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आवरण कथाः मिशन 2022

भाजपा आलाकमान ने उत्तर प्रदेश और दूसरे कई राज्यों में निर्णायक माने जा रहे चुनावों के लिए अपनी रणनीति को सिरे चढ़ाना शुरू किया. इसमें उसे सत्ता विरोधी रुझान के अलावा महामारी के चलते स्वास्थ्य और आर्थिक मोर्चे पर आ खड़ी हुई बड़ी चुनौतियों से निबटना है.

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सबका नेता एक दिल्ली में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 7 नवंबर को मोदी का सक्वमान करते भाजपा नेता सबका नेता एक दिल्ली में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 7 नवंबर को मोदी का सक्वमान करते भाजपा नेता

अमित शाह की बातों पर गौर करें कि फरवरी 2022 में आसन्न, खासकर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की केंद्रीय सत्ता के लिए भविष्य के लिहाज से किस कदर महत्वपूर्ण होंगे.

पिछले महीने केंद्रीय गृह मंत्री तथा पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ने वाराणसी में करीब 700 पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा, ''नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में होने वाले 2024 के लोकसभा चुनावों की नींव 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में रखी जाएगी.’’ 

भाजपा के लिए 2022 में होने जा रहे सात राज्यों के विधानसभा चुनाव वाकई 2024 के लोकसभा चुनावों के पहले बेहद खास मुकाबला होंगे. उनसे तय होगा कि पार्टी की केंद्र में लगातार सत्ता रहेगी या नहीं. ये राज्य हैं उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, गोवा (जहां फरवरी में चुनाव होने हैं), और गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश (जहां 2022 के आखिर में चुनाव तय हैं).

इन राज्यों में लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 132 या 24 फीसद सीटें हैं. अकेले उत्तर प्रदेश में ही 80 सीटें हैं. इन चुनावी राज्यों में पंजाब को छोड़कर बाकी छह राज्यों में भाजपा सत्ता में है. यकीनन विधानसभा चुनावों का अगला दौर सत्तारूढ़ पार्टी के कोविड-19 महामारी से निबटने के तौर-तरीकों पर जनादेश होगा, जिससे केंद्रीय और राज्य स्तर पर आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी भारी तबाही दिखी है. यही नहीं, उसका भारी असर दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनावों की संभावनाओं पर भी दिखेगा.

हालांकि 2024 के पहले भाजपा के सामने कुछ और फौरी चुनौतियां भी हैं. राज्यसभा की कुल 245 सीटों में से 74 पर मार्च और जून 2022 में चुनाव होंगे. उनमें 11 उत्तर प्रदेश, पांच पंजाब और एक उत्तराखंड हैं. इन 17 सीटों में ऊपरी सदन से भाजपा के छह सदस्य अगले साल रिटायर हो रहे हैं. ऊपरी सदन में फिलहाल पार्टी के 93 सदस्य हैं. इसलिए फरवरी के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत तय करेगी कि आम चुनावों के पहले राज्यसभा में 123 सदस्यों का बहुमत उसके पास होगा या नहीं.

फिर जुलाई 2022 में नए राष्ट्रपति का भी चुनाव होगा. उसमें 4,120 विधानसभा सदस्य और 776 सांसदों का निर्वाचक मंडल वोट डालेगा. उनमें 590 विधायक—जिनमें ज्यादातर भाजपा के हैं—आसन्न विधानसभा चुनावों में दोबारा चुनकर आना चाहेंगे. इन पांच राज्यों के राष्ट्रपति चुनावों में वोट का मूल्य 1,03,756 या करीब 10 फीसद है. इस 10 फीसद का 80 फीसद या 83,824 वोट अकेले उत्तर प्रदेश का है. इन तमाम वजहों को जोड़ लें तो भाजपा का मिशन 2022 बेहद खास हो गया है और पार्टी इसके लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रही है.

