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काश कि ऐसा होता: नरेंद्र मोदी ने गुजरात नरसंहार के लिए मांग ली माफी

अपने आलोचकों को हैरत में डालते हुए और समर्थकों को चौंकाते हुए नरेंद्र मोदी ने 2002 के गुजरात नरसंहार के लिए माफी मांग ली है. गुजरात के मुख्यमंत्री के कदम से आलोचक हैरान और और समर्थकों की जमात सकते में. कल्पना पर आधारित रिपोर्ट, अगर अप्रैल 2014 में ऐसा हो.

अहमदाबाद. 10 अप्रैल, 2014

अपने आलोचकों को हैरत में डालते हुए और समर्थकों को चौंकाते हुए बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने 2002 के गुजरात नरसंहार के लिए माफी मांग ली है. इस नरसंहार में उनकी सरकार के रहते हुए एक हजार से ज्यादा निर्दोष गुजरातियों, खासकर मुसलमानों का कत्ल कर दिया गया था और करोड़ों रुपए की संपत्ति नष्ट कर दी गई थी.

पश्चाताप के भाव में मोदी ने ट्वीट किया है: ''सममुच मुझे इस बात का बड़ा दुख है कि जब मैं कार चला रहा था तो इतने सारे पिल्ले मारे गए.” गुजरात के मुख्यमंत्री अपने इस माफीनामे को यूट्यूब पर आंखों में आंसू भरे एक वीडियो में और विस्तार देते हैं: ''ऐसा नहीं कि मैं गाड़ी चलाते हुए सो गया था. सच तो यह है कि मैं ड्राइविंग कर ही नहीं रहा था.

मैं तो पिछली सीट पर था. पर अब मैंने महसूस किया है कि अगर मेरी कार किसी पिल्ले के ऊपर से गुजरती है तो मुझे इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए, दूसरे पिल्लों से माफी मांगनी चाहिए और ड्राइवर अगर पकड़ में आए तो उसे अंदर कर देना चाहिए.”

आवारा कुत्तों की सुरक्षा में लगे संगठन द सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ स्ट्रे पपीज ने अपनी सतर्क प्रतिक्रिया में इस माफी के लिए मोदी की तारीफ  की है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि सरकार के रिकॉर्ड से 2002 में पिल्लों की बड़े पैमाने पर हुई मौतों का खुलासा नहीं होता. सोसाइटी के मुताबिक, ''यह संभव है कि मोदी को गलत तथ्य बताए गए हों.

लेकिन उन्हें क्या करना चाहिए था, इस बारे में दिया गया उनका बयान काबिलेतारीफ है.” साइबर दुनिया में तो इसके बाद दावों-जवाबी दावों का जैसे तूफान आ गया है. इंटरनेट हिंदुओं का विशाल संगठित दल पहली बार खुद को भ्रमित पा रहा है.

कुछ ने तो शुरू में इस खबर की आलोचना करते हुए माफी को 'कांग्रेसियों का झांसा’ बताया तो कुछ इस अच्छे मौके पर माफी को भुनाने में लग गए हैं: ''घटना के सिर्फ  12 साल बाद.” दूसरी तरफ, अन्य लोग सवाल उठाते हैं: ''अब उन्होंने पिल्लों के लिए माफी मांग ली है, क्या वे मनुष्यों के लिए भी माफी मांगेगे?”

मोदी के ज्यादातर समर्थक और प्रशंसक इस माफी से दूरी बनाए हुए हैं. वे जिस विचारधारा के पैरोकार हैं उसमें 2002 की घटनाओं को लेकर किसी तरह के पछतावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता. इसका बखान तो वे हिंदू गौरव और ताकत के रूप में करते रहे हैं.

इसलिए कइयों ने मोदी की माफी की आलोचना करते हुए इसे अपनी कमजोरी स्वीकार करना बताया है. आरएसएस के एक नेता ने ऑफ द रिकॉर्ड स्वीकार किया कि इस माफी ने एक मजबूत निर्णय क्षमता वाले नेता की सावधानीपूर्वक निर्मित की गई छवि को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है. इस घटना से उपजी निराशा ने हिंदुत्व विचारधारा के मूल में बुनियादी तनाव और अंतर्विरोध को जाहिर कर दिया है.

यह ऐसे समय में हो रहा है जब संघ 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाओं के साथ जुडऩे का प्रयास कर रहा है, ऐसा भारत जो आगे बढऩा, तरक्की करना चाहता है और यह भी चाहता है कि दुनिया संकीर्ण विचारधारा या दमघोंटू अवरोध के बगैर उसकी आवाज सुने, तो उसे अपनी गलतियों को स्वीकार करने की ताकत हासिल करनी होगी.

लेकिन जब माफीनामा एक ऐसे व्यक्ति की तरफ से आता है जिसके बारे में माना जाता है कि उसने कोई गलती नहीं की है तो उसके सच्चे अनुयायी संदेह के समुद्र में छटपटाने लगते हैं. ट्विटर पर खुद को नमो का एक प्रशंसक बताने वाला व्यक्ति कहता है: ''मोदी सॉरी नहीं बोल रहे थे. वे इस बारे में एक सवाल का जवाब दे रहे थे कि गुजराती महिलाओं को कौन-सा कपड़ा पहनना चाहिए. (वह है) सारी.”

(शशि थरूर कांग्रेस के नेता और केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री हैं.

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