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आवरण कथाः मोदी+योगी=भाजपा विजय का नया फॉर्मूला

योगी में, मोदी अपनी जैसी छवि देखते हैं, जो उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध है, कोई परिवार नहीं है जिसे आगे बढ़ाना है और कतई भ्रष्ट नहीं माना जाता

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निर्णायक मोड़ लखनऊ के राजभवन में 21 नवंबर, 2021 को प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी निर्णायक मोड़ लखनऊ के राजभवन में 21 नवंबर, 2021 को प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में एक के बाद दूसरी ऐतिहासिक जीत के पीछे अगर कोई निर्णायक मोड़ था, तो वह पिछले साल के आखिर में और सर्वाधिक असामान्य परिस्थितियों में आया. भगवा पार्टी के राज्य विधानसभा चुनावों के लिए अपना अभियान औपचारिक रूप से शुरू करने से ठीक पहले नवंबर 2021 में पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कुछ मुखर सुगबुगाहटें उठीं. कहा गया कि महंत से राजनेता बने आदित्यनाथ घमंडी हैं और फैसलों में कैबिनेट के साथियों को शामिल किए बिना या पार्टी की संवेदनशीलताओं का ख्याल रखे बिना राज्य सरकार को बहुत कुछ अपनी निजी जागीर की तरह चला रहे हैं. कुछ ने तो मुख्यमंत्री को बदलने की मांग भी की, उसी तरह जैसे पड़ोसी उत्तराखंड के अलावा गुजरात और सुदूर कर्नाटक में किया गया था. ठीक इसी मोड़ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़कर भगवाधारी महंत के समर्थन में निर्णायक रूप से अपनी पूरी ताकत लगाने का फैसला किया.

कम ही लोग मोदी के दिमाग या उनकी कार्यप्रणाली को जानने का दावा करेंगे. लेकिन प्रधानमंत्री पार्टी के प्रमुख साथियों के फीडबैक पर विचार करने और खुद स्थिति का पूरा आकलन करने के बाद ही फैसले पर पहुंचते हैं. जहां योगी की अपनी खामियां और कमियां हैं, वहीं यह भी सच है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश को सख्ती और दृढ़ता से चलाया और उन बड़े माफिया गिरोहों पर कड़ी कार्रवाई की, जो पहले निरापद ढंग से काम करते थे. इसी की बदौलत उन्होंने 'बुलडोजर बाबा' का मुंहबोला नाम भी हासिल किया. इन गिरोहों के कई सदस्य मुसलमान थे, इससे योगी की हिंदुत्व के कट्टर पैरोकार की छवि पुख्ता हो गई. वह छवि जो उन्होंने बड़ी मेहनत से बनाई थी. इसमें तथाकथित 'लव जेहाद' या अंतरधार्मिक रिश्तों के खिलाफ उनका अभियान भी शामिल था. मोदी के लिए ज्यादा अहम यह था कि बतौर प्रधानमंत्री शुरू की गई उनकी बीसियों कल्याणकारी योजनाओं को योगी ने कामयाबी से जमीन पर उतारा. खासकर मुफ्त राशन की योजना, जिसमें महामारी की मुश्किलों से पार पाने के लिए हर व्यक्ति को न केवल अनाज बल्कि दालें और खाद्य तेल भी दिया जाता है. जब 2024 के लोकसभा चुनाव महज दो साल दूर रह गए हैं, उत्तर प्रदेश की निर्णायक जीत तिबारा चुनकर आने की संभावनाएं मजबूत करने की खातिर मोदी और भाजपा के लिए बेहद अहम थी.

आवरण कथाः मोदी+योगी=भाजपा विजय का नया फॉर्मूला
आवरण कथाः मोदी+योगी=भाजपा विजय का नया फॉर्मूला

लोकसभा में 80 सांसद भेजने वाला उत्तर प्रदेश ऐसी ट्रॉफी थी जिसके लिए सब ललचा रहे थे. अपने वैरागी करिश्मे और राजकाज की सख्त शैली से योगी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की अधिकांश सीटें बटोर लेने की कामयाबी दोहराने में भाजपा की मदद की थी. हालांकि वे 2014 में जीती गई सीटों से कुछ कम सीटें ही जीत सके. फिर उनमें एक निश्चित एक्स फैक्टर (खास खूबी) भी था. मोदी ने उनमें एक मिलती-जुलती छवि देखी. एक ऐसा व्यक्ति, जिसने उनकी तरह अपनी जिंदगी एक मकसद के लिए समर्पित कर दी है, जिसका कोई परिवार नहीं है जिसे वह बढ़ावा दे और जो लोगों की नजरों में भ्रष्टाचार से ऊपर और परे है.

