई सामाजिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यौन अपराधों और बर्बर अत्याचारों में वृद्धि अकेले जातिगत कारणों से नहीं होती है. इन अमानवीय कृत्यों के पीछे कई अन्य उत्प्रेरक भी हैं और दलित महिलाएं, जिन्हें न्यूनतम सामाजिक और कानूनी सुरक्षा प्राप्त है, एक आसान शिकार हैं.

इस तरह की यौन हिंसा कोई नई बात नहीं है. जो बात परेशान करती है, वह है इस तरह के अपराधों की क्रूरता में वृद्धि. महिलाओं के सशन्न्तीकरण के लिए काम कर रहीं इक्वलिटी नाउ और स्वाभिमान सोसाइटी की इस साल की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि दलित महिलाओं के साथ यौन अपराध अधिक हिंसक रूप में होते हैं, मसलन सामूहिक बलात्कार या बलात्कार के साथ हत्या.

राजस्थान में विभिन्न नागरिक संगठनों के साथ काम करने वाले दलित अधिकार कार्यकर्ता मनीष कुमार कहते हैं, ''पहले आपको बलात्कार के मामले सुनने को मिलते थे, लेकिन अब सामूहिक बलात्कार के साथ उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग और पीडि़ता के शरीर के साथ अत्यधिक क्रूरता देखी जा रही है.’’ 19 अगस्त, 2020 को बिहार के जगदीशपुर इलाके में एक दलित स्कूली छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और अपराधियों ने इस कृत्य को फिल्माया भी.

बेंगलूरू स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरो-साइंसेज (निमहांस) में नैदानिक मनोविज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वीणा ए. सत्यनारायण कहती हैं, ''आर्थिक असमानता और जातिगत संघर्ष जैसे सामाजिक तनावों से लेकर मोबाइल फोन और सस्ते इंटरनेट की आसान उपलब्धता से यौन और हिंसक सामग्री तक बेरोकटोक पहुंच तक, बर्बर अपराधों में वृद्धि के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं.

और जब अतीत की दुश्मनी का बदला लेने के लिए बलात्कार को एक हथियार के रूप में देखा जाता है, तो क्रूरता का पैमाना और ज्यादा बढ़ जाता है.’’ हाथरस की घटना में पीड़ितों और अभियुक्तों के परिवारों के बीच पीढिय़ों से जमीन विवाद चलता आ रहा है. लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर डी.आर. साहू कहते हैं, ''क्रूरता के हर मामले का एक अलग संदर्भ होता है और जाति कुछ मामलों में पृष्ठभूमि प्रदान करती है. लेकिन ऐसी हिंसा को भड़काने वाले कुछ सामान्य कारक हैं.

पोर्न तक पहुंच, परिवार की नजरों से दूर मोबाइल फोन पर ज्यादा समय व्यतीत करना और नैतिक और सामाजिक मूल्यों की अनदेखी करते हुए समाज के पूरी तरह से भौतिक चीजों को ही उपलब्धि मानते हुए उसी पर ध्यान केंद्रित करने से समाज में गिरावट आई है. यह तनाव इन अपराधों की क्रूर प्रकृति को दर्शाता है.’’

2018 में जारी आंकड़ों के अनुसार, 50 करोड़ से अधिक स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं के साथ भारत एक प्रमुख अश्लील वेबसाइट का तीसरा सबसे बड़ा उपभोन्न्ता आधार वाला देश बन चुका है. और यह हाल तब है जब यहां पोर्न साइटों पर प्रतिबंध है. लॉकडाउन के दौरान देश में पोर्न की खपत में 95 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई.

2012 में नई दिल्ली में हुए निर्भया सामूहिक बलात्कार कांड में बड़े पैमाने पर आक्रोश के बाद दंड प्रक्रिया (संशोधन) अधिनियम 2013 को संसद में पारित किया गया जिसमें बलात्कार कानूनों में कड़े प्रावधान जोड़े गए, लेकिन इसने हत्या की नीयत से क्रूरता में वृद्धि की है. बलात्कार के लिए अब मौत की सजा भी दी जा सकती है और यह गैर-जमानती अपराध भी बन गया है.

