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फिर कुलांचें भरेंगे चीते

भारत में चीतों का शिकार इस कदर हुआ कि 1952 तक उनका इस देश से नामोनिशान मिट गया, अब उन्हें फिर से आबाद करने की कवायद जारी, मगर क्या किसी मांसभक्षी जानवर का दुनिया में पहला महादेशीय स्थानांतरण कामयाब हो पाएगा?

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स्थानांतरण की ‌चिंताएं : दक्षिण अफ्रीका में वेल्ला वेल्ला के पास एक संरक्षित वन से क्वारंटीन वाड़े में दो चीते भारत की ओर रवाना होने को तैयार स्थानांतरण की ‌चिंताएं : दक्षिण अफ्रीका में वेल्ला वेल्ला के पास एक संरक्षित वन से क्वारंटीन वाड़े में दो चीते भारत की ओर रवाना होने को तैयार

भारत के बिल्कुल मध्य के आसपास कहीं, सर्दियों की एक सुबह, कोहरे में धूप इस तरह छितरा रही है कि चमकदार धुंध में बदल गई है, जो वक्त की चाल को रोकती मालूम देती है. पक्षियों की चहचहाहट मृदु, सुरीली और ज्यादातर सौहार्दपूर्ण है. पुआल के रंग की ऊंची घास में कहीं सुगठित, मुरझाए बादामी चेहरे पर ऊंची जड़ी एक जोड़ी पुखराज आंखें भीतर की ज्योति से प्रज्ज्वलित हैं. चेहरे से नीचे की तरफ जाती आंसुओं की बूंद सरीखी दो गाढ़ी धारियां मानो चिमटे के एक जोड़े की तरह उन्हें थामे हैं.

वे उस भूदृश्य को बारीकी से ताक रही हैं जो 72,000 साल पहले से पिछली सदी की शुरुआत तक कहीं भी स्थित हो सकता है. दूर क्षितिज पर अपनी नजर के 210 डिग्री कोण के भीतर कहीं उसे कुछ हलचल नजर आती है. शायद कोई मादा चीतल है, पांच किलोमीटर दूर. इतनी दूरी पर भी उसकी लेजर की तरह तीखी आंखें जादुई चित्रात्मक समानता को ताड़ सकती हैं—और यह समानता है हिरण की देह पर फैले धब्बे, ठीक उसके अपने धब्बों की तरह. फिर वह खेल शुरू होता है जिसका वास्ता जिंदगी के इतिहास में चलचित्र के सबसे रोमांचकारी नजारे से हो सकता है.

वह दुबककर बैठी देह सरपट ऐसा फर्राटा भरती है कि बीच की मीलों लंबी दूरी आहिस्ते से निगल लेती है, और फिर..आखिर में...गजब की पूरी रफ्तार, बलखाती अविश्वसनीय ताकत, कुछ मौकों पर चारों पंजों के जमीन छूते वक्त आगे और पीछे लहराती कंधे की हड्डी के साथ यह आलीशान जंगली जानवर तकरीबन पूरी तरह हवा में है और इसी तरह अपने और शिकार के बीच बचे घास के मैदान का आखिरी टुकड़ा 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से पलक झपकते तय करता है. जमीन पर पाया जाने वाला एक ही जानवर इस नजारे को अंजाम दे सकता है और वह है—चीता.

यह नजारा भारत के सुदूर अतीत का भी नहीं है, बल्कि किस्मत ने थोड़ा साथ दिया तो 2022 की सर्दियों में फिर इस देश में घटित होगा. जिस जगह यह घटित होगा, वह है उत्तर-पश्चिमी मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क, जहां दूसरी जगहों पर ले जाकर बसा दिए गांवों की पूर्व खेती की जमीनों को हरे-भरे घास के मैदानों, बीच-बीच में छितराई झाड़ियों, पतझड़ी जंगल, और मशहूर टाइगर रिजर्व रणथंभौर सरीखे राजस्थान के सटे हुए समान इलाकों की शक्ल में नई जिंदगी दी गई है.

नामीबिया से ऐसे आठ चौपायों के स्थानांतरण के जरिए भारत में चीतों का फिर दिखाई देना अपने आप में उल्लेखनीय घटना है. ऐसा इसलिए क्योंकि चीतों को उनका नाम 'चीता’ हिंदुस्तान से ही मिला, जो संस्कृत के 'चित्रक’ से निकला है, वहीं इस भूभाग में आखिरी बार चीता का ठीक 75 साल पहले शिकार किया गया था. भारत के मूल या देसी चीतों में से आखिरी तीन 1947 में देखे गए, जो पराजय का एक पहलू था (देखें, और फिर वहां एक भी नहीं था...).