फिर पिछले नवंबर में जब वे राज्य पुलिस के सम्मेलन को संबोधित करने लखनऊ गए, तो वहां उन्होंने योगी को राज्यपाल के आवास पर बुलाया, जहां वे ठहरे थे. वहां बड़े करीने से कोरियोग्राफ किए गए सिलसिले में योगी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते, अपना पितृतुल्य हाथ उनके कंधों पर रखे और जाहिरा तौर पर सरकार के कुछ विषयों पर चर्चा करते मोदी की तस्वीरें खींची गईं. वे कुछ और तस्वीरों में साथ खड़े दिखाई दिए, जिनमें समर्थन की घोषणा का प्रदर्शन करते हुए मोदी योगी का हाथ ऊपर उठाए थे. बताया जाता है कि जल्द ही प्रधानमंत्री कार्यालय से योगी से कहा गया कि वे ये तस्वीरें इन शब्दों के साथ ट्वीट करें, ''हम यात्रा पर निकल पड़े हैं. हमने सब कुछ समर्पित करके नए भारत के निर्माण का बीड़ा उठाया है, जो नई रोशनी के साथ आसमान के भी पार ऊंचाइयां छुएगा.'' इस सार्वजनिक अनुमोदन की अदाकारी के साथ प्रधानमंत्री ने पार्टी को दो-टूक संदेश दे दिया कि योगी को नहीं बदला जाएगा और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए योगी और वे 'डबल इंजन की सरकार' के चेहरे होंगे. मंचों पर भी मोदी ने योगी के राजकाज की दिल खोलकर तारीफ की. कुछ पार्टीजनों का कहना है कि यह तारीफ भाजपा के किसी दूसरे मुख्यमंत्री के लिए कही गई बातों से ज्यादा थी.

जश्न की तस्वीर
जश्न की तस्वीर

कामयाबी का भाजपा का नया फॉर्मूला

10 मार्च को जब धड़ाधड़ चुनाव नतीजे आने शुरू हुए, जल्द ही यह साफ हो गया कि मोदी+योगी की जोड़ी भाजपा के लिए बेहद कामयाब फॉर्मूला साबित हुई है. पार्टी ने राज्य विधानसभा की 403 सीटों में से अपने दम पर 255 और सहयोगी दलों के साथ 273 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया. यह ऐतिहासिक था. राज्य का कोई भी मुख्यमंत्री इससे पहले कभी पद पर एक संपूर्ण कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा चुनकर नहीं आया. न ही 1985 के बाद कोई सत्तारूढ़ सरकार दूसरे कार्यकाल का जनादेश लेकर सत्ता में आई.

हालांकि भाजपा अपने दम पर 312 (और सहयोगी दलों के साथ 325) सीटें जीतने की अपनी 2017 की कामयाबी नहीं दोहरा पाई, फिर भी यह जीत बेहद काबिले-तारीफ थी, क्योंकि यह कोविड-19 महामारी के दो तबाह कर देने वाले साल के बाद हासिल की गई थी. बेरोजगारी बहुत ज्यादा थी और मंहगाई भी. केंद्र के विवादास्पद कृषि कानूनों को लेकर राज्य के किसान भी नाखुश थे.

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से उन्हें जोश और जज्बे से भरी चुनौती भी मिल रही थी, जो न केवल समाजवादी पार्टी (सपा) को एकजुट करने में कामयाब रहे बल्कि यह नैरेटिव खड़ा करके उन्होंने कामयाब अभियान भी चलाया कि भाजपा की सरकार ने पिछड़े वर्गों की अनदेखी की है, जो राज्य की आबादी के करीब एक-तिहाई हैं. इसी की बदौलत अखिलेश योगी के तीन ओबीसी मंत्रियों को लुभाकर सपा में ला पाए. इन जातियों की नुमाइंदगी करने वाली कुछ अन्य पार्टियों को भी उन्होंने साथ जोड़ा. तिस पर भी, जैसा कि इंडिया टुडे-एक्सिस माइ इंडिया एक्जिट पोल ने सटीक भविष्यवाणी की थी, भाजपा ने तमाम जातियों, स्त्री-पुरुष और आयु वर्गों का समर्थन हासिल करके पूरा राज्य जीत लिया. इससे एक मजबूत लेकिन खामोश सत्ता-समर्थक (प्रो-इन्कंबेंसी) अंतर्धारा का भी पता चला, जिसने भगवा पार्टी की कामयाबी में योगदान दिया (देखें साथ की रिपोर्ट).

