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आवरण कथाः आगे की डगर आसान नहीं

महामारी के साल में कई चुनौतियों के एक साथ आ धमकने का अर्थ है कि सरकार को फौज के आधुनिकीकरण का नए सिरे से आकलन करना होगा, बजट की प्राथमिकताएं बदलनी होंगी और रक्षा सुधारों में तेजी लानी होगी, जो पिछले दो दशक से अटके पड़े हैं.

चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य स्तर पर जो गलबहियां हो रही हैं वह इस समय देश के सामने सबसे बड़ी और साफ नजर आने वाली चुनौती है चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य स्तर पर जो गलबहियां हो रही हैं वह इस समय देश के सामने सबसे बड़ी और साफ नजर आने वाली चुनौती है

नया दौर, नई राहें 2021

साल 1991 में बहुत सारी वजहों ने ऐसा सामरिक-रणनीतिक संकट पैदा कर दिया था, जो देश ने उससे पहले के दशकों में नहीं झेला था. उस वक्त देश के सामरिक सहयोगी सोवियत संघ के पतन से ऐसा शून्य पैदा हो गया था जो रूस में बनी सैन्य मशीनों के कलपुर्जे हासिल करने की फौरी परेशानी से भी आगे जाता था. उसी साल भुगतान संतुलन के संकट ने—जिसकी ज्यादातर वजह 1980 के दशक में की गई सैन्य खरीदारियां थीं—ऐसा आर्थिक संकट पैदा कर दिया जिसकी वजह से आरबीआइ (भारतीय रिजर्व बैंक) को विदेशी मुद्रा उगाहने के लिए सोना गिरवी रखना पड़ा था.

भारतीय सेना श्रीलंका में विद्रोह को कुचलने के लिए मुश्किल और थकाऊ तैनाती से बाहर आई थी. वह चार दशकों से पूर्वोत्तर में बागियों से जूझ ही रही थी कि तभी उसे जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की शह से शुरू अलगाववाद से जूझना पड़ा. उस साल के आर्थिक संकट का नतीजा अलबत्ता यह हुआ कि अर्थव्यवस्था को उदार बनाया गया, जिससे धन-दौलत की आमद हुई और सेना के आधुनिकीकरण के लिए सरकार की आर्थिक क्षमता में इजाफा हुआ.

तीन दशक बाद आज मौजूद चुनौतियां मिल-जुलकर कुछ ऐसी ही उलझन भरी परिस्थितियां पेश कर रही हैं. मार्च 2020 में जब केंद्र सरकार स्वास्थ्य की आपात स्थिति से निपटने के लिए कमर कस रही थी और कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देश में लॉकडाउन लगा दिया गया था, उस वक्त भी पाकिस्तान और चीन से सटी 5,000 किलोमीटर लंबी विवादित सरहदों पर पारंपरिक खतरे नए सिरे से सिर उठा रहे थे.

2020 की गर्मियों में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी पीएलए (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) की जबरदस्त लामबंदी की वजह से ऐसा सैन्य टकराव पैदा हुआ, जो 2021 में भी जारी है. 15 जून को हिंसक टकराव में 20 भारतीय सैनिकों और अनिश्चित संख्या में चीनी सैनिकों के मारे जाने के बाद तनाव चरम पर पहुंच गया. उधर पाकिस्तान से सटी नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर पिछले साल सीमा-पार गोलीबारी में नौ भारतीय सैनिक और बीएसएफ के दो जवान मारे गए. आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि सेना ने दोनों मोर्चों पर जिंदगियां गंवाईं. चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ती सैन्य सांठगांठ भारत के सैन्य योजनाकारों के दिमाग पर बल डाल रही है.

तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य अब तीन परमाणु हथियार संपन्न देशों के बीच (जिनमें से दो देश तीसरे के खिलाफ जुटे हैं) दुर्गम गतिरोध का रणक्षेत्र बन गया है. चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों में यह बीते तीन से ज्यादा दशकों का सबसे कटु दौर है और यह ऐसे वक्त आया है जब अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक रिश्ते थोड़े बेहतर हुए हैं. चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन अपने आजीवन राष्ट्रपति शी जिनपिंग के मातहत यह देश ऐसा अहम रणनीतिक खतरा भी है जिसका भारत ने हाल के वर्षों में सामना नहीं किया है. इन चुनौतियों और अवसरों के बीच किस तरह रास्ता बनाया जाता है, इसी से इस दशक में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आगे का रास्ता तय होगा.