तस्वीर वहां ली गई जो आज का छत्तीसगढ़ है और जिसमें उनकी लंबी, छरहरी देह कोरिया के महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के चरणों में निढाल और बेजान पड़ी थी. 1952 में चीता आजाद हिंदुस्तान में विलुप्त घोषित किया गया पहला जानवर बना—फिर भले ही 60 के दशक में कुछेक अलग-थलग, झुंडों के बगैर शायद बचा रह गया हो. उस स्थिति को अब उलटने की कोशिश की गई है, उस अभियान में जो दुनिया में जंगल के किसी विशाल मांसभक्षी जानवर का पहला अंतरमहाद्वीपीय स्थानांतरण होगा.

भारत की आजादी के 75 साल पूरे होने के महज एक महीने बाद कुछ इने-गिने चीते नियंत्रित जंगली बाड़े में अपने पंजों के बल चलते हुए उस देश की खुली हवा में सांस लेंगे जिसने हजार साल उनकी मेजबानी की और उन्हें उनका नाम दिया—और उन पर इतने जुल्म भी ढाए कि उनका नामोनिशान तक मिट गया. यह ऐसी परियोजना है जो महत्वाकांक्षी भी है और एहतियात से तैयार की गई है, फिर भी जोखिम भरी है, और जिसमें चीतों के पदचिह्नों पर न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के वन्यजीव विशेषज्ञ गहरी दिलचस्पी के साथ नजर रखेंगे.

धब्बेदार इतिहास

प्यूमा वंश एसीनोनिक्स जुबाटस की यह 'छोटी-सी बड़ी बिल्ली’ भारत के लिए उतनी अपनी और स्थानिक थी, जितनी पैंथेरा परिवार की इसकी चचेरी जंगली बिल्लियां यानी बाघ और तेंदुए थे. दरअसल हाल के जेनेटिक अध्ययन, जिनमें 19वीं सदी के मध्य प्रदेश के इस चीते के अवशेषों पर किए गए अध्ययन भी शामिल हैं, प्रजातियों के समयकाल के पैमाने पर पहले सोचे गए वक्त से कहीं ज्यादा—करीब 72,000 साल—पहले अफ्रीकी प्रजाति से ज्यादा गहरे विभाजन की बात कहते हैं. लिहाजा, चीते सैकड़ों हजारों की तादाद में सहस्राब्दियों से हमारे देश के भूभागों की खाक छानते थे.

ठीक वैसे ही जैसे वे दूसरे महाद्वीपों की खाक छानते थे. दक्षिण अफ्रीका से लेकर, जहां ए. जुबाटस का करीब 3.9 एमवाइए (मिलियन वर्ष पूर्व) पुराना सबसे शुरुआती जीवाश्म मिला है. प्राचीन मिस्र और सुमेर तक, जहां तस्वीरों और प्राचीनग्रंथों की किंवदंतियों में पालतू बनाए गए चीतों के प्रमाण सामने आते हैं. महाद्वीपीय यूरोप तक, जहां वे ईसा पूर्व 30,000 वर्ष पुरानी चाउवेट गुफा पेंटिग में चित्रित हैं.

यूरोप और अमेरिका में आखिरी हिम युग के पटाक्षेप के वक्त हुए प्लेस्टोसीन यानी बड़े स्तनधारी जानवरों के एक किस्म के सर्वनाश के अंत में विशाल जंतुओं के सामूहिक विनाश या उन्मूलन से बच नहीं सके, और जिसमें लंबे-तीखे दांतों वाले बाघ और विशालकाय ऊनी हाथियों का भी सफाया हो गया. चीता अफ्रीका, पश्चिम एशिया/मिस्र, और भारत में बचा रह गया. फिर भी वह मानव हाथ, जिसे उनके सामूहिक विनाश की उन घटनाओं के लिए बड़ी हद तक दोष दिया जाता है, अपनी हरकतों से बाज नहीं आया.

चीते का शिकार अपने आप में एक चीज थी और बेरहम थी. मगर संयोग से ऐतिहासिक युग भी चीतों की कोर्सिंग—यानी शिकार का वह खेल जिसमें पालतू चीते वही भूमिका निभाते हैं जो शिकारी कुत्ते निभाते हैं—से भरा पड़ा है. चीते की एक कमजोरी उसका खास गुण है: यह इनसान के प्रति मोटे तौर पर आक्रामक नहीं है और करीब साल भर बाद पालतू बनाया जा सकता है, पर शिकारी कुत्तों के विपरीत कैद या दासता में प्रजनन नहीं कर सकता.

