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आवरण कथाः भविष्य के लिए कमर कसती भाजपा

मौजूदा विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए निर्णायक मोड़ होंगे. अगर वह बंगाल जीतती है तो 2024 में उसे सत्ता में लौटने से कुछ भी रोक नहीं पाएगा. अगर वह हार जाती है तो इसका दूरगामी असर पड़ेगा और उसका सुधारों का एजेंडा खतरे में पड़ जाएगा.

तिकड़ी नरेंद्र मोदी, अमित शाह अव्वल दर्जे के रणनीतिकार जे.पी. नड्डा तिकड़ी नरेंद्र मोदी, अमित शाह अव्वल दर्जे के रणनीतिकार जे.पी. नड्डा

अपनी युवा उम्र में जगत प्रकाश नड्डा उम्दा धावक और तैराक थे और पटना में, जहां वे पले-बढ़े, अपने स्कूल और कॉलेज दोनों में स्वर्ण पदक जीतते थे. वे कहते हैं कि खेलों ने उन्हें ध्यान केंद्रित करना, निरंतरता बनाए रखना और धैर्य के साथ सही मौके का इंतजार करना सिखाया. ये खूबियां तब भी उनके बहुत काम आईं जब वे अपने गृहराज्य हिमाचल प्रदेश लौटे, राजनीति से जुड़े और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक चुने गए.

जब 1998 में पार्टी ने विधानसभा चुनाव जीता तो उन्हें दरकिनार करके मुख्यमंत्री पद प्रेम कुमार धूमल को दे दिया गया. तब भाजपा महासचिव नरेंद्र मोदी ने यह किया था. भाजपा की जीत पक्की करने के लिए नड्डा ने हालांकि मोदी के साथ घनिष्ठता से काम किया था, फिर भी उन्होंने कोई कटुता या नाराजगी नहीं जताई और यहां तक कि धूमल के मंत्रिमंडल में भी शामिल हो गए. मोदी जाहिर तौर पर नड्डा की सकारात्कता और परिपक्वता से प्रभावित थे.

बीस साल बाद मोदी ने नड्डा को उनके धैर्य और शांतचित्तता के लिए नवाजा, जब जनवरी 2020 में अमित शाह के वारिस के तौर पर भाजपा अध्यक्ष का पद इस हिमाचली नेता को सौंप दिया गया. मोदी और शाह तब तक भाजपा को 15 करोड़ से ज्यादा सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बना चुके थे. दोनों नेताओं ने 2014 और 2019 के आम चुनावों में एक के बाद एक पार्टी के हैरतअंगेज संसदीय बहुमतों की अगुआई की थी.

इतना ही नहीं, 2018 तक देश की 70 फीसद आबादी की नुमाइंदगी करने वाले 21 राज्यों में भाजपा ने या तो सरकारें बना ली थीं या वह सरकारों का हिस्सा थी. इनमें उत्तर प्रदेश में जबरदस्त बहुमत हासिल करना भी शामिल है जहां वह 15 साल बाद सत्ता में लौटी.

नड्डा अब उस विशाल राजनैतिक संगठन के सीईओ हैं जिसने छोटे-से वक्त में ‘‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’’ की छवि से छुटकारा पा लिया है. भाजपा भारतीय राजनीति का केंद्र बिंदु बनकर उभरी है. अब वह अखिल भारतीय बन रही है जो राष्ट्रीय राजनैतिक नैरेटिव या अफसाने पर उसी तरह हावी है जैसे पहले कांग्रेस हुआ करती थी. भाजपा को जबरदस्त चुनावी ताकत बनाने के अलावा शाह ने अध्यक्ष के नाते पार्टी की दोहरी भूमिका की परिकल्पना की, यानी वह सरकार और लोगों के बीच ओजस्वी पुल बने और उस फीडबैक के आधार पर सरकार को राजकाज के लिए संदर्भ और दिशा प्रदान करे.

कई लोग नड्डा को मोदी और शाह के रबर स्टैंप की तरह देखते हैं, जो दोनों बड़े नेताओं को पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने देंगे और एक आलोचक के शब्दों में ''एचएमवी (हिज मास्टर्स वॉएस या अपने मालिक की आवाज) होने से ज्यादा कुछ नहीं होंगे.’’ मगर दूसरों का मानना है कि पार्टी को स्थिर और निरंतर गति से आगे बढ़ाते रहने की खातिर नड्डा को पूर्ण संतुलन और समवेत ऊर्जा देने के लिए चुना गया.