धन का मोल
इस साल पहली चुनौती बजट से जुड़ी होगी. लॉकडाउन से पैदा हुए गहरे आर्थिक संकट ने रक्षा बजट में 10 फीसद की मामूली सालाना बढ़ोतरी पर भी सवालिया निशान लगा दिया है. अभी शुरू हुए दशक के दौरान 100 अरब डॉलर से ज्यादा की अनुमानित लागत से सेना के तीनों अंगों को आधुनिक बनाने का जो अभियान चल रहा है, उसमें अड़चन आ सकती है क्योंकि सरकार स्वास्थ्य सेवाओं, वैक्सीन वितरण और अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए होने वाले खर्चों की खातिर बजट की प्राथमिकताएं नए सिरे से तय कर रही है.

खर्चों में कटौती से सैन्य क्षमता को गंभीर नुक्सान पहुंच सकता है. ऐसे समय जब दो दुश्मन विवादित सीमाओं को फिर से तय करने को आतुर हैं, यह खास तौर पर खतरनाक स्थिति होगी. 1999 में पाकिस्तान के जनरल परवेज मुशर्रफ ने गलती से यह मान लिया था कि एलओसी को बदलने की उनकी खुल्लमखुल्ला कोशिश का विरोध नहीं होगा. उनका यह अंदाजा तो शायद सही था कि 1991 के बाद सैन्य खर्चों में कटौती की वजह से खोखले हो चुके भारतीय सशस्त्र बलों के पास इतने संसाधन नहीं होंगे कि वे पारंपरिक फौजी हमला बोल सकें.

ऐसी किसी घटना को दोबारा होने से रोकने के लिए सरकारी अफसरों ने अपने बजट में बचत के लिए गैर-जरूरी खर्चों में कटौती की योजनाएं शुरू की हैं. इसी गरज से, ऐसा एक प्रस्ताव रक्षा प्रमुख जनरल बिपिन रावत की तरफ से आया है, जिसमें उन्होंने सैन्य अधिकारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर छोटे वक्त के लिए रक्षा मंत्रालय के कुछ हजार करोड़ रुपए बचाने की पेशकश की है. मगर इस किस्म के समाधान मरहम-पट्टी मात्र ही साबित हो सकते हैं.

हालिया अतीत में किसी भी दूसरे वक्त से ज्यादा इस समय भारत को अपने राष्ट्रीय सुरक्षा खर्च का नए सिरे से तुरत-फुरत और पूरा आकलन करने की जरूरत है. भारत हर साल अपनी सेना पर 4 लाख करोड़ रुपए खर्च करता है और प्रतिरक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले शीर्ष पांच देशों में शुमार है.

इसके अलावा सरकार दुनिया के सबसे बड़े अर्धसैन्य बलों में से एक के रख-रखाव पर साल में 1.05 लाख करोड़ रुपए खर्च करती है, जिनमें से ज्यादातर आंतरिक सुरक्षा के कामों में जाता है. केंद्र सरकार के कुल खर्चों में प्रतिरक्षा का हिस्सा पहले ही 15.5 फीसद है. यह सरकारी खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा है और खाद्य तथा सार्वजनिक वितरण, कृषि, ग्रामीण विकास और शिक्षा पर कुल खर्च से भी ज्यादा है.

तिस पर इस भारी-भरकम खर्च से भी जम्मू-कश्मीर में बगावत को पाकिस्तानी शह का कोई टिकाऊ समाधान नहीं निकला है. सैन्य जोर आजमाइश उसके खिलाफ काम नहीं आई है. हालांकि उसके पूरे सैन्य बजट से दोगुनी रकम भारत अकेले रक्षा पेंशन पर खर्च करता है. वैसे, 2016 में सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 में बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आंतकी प्रशिक्षण शिविरों पर हवाई हमलों ने लक्ष्मण रेखा जरूर खींच दी और राजनैतिक संकल्प का संदेश भी दिया, लेकिन इससे रावलपिंडी के फौजी हुक्मरानों को जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को शह देकर कम खर्च में ही वहां भारतीय सेना को उलझाए रखने के तौर-तरीकों से दूर हटने का कोई इंतजाम नहीं किया जा सका है.