शाही दरबार और राजनय के वृत्तांत जिन चीतों से भरे पड़े हैं और जो पवित्र रोमन साम्राज्य से लेकर मुगल दरबार तक प्रतिष्ठा के प्रतीक बन गए थे, वे सब जंगल से पकड़े गए थे. फिरौनों से लेकर चंगेज खान (जो अपनी काठी पर चीते के साथ सवारी करना पसंद करता था) तक और 16वीं सदी में दसवें पोप लियो तक, जिन्हें तोहफे में विदेशी जानवर अच्छे लगते थे, सभी इसमें शामिल रहे. यूरोप से लेकर भारत तक राजा किस्म के अनगिनत लोग भी.

अकबर पर तो चीतों की सनक-सी सवार थी और अपने जीवनकाल के दौरान उसने करीब 9,000 चीते रखे—उसके यहां उनकी तादाद 1,000 से कम कभी नहीं हुई. उसके पसंदीदा चीते समंद मलिक को रत्नजड़ित अंगरखे में सजाया जाता था, जिसे वर्दीधारी सिपाही उठाकर चलते थे, और मिनिएचर पेंटिंग में चित्रित किया जाता था. मगर, अकबर के बेटे जहांगीर ने लिखा है कि कैद में रखे गए उन हजारों चीते में से केवल एक ने संतति जनी. इस जंगल की आबादी पर जबरदस्त दबाव आ गया.

गायब होना...

सामाजिक हैसियत की काफी निचली पायदान पर, श्योपुर जिले में कूनो नदी के किनारे रेशम कॉलोनी में बलुआ पत्थर की दीवार वाली झोपड़ी में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर दिनेश आदिवासी, जो सहरिया जनजाति के हैं, सितंबर 2022 में इतिहास के साथ अपने इलाके की इस मुलाकात का इंतजार कर रहे हैं. उनका नजरिया राजाओं और आम लोगों की कहानियों को अनूठे ढंग से जोड़ता है. उनके पुरखों ने शायद ग्वालियर के महाराजाओं के साथ शिकार के दिलबहलाऊ अभियानों में मुलाजिम या सहायकों के तौर पर हिस्सा लिया था. 

इस जानवर की तादाद औपनिवेशिक युग की शुरुआत तक काफी कम हो गई थी, क्योंकि चीतों की कोर्सिंग या आखेट के तौर पर उनका शिकार तब तक खासा घट गया था—फिर भले ही वे 20वीं सदी के शुरुआती वर्षों तक जिंदा रहे हों, जैसा कि 1939 के एक वीडियो और अफ्रीका से उनके पहले स्थानांतरण के प्रमाण से तस्दीक होती है. 

ग्वालियर के महाराजा ने 1920 में अपनी रियासत के जंगलों में अफ्रीकी शेर लाने की कोशिश की थी, ताकि बाद में उनका शिकार कर सकें. संरक्षणवादी दिव्यभानुसिंह की 2005 की किताब द स्टोरी ऑफ एशिया’ज लायंस के मुताबिक जूनागढ़ के शासक ने उन्हें अपने इलाकों में जाहिरा तौर पर शिकार की इजाजत नहीं दी.

इसकी तस्दीक करते हुए ग्वालियर रियासत और बाद में जयपुर के भी 'शिकार अधिकारी’ कर्नल केसरी सिंह 1959 की अपनी किताब में लिखते हैं कि किस तरह महाराजा माधो राव सिंधिया 1920 में अफ्रीका से छह सिंह शावक लाए थे, जिन्हें कूनो के आसपास छोड़कर प्रजनन करवाया गया. बाद में ये मवेशी-चोर और नरभक्षी बन गए और उन्हें मारना पड़ा. उनमें से एक को पन्ना में गोली मारी गई और दूसरे को झांसी में.

व्यापक पैमाने पर शिकार के शौकीन ब्रिटिश या अंग्रेजों का झुकाव बिग गेम हंटिंग यानी मांस और व्यावसायिक तौर पर बेशकीमती अंगों की खातिर शिकार की तरफ था. उन्होंने चीतों के साथ कीड़े-मकोड़ों सरीखा बर्ताव किया, जो मारने के लिए ही बने हैं, ताकि बाघों और शेरों की उनकी बेशकीमती ट्रॉफियों को ज्यादा बड़ी पहचान दी जा सके. चीतों के शिकार पर इनाम रखे गए, जो वयस्क चीते के लिए 6 रुपए से 18 रुपए तक था.

अशोका विश्वविद्यालय में इतिहास और पर्यावरणिक अध्ययनों के प्रोफेसर महेश रंगराजन कहते हैं, ''ब्रिटिश काल के दस्तावेज बताते हैं कि इनाम के लिए चीतों का शिकार किया गया, क्योंकि उन्हें भेड़-बकरी उठाते देखा गया था. आखेट के लिए उनका शिकार किया गया और उन्हें फंसाया भी गया. इसके अलावा चीतों के वासस्थानों पर भी दबाव था और वे वनों की कटाई की वजह से सिकुड़ रहे थे, जिन्हें खेती के लिए साफ किया जा रहा था.

