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न्यायपालिकाः कोर्ट का कायाकल्प

न्यायपालिका की तात्कालिक चुनौतियों में निचली अदालतों में लंबे समय से लटके मामले कम करना, जजों के खाली पद भरना और न्यायाधिकरणों के काम को आसान बनाना शामिल है. न्यायिक स्वतंत्रता भी बड़ी चिंता का विषय है.

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अरविंद पी. दातार अरविंद पी. दातार

भविष्य के रुझान 2022
न्यायपालिका

अरविंद पी. दातार

आजादी के 75वें साल की तरफ तेजी से बढ़ते हुए हमें एक स्पष्ट रोडमैप की जरूरत है जो यह पक्का करे कि हमारे गणतांत्रिक संविधान की न्यायिक शाखा, जिसमें अदालतें और न्यायाधिकरण या पंचाट आते हैं, दक्षता और स्वतंत्रता से काम करे. अनुबंधों को लागू करने के लिहाज से फिलहाल भारत 193 देशों में 163वीं पायदान पर है और इससे बेहतर चेतावनी नहीं हो सकती है.

अगर हम अपने लोकतंत्र के उपेक्षित तीसरे खंबे पर ज्यादा ध्यान दें तो पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य कहीं ज्यादा तेजी से पूरा कर सकते हैं. 2022 में जिन तीन क्षेत्रों पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है, वे हैं—लंबित मामले, न्यायिक नियुक्तियां और पंचाटों की कार्यप्रणाली.

लटके मामले
साल 2021 को अलविदा कहते वक्त सभी हाई कोर्ट में 56,38,327 मामले (40,80,659 दीवानी और 15,57,668 फौजदारी मामले) लंबित हैं. इनमें करीब 54 फीसद तीन साल से ज्यादा वक्त से लंबित हैं, जिनमें एक दशक से ज्यादा वक्त से लटके 9,40,513 मामले भी शामिल हैं. दिलचस्प बात यह है कि आधे से ज्यादा लंबित मामले 22 में से केवल पांच हाई कोर्ट में हैं. 

लंबित मामलों का स्वरूप विभिन्न अदालतों में बिल्कुल अलग-अलग है. बॉम्बे में व्यावसायिक मामले बहुत बड़ी तादाद में लटके हैं जबकि इलाहाबाद को आपराधिक मामले निपटाने पर ध्यान देना होगा, जो बकाया मामलों में 48 फीसद हैं. इसके विपरीत, मद्रास हाई कोर्ट में ऐसे मामले महज 11 फीसद हैं, अजीब बात यह है कि देश में लंबित दीवानी मामले सबसे ज्यादा इसी कोर्ट में हैं. लिहाजा लंबित मामलों को निपटाने के लिए अदालतों को उनकी जरूरतों के हिसाब से तैयार योजना की जरूरत है.

परेटो का सिद्धांत सीधे-सादे ढंग से लागू करने पर पता चलेगा कि किसी भी श्रेणी के 80 फीसद मामले एक उपश्रेणी के 20 फीसद मामलों से निकलेंगे.  बकाया मामलों के बड़े कारणों की पहचान करके और मामलों के समूह बनाकर लॉगजाम को साफ करने में अहम मदद मिलेगी.

न्यायपालिकाः कोर्ट का कायाकल्प
न्यायपालिकाः कोर्ट का कायाकल्प

यह भी इतना ही जरूरी है कि मौजूदा संसाधनों से मामलों का निपटारा बढ़ाने के लिए कैजन और सीमांत लाभ जैसे प्रबंधन के सिद्धांतों को लागू करें. इसी तरह जिला स्तर पर लटके मामले भी चिंता का विषय हैं, जहां 4.04 करोड़ लंबित मामलों में से 56 फीसद के लिए महज पांच राज्य जिम्मेदार हैं.

आंकड़ों पर नजदीक से नजर डालने पर पता चलता है कि उच्च न्यायालयों में दीवानी मामलों की संख्या ज्यादा है, वहीं जिला और मजिस्ट्रेट अदालतें आपराधिक मामलों की बहुत भारी तादाद से पटी पड़ी हैं. इससे यह भी पता चलता है कि हमारे बीच के सबसे गरीब लोग पैसे के अभाव में या पर्याप्त संख्या में जजों के न होने से विचाराधीन कैदी बने हुए हैं.

निचली अदालतों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट और विशेष अदालतें बनाने का प्रयोग मामलों के तेजी से निपटारे में ज्यादा कारगर नहीं रहा इसलिए नए तरीके निकालने होंगे. कर्नाटक में कुछ मजिस्ट्रेट और दीवानी अदालतों के साथ किए गए दक्ष सेंटर ऑफ एक्सेलेंस फॉर लॉ ऐंड टेक्नोलॉजी के एक टाइम-वर्क अध्ययन से पता चला कि फौजदारी जज का 52 फीसद वक्त और दीवानी जज का 48 फीसद वक्त मुकदमे बुलाने और स्थगित करने में गया.