आवरण कथाः मिशन 2022
आवरण कथाः मिशन 2022

आगे हैं चुनौतियां
देश के 28 राज्यों में फिलहाल ज्यादातर में भाजपा को बढ़त है. हाल के वर्षों में ऐसी स्थिति में सिर्फ कांग्रेस एक बार रही है. फिलहाल भगवा दल की 12 राज्यों में सीधे सत्ता है और छह में वह गठजोड़ सहयोगी है. इससे अगले दौर के विधानसभा चुनाव उसके लिए करो या मरो वाली स्थिति लेकर आए हैं, ताकि उसकी अजेय चुनावी छवि को पश्चिम बंगाल चुनावों में लगे झटके से बचाया जा सके.

पश्चिम बंगाल में इस साल अप्रैल के चुनावों में उसने सब कुछ दांव पर लगा दिया था, लेकिन ममता बनर्जी ने बड़ी जीत के साथ उसे धराशायी कर दिया. भाजपा के दक्षिणी मंसूबे भी धड़ाम हो गए. केरल में माकपा सत्ता में लौट आई और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की द्रमुक ने भाजपा की सहयोगी अन्नाद्रमुक को सत्ता से बेदखल कर दिया.

उसे थोड़ी राहत असम में निर्णायक जीत और पुदुच्चेरी में सहयोगी एन.आर. कांग्रेस के साथ सरकार बनाकर मिली. भाजपा पश्चिम बंगाल में भी प्रमुख विपक्षी दल बनकर उभरी. उसे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 47.9 फीसद के मुकाबले 38.1 फीसद वोट मिले और वाम मोर्चे तथा कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया.

हालांकि, 2019 के आम चुनावों में निर्णायक जीत (भाजपा को 303, एनडीए को 353) के बाद हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी अपना प्रदर्शन दोहराने में कामयाब नहीं हो पाई है. बिहार में 67 फीसद सीटें जीतने (110 पर लड़कर 72 जीते) के बावजूद उसकी सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) का प्रदर्शन बहुत खराब रहा और गठजोड़ हांफते-हांफते बहुमत के मुहाने पर पहुंचा.

दुनिया कीसबसे बड़ी चुनावी सेना
दुनिया कीसबसे बड़ी चुनावी सेना

लालू यादव की गैर-मौजूदगी में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने बड़ी टक्कर दी. दिल्ली में भारी शोर-शराबे और ध्रुवीकरण वाले प्रचार अभियान के बावजूद वह अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को सत्ता से नहीं हटा पाई.

इसके अलावा भाजपा को इसका गहरा एहसास भी है कि कोविड-19 महामारी की जानलेवा दूसरी लहर से निपटने के तरीके से केंद्र और उसके शासित राज्यों, दोनों में उसकी छवि को भारी झटका लगा है. फिर हाल की तिमाही सहित जीडीपी में सम्माजनक वृद्धि की रिपोर्टों के बावजूद अर्थव्यवस्था अभी खस्ताहाली से उबरी नहीं है.

बेरोजगारी और महंगाई बड़ी चिंता बनी हुई है. इसलिए चुनाव वाले छह राज्यों में से हरेक में भाजपा को सरकार विरोधी हवा, गुटबाजी, सहयोगियों की टूट और हालात संभालने में स्थानीय नेतृत्व की नाकामी से जूझना होगा. इसलिए भाजपा ने अपने कील-कांटे दुरुस्त कर लिए और ऐसी रणनीति पर काम किया है, जिससे उसे विपक्ष पर बढ़त पा लेने की उम्मीद होगी.

दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी सेना
दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी सेना

मसलन, मोदी सरकार ने नवंबर में ऐलान किया कि पेट्रोल पर 5 रु. और डीजल पर 10 रु. उत्पाद शुल्क घटा दिया गया (उसके बाद भाजपा शासित राज्यों ने वैट घटाया). फिर, 19 नवंबर को प्रधानमंत्री ने लंबी हठधर्मिता के बाद उन कृषि कानूनों को रद्द करने का ऐलान किया, जिसे उनकी सरकार सितंबर, 2020 में संसद में झटके से पारित करवा लिया था.