ज्यादा अहम यह कि उनके आहार पशुओं के आधार में तेज गिरावट आई, जिसकी वजह से आबादी बहुत कम हो गई. यह न केवल भारत बल्कि उस समूचे एशिया के लिए भी सच है जहां पहले चीता पाया जाता था.’’ रंगराजन यह भी कहते हैं कि शिकार के दस्तावेजों से पता चलता है कि विलुप्त होने से पहले ठेठ दक्षिण में तिरुनेल्वेली से लेकर झारखंड में पलामू तक चीतों की आबादी दर्ज की गई थी.

कोरिया में बंदूक की आखिरी गोली गूंजने के पचहत्तर साल बाद सटीक ब्योरों से तो दिनेश शायद आज भी नावाकिफ ही हैं, पर उन्हें इतना पता है कि इसका असर उनके सामाजिक पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ेगा. देसी राजघरानों से लेकर शारलेमेन और फिर इंदिरा गांधी तक सत्ता पर काबिज लोगों में हमेशा खूबसूरत परभक्षियों के साथ जुड़ने की एक ललक थी. दरअसल अफ्रीका से चीते लाने का विचार 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के वक्त जन्मा.

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उस प्रतिष्ठा सूची में शामिल हो रहे हैं और उस कहानी को आगे ले जा रहे हैं. अपने जन्मदिन 17 सितंबर को वे जाखोड़ा में, जो दिनेश के घर से ज्यादा दूर नहीं है, निजी तौर पर अपने हाथों से अफ्रीका से आयात किए गए तीन नए चीते बोमा (खास ढंग से बनाए गए बाड़े के लिए अफ्रीकी शब्द) में छोड़ेंगे. यहां की जलवायु के हिसाब से उन्हें ढालने के एक महीने बाद रेडियो कॉलर से लैस ये चीते ज्यादा बड़े बाड़े में ले जाए जाएंगे और फिर दो-एक महीनों में उन्हें जंगल में छोड़ दिया जाएगा.

शंकालुओं के बावजूद, चौतरफा पशुप्रेमियों को उम्मीद है कि चीतों की वह असंदिग्ध रोएंदार खाल—उसके साथ लंबाई में औसतन चार फुट और ऊंचाई में महज ढाई फुट लटका, हैरतअंगेज ढंग से सुंदर तथा सजीले लंबे-लंबे डगों में कुलांचे भरता, वह पीले-सांवले रंग का चितकबरा लबादा—भारत में फिर आम नजारा बन जाएगा. दुनिया भर के पारिस्थितिकी वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह इस सबसे दुलारे जानवरों में से एक की कहानी का निर्णायक मोड़ होगा, जो पिछली सदी के मोड़ पर करीब 1,00,000 की वैश्विक आबादी से घटकर 2016-17 में 7,100 रह गए हैं.

कूनों के आसपास यह कहानी शुरू भी हो चुकी है. चहलपहल का माहौल है. कुछ दिनों से कूनो के पुल पर सामान्य से ज्यादा तेज रफ्तार से आती-जाती सफेद सरकारी गाड़ियों के काफिले दिनेश की नजरों के सामने से गुजर रहे हैं, जिससे शायद उस जानवर के साथ उनका मन मिलने की झलक मिलती है जिसे वे यहां लाने की उम्मीद संजोए हैं. नामीबिया में एक महीने पहले पकड़े गए ये चीते 16 सितंबर को एक चार्टर्ड कार्गो उड़ान से विंडहोक से जयपुर लाए जाएंगे.

आयातित मेहमानों की यात्रा के अंतिम चरण में अगले दिन उन्हें 40 मिनट के हेलिकॉप्टर के सफर से कूनो के भीतर एक पुराने गांव पालपुर लाया जाएगा, जहां पांच हेलीपैड बनाए गए हैं. स्थानांतरण के दौरान लंबे सफर की दुश्वारियां जानवरों को भी झेलनी ही पड़ती हैं—वे तनाव से गुजरेंगे, वजन घट जाएगा और कुछ वक्त के लिए सुध-बुध खो बैठेंगे. इससे जंगल के लिए उनका दम-खम भी घट जाएगा. कूनो में, जहां शिकार के छोटे पशुओं के बेहतरीन मांस की बड़े एहतियात से व्यवस्था की गई है, बगैर किसी प्रतिस्पर्धा के महीने भर रहकर उनका कुछ जोश और जज्बा लौट आना चाहिए.