हालांकि, जागरूकता और संवेदना और जीरो एफआइआर या एफआइआर दर्ज करने से इनकार पर सजा जैसे पीड़ित के हक में कानूनी प्रावधानों ने अधिक पीड़ितों को आगे आने और पुलिस से संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित किया है. इसके अलावा, नए कानून के तहत पीड़ित की गवाही को अदालत में कम चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

ये सब बलात्कार पीडि़तों की हत्या की प्रवृत्ति में वृद्धि के कारण बने हैं. यूपी में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए उन्हें मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दे रहे एक एनजीओ रेड ब्रिगेड की मुख्य प्रबंध न्यासी उषा विश्वकर्मा कहती हैं, ''बलात्कार के बाद ज्यादातर हत्याएं कानूनी रूप से या अन्य तरीकों से प्रतिशोध की आशंका के कारण होती हैं.’’

हाल के दिनों में दलितों को मूंछें बढ़ाने, अपनी जाति से बाहर शादी करने, घोड़े की सवारी करने और अन्य गतिविधियों के कारण जिसे मौजूदा सामाजिक व्यवस्था की अवहेलना के रूप में देखा जाता है, के लिए पीटा गया है. इसके बाद मोदी सरकार ने किसी दलित को शादी की बारात में घोड़ी पर चढऩे से रोकने या उसका सिर मूंडने जैसी घटनाओं को अपराध की श्रेणी में डाल दिया.

2018 में जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी/ एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के कुछ प्रावधान, जिसमें अनिवार्य गिरफ्तारी भी शामिल थी, को हटाने संबंधी व्यवस्था दी तो एनडीए सरकार ने अधिनियम में संशोधन करके उन प्रावधानों को बहाल कर दिया.

प्रशासनिक उदासीनता का अभिशाप
कार्यान्वयन अब भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. बलात्कार पीडि़तों के लिए एक प्राथमिकी दर्ज करा पाने की कठिनाई एक मानसिक आघात पैदा कर सकती है जो कई रूपों में शारीरिक उत्पीडऩ से कम कठोर नहीं होती. शर्मनाक है कि पुलिस बल और राज्य प्रशासन पीडि़तों को उस तरह की सहायता दे पाने में नाकाम रहे हैं, जिसके बारे में दंड प्रक्रिया (संशोधन) अधिनियम, 2013 में कल्पना की गई थी.

यह बात दलितों के मामले में ज्यादा बड़ी सचाई है. हाथरस में जो हुआ है, वह कोई असाधारण मामला नहीं है. जब दलितों के लिए न्याय की बात आती है तो अन्य राज्यों में भी प्रशासनिक उदासीनता वैसी ही दिखती है.

पिछली मई के अलवर के मामले को ही लीजिए. अपने मंगेतर के सामने गुर्जरों के हाथों बलात्कार का शिकार दलित महिला जब पुलिस के पास गई तो अधिकारियों ने यह कहते हुए प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी की कि वे अभी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में व्यस्त हैं. मीडिया के दबाव और विपक्षी दलों के विरोध के बाद ही आरोपियों को गिरफ्तार किया गया.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में 32 वर्षीया एक दलित महिला के साथ 28 सितंबर को कथित रूप से बलात्कार किया गया था. पुलिस के मामला दर्ज करने से इनकार करने पर 2 अक्तूबर को उसने आत्महत्या कर ली. एक एएसआइ (सहायक उप-निरीक्षक) को अपना काम करने में विफल रहने के लिए निलंबित कर दिया गया है.

जिस तरह यूपी सरकार ने हाथरस मामले में एक एसपी (पुलिस अधीक्षक), एक डीएसपी (पुलिस उपाधीक्षक), एक इंस्पेक्टर और दो अन्य पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है. हालांकि, यूपी के पूर्व डीजीपी (पुलिस महानिदेशक) विक्रम सिंह कहते हैं, ''निलंबन कोई सजा नहीं है. कानून के मुताबिक, उन्हें जेल में होना चाहिए था. 'अपराध के प्रति कोई रियायत नहीं’ वाले नजरिए के बिना, स्थिति नहीं बदलेगी.’’
 