ये दोनों चालें महंगाई और आंदोलनकारी किसानों के प्रति सरकारी असंवेदनशीलता संबंधी विपक्ष की आलोचना को भोथरा करने के लिए चली गईं. किसानों के आंदोलन का उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों में असर मुमकिन होता.

इसके अलावा, पश्चिम बंगाल चुनावों के झटके और कोविड की दूसरी लहर के दुष्परिणाम के बावजूद ब्रांड मोदी पार्टी की सत्ता संभावनाओं के लिए खास बना हुआ है. अगस्त 2021 में इंडिया टुडे देश का मिजाज जनमत सर्वेक्षण से पता चला कि मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता की रेटिंग पिछले साल के मुकाबले गिरने के बावजूद काफी ऊंची बनी हुई है.

पार्टी नेताओं का मानना है कि देश भर में टीकाकरण में तेजी से प्रधानमंत्री मोदी की काम करके दिखाने वाले की छवि को बल मिला है. एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं, ''वे हमारे तुरुप हैं. मूल भारतीय राष्ट्रवाद-स्वराज, स्वदेशी, स्वावलंबन में पक्का यकीन रखने के कारण हम लोगों तक कारगर तरीके से चीजें ले जाने की कोशिश कर रहे हैं.’’ 

ब्रांड मोदी की अपील के साथ भाजपा सम्मान, भागीदारी और राष्ट्रवाद के नारों के जरिए आम आदमी तक पहुंचने के भारी अभियान पर भी अमल कर रही है. वह अपने काडर से ''सेवा, संकल्प और समर्पण’’ के जरिए आम आदमी से ''आस्था का पुल’’ कायम करने को कह रही है, जिसकी अपील पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की हालिया बैठक में प्रधानमंत्री ने की है. 

दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी सेना
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नेतृत्व में नई जान
भाजपा ने हाल के महीनों में पार्टी के प्रदेश नेतृत्व में भी फेरबदल किए हैं. पिछले सात साल में पार्टी पहले शाह और फिर जे.पी. नड्डा के नेतृत्व में अजेय चुनावी सेना बन गई है. वह कभी अपनी जीत से संतुष्ट नहीं हो जाती और हार से सबक लेती है. केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल, राज्यों में मुख्यमंत्रियों को बदलने, नए राज्य पार्टी पदाधिकारियों की नियुक्ति जैसी हाल की कई कार्रवाइयों से मोदी-शाह-नड्डा तिकड़ी ने पार्टी को चुस्त बनाया है.

अब पार्टी युवा, चतुर नेतृत्व की तलाश में है. इसके अलावा वह महिला, ओबीसी, दलित और आदिवासियों पर फोकस के जरिए अधिक समावेशी और समानता वाली दिखना चाहती है. इस मकसद से पार्टी ने बड़ी निर्ममता से राज्य के नेताओं को बदला है.

मसलन, उत्तराखंड में जब पार्टी ने पाया कि मार्च में त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह मुख्यमंत्री बनाए गए तीरथ सिंह रावत काम नहीं कर पा रहे हैं तो जुलाई में उन्हें चलता कर दिया गया. उनकी जगह पुष्कर सिंह धामी को लाया गया, जो 46 वर्ष की उम्र में अपने मंत्रिमंडल में सबसे युवा हैं.

पार्टी अब अपने आधे विधायकों का टिकट काटने और नए चेहरे लाने की उक्वमीद कर रही है. इसी तरह, गुजरात में विजय रूपाणी के खिलाफ बढ़ते असंतोष को भांपकर भाजपा आलाकमान ने सितंबर में समूचे राज्य नेतृत्व को ही बदल डाला. राजनीति में अपेक्षाकृत नौसिखिया 59 वर्षीय भूपेंद्रभाई पटेल को नया मुख्यमंत्री बनाया गया और कैबिनेट में कई नए चेहरे लाए गए.