उसके बाद वे कूनो के 750 वर्ग किमी के फैलाव में बेरोकटोक हुंकार भरेंगे. तो, संभावनाएं क्या हैं? कुदरत के साथ इस विराट प्रयोग मैं कौन-से जोखिम निहित हैं? प्रतीकात्मकता से आगे असल फायदे क्या हैं? ये तो बस कुछेक बड़े सवाल हैं जो इस परियोजना में अपना तन-मन-धन लगाने वाले हर व्यक्ति के दिलो-दिमाग को मथ रहे हैं.

कुछ हकीकत तो ब्योरों में छिपी है. आरंभिक स्तर पर भी परियोजना तभी कामयाब होगी जब चीते जिंदा रहेंगे और फलेंगे-फूलेंगे. फिर यह दूसरे और तीसरे दौर का मार्ग प्रशस्त करेगा. 11 सितंबर को पालपुर में तैयारियों की समीक्षा करते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, ''दक्षिण अफ्रीका से बारह और चीते आने वाले हैं. कुल 25 से ज्यादा चीते भारत आएंगे. परियोजना अगले पांच साल चलेगी.’’

कई बहुत नित-नित बदलने वाली चीजें इस अल्प संस्थापक आबादी के जिंदा रहने से जुड़ी हैं. एक तो उनका आहार बनने वाले शिकार जानवरों की मौजूदगी ही है. अपनी छरहरी कद-काठी के कारण चीता आम तौर पर छोटे जानवरों का शिकार करता है—यहां उनका आहार भी बदल जाएगा, जो नामीबिया में इंपाला हुआ करते थे और यहां चीतल (चकत्तेदार हिरण) और चिंकारा होंगे, पर इससे वे संभवत: काम चला लेंगे.

पारंपरिक तौर पर पहले कोर्सिंग यानी दूसरे जानवरों का चारा दिखाकर उनका शिकार करने के दिनों में उन्हें कुछ बड़े जानवरों के लिए प्रशिक्षित करना पड़ता था—वरना वैसे तो चीते जंगल में काले हिरण से भी परहेज करते हैं. लिहाजा हिरण, मृग और जंगली सूअरों के साथ, जो कूनो में परोसे गए बुफे का हिस्सा हैं, बछड़े और मझौले जानवर नाश्ते के मीनू का हिस्सा बन सकते हैं. मगर यह बमुश्किल ही जोखिम से मुक्त है.

दूसरा छोटा-सा मामला प्रतिस्पर्धा का है. कूनो में तेंदुए और बाघ रहते हैं. तेंदुए कुल करीब 65 या प्रति 100 वर्ग किमी में नौ हैं. बाघ यहां से महज 80 मील दूर रणथंभौर आने-जाने के लिए जाने जाते हैं. खाने की मेज पर नए मेहमानों को देखकर वे बहुत खुश होंगे, इसकी संभावना नहीं है. फिर बड़ी बिल्लियों की जमात में हिंसा के प्रति चीते सबसे ज्यादा कमजोर और बेबस होते हैं.

स्थिर पारिस्थितिकी आवास के भीतर तमाम किस्म की परभक्षी प्रजातियां एक मंडली के रूप में काम करने के लिए जानी जाती हैं, जिसमें अगर वे ठीक-ठीक सहयोग न भी करें तो एक दूसरे को बर्दाश्त करती हैं, लेकिन तभी तक जब तक कि वहां उन्हें पर्याप्त खाना उपलब्ध हो. संतुलन बदलते ही मंडली के भीतर होड़ मच जाती है.

यही वजह है कि कार्य योजना में कूनो के तेंदुओं को भी रेडियो कॉलर से लैस करने का ध्यान रखा गया है, ताकि उनके आपसी मेलजोल पर नजर रखी जा सके. एक अकेला नर तेंदुआ—बनिस्बतन छोटा भलामानुस, पर ज्यादा भारी और ज्यादा खूंखार—चीतों को खदेड़ सकता है या बुरा दिन हुआ तो उन्हें अपना निवाला भी बना सकता है. दुष्ट जीव लकड़बग्घे का तो जिक्र ही क्या, जिनकी कूनो में कोई कमी नहीं है. चीते के एक साथ पैदा हुए शावकों की मृत्यु दर आम तौर पर 90 फीसद है.

इन मुश्किलों के आगे कामयाब होने के लिए सबसे पहले संस्थापक आबादी में दमखम होना जरूरी है—वे अलग-अलग तगड़े और हट्टे-कट्टे हों और स्वस्थ विस्थापन दर पर प्रजनन करने में सक्षम हों. इस मोर्चे पर भी कुछ सवाल उठाए गए. पता यह चला कि भारत भेजने के लिए चुने गए तीन मूल चीते कैद में जन्मे और पले थे—भारतीय अधिकारियों ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया, तब कहीं जाकर उन्हें खुले में विचरने वाले चीतों से बदला गया. मगर परिभाषाएं भी थोड़ी ढीली-ढाली हैं. अब कहा यह जा रहा है कि तीनों चीते पैदा तो जंगल में हुए थे पर कुछ वक्त उन्होंने बाड़ों में बिताया.