जहां विपक्षी राजनैतिक दलों का कहना है कि योगी आदित्यनाथ सरकार दलितों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने में विफल रही है, तो वहीं तथ्य यह है कि राज्य में किसी भी राजनैतिक दल की सरकार रही हो, दलितों के खिलाफ अपराध बेरोकटोक होते रहे हैं. एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, यूपी ने 2015 से 2016 के बीच दलितों के खिलाफ अपराधों में 25 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई. उस समय राज्य में समाजवादी पार्टी सत्ता में थी.

एनसीआरबी के 2019 के आंकड़ों के अनुसार, 28.6 प्रतिशत के साथ यूपी, दलितों के खिलाफ अपराध की दर (राष्ट्रीय औसत 22.8 प्रतिशत) के मामले में देश में छठे स्थान पर है. दलितों के खिलाफ हुए अपराधों में आरोपपत्र दाखिल करने के मामले में 81.8 प्रतिशत के साथ यूपी का रिकॉर्ड राष्ट्रीय औसत 78.5 प्रतिशत से थोड़ा ऊपर ही है.

एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में सजा की दर यूपी में, देश में दूसरी सबसे अधिक है. यूपी के एडीजी (अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक-अभियोजन) आशुतोष पांडे बताते हैं कि 2019 में दलित महिलाओं के बलात्कार की 535 घटनाएं हुईं और संक्चया के लिहाज से यह सभी राज्यों में दूसरे स्थान पर है, लेकिन प्रति 1,00,000 लोगों पर दलित महिलाओं के बलात्कार के मामले में यूपी 11वें स्थान पर है.

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं, ''जो लोग जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर समाज को विभाजित करते आए हैं, वे अभी भी यही कर रहे हैं. वे विकास नहीं देख सकते, इसलिए नए षड्यंत्र रच रहे हैं. किसी की मृत्यु पर राजनीति करने वालों को पहचानना चाहिए.’’ यूपी पुलिस ने जातिगत संघर्ष के प्रयास के आरोपों में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ कम से कम 19 एफआइआर दर्ज की हैं.
 
आगे की राह
ज्यादातर समाज विज्ञानियों का कहना है कि इन अपराधों को चाहे जाति-आधारित शत्रुता या पितृसत्ता पोषित जहरीली मर्दानगी के चश्मे से देखें, दो ही समाधान नजर आता है—पीडि़तों को सभी व्यवस्थागत सहायता उपलब्ध कराई जाए और समाज को संवेदनशील बनाया जाए जो जातिगत बाधाओं और लैंगिक पक्षपात से ऊपर उठे. इससे भी महत्वपूर्ण बात, दोनों को एक दूसरे की जगह रखकर नहीं देखा जाना चाहिए, दोनों उपायों की साथ-साथ जरूरत है.

तेलंगाना के करीमनगर में सातवाहन विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की प्रमुख प्रो. सुजाता कहती हैं, ''जाति और पितृसत्ता को एक ही समय में संबोधित किए बिना इस तरह के अत्याचारों को रोका नहीं जा सकता. अगर दलित महिलाओं की जिंदगी मायने रखती है, तो शासन और राजनैतिक दलों तथा परिवारों में लैंगिक संवेदनशीलता की आवश्यकता होगी.’’

महिला और दलित-हितैषी प्रणाली की ओर पहला कदम होगा पुलिस को कुशल और सशक्त बनाना क्योंकि ज्यादातर पीडि़तों के लिए पहली बाधा तो एफआइआर दर्ज कराने में ही आती है. एफआइआर दर्ज करने में पुलिस की अनिच्छा या देरी से महत्वपूर्ण समय का नुक्सान होता है, जिससे अक्सर फोरेंसिक सबूत नष्ट हो जाते हैं. निर्भया कांड में एक पुख्ता सबूत जो आरोपियों को दोषी ठहराने में उपयोगी साबित हुआ, वह निर्भया के शरीर पर काटने के निशानों का आरोपियों से मिलान था.

हाथरस मामले में, आगरा में फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला ने बलात्कार का कोई सबूत नहीं पाया. विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है क्योंकि फोरेंसिक सबूत कथित अपराध के 11 दिन बाद एकत्र किए गए थे. महिला ने सामूहिक बलात्कार का अपना पहला बयान 22 सितंबर को दर्ज कराया और आरोपियों के नाम बताए.

