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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मिशन अमेरिका

अमेरिका की अपनी पहली यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिश आपसी रिश्तों को पक्का करने और निवेश के मामले में भारत की विश्वसनीय छवि पेश करने की है. क्या नरेंद्र मोदी इसके जरिए भारत को कारोबार के भरोसेमंद ठिकाने के तौर पर पेश कर पाएंगे?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दुनिया के दूसरे छोर की यात्रा से न सिर्फ वैश्विक मंच पर उनकी पुख्ता मौजूदगी, बल्कि दुनिया की इकलौती महाशक्ति के साथ रिश्तों में नए अध्याय के आगाज की भी उम्मीद है. आखिर, बड़ी संजीदगी से यात्रा का वक्त संयुक्त राष्ट्र संघ आम सभा की बैठक के मौके पर तय किया गया है. इससे पुराने दिनों का गतिरोध टूटने और वीजा न देने की पिछले नौ बरस की खटास मिटने की भी उम्मीद है. इस लिहाज से यह यात्रा जितनी राजनैतिक है उतनी ही निजी भी है, और यह पांच दिनों के दौरान अमेरिका में मोदी के महत्वाकांक्षी एजेंडे से भी साफ है.

आसान नहीं है रिश्तों का सफर
लेकिन सब इतना आसान भी नहीं है. खासकर इसलिए कि पिछले साल अमेरिका-भारत के रिश्ते रसातल में चले गए थे जिसकी भद्दी परिणति न्यूयॉर्क में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की गिरफ्तारी से उपजे तनाव में हुई. हालांकि कूटनीतिकों और जानकारों का मानना है कि उसके बाद से जैसे रिश्ते बहाल हुए हैं, उसके चलते उम्मीद पर्याप्त है. इसकी शुरुआत लोकसभा चुनाव के परिणामों से हुई जब मोदी और एनडीए को स्पष्ट बहुमत हासिल हो गया. और जैसा कि भारतीय विदेश मंत्रालय के अफसरों को बार-बार यह बात कहने की आदत-सी हो चुकी है, मोदी ने सत्ता में आने के बाद खुद को वीजा न दिए जाने के मसले पर जिस तरह रत्ती भर विद्वेष नहीं जताया, उसी के चलते दोनों देशों के रिश्तों के पटरी पर लौटने की पृष्ठभूमि तैयार हुई.

उसके बाद कूटनीतिक गतिविधियां इतनी तेजी से सक्रिय होती देखी गईं, जो दुर्लभ ही कही जाएगी. अमेरिकी विदेश मंत्री, वाणिज्य मंत्री और ऊर्जा उपमंत्री एक साथ अगस्त में पांचवें भारत-अमेरिका रणनीतिक संवाद में हिस्सा लेने यहां आए. कूटनीतिक प्रतीकों के हिसाब से देखें तो संयुक्त राष्ट्र की आम सभा के दौरान अमेरिका में तमाम राष्ट्राध्यक्ष मौजूद रहेंगे, लेकिन अकेले मोदी ही हैं जिन्हें व्हाइट हाउस में आने का न्योता भेजा गया है. इन प्रतीकों के पार हालांकि बंद दरवाजों के पीछे जब मोदी का सामना अपने फन में पक्के नेताओं और सीईओ से होगा, तो बात बिल्कुल सीधी होगी. यह बातचीत खासकर दोनों देशों के बीच व्यापार और कारोबारी रिश्तों पर केंद्रित रहेगी जो कि मोदी के दौरे के मूल में भी है.
ड्रैगन से व्यापार में पिछड़े अंकल सैम
उतार-चढ़ाव
वाशिंगटन में तैनात रहे भारत के एक पूर्व वरिष्ठ राजनयिक कहते हैं, “सुधारों के मुद्दे पर भारत की गति भले धीमी रही, लेकिन पहले उसकी प्रतिष्ठा किसी भी कीमत पर अपनी वचनबद्धताएं निभाने की रही है. पिछले कुछ वर्षों में हालांकि पहली बार ऐसा हुआ कि यह ताना-बाना टूटने लगा और नकारात्मक वातावरण बन गया. इसके चलते आपसी रिश्तों में मजबूत पक्षकार रहा अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत भारत के खिलाफ हो गया.”

