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अर्थव्यवस्थाः पूर्ति ज्यादा मांग कम

टीके लगने की तादाद जैसे-जैसे बढ़ेगी, आपूर्ति शृंखला की रुकावटें कम होंगी, उत्पादन बढ़ेगा. 2022 की चुनौती होगी मांग को ऊंचा बनाए रखना ताकि भारत महामारी से पहले की वृद्धि की राह पर लौट सके.

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नीलकंठ मिश्र

कोविड-19 महामारी की जिन लहरों ने 2020 में वैश्विक आर्थिक मंदी का बिगुल फूंका, 2021 के अंत में भी कायम थीं. डेल्टा वैरिएंट अब भी जिंदगी बर्बाद करने पर तुला है और लगभग हर देश को मानना पड़ रहा है कि कोविड-19 शायद कभी जाएगा ही नहीं.

कुछ हफ्तों में हम शायद जान पाएं कि नए ओमिक्रॉन वैरिएंट से संक्रमण कितना गंभीर हो सकता है और यह लहर कितनी दूर जाएगी. मगर और भी नए वैरिएंट का खतरा मंडरा रहा है. इन चुनौतियों के बावजूद लगता यही है कि 2022 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 2021 के मुकाबले बहुत अलहदा हो सकता है.

कामकाज पर पाबंदियां 2021 में जैसे-जैसे हटीं, उपभोक्ता मांग में उछाल आया. सरकारी खजाने से लोगों की जेब में पैसा डालने से, खासकर अमेरिका में, इतना जोरदार बढ़ावा मिला कि बंदरगाह की क्षमता और जहाजों से लेकर सेलफोन, खिलौनों, जूतों और उपकरणों तक हर चीज की तंगी पैदा हो गई.

छिन्न-भिन्न आपूर्ति शृंखलाओं को सेमीकंडक्टर सरीखे छोटे लेकिन बेहद जरूरी पुर्जों के लिए जूझना पड़ा. ऐसे में उत्पादन में लगातार खलल पड़ने से समुद्री जहाज मार्ग बंद हो गए. मैन्युफैक्चरिंग स्थलों पर संक्रमण के छिटपुट प्रकोप ने तंगी को और तीव्र कर दिया. इसने न केवल उपभोक्ताओं को बल्कि आपूर्ति शृंखलाओं के बिचौलिए को भी जमाखोरी करने के लिए उकसाया, जिससे मांग और पूर्ति की जाहिरा खाई और चौड़ी हो गई और कीमतों में तेजी आ गई.

साल के अंत की तरफ बढ़ते हुए वैश्विक मांग लौटने से ऊर्जा की कीमतें बढ़ीं, पर कोयले, गैस और तेल के आपूर्तिकर्ताओं ने, जिन्होंने तकरीबन दो साल से मांग के दबे होने से उत्पादन क्षमता स्थगित कर रखी थी, तब भी कामकाज पूरे जोर-शोर से शुरू नहीं किया. अमेरिका में घर-परिवारों को मिली बड़ी नकद सहायता की वजह से भी श्रम बाजार में उससे ज्यादा तंगी पैदा हो गई जितनी उत्पादन के स्तर को देखते हुए होनी चाहिए थी.

महंगाई के कई दशकों की ऊंचाई पर पहुंच जाने का शायद यह भी एक अहम कारण था. 2022 में वैश्विक उत्पादन में बढ़ोतरी होनी चाहिए. इससे मुद्रास्फीति का दबाव कुछ कम होगा. मसलन टीके लगने का स्तर बढ़ने से फैक्ट्रियां निर्विघ्न चल पाएंगी, वियतनाम सरीखे केंद्र फिर खुले रह पाएंगे और धातुओं तथा सेमीकंडक्टरों सरीखी प्रमुख आगतों की सुचारू आपूर्ति हो सकेगी, जिससे माल भरा रहेगा और उत्पादन शृंखलाएं फिर शुरू हो पाएंगी.