निर्णायक तैयारी से पहले लैंगिक अनुपात को लेकर भी अस्पष्टता थी. शुरुआत में कहा गया कि पहले समूह में चार मादा और चार नर हैं, जो स्थानांतरण की पारंपरिक समझदारी के खिलाफ था. ऐसे प्रयोगों के लिए समूह में मादा हमेशा ज्यादा रखी जाती हैं. शीर्ष सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि वहां की आबादी में मादा चीतों की कमी के कारण यह उलझन हुई. यही नहीं, मादा चीतों में से एक ने पकड़े जाने के बाद शावक को जन्म दिया और उसे बदलना पड़ा; एक अन्य की मौत हो गई. अंतिम फेहरिस्त अच्छी है: तीन नर, पांच मादा.

आठ चीते अपना सामाजिक विन्यास कैसे विकसित करते हैं, यह बेहद अहम होगा. चीते आम तौर पर तीन बनावटों में रहते हैं—अकेली मादा चीता शावकों के साथ, एक ही पेट से जन्मे नर चीतों का समूह जिसे 'गुट’ या 'गठजोड़’ कहा जाता है, और जंगल में मुक्त घूमने वाला अकेला घुमक्कड़ चीता. मादा चीता स्वच्छंद संसर्ग करने वाली होती है और ऐसे में कोई नहीं चाहेगा कि जंगल में विदेश से लाए गए दो महंगे चीतों के बीच जानलेवा टकराव हो.

इस परियोजना में बहुत कुछ दांव पर लगा है. एक तो 91.65 करोड़ रुपए की लागत ही है. इसलिए हर कोई उम्मीद कर रहा है कि आहार जानवरों, ज्यादा प्रचंड स्तनधारी बिल्लियों के परिवारों के कजिन, दूसरे विभिन्न प्रतिद्वंद्वियों और एक समूह के भीतर के चीतों के बीच नाजुक सामाजिक मेलजोल काफी कुछ अच्छी तरह संपन्न हो. अगले दौर में फिर कूनो में स्थिर स्रोत आबादी तैयार करने की कोशिश की जाएगी, जो अंतत: राजस्थान के मुकुंदरा, शेरगढ़ और भैंसरोडगढ़ तथा मध्य प्रदेश के माधव नेशनल पार्क व गांधी सागर अभयारण्य सरीखे दूसरे रिजर्व को भी गुलजार करेगी.

एक और सवाल व्यापक पारिस्थितिकी से जुड़ा है. क्या इसकी राजसी प्रदर्शनकारी वस्तु होने से ज्यादा कोई अहमियत है—चिड़ियाघरों के उन बाद के दिनों के संस्करणों के समान, जिन्हें पर्यावरण के लिहाज से सही ध्वनियों के साथ उन्नत किया गया है? (संयोग से चिड़ियाघर पिछली पूरी शताब्दी में चीतों को सर्वनाश करने के बाद वन्यजीवन के विनाश की मानवीय कलाकृति रहे हैं, जिसे स्वीकार तक नहीं किया जाता.)

प्रोजेक्ट टाइगर इसकी एक मिसाल है. यह जाना-माना तथ्य है कि खाद्य शृंखला के शीर्ष पर होने के कारण बाघों की आबादी के मजबूत होने का मतलब समूचे पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण भी है जिसे मात्रा में नहीं नापा जा सकता. सावधानी से संभाला जाए तो यह उपेक्षित वासस्थानों को बहाल कर सकता है, जैव विविधता का संरक्षण कर सकता है और अधिकतम क्षमता तक कार्बन को छितराने के लिए अपनी क्षमता का दोहन कर सकता है.

लगे हाथ ईकोटूरिज्म को बढ़ावा देने से दिनेश सरीखे स्थानीय लोगों की आजीविकाओं को कोई नुक्सान नहीं पहुंचेगा—मसलन, जंगल से जुड़े हुनर से लैस ''विशेषज्ञ वनवासी’’ के तौर पर सूचीबद्ध सहरिया आदिवासी बेहद गरीब हैं, उनमें कुपोषण का स्तर बहुत अधिक है और उनमें से केवल कुछेक ही सिंचाई के कमी वाले क्षेत्रों में खेती पर निर्भर कर पाते हैं.

कूनो क्यों?