पूर्व राजनयिक का इशारा उन सिलसिलेवार घटनाओं की ओर है जिनके चलते 2005 से 2008 के बीच एटमी करार की वजह से बुलंदी पर पहुंचे भारत-अमेरिका संबंध बाद में पटरी से उतर गए और 2010 में ओबामा के भारत दौरे के बाद ही इनमें कुछ सुधार आया. मसलन, एटमी जवाबदेही कानून की वजह से एटमी करार के बावजूद अमेरिकी कंपनियां यहां कारोबार नहीं कर पाईं, 20 अरब यूरो की कीमत का मीडियम मल्टी-रोल लड़ाकू विमान का सौदा फ्रांस की ओर चला गया, भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी, अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी और एक के बाद एक घोटालों के खुलासे से दिल्ली की सरकार नीतिगत लकवा की शिकार हो गई. वे कहते हैं, “दरअसल, कोई वादा पूरा नहीं किया गया. कथनी और करनी में भारी फर्क आ गया.”

बदल गया कारोबारी स्वरूप
आंकड़े खुद इसकी गवाही देते हैं. अमेरिका 1998-99 में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार हुआ करता था जब कुल व्यापार में उसका हिस्सा 14 फीसदी था. उसके बाद से गिरावट चालू हुई. यह हिस्सा धीरे-धीरे गिरते हुए 2009 से 2013 के बीच 8 फीसदी से भी नीचे पहुंच गया और 2013-14 के दौरान ही इसमें कुछ सुधार हुआ तो यह 8 फीसदी पर वापस आया. दूसरी ओर भारत के व्यापार में चीन की हिस्सेदारी इसी अवधि में 2 से बढ़कर 9 फीसदी हो गई. लिहाजा, वह भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार बन गया. दरअसल, 2000-01 के बाद 13 वर्षों में अमेरिका के साथ भारत का व्यापार 400 फीसदी ही बढ़ा जबकि चीन के मामले में यह इजाफा 2,750 फीसदी था.

बेरिंग प्राइवेट इक्विटी के प्रबंध निदेशक राहुल भसीन कहते हैं, “निवेश में भारी कमी इस वजह से आई क्योंकि भारत ने निवेशकों के प्रति विश्वसनीय और सम्मानजनक व्यवहार नहीं दिखाया. निवेशकों के दिमाग में वे घटनाएं अब भी ताजा हैं कि कैसे ब्रिटेन की बड़ी कंपनी वोडाफोन पर मुकदमा चला और सुप्रीम कोर्ट के उसके पक्ष में फैसले के बाद कर कानूनों में पिछली तारीखों से संशोधन कर दिया गया, और नोकिया पर कर की दावेदारी ठोक दी गई, जो हमारे यहां सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय उत्पादकों में एक है.”

अहम होगी मुलाकातें
भारत जापान या चीन की तरह यहां तत्काल किसी निवेश या बड़े करार संबंधी वादे और नतीजे की उम्मीद नहीं कर सकता क्योंकि अमेरिकी प्रशासन का कॉर्पोरेट फैसलों से ज्यादा लेना-देना नहीं होता. टोक्यो और बीजिंग की सरकारें तो अपने उद्योगपतियों को सरकारी मदद के सहारे प्रभावित कर लेती हैं. भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इसी वजह से मोदी अमेरिकी कारोबारी समुदाय के साथ सुबह के नाश्ते, निजी कॉल और सामूहिक स्वागत समारोहों के माध्यम से मुलाकात रख रहे हैं क्योंकि वहां निवेश के फैसले सियासी गलियारों में नहीं बल्कि कॉर्पोरेट बोर्डरूम में लिए जाते हैं.