इस दौर में जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए, अगर पार्टी उनमें से चार जीत गई, तो एक्सिस माइ इंडिया के सीएमडी प्रदीप गुप्ता कहते हैं कि इसका राज बस एक ही चीज में है और वह है 'डिलिवरी'. वे कहते हैं, ''लोग किसी पार्टी को तब तक दोबारा नहीं चुनेंगे जब तक उन्हें यकीन न हो कि उसने काम किया है. यह उत्तर प्रदेश सहित उन चारों भाजपा शासित राज्यों के बारे में सच है, जिनमें पार्टी सत्ता में लौटी है. महामारी की वजह से लगे झटके सबने देखे थे. मगर राज्य स्तर की विकास नीतियों के अलावा यह मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई तमाम कल्याणकारी योजनाओं की माकूल डिलिवरी ही थी जो निर्णायक साबित हुई, बात चाहे मात्रा की हो, गुणवत्ता की हो या समयबद्ध कार्यक्रमों की.''

आरएसएस के नेता राम माधव भी यह स्वीकार करते हैं. वे कहते हैं, ''इस दौर के चुनाव साबित करते हैं कि वंश, धर्म और अवसरवादी गठबंधनों की पुरानी राजनीति मतदाताओं को अब और प्रभावित नहीं करती. इन भाजपा शासित राज्यों में अच्छे राजकाज के लाभार्थियों ने अपनी बात खुलकर कही. यह भारतीय मतदाता की परिपक्वता का संकेत है. इससे काम करके दिखाने और नतीजे देने की जिम्मेदारी नेताओं पर बढ़ेगी.'' पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के प्रदर्शन से मतदाताओं का मोहभंग हो गया लगता था और उन्होंने बढ़-चढ़कर आम आदमी पार्टी को वोट दिया. उन्होंने कुल 117 सदस्यीय सदन में 92 सीटों का हैरतअंगेज जनादेश उसकी झोली में डाल दिया.

यूपी के बाद ऊपर ही ऊपर?

भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश की जीत कई कारणों से बेहद अहम है. एक तो, जैसा कि खुद मोदी ने दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय पर जीत के अपने भाषण में कहा, ''मैं उम्मीद करता हूं कि पंडित अब यह कहने का साहस करेंगे कि 2022 के उत्तर प्रदेश चुनावों ने 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजे तय कर दिए हैं.'' साथ ही, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर की जीत यह पक्का करेगी कि जुलाई में राष्ट्रपति पद के चुनाव में पार्टी के मनोनीत व्यक्ति को कोई अड़चन न आए. भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास मतदाता मंडल (जो राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों के अलावा संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित प्रतिनिधियों से मिलकर बनता है) में इतने पर्याप्त वोट होंगे कि उनका मनोनीत व्यक्ति जीत सकेगा.

चार राज्यों की जीत से उन अन्य राज्यों में भी भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ेगा, जहां चुनाव होने वाले हैं. इनमें गुजरात और हिमाचल प्रदेश भी हैं, जहां इसी साल चुनाव होंगे. उसके बाद 2023 में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और पूर्वोत्तर के चार राज्यों में चुनाव होंगे. भाजपा 2025 में अपने वैचारिक मार्गदर्शक आरएसएस की स्थापना के 100 साल का जश्न जोरदार ढंग से मनाने का मनसूबा बना रही है, जिसके लिए अगले आम चुनाव में उसे जीतना ही होगा.

मौजूदा दौर के विधानसभा चुनावों का एक अहम नतीजा यह है कि इसने उन आलोचकों की जबान पर ताले डाल दिए हैं जो खासकर पिछले साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद मानते थे कि ब्रांड मोदी का सूरज ढल रहा है. इसमें कोई शक नहीं कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पार्टी की जो अजेय चुनाव मशीनरी कायम की है, उसके अलावा प्रधानमंत्री की कद्दावर मौजूदगी उसकी मौजूदा जीत के अहम कारक हैं. अलबत्ता उत्तर प्रदेश के चुनाव योगी को भी चकाचौंध में ले आए.