चीन में व्यापक लॉकडाउन से आपूर्ति शृंखलाओं में खलल पड़ सकता है (बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में केवल चीन ही अब भी ''शून्य-कोविड’’ का लक्ष्य लेकर चल रहा है). यही नहीं, तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य होने पर भूराजनीति के बादल मंडरा रहे हैं. इस खतरे से चौकन्ना रहना जरूरी है.

दूसरी तरफ, 2021 के उलट, 2022 में दाखिल होते वक्त दुनिया सुस्त पड़ती मांग से दोचार है. खुदरा बिक्री दुनिया भर में रुझान से पीछे चली गई है और दबी हुई मांग के और कमजोर पड़ने, अमेरिका की भारी प्रोत्साहन राशि का असर फीका पड़ने, चीनी खुदरा बिक्री के रुझान से 10 फीसद से ज्यादा बने रहने और तेजी से बढ़ते संक्रमणों के चलते कई यूरोपीय देशों की ओर से फिर कामकाज पर पाबंदियां लगाए जाने से इनके अगले कुछ महीनों में रुझान से और भी नीचे जाने की आशंका है.

सेवाओं-से-सामान का जो बदलाव लॉकडाउनों के दौरान आया था (क्योंकि सेवाएं प्रतिबंधित थीं), वह भी उलटना चाहिए. इससे सामान की मांग को नुक्सान पहुंचेगा. स्थिर-परिसंपत्ति निवेश दुनिया भर में कमजोर रहा. महामारी के बार-बार प्रकोप से पैदा अनिश्चितता के कारण तो ऐसा हुआ ही, लेकिन अपने रियल एस्टेट और स्थानीय बुनियादी ढांचे को लेकर चीन की नीति में आए बदलावों के कारण भी ऐसा हुआ. दिसंबर में थोड़ा सुधार हुआ, पर मकसद इन गतिविधियों को फिर तेजी से बढ़ाने के बजाए धीमे-धीमे बढ़ाना दिखाई देता है.

मांग में सुस्ती से निपट पाना शायद आसान न हो. मुद्रास्फीति विकसित देशों तक में सुर्खियों में है और कुछ विकासशील देशों में भी बढ़ी है, जिससे सरकारें राजनैतिक दबाव में हैं (खासकर अमेरिका में) और संभावना नहीं कि नीति निर्माता धीमी वृद्धि का जवाब और ज्यादा प्रोत्साहन पैकेजों से देने की स्थिति में होंगे. असल में, तकरीबन सारे केंद्रीय बैंक मौद्रिक समायोजन से पीछे हट रहे हैं और कुछ ने तो मौद्रिक सख्ती भी शुरू कर दी है.

मांग में कमी और पूर्ति में सुधार से महंगाई कम करने में मदद मिलनी चाहिए, पर इसमें कई माह लग सकते हैं. अमेरिका सरीखे बाजारों में तो शायद और भी ज्यादा वक्त लग सकता है जहां राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन सबसे तगड़े रहे हैं. वैश्विक वित्तीय बाजारों का अफसाना महंगाई की चिंता से हटकर वृद्धि की चिंता पर आ सकता है, यहां तक कि तब भी जब कई अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई ऊंची बनी हुई है. यह मुद्रा, बॉन्ड और शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव का नुस्खा है, तब तो और भी जब व्यापारियों की मौजूदा पीढ़ी में ज्यादातर अमेरिका की ऊंची मुद्रास्फीति की नीति की पृष्ठभूमि से वाकिफ नहीं हैं.

तो भारत कैसा प्रदर्शन करेगा? भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल आंतरिक है: महामारी से पहले की राह के यह कितना नजदीक आ सकता है? आम राय से अनुमान यह है कि अगले वित्त वर्ष में उत्पादन कोविड से पहले के स्तर से करीब 10 फीसद नीचे रहेगा. यह निराशावादी अनुमान मालूम देता है. अंतर मात्र पांच फीसद रह सकता है और तब भारत की वृद्धि के पूर्वानुमानों को खासा बढ़ाना पड़ेगा.