2009 में, जब चीता को फिर से लाने की परियोजना पर काम सही ढंग से शुरू हुआ, तब कूनो पालपुर अभयारण्य (उसे तब इसी नाम से जाना जाता था) को पहले से ही गिर से एशियाई शेरों को स्थानांतरित करने के लिए एक व्यवहारिक निवास स्थान के रूप में योग्य पाया गया था.

जब चीता योजना ने आकार लेना शुरू किया, तो देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) ने मध्य प्रदेश के कूनो और नौरादेही तथा राजस्थान के शाहगढ़ में अध्ययन किया और उन्हें उपयुक्त पाया. जब जनवरी 2020 में मृतप्राय-सी पड़ी परियोजना में फिर से जान आई, तो डब्ल्यूआइआइ ने पूरे देश में 10 जगहों का मूल्यांकन किया, जिसमें कूनो को चीतों के लिए सबसे उपयुक्त पाया गया.

कौन-सी बातें कूनो के पक्ष में गईं? पहली, शेरों को कूनो में लाने के लिए जमीन पर किया गया शुरुआती काम, जैसे कि 24 गांवों को स्थानांतरित करना, जिससे यह रिजर्व इनसानी आबादी से मुन्न्त हो गया था. दूसरी, इन शिकारी जानवरों को उनकी जरूरतों के लिए शिकार की पर्याप्त गुंजाइश. तीसरा, यह काठियावाड़ गिर के सूखे पर्णपाती पारिस्थितिक क्षेत्र के वन-घास के मैदान का हिस्सा है, जिसमें सलाई, करधई, खैर और सवाना के साथ धब्बेदार तेंदू जैसी वृक्षों की प्रमुख प्रजातियां पाई जाती हैं.

चौथी चीज थी जलवायु. चीता 23-40 डिग्री सेल्सियस वाले तापमान क्षेत्रों में सबसे अच्छे तरीके से विकास करता है और विशेष रूप से अपने शुष्क/अर्ध-शुष्क वातावरण के कारण कूनो इसके लिए उपयुक्त है. 1981 में पहली बार 344 वर्ग किमी क्षेत्र के साथ कूनो को एक अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया था, जिसे 2018 में 413 वर्ग किमी के साथ राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दे दिया गया. यह ग्वालियर के सिंधिया शासकों का पसंदीदा शिकार क्षेत्र हुआ करता था और बाघों के साथ यहां चीतल भी खूब पाए जाते थे.

हालांकि संशयवादी अब भी आश्वस्त नहीं हैं और उनके तर्क चीतों के आहार के लिए शिकार के पर्याप्त आधार और उनके निवास स्थान के रूप में इस क्षेत्र की उपयुक्तता के इर्द-गिर्द घूमते हैं. वन्यजीव संरक्षणवादी वाल्मीक थापर, जिन्होंने अपनी किताब एग्जॉटिक एलियंस में लिखा है कि यह उपमहाद्वीप ऐतिहासिक रूप से शेरों और चीतों का मूल स्थान नहीं है, विरोधियों के तर्क का मुख्य आधार उनकी यह टिप्पणी बन रही है.

इंडिया टुडे  से बातचीत में थापर बताते हैं कि चीते के लिए जरूरी विशाल घास के खुले मैदान भारत में मौजूद नहीं हैं और ज्यादा से ज्यादा उन्हें बाड़ वाले क्षेत्रों में रखा जा सकता है, जहां संभवत: उन्हें हाथ से खिलाया जाए या फिर उनके लिए शिकार का चारा डाला जाए. थापर कहते हैं, ''अफ्रीका में 400 अलग-अलग चीतों को देखने और जानवरों की हर बारीकियों का अध्ययन करने के बाद, मैं यही कह सकता हूं कि मैंने भारत में ऐसी कोई ऐसी जगह नहीं देखी  जहां चीतों को मुक्त रूप से रहने के लिए पर्याप्त शिकार उपलब्ध हो.

जिस चीते को लाया जा रहा है वह एक विदेशी प्रजाति है और वह अपने मूल निवास क्षेत्र में भी बेहद नाजुक प्रजाति मानी जाती है.’’ वे आगे देते हैं, ''यहां तक कि पूर्वी सेरेनगेटी में, जहां चीते के लिए शिकार को 10 से 15 लाख जानवर उपलब्ध हैं, वहां भी इसके शावकों की मृत्यु दर 90 प्रतिशत है.’’ वे चाहते हैं कि जो पैसा चीतों पर खर्च किया जा रहा है उसे बाघ, शेर और हाथी जैसी प्रजातियों के संरक्षण के लिए खर्च किया जाए. 