यह लड़ाई लगातार 30 साल से ज्यादा अरसे से चली आ रही है और इसका कोई अंत नजर नहीं आता. इसलिए सवाल पूछना लाजिमी है कि वांछित नतीजे हासिल करने के लिए नई दिल्ली को अपने बजटीय संसाधन कहां लगाने चाहिए? आंतरिक सुरक्षा के कामों में लंबे वन्न्त के लिए सेना की तैनाती क्या उसके बाहरी आक्रमण को रोकने के मुख्य काम पर असर डाल रही है? क्या आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारियां धीरे-धीरे सेना से लेकर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को सौंपने का कोई रोडमैप है?

सैन्य सुधार
2013 में जब राष्ट्रपति शी ने पीएलए का आकार बीस लाख सैनिकों तक घटाने, एकीकृत थिएटर कमान तैयार करने और सेना को आधुनिक बनाने के लिए चीन के सैन्य सुधारों की शुरुआत की थी, तब नई दिल्ली के एक सुरक्षा विश्लेषक ने अनुमान जाहिर किया था कि इन सुधारों के पूरा होने पर अवश्यंभावी मुकाबले की तैयार करने के लिए भारत के पास एक दशक का वक्त है. उनका आकलन सरकार के लिए भविष्य की डरावनी सूचना था.

2020 में तिब्बती पठार पर नवनिर्मित ढांचे के शिखर पर पीएलए के दो डिविजनों की ताबड़तोड़ लामबंदी बीजिंग की इस क्षमता का इम्तिहान भी थी कि वह भारत के साथ एक और युद्ध की दशा में अपनी टुकडिय़ों को तेजी से गोलबंद कर सकता है या नहीं.

अब भारत के सामने खुद अपने सैन्य सुधारों को तेज करने के अलावा कोई चारा नहीं है. इनमें ज्यादातर सुधार 20 साल से ज्यादा पहले सुझाए गए थे. इस साल रक्षा मंत्रालय अपनी दो थिएटर कमान—समुद्री थिएटर कमान और राष्ट्रीय वायु रक्षा कमान—में से पहली कमान की स्थापना की प्रक्रिया शुरू करेगा. भारत की 17 एकल सेवा कमान को महज पांच एकीकृत कमान में समाहित करना, सेना के तीनों अंगों को एक रक्षा प्रमुख के तहत लाना आजादी के बाद सशस्त्र बलों की सबसे अहम पुनर्रचना का हिस्सा है.

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है और आयातित हथियारों पर भारत की निर्भरता को कम करना दूसरी चुनौती होगी. पिछले साल संकट के चलते नीतिगत सुधारों में विदेशी कंपनियों को भारत में मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएं स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करने की खातिर रक्षा क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा 49 फीसद से 74 फीसद बढ़ाने और भारत के आयुध कारखानों की क्षमता में सुधार लाने के लिए उन्हें कॉर्पोरेट में बदलने सरीखे फैसले होते देखे गए थे. रक्षा मंत्रालय ने देश में ही निर्मित सैन्य साजोसामान के आयात पर प्रतिबंध लगाकर नकारात्मक सूची और पांच साल में 5 अरब डॉलर के निर्यात लक्ष्य का भी ऐलान किया था.

पिछले साल घोषित आत्मनिर्भर भारत सरीखे महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों के नाकाम होने का जोखिम बना ही रहता है, जैसे रक्षा आत्मनिर्भरता हासिल करने की 2016 की 'मेक इन इंडिया’ योजना का हुआ. स्वदेशीकरण के पिछले अभियान इसलिए नाकाम हुए क्योंकि सरकार ने लक्ष्यों और अहम पड़ावों की दोटूक पहचान नहीं की. मसलन, बजटीय संसाधन ऐसी खरीद पर खर्च किए जाते रहे जिनके स्वदेशी विकल्प मौजूद थे.