प्रचार अभियान के दौरान पार्टी ने उन्हें असामान्य छूट दी और यहां तक कि भाजपा ब्रांड का मंत्र फूंकने के बजाए 'योगी सरकार' शब्द का इस्तेमाल किया. योगी राज्य में अहम प्रचारक थे. उन्होंने राज्य भर में 300 से ज्यादा एकल रैलियां संबोधित कीं. इसमें शामिल होते हुए मोदी और शाह ने इसे रणनीतिक उछाल दी. यह बात माधव भी कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी की जोड़ी ने अच्छा काम किया.''

अब यह साफ तौर पर उभरकर सामने आ रहा है कि 2017 में तमाम दूसरे दावेदारों को नजरअंदाज करते हुए योगी को मुख्यमंत्री के रूप में पदोन्नत करना भाजपा-आरएसएस के हिंदू वोट बैंक का तेजी से विस्तार करने के ज्यादा बड़े गेम प्लान का हिस्सा था. मुख्यमंत्री बनने से पहले पांच बार सांसद रह चुके योगी हिंदुत्व के उग्र चेहरे की नुमाइंदगी करते थे और हिंदुत्व की विचारधारा के नरम संस्करण पर चलने के लिए अक्सर संघ परिवार (वे खुद आरएसएस से नहीं आए हैं) के अपने समकक्षों की आलोचना किया करते थे.

शाह और मोदी ने आरएसएस से सलाह-मशविरा करके शीर्ष पद योगी को इसलिए दिया क्योंकि उनकी कोई जातिगत अपील नहीं थी या वे उससे ऊपर थे. 'ठाकुरवाद' (योगी मूलत: गढ़वाल के राजपूत हैं) की धारणा से इस पर कुछ दबाव जरूर आया, पर अंतत: उन्होंने अपना सिरा मजबूती से थामे रखा, भाजपा के जोड़े गए पंचमेल गठबंधन को बखूबी चलाया और राज्य पर हुकूमत करने के मामले में पार्टी आलाकमान के फरमानों का पालन किया. ये नतीजे अब योगी आदित्यनाथ को पूरी मजबूती से राष्ट्रीय मंच पर और कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि मोदी की कुर्सी के दावेदारों की अगली कतार में ले आए हैं.

तिस पर भी मोदी भाजपा नेताओं के बाकी हुजूम से बहुत ऊपर हैं. उन्हीं में से एक कहते हैं, ''नेतृत्व के लिहाज से मोदी नंबर 1 से 10 पायदान तक काबिज हैं. किसी भी दावेदार को नंबर 11 से शुरू करना होता है.'' अभी हाल तक अमित शाह को मोदी के असंदिग्ध तार्किक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता था. उनका रिश्ता गुजरात के दिनों से है. तभी से शाह मोदी के सबसे भरोसेमंद और करीबी रहे हैं. ऐसे शख्स जिनकी संगठन क्षमता आज भी बेजोड़ है. 2019 में गृह मंत्री बनाए जाने के बाद शाह जल्द ही हिंदुत्व के कट्टरपंथी चेहरे के तौर पर उभरे, उन्होंने अनुच्छेद 370 को रद्द करने के अभियान की अगुआई की, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लाए जिसने मुस्लिम शरणार्थियों को भारत में नागरिकता के लिए आवेदन करने से वर्जित कर दिया. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में जिस तरह लालकृष्ण आडवाणी को हिंदू कट्टरपंथी के तौर पर देखा जाता था, मोदी के दूसरे कार्यकाल में शाह ने वह चोगा धारण कर लिया. हर कोई मानता है कि मोदी के उत्तराधिकार के अव्वल दावेदार होने के साथ शाह पार्टी में अदम्य ताकत हैं और बने रहेंगे. 