जहां थापर चीतों को लाकर बसाने के खिलाफ हैं वहीं एक पूर्व आइएएस अधिकारी और केंद्र सरकार के वन्यजीव निदेशक एम.के. रंजीतसिंह का कहना है कि चीता भारत के लिए विदेशी प्रजाति बिलकुल नहीं हैं. वे तर्क देते हैं, ''हुमायूं अगर चीतों को भारत लाया, तो हजारों साल पहले बने रॉक आर्ट (पत्थरों पर बनी कलाकृति) में हमें उनका जो चित्रण मिलता है, उसको लेकर क्या कहेंगे?’’ वास्तव में, खैराबाद और खैरवई जैसी साइटों पर रॉकआर्ट में चीते की आकृतियां पाई गई हैं.

ये आकृतियां दक्षिण अफ्रीका के सैन रॉक आर्ट जैसी भव्य नहीं हैं, तो भी इनमें अंकित शिकारी बिल्ली की पतवार जैसी पूंछ, चीते को लेकर संशय की ज्यादा गुंजाइश नहीं छोड़ती. रंजीतसिंह, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में चीता के स्थानांतरण की निगरानी के लिए विशेषज्ञ समिति का प्रमुख नियुक्त किया था, कहते हैं, ''इसके अलावा, अकबर के पास हजारों की संख्या में चीते थे.

फिर तो उन्होंने एक बहुत ही सफल संरक्षण कार्यक्रम चलाया होगा तभी उनके पास इतनी बड़ी संख्या में चीते उपलब्ध हो सके. और चीते जंगलों में ही जीवित रह सकते हैं. और जिस आखिरी चीते को गोली मारी गई थी वास्तव में वह साल के जंगल में मौजूद था, न कि घास के मैदान में.’’ 

कूनो में लगभग प्रति वर्ग किमी में 30 चीतल हैं. डब्ल्यूआइआइ के डीन डॉ. वाइ.वी. झाला बताते हैं, ''कुल शिकार आधार लगभग 20 चीतों के लिए पर्याप्त होगा. एक बार जब कूनो के आसपास के क्षेत्र विकसित हो जाते हैं, तो हम संभवत: 40 चीतों तक को रख सकेंगे. और कूनो के 750 वर्ग किमी में कोई जंगली कुत्ते या गांव नहीं हैं.

हमारी योजना एक प्रबंधित मेटा पॉपुलेशन (अलग-अलग जीवों के लिए अलग क्षेत्र जहां जीवों के बीच आपसी संबंध बना रहता है) रखने की है. हमने मूल्यांकन किया कि सभी आशंकाओं के बावजूद सफलता की अधिक संभावना है.’’ इसे आइयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर) रीइन्ट्रोडक्शन ग्रुप के दिशानिर्देशों के अनुसार डिजाइन किया गया है. इसमें संभावित मृत्यु दर को 50 प्रतिशत तक रखा गया है. 

चीतों के स्थानांतरण की कहानी का नवीनतम अध्याय, जो 2009 में यूपीए के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के कार्यकाल में शुरू हुआ, तुरंत ही विवादों में आ गया. 2013 में, विरोधियों ने सुप्रीम कोर्ट को इस पर रोक लगाने को राजी कर लिया. 2017 में, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने स्पष्टीकरण मांगा और जनवरी 2020 में जाकर तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश शरद बोबडे ने इसे मंजूरी दी. जस्टिस बोबडे ने इंडिया टुडे को बताया, ''बेंच ने बहुत सावधानी बरती. सभी नफे-नुक्सान को विस्तार से समझने और तोलने के बाद ही अदालत ने प्रयोगात्मक आधार पर इस पर सहमति व्यक्त की.’’ 

इस प्रकार भारत ने अपने प्राकृतिक इतिहास को फिर से लिखने का प्रयास शुरू किया. कूनो के पास कई और दुविधाएं भी हैं. यहां पर शेरों के स्थानांतरण की योजना अभी समाप्त नहीं हुई है-रिजर्व के प्रवेश स्थान टिकटोली में हाल ही में बनाए गए चित्र में एक शेर को भी दर्शाया गया है. लेकिन, अभी तो सारी कहानी दुनिया की उस एकमात्र बड़ी बिल्ली की है जो दहाड़ती नहीं है.

यह बिल्ली शिकार के लिए निकल जाए तो उसे मार गिराए बगैर अपने पंजे वापस नहीं खींचती. उसके पंजे जमीन पर उसी तरह धंसते हैं जैसे किसी एक धावक के जूतों में लगे स्पाइक्स, जो उसे उछाल देते हैं. वह दृश्य जिसने प्राचीन कलाकारों को इतना रोमांचित किया है कि उन्होंने इसे अपनी कलाकृतियों में शामिल किया, हो सकता है इस महाद्वीप में वह दृश्य एक बार फिर से देखने को मिलने लगे. 

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