सरकारी दिशानिर्देश कहते हैं कि यौन अपराध के 96 घंटे के अंदर फोरेंसिक सबूत एकत्र किए जाने चाहिए. पुलिस इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती है कि मरने से पहले महिला ने दोषियों का नाम लिया है और यह अदालत में स्वीकार्य सबूत है. दिल्ली स्थित वकील और एक महिला अधिकार कार्यकर्ता सीमा मिश्रा कहती हैं, ''बलात्कार एक कानूनी शब्द है, न कि चिकित्सा विज्ञान का. चिकित्सा साक्ष्य के बिना भी सजा बरकरार रखी जा सकती है. मेडिकल साक्ष्य को प्रत्येक मामले में तथ्यों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.’’

ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर फोरेंसिक लैब तक सबूत के पहुंचने में लंबा समय अंतराल होता है. जूनियर पुलिस अधिकारी, जो आमतौर पर घटनास्थल पर पहुंचने वाले पहले व्यक्ति होते हैं, फोरेंसिक सबूतों को संभालने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित नहीं हैं. इसके अलावा, अधिकांश राज्यों में छह केंद्रीय फोरेंसिक लैब और केवल एक राज्य सरकार की लैब है.

नया रायपुर स्थित हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर प्रियंका धर कहती हैं, ''खुद पुलिस के सबूतों को नष्ट करने के उदाहरण हैं, क्योंकि वे नहीं जानते कि अपराध स्थल या पीड़िता के सामान को कैसे संभालना है. कई बार यह जानबूझकर, राजनैतिक दबाव से प्रेरित भी होता है.’’

राजनैतिक दबाव अपराध के ग्राफ को कम रखने के लिए हताशा से उपजा है. यूपी के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह कहते हैं, ''मुख्यमंत्री अक्सर पुलिस से अपराध रिकॉर्ड को नीचे लाने की उम्मीद करते हैं. ऐसा करने के दो तरीके हैं—या तो अपराध का मुकाबला किया जाए या फिर एफआइआर दर्ज न करके उस संख्या को नीचे रखा जाए. दुर्भाग्य से कई पुलिस बल दूसरा और आसान विकल्प चुनते हैं.’’

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस चलन के अपवाद हैं, जिनकी प्राथमिकी दर्ज करने की जिद के कारण राज्य के अपराध ग्राफ में उछाल आया है जिसमें दलित महिलाओं के बलात्कार के मामले भी शामिल हैं. मई 2019 में अलवर सामूहिक बलात्कार के बाद, गहलोत ने ऐलान किया कि यदि स्थानीय पुलिस स्टेशन सहयोग नहीं कर रहे हैं तो एफआइआर सीधे एसपी के पास लिखाई जा सकती है.

1 जुलाई 2019 को राज्य सरकार ने हर शिकायत को अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम (सीसीटीएनएस) पर दर्ज करना अनिवार्य कर दिया, जो देशभर के 15,000 पुलिस स्टेशनों को जोड़ता है. परिणाम दिख रहे हैं. राजस्थान में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में पुलिस के पास लंबित अनुसंधान की दर सबसे कम 8.7 प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय औसत 32.4 प्रतिशत है.

लेकिन अपराध तभी रुकेंगे जब मामले की सुनवाई के बाद अंतत: दोषियों को सजा मिले. 2013 के बाद बलात्कार के मुकदमों की सुनवाई को दो महीने में पूरा किए जाने की बात थी. फिर भी, 2019 में 1,45,632 बलात्कार के मामलों की सुनवाई लंबित थी, और उनमें से 46 प्रतिशत तीन वर्षों से अधिक समय से लंबित थे. केंद्र बलात्कार के मामलों के शीघ्र निबटारे के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित कर रहा है, लेकिन उनका रिकॉर्ड उत्साहजनक नहीं है.

31 दिसंबर, 2019 तक 828 फास्ट-ट्रैक अदालतों में 6,33,370 मामले लंबित थे. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ए.के. सीकरी कहते हैं, ''आधी-अधूरी जांच और सबूतों के साथ हुई छेड़छाड़ के बावजूद न्यायपालिका से जादू की छड़ी घुमाने की उम्मीद नहीं की जा सकती. बलात्कार की शिकायतों से निबटने में एक पुलिस अधिकारी के कौशल की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है क्योंकि वह पीडि़त के आपराधिक न्याय अधिकारियों के साथ सहयोग की इच्छा को प्रभावित कर सकता है.’’