चुनावी रणनीतिकार अलबत्ता आहिस्ता-आहिस्ता हो रहा एक बदलाव देखते हैं, जिसमें योगी अब हिंदुत्व के एक प्रमुख शुभंकर के तौर पर उभर रहे हैं, जिनका इस्तेमाल संघ परिवार देश भर में हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने और बढ़ाने में मदद के लिए करेगा. 'राजनैतिक हिंदू' के उभार की चर्चा करते हुए आरएसएस और भाजपा के विचारक शेषाद्रि आर. चारी कहते हैं, ''दार्शनिक स्तर पर आरएसएस बढ़-चढ़कर अपनी बात कहने वाले हिंदुत्व पर भले जोर दे, पर व्यावहारिक स्तर पर उसे ऐसे राजनैतिक नेता की जरूरत है जो इसे आक्रामक ढंग से आगे बढ़ा सके.

योगी उस चेहरे की तरह उभर रहे हैं. नया फॉर्मूला यह हो सकता है कि मोदी हिंदुत्व के नरम चेहरे की नुमाइंदगी करें और विकास के एजेंडे पर जोर दें, जबकि योगी को देश भर में हिंदू वोटों को एकजुट और मजबूत करने पर आक्रामक ढंग से जोर देने के काम में लगाया जाए.'' योगी ने पहले कार्यकाल में यह भूमिका पहले ही अख्तियार कर ली, जब उन्होंने कई राज्यों में भाजपा के लिए प्रचार किया और लगातार अखिल भारतीय मौजूदगी कायम की. वह प्रक्रिया अब और तेज हो सकती है.

क्या मोदी जैसा योगी कर सकते हैं?

क्या योगी प्रभावशाली मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री के रूप में उभर सकते हैं, जैसा मोदी ने किया? एक्सिस माइ इंडिया के गुप्ता मानते हैं कि मोदी की कामयाबी दोहराने के इच्छुक किसी भी राजनैतिक नेता में तीन अनिवार्य गुण होने चाहिए, जो प्रधानमंत्री में हैं. पहला यह कि उसे पार्टी संगठन में असंदिग्ध स्वीकृति और उस पर पूरा नियंत्रण हासिल हो. दूसरा यह कि उसके पास देश के लिए विजन हो और अफसरशाही से अपनी नीतियों पर अमल करवा पाए. इसके लिए जरूरी है कि उसके पास न केवल राजकाज के विभिन्न क्षेत्रों को अच्छी तरह समझने का व्यापक नजरिया हो बल्कि जिद्दी नौकरशाही से निपटने का प्रबंधकीय हुनर भी हो. तीसरा, जिसे गुप्ता मुख्य गुण मानते हैं, यह कि वह मतदाताओं के साथ गहरा नाता जोड़ सके और अपने शब्दों तथा काम दोनों से उनके दिल जीत सके. भाजपा के राज्यसभा सदस्य और रणनीतिकार राकेश सिन्हा यह बात ज्यादा बेबाक ढंग से कहते हैं, ''मोदी जी ने पार्टी को बिल्कुल जमीन से जुड़ी पार्टी बना दिया और हम उनके करिश्मे और विजन की वजह से सत्ता में हैं. मंडल बनाम कमंडल धड़ों के बीच सर्वानुमति बनाकर, ताकि दोनों के बीच अब और टकराव न हो, उन्होंने भगवा क्रांति का सूत्रपात किया. यह नई राजनीति का नया युग है.''

कई राजनैतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि मोदी के सांचे में ढलकर राष्ट्रीय नेता बन पाने से पहले योगी को अभी लंबी दूरी तय करनी है. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी दोनों के सलाहकार रहे सुधींद्र कुलकर्णी को नहीं लगता कि योगी में वह बात है, जो शीर्ष पर पहुंचने के लिए जरूरी है. वे कहते हैं, ''मैं उन्हें राष्ट्रीय नेता बनते इसलिए नहीं देखता क्योंकि उनमें उन मुख्य खूबियों का अभाव है जो मोदी को मंच के बीच ले आईं. हिंदू वोट से बाहर के लोगों के बीच मोदी की कहीं ज्यादा व्यापक अपील थी. उन्होंने राजकाज के गुजरात मॉडल को आगे बढ़ाया और उसे लोकप्रिय बनाया. इसके अलावा, योगी प्रभावी वक्ता होने के लिहाज से मोदी के कहीं आसपास भी नहीं हैं.'' पार्टी के एक और पर्यवेक्षक मुंहफट तरीके से कहते हैं, ''योगी ने मोदी के करिश्मे के बूते उत्तर प्रदेश जीता. इस सारे समीकरण से मोदी को हटा दें, तो क्या आपको लगता है कि योगी अपने दम पर यूपी में सीधा-सादा बहुमत भी जीत सकते हैं? बेहतर यही है कि राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा पालने के बजाए वे राज्य में नतीजे देने पर ध्यान दें.''