कुछ दूसरे चुनावी राज्यों में मुख्यमंत्री भले न बदले गए हों, मगर नए चेहरों को आगे लाने का काम किया गया. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री तथा गोवा भाजपा के प्रभारी देवेंद्र फड़नवीस ने अक्तूबर में वरिष्ठ भाजपा नेताओं और विधायकों के साथ बैठक की और बताया कि पार्टी कई मौजूदा विधायकों को बदल सकती है. मणिपुर में भी भाजपा सत्ता विरोधी रुझान की काट के लिए कई विधायकों को हाशिये पर ला सकती है.

दुनिया की सबसे बड़ी चुनावी सेना
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पंजाब में 2020 में शिरोमणि अकाली दल के जुदा होने के बाद से भाजपा शहरी हिंदुओं और दलितों में पैठ बढ़ाने की कोशिश में लगी है. कृषि कानूनों को रद्द करने का मोदी सरकार का फैसला प्रभावी जट सिख समुदाय की नाराजगी घटाने के मकसद से ही किया गया. इधर, भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और उनके नए गुट पंजाब लोक कांग्रेस से पींगें बढ़ाने की कोशिश कर रही है. उसे उम्मीद है कि उदार सिख उसकी ओर झुक जाएंगे. हालांकि राज्य में अभी उसके आगे बहुत बड़ी चुनौती है. 

चुनावी सेना में जोश फूंकना
साथ ही, नड्डा कार्यकर्ताओं में जोश फूंकने और शाह के बनाए संगठन को और मजबूत करने के लिए बी.एल. संतोष, अरुण सिंह, तरुण चुघ, सी.टी. रवि और दिलीप सैकिया सरीखे प्रमुख महामंत्रियों और सौदान सिंह, राधा मोहन सिंह, बैजयंत पंडा और डी.के. अरुणा सरीखे उपाध्यक्षों का सहयोग ले रहे हैं. पार्टी ने डिजिटल टेक्नोलॉजी के जरिए 18 करोड़ स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं का अपना डेटाबेस खंगाला और पेशे तथा बूथ स्थल के हिसाब से उनके समूह बनाए. (देखें बातचीत:  ''भाजपा कभी आत्मसंतुष्ट नहीं होती. हमने 2022 में जीतने की पूरी तैयारी कर ली है’’).

फिर उसने बूथ स्तर पर व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए और वीडियो, दस्तावेजों तथा वॉइस-मॉड्यूलेटेड संदेशों के जरिए पार्टी के कार्य प्रदर्शन तथा एजेंडे के बारे में जानकारियां प्रसारित कीं. मंडल स्तर पर प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि पार्टी कार्यकर्ताओं को केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी के कार्यक्रमों और नीतियों और उनके अपने राज्य की सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारियों से लैस किया जा सके.

वहीं भाजपा की चुनावी सेना ने अनेक विधानसभा क्षेत्रों में पूर्णकालिक विस्तारकों की पूरी की पूरी बटालियन भर्ती की है. फिलहाल भाजपा के पास ऐसे 8,000 रंगरूट हैं, जिनमें से 800 अकेले उत्तर प्रदेश में, 120 उत्तराखंड में और 100-100 पंजाब तथा गोवा में तैनात किए गए हैं. यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लिया गया है, जहां पूर्णकालिक प्रचारक पार्टी के जमीनी कार्यक्रमों और संदेशों को असरदार ढंग से घर-घर पहुंचाना तय करते हैं.

नड्डा सभी 10.4 लाख चुनाव बूथों पर पन्ना प्रमुख और पन्ना समितियां बनाकर अपने पूर्ववर्ती की बूथ स्तरीय रणनीति को भी नई धार दे रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि यह काम अगले साल अप्रैल तक पूरा कर लिया जाएगा. प्राथमिकता बेशक उन पांच राज्यों को दी जाएगी जहां अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं.

