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''मैं समझ गया हूं कि लोग यहां बस इज्जत चाहते हैं''

बशीरुल हक चौधरी ने जिला युवा केंद्रों की स्थापना से नौजवानों को जोड़ा है. ये युवा केंद्र कौशल विकास की कक्षाएं लगा रहे हैं और इनमें जिम तथा डिजिटल लाइब्रेरी सरीखी सुविधाएं भी हैं

बशीरुल हक चौधरी 33 वर्ष, उपायुक्त, पुलवामा बशीरुल हक चौधरी 33 वर्ष, उपायुक्त, पुलवामा

पुलवामा को कश्मीर के धान के कटोरे और उम्दा केसर के ठिकाने के तौर पर देखा जाता था. फरवरी 2019 में भारतीय सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ कायराना आतंकी हमले और उसमें 40 की जान जाने के बाद दक्षिण कश्मीर के पड़ोसी जिलों शोपियां, सोपोर और अनंतनाग के साथ इसे उग्रवाद का अड्डा माना जाने लगा. कश्मीर के ज्यादा प्रगतिशील जिलों में से एक होने की इसकी छवि बहाल करने का जिम्मा अब इसके 33 वर्षीय उत्साही उपायुक्त (डिप्टी कमिश्नर) बशीरुल हक चौधरी के कंधों पर है.

चौधरी के लिए हिंसा नई बात नहीं है. वे उस वक्त राजौरी में पले-बढ़े जब तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य सचमुच लपटों में घिरा हुआ था. उन्होंने जल्द ही अपने राज्य के लिए कुछ करने की ठान ली. उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और कुछ वक्त राज्य में बागबानी की विपुल संभावनाओं को साकार करने के लिए फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर विचार किया. मगर अंतत:

उन्होंने सिविल सेवा में जाने का फैसला किया. पहले वे कश्मीर सिविल सेवा के लिए चुने गए. फिर जल्द ही उन्होंने आइएएस की परीक्षा पास की और इस तरह से अव्वल सिविल सेवा में शामिल होने वाले राज्य के तीसरे अफसर बन गए.

वे कहते हैं, ''हम कश्मीर को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और धार्मिक अवधारणाओं के आधार पर अलग-अलग खानों में बांट सकते हैं लेकिन सूफीवाद आज भी इस समाज की रीढ़ है.'' चौधरी मानते हैं कि इस्लाम की रहस्यवादी छटाएं ही कश्मीर की संस्कृति को अनोखा बनाए रखेंगी. पुलवामा से जुड़े मुद्दों से निबटते के संदर्भ में वे कहते हैं, ''हरेक धर्म इनसानियत को मानने की बात करता है और यही कुंजी है. मैंने जान लिया है कि यहां लोग बस इज्जत चाहते हैं. रास्ता यही है कि उनसे सही और पारदर्शी तरीके से बात करो और उनके लिए हर वक्त मौजूद रहो.''

यह पक्का करने के अलावा कि केंद्र की सभी 52 विकास योजनाएं लागू हों, चौधरी जिले के नौजवानों को रचनात्मक कामों में लगाने के अलावा रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान दे रहे हैं. जिले की 5.6 लाख आबादी में आधे लोग 18 से 35 की उम्र के हैं और उनकी तरक्की के लिए 3,600 करोड़ रुपए की अच्छी-खासी रकम अलग रख दी गई है.

उद्यमशीलता के लिए बैंक से कर्ज मिलने में मदद के लिए वे वित्तीय साक्षरता शिविर लगा रहे हैं. इसके अलावा, उन्होंने स्टील फैब्रिकेशन संयंत्र से लेकर कारपेंट्री की दुकान और गारमेंट फैक्ट्री तक तमाम किस्म के प्रोजेक्ट लगाने को लेकर विशेषज्ञों से बातचीत आयोजित की है. वे एक महत्वपूर्ण बात बताते हैं, ''इस सब में जो सबसे अहम बात है वह यह कि मदद के लिए आने वालों में 40 फीसद महिलाएं हैं, जो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं.''
साथ ही, चौधरी ने जिला युवा केंद्रों की स्थापना से नौजवानों को जोड़ा है.

ये युवा केंद्र कौशल विकास की कक्षाएं लगा रहे हैं और इनमें जिम तथा डिजिटल लाइब्रेरी सरीखी सुविधाएं भी हैं. यहां तक कि उन्हें परिसरों की डिजाइन के काम में भी शामिल किया जा रहा है. चौधरी कहते हैं, ''देश भर में उनके लिए इतने सारे मौके हैं और उन्हें एहसास कराना जरूरी है कि देश उनका भी है.'' काम कठिन है, पर हर लिहाज से पैसा वसूल काम है.

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