निराशावादियों को उन 2.5 करोड़ कामगारों की चिंता है जो उद्योग और सेवा से फिर खेती-किसानी में लौट गए और शायद अन्य 1.5 करोड़ लोग बीते दो सालों में कामकाजी उम्र वाली आबादी में जुड़े हैं. मगर नौकरियों के इस नुक्सान को स्थायी कहना समझदारी नहीं होगी. सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाली सेवाएं हैं व्यक्तिगत सेवाएं, यात्रा और पर्यटन, तथा शिक्षा. कार्यस्थलों पर काम पूरी तरह दोबारा शुरू होने पर दफ्तरों और घरों (जैसे सफाई कामगार, रसोइए, ड्राइवर और आया) में निजी सेवाओं की नौकरियां वापस आ जानी चाहिए.

सरकारी और भारत में आने वाली अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के फिर शुरू होने से यात्रा और पर्यटन क्षेत्र में नौकरियां बहाल होने में मदद मिलनी चाहिए. इसी तरह संभावना यह है कि बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिल करवा देने वाले माता-पिता निजी स्कूलों के खुलने पर उन्हें फिर इन स्कूलों में डालेंगे. इससे शिक्षक भर्ती करने होंगे.

औद्योगिक रोजगार के मामले में नुक्सान निर्माण सामग्री और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में हुआ. कलपुर्जों की कमी घटने से ऑटो उत्पादन अब धीमे-धीमे बढ़ रहा है. निर्माण गतिविधियों में फिर उछाल आएगा, क्योंकि राज्य सरकारें, जो लॉकडाउन के दौरान खर्च करने को तरस गईं और जिसकी वजह से उनके पास फिलहाल खर्च न की गई करीब 3 लाख करोड़ की रकम है, फिर खर्च करेंगी.

करों से मिलने वाली अच्छी रकम केंद्र सरकार के लिए भी राजकोषीय गुंजाइश पैदा कर रही है. यही नहीं, करीब एक दशक लंबे ठहराव के बाद, जिसने जीडीपी की वृद्धि में करीब एक फीसद से ज्यादा का पलीता लगा दिया, रियल एस्टेट निर्माण भी तेजी पकड़ने को तैयार दिखता है.

आखिर में, सामान्य हालात लौटने के साथ अनौपचारिक क्षेत्र में भी थोड़ी बहाली दिखाई दे सकती है. तंगी का माहौल बड़ी और संगठित फर्मों की तरफदारी करता है, जो आगे की राह में बदलना चाहिए, तब तो और भी जब पूंजी से भरपूर भारतीय वित्तीय क्षेत्र फिर कुछ जोखिम उठाने लगे हैं.

वैश्विक मांग में वृद्धि का कमजोर पड़ना निर्यात-चालित क्षेत्रों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है. अलबत्ता भारत की वृद्धि की रफ्तार बनाए रखने के लिए नीति निर्माताओं को वैश्विक व्यापार में भारत का हिस्सा बढ़ाने पर ध्यान लगाए रखना चाहिए, सेवाओं में भी (जहां बड़ा मौका पुकार रहा है और केवल सॉफ्टवेयर में ही नहीं) और वस्तुओं (इलेक्ट्रॉनिक्स, परिधान और फूटवीयर, खिलौने, ऑटो कलपुर्जे, अक्षय ऊर्जा उपकरण और रसायनों वगैरह) में भी. मजबूत वृद्धि ज्यादा नहीं तो कम से कम एक दशक तक जरूरी है, न केवल संप्रभु ऋण अनुपात को ज्यादा सुरक्षित स्तर तक नीचे लाने के लिए बल्कि लोगों को गरीबी से निकालने के लिए भी.

नीलकंठ मिश्र एपीएसी स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख और क्रेडिट सुइस के इंडिया स्ट्रैटजिस्ट हैं.

वैश्विक मांग में वृद्धि का कमजोर पड़ना निर्यात-चालित क्षेत्रों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है. अलबत्ता भारत की वृद्धि की रफ्तार बनाए रखने के लिए नीति निर्माताओं को वैश्विक व्यापार में भारत का हिस्सा बढ़ाने पर ध्यान लगाए रखना चाहिए.

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