चुघ कहते हैं, ‘‘हरेक पन्ना प्रमुख से मतदाता सूची के एक पन्ने पर दर्ज औसतन 30 वोटरों या 5-6 परिवारों से संपर्क करने की उम्मीद की जा रही है.’’ भाजपा ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले पन्ना समितियों की व्यवस्था लागू करने का फैसला किया है. महज पन्ना प्रमुख की बजाए अब पांच सदस्यों की एक समिति होगी, जो मतदाता सूची के एक पन्ने पर दर्ज मतदाताओं से संपर्क करेगी. 

उम्मीद की जा रही है कि ठेठ जमीनी स्तर पर इस गहन नेटवर्क की मदद से भाजपा मोदी सरकार की कोविड के टीके लगाने की कोशिशों, सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं, गरीबों को दिए जा रहे मुफ्त राशन और नकद सहायता, राम मंदिर निर्माण और काशी मंदिर के पुनर्विकास की ताजातरीन गतिविधियों की जानकारियां मतदाताओं तक पहुंचा सकेगी. साथ ही पार्टी राजकाज में दलितों, वनवासियों (आदिवासियों) और पिछड़े वर्गों सरीखे कमजोर तबकों की भागीदारी भी बढ़ा रही है.

अगस्त से भाजपा ने मेल-मिलाप के तीन भारी-भरकम कार्यक्रम लॉन्च किए हैं. इनमें पहला मंत्रिमंडल में शामिल नए मंत्रियों की उनके अपने निर्वाचन क्षेत्रों से भिन्न इलाकों में जन आशीर्वाद यात्राएं थीं. फिर सार्वजनिक पद पर प्रधानमंत्री के 20 साल पूरे होने का उत्सव मनाने के लिए आजादी का अमृत महोत्सव कार्यक्रम था.

इसके अलावा भाजपा का सेवा ही संगठन अभियान अभी चल ही रहा है, जिसमें 10 लाख स्वैच्छिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता शामिल हैं. भाजपा के हर घर दस्तक कार्यक्रम के लिए प्रशिक्षित और तैनात इन कार्यकर्ताओं को देश में सभी को पूर्ण टीके लगवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

नड्डा ने केंद्र और राज्य स्तरों पर नेतृत्व के कामकाज में भी बदलाव किए हैं. मसलन, पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्रियों के लिए 'चक्रीय प्रवास’ या बारी-बारी से दौरे की व्यवस्था शुरू की गई है. इसमें उम्मीद है कि पार्टी के सभी नौ महासचिवों के उन राज्यों के दौरे होंगे जिनके वे प्रभारी हैं. पार्टी के एक शीर्ष नेता कहते हैं, ''नियंत्रण और संतुलन के अलावा इससे पार्टी कार्यकर्ताओं को एक नया नजरिया हासिल करने में भी मदद मिलती है.’’ राज्य स्तर पर सभी अध्यक्षों को 'की रिजल्ट एरिया’ (केआरए) या प्रमुख परिणाम क्षेत्र दिए गए हैं, जिन पर उन्हें काम करके दिखाना है. इनकी नियमित निगरानी की जाती है.

उत्तर प्रदेश की लड़ाई
उत्तर प्रदेश में भाजपा की मुख्य चुनौती इस अभिशाप को तोड़ना है कि बीते छह दशकों में कोई मुख्यमंत्री दोबारा सत्ता में नहीं लौटा. पार्टी इस बढ़त के साथ शुरुआत कर रही है कि उसने 2014 के बाद दो आम चुनाव (2014 और 2019) और एक विधानसभा चुनाव (2017) भारी बहुमत से जीता. 2017 के चुनाव में भाजपा ने 39.6 फीसद वोट अपनी झोली में डाले थे, जबकि उसके निकटमत प्रतिद्वंद्वियों बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) को क्रमश: 22.33 फीसद और 21.82 फीसद वोट मिले थे.