भारत में एके-47 की नकल बनाने के लिए एक नहीं बल्कि दो सरकारी फैक्टरी मौजूद हैं, फिर भी वह एके-203 बनाने की खातिर एक तीसरी फैक्टरी की स्थापना के लिए रूस की जेब भरता है. हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स ने स्वदेशी हल्के हेलिकॉप्टर में महारत पा ली है लेकिन सरकार रूसी मशीन केए-226 ही खरीदना चाहती है. एक स्वदेशी कारबाइन परीक्षणों पर खरी उतरी है लेकिन सेना यूएई से 90,000 से ज्यादा हथियार खरीदने को उत्सुक है.

भविष्य के युद्ध
एक और चुनौती भारतीय सेना को भविष्य के युद्धों के लिए तैयार करने की होगी. 2020 की शरद ऋतु में आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच नागोर्नो-काराबाख के विवादित इलाके को लेकर दो महीने चले टकराव ने एक झलक दिखला दी है कि भविष्य का यह युद्ध कैसा हो सकता है. अजरबैजान के ड्रोन के बेड़े ने, जो उसे तुर्की ने दिया था, आर्मेनिया के टैंकों, युद्धक वाहनों, रडारों और जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों को तहस-नहस कर दिया.

इन झटकों ने मॉस्को को युद्धविराम के साथ दखल देने को मजबूर किया. अजरबैजान के सेंसर से लैस ड्रोन बेड़े की दिन हो या रात अपने निशानों को साफ-साफ देख पाने और सटीक हमले करने की क्षमता अहम थी. बीते हुए कल के हथियार—युद्ध टैंक, विमानवाहक युद्धपोत और मानव संचालित लड़ाकू विमान—आने वाले कल के युद्धों में किस तरह कारगर होंगे, यही वह प्रमुख सवाल है जो भारत के रक्षा योजनाकारों को पूछने की जरूरत है.

हिमालय के विशाल विस्तार साफ तौर पर ऐसे इलाके हैं जहां भारतीय सैन्य बलों को बूटों को बोट (स्वचालित रोबोट या मशीनों) से बदलने की जरूरत होगी. भारतीय सेना को ऐसी टेक्नोलॉजी हासिल करने को प्राथमिकता देनी होगी जो शत्रु के इलाके में चौबीसों घंटों और सभी मौसमों में गहराई से ताकझांक कर पाए. उसे अपनी भारी-भरकम और बोझिल खरीद प्रक्रिया को दुरुस्त करने की जरूरत है जिसमें जूतों से लेकर जंगी जहाज तक कुछ भी हासिल करने में दशक तक का वक्त लग सकता है. सेना की खरीद प्रणाली फिलहाल पूरी तरह ऐसी है जिसमें हथियार प्रणालियों को विकसित करने के बजाए पहले से कार्यरत बनी-बनाई हथियार प्रणालियां खरीद ली जाती हैं.

अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी में निवेश पारंपरिक सैन्य साजोसामान के लिए तय संसाधनों का बहुत छोटा-सा हिस्सा भर है. इस व्यवस्था को इस तरह उन्नत बनाने की जरूरत है कि जिसमें सेना डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन), उद्योग और अकादमिक जगत के साथ मिलकर हाइपरसोनिक मिसाइलों और मानवरहित लड़ाकू हवाई वाहनों सरीखे अत्याधुनिक हथियारों के विकास की अगुआई करें.

भारत में फैसले लेने वाले लोगों को लीक से हटकर सोचने की जरूरत है ताकि अपनी जमीनी सरहदों पर बीजिंग के दबावों का प्रतिकार कर सकें. तथाकथित 'लोकतंत्रों के चतुर्भुज (क्वाड)’—जिसमें भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं—को 13 साल में पहले संयुक्त नौसैन्य अभ्यास के साथ सक्रिय करना ऐसा ही संकेत था. साफ है कि नई दिल्ली को ऐसी कई और पहल करनी होंगी ताकि बीजिंग के हाथों खुद को दक्षिण एशिया में चौतरफा घिरने से बचाया जा सके. 

चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य स्तर पर जो गलबहियां हो रही हैं वह इस समय देश के सामने सबसे बड़ी और साफ नजर आने वाली चुनौती है

रक्षा में सुधार को लेकर छाई जड़ता को दूर करना एक अहम चुनौती होगी. इसके अलावा, एक दूसरी जो बड़ी चुनौती है वह है अस्त्र-शस्त्रों के लिए आयात पर हद दर्जे की निर्भरता.

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