यूएस-इंडिया पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी के सह-संस्थापक रोबिंदर सचदेव कहते हैं, “प्रधानमंत्री को विश्वसनीय भारत की एक बड़ी तस्वीर पेश करनी होगी. उन्हें यह यकीन दिलाना होगा कि भारत निवेश के लिए विश्वसनीय देश है. व्यापार एक सड़क की तरह होता है. यह यात्रा उस सड़क को हाइवे में बदल सकती है जहां नीतिगत रोड़े कम हों. बस एक बार ये रोड़े हटा दिए जाएं, फिर तो निजी क्षेत्र जम ही जाएगा.”

रिश्ते मजबूत करने का मॉडल
कुछ जानकार रक्षा क्षेत्र में भारत और अमेरिका के कामयाब संबंधों को अन्य क्षेत्रों में रिश्ते मजबूत करने का एक मॉडल मानते हैं. कुछ रक्षा क्षेत्र को द्विपक्षीय संबंधों का सबसे ठोस आयाम बताते हैं. भारत में अमेरिका से हथियारों का आयात 2005 के बाद के एक दशक से कम वक्त में ही 10 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. विडंबना देखिए कि शीत युद्ध के दौरान जो अमेरिका विरोधी खेमे में हुआ करता था, वह आज भारत का सबसे बड़ा प्रशिक्षण सहभागी बन गया है और आज भारतीय सेना को भी वही सबसे ज्यादा हथियारों की आपूर्ति कर रहा है. भारत जैसे-जैसे अपनी सेना का आधुनिकीकरण करता जाएगा और पिछले वर्षों में यूपीए की सरकार के दौरान उजागर हुई सैन्य खामियों को भरता जाएगा, उसी रफ्तार से यह संबंध और ज्यादा बुलंदी हासिल करेगा.

दोनों देश 2012 में ही प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा हथियारों के संयुक्त उत्पादन व विकास के लिए डिफेंस टेक्नोलॉजी ऐंड ट्रेड इनिशिएटिव (डीटीटीआइ) पर राजी हो गए थे, लेकिन इस कदम को मोदी की यात्रा से प्रोत्साहन मिलेगा. यह उनके ‘मेक इन इंडिया’ अभियान और घरेलू स्तर पर हथियारों के निर्माण की योजना के बिल्कुल उपयुक्त है.

दोनों देशों के बीच ज्यादा से ज्यादा गतिविधियां सद्भावनापूर्ण और मूल्यवान हो सकती हैं, लेकिन इनसे ही अपने आप में रणनीतिक संबंध प्रगाढ़ नहीं हो जाएंगे, जैसा कि दोनों देशों की दिली चाहत है. कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में सीनियर फेलो एश्ले जे. टेलिस ने इस संबंध में मोदी की यात्रा से कई दिन पहले संस्थान की वेबसाइट पर काफी विस्तार से एक विश्लेषणात्मक लेख लिखा था, जिसमें कई अहम बातों का जिक्र है, “दोनों नेताओं को उन बुनियादी बातों पर नए सिरे से गौर करना चाहिए जिनकी वजह से दोनों देश सबसे पहले एक-दूसरे के करीब आए थे. बेहतर होगा कि राष्ट्रपति ओबामा और प्रधानमंत्री मोदी अपना समय यह चर्चा करने में बिताएं कि आखिर उन्हें रणनीतिक साझेदारी कायम करने की जरूरत क्यों है और कैसे वे इसे कर सकते हैं जबकि अमेरिका और भारत के बीच राष्ट्रीय क्षमता, विश्वदृष्टि और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विभिन्न मसलों पर व्यावहारिक सहयोग के प्रति वचनबद्धता के मामले में कई तरह के मतभेद हैं.”
—साथ में एम.जी. अरुण और मनु पब्बी

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