समाज विज्ञानियों का कहना है कि सिस्टम को संवेदनशील बनाने का एक तरीका एससी/एसटी आरक्षित पदों को भरना हो सकता है. अधिकांश राज्यों का इसको लेकर रिकॉर्ड खराब है. टाटा ट्रस्ट के कराए गए 2019 के एक अध्ययन, 'इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ में यूपी में आरक्षित श्रेणी के पुलिस अधिकारी स्तर के 68 प्रतिशत पद रिक्त पाए गए. जातिगत पूर्वाग्रहों पर काबू पाने के लिए भी गहरे सामाजिक आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता होगी.

प्रोफेसर थोराट आंबेडकर की बात याद दिलाते हुए कहते हैं कि इस संकट से राहत तभी संभव है, जब निचली जातियों की अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकी उच्च जातियों से अलग हो जाए. थोराट कहते हैं, ''आंबेडकर ने तर्क दिया कि मिसाल के तौर पर कोई ऐसा गांव है जहां अनुसूचित जाति के लोगों को अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह सवर्णों पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे हालात में इस बात की संभावना बहुत कम है कि वे समान अधिकारों का आनंद लेंगे. इसलिए उन्होंने आय के स्वतंत्र स्रोतों के साथ अनुसूचित जाति के लोगों के लिए अलग बस्तियों या गांवों का प्रस्ताव रखा था.’’

यौन हमले के शिकार लोगों की सहायता के लिए एक एनजीओ निर्भया एक शक्ति की स्थापना करने वालीं अधिवक्ता अनुजा त्रेहन कपूर का दावा है कि भयानक यौन अपराधों की घटनाएं राजनैतिक वर्ग के लिए केवल अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने का साधन बन रही हैं, जबकि मौजूदा प्रावधानों को लागू करने पर उनका कोई ध्यान नहीं है. कपूर कहती हैं, ''जिस तरह से कुछ मामलों को राजनैतिक लाभ के लिए उठाया जाता है, मुझे उसमें एक खास पैटर्न नजर आता है.

उस समय पर भी गौर करने की जरूरत है जब राजनैतिक वर्ग कुछ विशेष मामलों पर प्रकाश डालता है. अपना सियासी मकसद पूरा हो जाने के बाद वे आगे बढ़ जाते हैं. शोर में, असली मुद्दा और समाधान की बात गुम हो जाती है.’’ निर्भया कांड के बाद भाजपा ने इस मामले पर राहुल गांधी की 'चुप्पी’ पर सवाल उठाया था. 2020 में राहुल और प्रियंका गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस हाथरस की घटना के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है. आरोप-प्रत्यारोप के पक्ष बदल गए हैं लेकिन पीडि़तों की किस्मत जस की तस है.


 —साथ में सोनाली आचार्जी, रोहित परिहार, अमरनाथ के. मेनन, अमिताभ श्रीवास्तव, किरण डी. तारे और राहुल नरोन्हा

''जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर समाज को बांटते आए लोग अब भी उसी हरकत में लगे हैं. विकास उन्हें सुहाता नहीं, इसलिए वे नई साजिशें रच रहे हैं. किसी की मौत पर सियासत करने वालों की पहचान करनी ही होगी’’
योगी आदित्य नाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

‘‘बर्बर किस्म के अपराध बढऩे के पीछे कई वजहें हैं. बलात्कार को जब पिछली किसी दुश्मनी से बदला लेने के औजार के रूप में देखा जाने लगता है तो फिर नृशंसता बढऩे लगती है’’
डॉ. वीणा ए. सत्यनारायण, एसोसिएट प्रोफेसर, क्लिनिकल साइकोलॉजी, निमहांस, बेंगलूरू


-1,45,632 मामले, बलात्कार के, लंबित थे 2019 में.

-इनमें से 46 फीसद तो तीन साल से ज्यादा समय से झूल रहे थे.

-बलात्कार के मामलों की सुनवाई के लिए स्थापित 828 फास्ट ट्रैक अदालतों में 31 दिसंबर, 2019 तक 6,33,370 मामले लंबित थे
 

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