दूसरों को लगता है कि हिंदू वोट बैंक को एकजुट करने और इसलिए आक्रामक हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने की अपनी सीमा है. चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर मानते हैं कि भाजपा ज्यादातर चुनावों में कुल हिंदू आबादी के 50 फीसद से ज्यादा हिंदू वोट (कुल मतदाताओं का करीब 40 फीसद) कभी गोलबंद नहीं कर पाई. सबूत के तौर पर वे पश्चिम बंगाल में भाजपा के जबरदस्त अभियान के सामने ममता बनर्जी की निर्णायक जीत का उदाहरण देते हैं. धार्मिक ध्रुवीकरण से बस इतना ही चुनावी लाभ हासिल किया जा सकता है. 

यही वजह है कि मोदी, भाजपा और आरएसएस ने इसमें राष्ट्रवाद और जनकल्याणवाद को जोड़ा और जहां उन्हें ठीक लगा वहां जाति का कार्ड खेला. गुप्ता भी मानते हैं कि हिंदुत्व वोट की सीमाएं हैं और उसकी भरपाई के लिए इसमें विकास तथा राजकाज का एजेंडा जोड़ना जरूरी है. तो भी दूसरों का मानना है कि 2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा ने उनमें से ज्यादा चीजों को पूरा किया है जिनके बारे में आरएसएस हल्ला मचाता था. इसमें अनुच्छेद 370 को खत्म करना, राम मंदिर बनाना और एक समान नागरिक संहिता पर जोर देना शामिल है. अब उसे महज हिंदू वोट बैंक को बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाए जीतने के नए तरीके खोजने की जरूरत है. 

पार्टी के एक अंदरूनी व्यक्ति कहते हैं, ''जनकल्याणवाद मसलन शौचालय, पानी, मकान और बिजली देना, जाति और समुदाय के अवरोध तोड़ने में बेहतर रहा है. लाभार्थी वोट का उभार इसका सबूत है, खासकर महिलाओं में, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ी तादाद में वोट दिए.''

यह जिस चीज की तरफ इशारा करता है, वह धार्मिक गोलबंदी से आगे जाती है. मतदाताओं का एक पूरा नया आकांक्षी तबका है, जो नौकरियों के अवसर, बेहतर आमदनी और अच्छा राजकाज चाहता है. पंजाब में आम आदमी पार्टी की जोरदार जीत ने भी यह बात प्रदर्शित की. अरविंद केजरीवाल के इंकलाब का कुल जमा मतलब आम आदमी को ताकतवर बनाना है. 

कांग्रेस इस चुनाव में सबसे बड़े लूजर के तौर पर उभरी. पांचों राज्यों में उसने चुनाव लड़ा और पांचों में खराब प्रदर्शन किया. इनमें उत्तराखंड और गोवा भी हैं, जहां उसे जीतना चाहिए था, और पंजाब भी, जहां उसे अपनी सत्ता कायम रखनी चाहिए थी. पार्टी जिस लेफ्ट-ऑफ-सेंटर धारा की नुमाइंदगी करती है, और जिस समावेशी विकास पर उसका जोर है, उनकी अब भी अपील है, पर मौजूदा नेतृत्व वोटरों को लामबंद करने में इस ताकत का इस्तेमाल कर पाने में असमर्थ है. पंजाब में अपनी जीत के बाद आप इस जगह को हथियाने की भले इच्छुक हो, पर भाजपा के सबसे अव्वल चैलेंजर के रूप में कांग्रेस को विस्थापित करने से पहले उसे अभी लंबा रास्ता तय करना है. 

न ही भाजपा अपनी उपलब्धियों पर गर्व करते हुए हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना गवारा कर सकती है. मोदी ने दिखा दिया है कि कड़ी मेहनत, स्पष्टता और लक्ष्यों की एकाग्र खोज से नतीजे हासिल होंगे. सत्तारूढ़ पार्टी अगर सत्तारूढ़ पार्टी बनी रहना चाहती है, तो उसे विकास और प्रगति पर जोर देते रहने होगा.

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