अगर यह प्रशासनिक काम सेवानिवृत्त जजों की समिति को सौंप दिया जाए, तो ट्रायल कोर्ट मामलों की वास्तविक सुनवाई पर ध्यान दे सकेंगे. उससे उनकी उत्पादकता तत्काल दोगुनी हो जाएगी. मामलों के आने के प्रवाह की जांच भी इतनी जरूरी है. जमानत को स्वचालित और आसान बना वाले सीधे-सादे संशोधनों से भी फौजदारी अदालतों और उच्च न्यायालयों में मुकदमों का अंबार काफी कम हो जाएगा. जमानत की सख्त शर्तों से अपराध तो कम नहीं हुए बल्कि भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया. इस पर भी फिर से विचार करना जरूरी है कि चेक का भुगतान न होने को अपराध बनाए रखा जाए या नहीं.

न्यायिक नियुक्तियां
सभी हाईकोर्ट में जजों की कुल 1,098 संख्या में से 402 पद खाली पड़े हैं. कुछ अदालतों में तो स्थिति खास तौर पर भयावह है. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने के खराब ढंग से बने प्रावधानों को अच्छा ही हुआ रद्द कर दिया गया, क्योंकि वे कारगर नहीं होते. अब जब तक संविधान संशोधित नहीं किया जाता, मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था जारी रहेगी.

यह मिथ है कि न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका का कोई दखल नहीं है. संविधान का अनुच्छेद 224ए  छोटे वक्त के लिए तदर्थ जजों के रूप में सेवानिवृत्त जजों की नियुक्ति का अधिकार देता है. कोई कारण नहीं है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल न किया जाए और 10 साल से ज्यादा पुराने मामलों के निपटारे में उनकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल न किया जाए.

पंचाट और न्याय
1990 के दशक की शुरुआत से न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) या पंचाट बनाने की शुरुआत हुई. इसका मकसद मामलों के ज्यादा तेजी से निपटारा और अदालतों का बोझ घटाना था. पारंपरिक टैक्स ट्रिब्यूनल के अलावा, बैंकिंग, सेवा कानून, कंपनी कानून, पेटेंट, ट्रेडमार्क और कई दूसरे क्षेत्रों के मामलों का निपटारा न्यायाधिकरण करने लगे. यह प्रयोग बुरी तरह नाकाम रहा और इसमें तत्काल सुधार की जरूरत है.

मौजूदा मॉडल में सेवानिवृत्त जज और सिविल सेवक पंचाटों का कामकाज देखते हैं, जिन्हें बहुधा उस विषय की कोई विशेषज्ञ जानकारी नहीं होती जिससे उनके पंचाट को निपटना होता है. यह भी नाकाम हो चुका है. सीमित कार्यकाल की मंजूरी (पांच साल), पर्याप्त बुनियादी ढांचे का अभाव और बैठने-काम करने की समुचित व्यवस्था न होने से योग्य लोग मुश्किल से ही आवेदन करते हैं. सबसे बदतरीन झटका यह है कि हर पंचाट को स्वतंत्र न्यायिक पंचाट के बजाय मंत्रालय का हिस्सा माना जाता है.

अव्वल लोकतंत्रों में हरेक पंचाट की कसौटी यह है कि वे उतने स्वतंत्र होते है जितने कानूनी अदालतें. दुर्भाग्य से सरकार को अहसास ही नहीं है कि मजबूत और स्वतंत्र पंचाट प्रणाली से कानून के शासन वाले देश के रूप में भारत की छवि सुधरेगी. पहला और सबसे अहम कदम राष्ट्रीय पंचाट आयोग का गठन है, जिसकी सुप्रीम कोर्ट ने सिफारिश की है.

पंचाटों में खाली पदों की स्थिति हाई कोर्ट से भी बदतर है. मसलन, देश के ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण की सभी पांचों पीठ खाली हैं. नई दिल्ली और चंडीगढ़ के ऋण वसूली न्यायाधिकरणों में एक पदाधिकारी नहीं है. तकरीबन सभी न्यायाधिकरणों की यही निराशाजनक कहानी है. फिर यह नतीजा तो होना ही था कि पंचाटों में भी मामलों के अंबार लगे हैं. और पंचाट के गैरमौजूदगी के कारण वादी के सामने इसके अलावा कोई चारा नहीं रह जाता कि वह हाई कोर्ट की शरण में जाए, जिससे समस्या और उलझ जाती है.

जो लोकतंत्र न्यायिक स्वतंत्रता के प्रति असहिष्णु या एलर्जिक हैं, उन्होंने केवल कानून के शासन को ही चोट नहीं पहुंचाई बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था को भी भोथरा किया है. यह वह सबक है जो रूस, तुर्की और पोलैंड की ओर से अपनाए गए रास्ते से हमें सीखना चाहिए. 2022 की पौ फटने के साथ हमारे सामने सड़क में एक असंदिग्ध कांटा है—यह तो हमारे हाथ में है कि कौन-सा रास्ता चुनें, लेकिन उसके बाद नतीजे चुनना हमारे हाथ में नहीं है.

—अरविंद पी. दातार सीनियर एडवोकेट हैं.

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