2019 के आम चुनाव में भाजपा की अगुआई वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)ने 49.9 फीसद वोटों पर कब्जा किया था, जो बताता था कि राज्य में उसका किस कदर जोरदार दबदबा है. 2017 की तरह इस बार भी भाजपा जातियों के उस इंद्रधनुष पर भरोसा करके चल रही है जो राज्य में अपने पारंपरिक ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर वोटों को कायम रखते हुए गैर-जाटव दलितों और गैर-यादव ओबीसी से मिलकर बना है.

पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को नहीं बदलेगी. योगी हिंदुत्व के कट्टरपंथी प्रतीक बनकर उभरे हैं. उन्हें पार्टी के मूल वोटरों का समर्थन हासिल है. एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं, ''मोदी तो खैर स्टार कैंपेनर हैं ही, योगी के साथ उनकी जोड़ी को मैच विनर की तरह देखा जा रहा है.’’

चुनावों की वृहत व्यवस्था के लिए भाजपा ने उत्तर प्रदेश को छह क्षेत्रों में बांटा है—पश्चिमी उत्तर प्रदेश, ब्रज, अवध, कानपुर, गोरखपुर और काशी. प्रत्येक क्षेत्र में संगठन के मामलों और चुनाव अभियान के अलग-अलग प्रभारी हैं. हरेक क्षेत्र में जाति समीकरण, प्रतिनिधित्व की प्राथमिकताएं और जरूरतें बिल्कुल अलग-अलग हैं. इस बंटवारे से भाजपा को आरएसएस की इकाइयों के साथ मिलकर काम करने में मदद मिलती है.

संघ ने भी अपना काम इसी से मिलते-जुलते क्षेत्रों में बांटा है और भाजपा की संभावनाओं में चार चांद लगाने के लिए अभियान चलाता है. कहा जाता है कि आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले ने राज्य नेतृत्व के झगड़ते धड़ों और आरएसएस के बीच खाई पाटने में सक्रिय भूमिका निभाई. 

राज्य में भाजपा की जीत की संभावनाएं बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने जुलाई में किए फेरबदल में अपने मंत्रिमंडल में राज्य से सात नए केंद्रीय मंत्री शामिल किए. ये हैं—सहयोगी अपना दल की अनुप्रिया पटेल, आगरा से सांसद एस.पी. सिंह बघेल, मोहनलालगंज से सांसद कौशल किशोर, महाराजगंज से सांसद पंकज चौधरी, लखीमपुर खीरी से सांसद अजय मिश्रा, जालौन से सांसद भानु प्रताप वर्मा और राज्यसभा सांसद बी.एल. वर्मा. इनके चयन से पार्टी के जातीय समीकरणों में संतुलन साधने की भी झलक मिलती है.

पटेल, चौधरी और बी.एल. वर्मा ओबीसी हैं; बघेल, किशोर और वर्मा दलित हैं; जबकि मिश्रा ब्राह्मण हैं. भाजपा ने यह भी पक्का किया कि सभी छह क्षेत्रों को कम या ज्यादा प्रतिनिधित्व मिले. उत्तर प्रदेश से ही स्मृति ईरानी, राजनाथ सिंह, संजीव बालियान, वी.के. सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति पहले से ही मंत्रिमंडल में हैं. खुद प्रधानमंत्री तो खैर हैं ही.

साथ ही, भाजपा विकास और कानून-व्यवस्था में सुधार के नारों पर खासा जोर दे रही है. मध्य अक्तूबर से ही राज्य में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का तांता लगा है, जिनका प्रधानमंत्री ने या तो उद्घा टन किया या जिन्हें लोकार्पित किया. 16 नवंबर को प्रधानमंत्री ने भारतीय वायु सेना के भारी वजन ढोने वाले सी-130जे हरक्यूलिस विमान से उड़ान भरी और नवनिर्मित पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर उतरे. 360 किमी लंबा यह हाइवे लखनऊ को पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों से जोड़ता है.

एक हफ्ते बाद उन्होंने अलीगढ़ के नजदीक जेवर में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का शिलान्यास किया. इससे पहले केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश में रक्षा गलियारे का उदï्घाटन किया तो गृह मंत्री शाह ने 13 नवंबर को आजमगढ़ में और दिसंबर के पहले हक्रते में अलीगढ़ में राज्य विश्वविद्यालयों की आधारशिलाएं रखीं. इन विश्वविद्यालयों के नाम स्थानीय नायकों के नाम पर रखे गए हैं.

जाति समीकरणों और विकास पर जोर देने का यह मतलब नहीं कि भाजपा देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में सत्ता कायम रखने की खातिर हिंदुत्व या अतिराष्ट्रवाद का सुर मद्धम कर रही है. इसमें भाजपा, आरएसएस के कार्यकर्ताओं की मदद ले रही है. वे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का संदेश बिल्कुल नीचे जमीनी स्तर तक ले जाने में पार्टी की मदद कर रहे हैं.

मध्य नवंबर में संघ ने काशी विश्वनाथ मंदिर से तस्करी के जरिए ले जाई गई देवी अन्नपूर्णा की प्रतिमा कनाडा से वापस आने का उत्सव मनाने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को गोलबंद करके मां अन्नपूर्णा यात्रा का आयोजन किया. मूर्ति को राज्य के 18 जिलों में फैले विधानसभा क्षेत्रों के 230 हिस्सों में घुमाया गया. भाजपा के नेता इनकार करते हैं कि पार्टी साफ-साफ ध्रुवीकरण का रास्ता चुन रही है.

वे दावा करते हैं कि हिंदुत्व के प्रति उनका नजरिया कहीं ज्यादा नपा-तुला है. आखिरकार राज्य में 18 फीसद मुस्लिम वोट हैं. 2017 में उसने कई सीटों पर उदार मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं के कुछ वोट हासिल किए थे, जिससे उसे चुनाव में सूपड़ा साफ करने में मदद मिली थी. भाजपा के एक शीर्ष नेता स्वीकार करते हैं, ‘‘2017 दोहराना इस बार मुश्किल दिखाई देता है.’’ यह चेतावनी उन दूसरे राज्यों पर भी लागू होती है जहां चुनाव होने जा रहे हैं. मिशन 2022 निश्चित ही आसान नहीं होगा.
—साथ में, ब्यूरो रिपोर्ट

अगले साल जिन सात राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें लोकसभा की 543 में से 132 या कि 24 फीसद सीटें हैं. इनमें से सीधे-सीधे 80 सीटें तो अकेले उत्तर प्रदेश की ही हैं

आलाकमान ने एक तरह से यह बात स्पष्ट कर दी है कि उसका जोर अपेक्षाकृत युवा और जिताऊ नेतृत्व पर है. यही वजह है कि उसने उम्मीदों पर खरे न उतर पाने वाले मुख्यमंत्रियों को बिना कोई मुरव्वत दिखाए बदल डाला

लोग समझते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अर्थव्यवस्था अच्छी गति से सही दिशा में आगे बढ़ रही है. उन्हें एक ऐसी शक्चिसयत के रूप में देखा जाता है जो जनता की आकांक्षाओं को लेकर नितांत संवेदनशील और बेहद सक्रिय हैं 

उत्तर प्रदेश में तो सत्ता विरोधी नहीं, सत्ता के पक्ष में लहर है. योगी आदित्य नाथ ने हर मोर्चे पर मजबूत नेतृत्व का प्रदर्शन किया है. चाहे वह कानून-व्यवस्था और विकास की बात हो या फिर जमीनी स्तर पर बदलाव लाने की बात. 

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