नड्डा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अमित शाह की विराट उपलब्धियों के अनुरूप खुद को खरा साबित करने की है. उन्हें न केवल मोदी और शाह के हाथों निर्मित विशाल राजनैतिक साम्राज्य को मजबूती देना है, बल्कि पूरब और दक्षिण के राज्यों में पार्टी की मौजूदगी का विस्तार भी करना है. विधानसभा चुनावों का मौजूदा दौर उनके और पार्टी के लिए लिटमस टेस्ट होगा. नड्डा को यह भी पक्का करना होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल आर्थिक सुधारों की जो मुहिम छेड़ी है, पार्टी का काडर उसे जमीनी समर्थन मुहैया करे ताकि वे उसी तरह विरोध की ज्वाला में फंस कर न रह जाएं जैसा नए कृषि कानूनों के साथ हुआ.

नड्डा अपनी जिम्मेदारियों के इतने भारी-भरकम होने से भयभीत या हतोत्साहित नहीं हैं. वे तूफान के बीच शांत रहने की अपनी क्षमता का श्रेय अपनी खेल की पृष्ठभूमि को देते हैं. एक विस्तृत इंटरव्यू में (देखें ‘राष्ट्रवादी शक्तियों को एकजुट करेगी भाजपा’), उन्होंने कहा, ‘‘जब हम टीम भावना से काम करते हैं, नतीजे अच्छे आते हैं. कार्यकर्ताओं में निरंतरता और साधना है और कोई भ्रम नहीं है. कुछ इलाकों में हमारे पास विस्तार का मौका है, इसलिए हम पार्टी के काडर और ढांचे को मजबूत बनाने के लिए संसाधन झोंक रहे हैं और अपने मौजूदा आधार में भी नई जान फूंक रहे हैं.’’

तो भी, आम चुनावों में बड़ी जीतों के बावजूद, बीते तीन सालों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन साफ तौर पर कुछ अच्छा और कुछ बुरा रहा है और यह उसके नेताओं के लिए बढ़ती चिंता का विषय है. 2018 में वह राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में सत्ता से हाथ धो बैठी. 2019 के आम चुनाव के बाद हुए राज्य विधानसभाओं के चुनावों में उसने झारखंड में सत्ता गंवा दी, महाराष्ट्र में नाकाम रही, दिल्ली में बुरी तरह मुंह की खाई और हरियाणा में गठबंधन के लिए मजबूर हुई.

अकेली गनीमत बिहार की जीत थी जहां उसने गठबंधन के भागीदार जनता दल (यूनाइटेड) से ज्यादा सीटें जीतीं, लेकिन उससे पहले राष्ट्रीय जनता दल के नए उभरते नेता तेजस्वी यादव ने उनका चैन और जीत लगभग छीन ही ली थी. राज्यों के हालिया चुनावों में उनके कमजोर प्रदर्शन को देखते हुए बड़े सवाल उठे हैं: क्या पार्टी का चुनावी प्रदर्शन अपने शिखर पर पहुंचने के बाद अब ढलान पर है? अपने जबरदस्त रुतबे के बावजूद क्या राज्य चुनावों में भाजपा के लिए वोट खींचने की मोदी की क्षमता उतार पर है?


यही कारण हैं कि भाजपा मौजूदा विधानसभा चुनावों में अच्छे नतीजे लाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है. खासकर पश्चिम बंगाल में. यह बड़ा पूर्वी राज्य तीखे मुकाबले का गवाह बन रहा है, क्योंकि तीन दशकों में पहली बार एक राष्ट्रीय सत्तारूढ़ पार्टी ममता बनर्जी की अगुआई वाली सत्तारूढ़ क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की दशक भर लंबी हुकूमत को कड़ी चुनौती दे रही है. 2019 के संसदीय चुनाव में शाह ने चमत्कारिक सफलता हासिल करते हुए पहली बार बंगाल की 42 में से 18 सीटें भाजपा की झोली में डाल दीं और ममता को बुरी तरह हतप्रभ कर दिया.

अब ममता को सत्ता से बेदखल करने और बंगाल में पहली भाजपा सरकार कायम करने के लिए मोदी और शाह ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी है. मोदी वहां 20 और शाह इससे दुगुनी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं. पार्टी ने राज्य में प्रचार के लिए 109 राष्ट्रीय नेताओं को उतारा है जिनमें केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, गजेंद्र सिंह शेखावत, स्मृति ईरानी और गिरिराज सिंह भी हैं. केंद्रीय राज्यमंत्री बाबुल सुप्रियो को उक्वमीदवार बनाया गया है, तो राज्यसभा सांसद स्वप्न दासगुप्ता के अलावा लोकसभा सांसद लॉकेट चटर्जी और निशीथ प्रमाणिक को भी जंग में उतार दिया गया है.

दांव इतने ऊंचे हैं कि यकीन नहीं होता. टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) के अभियान की दशा-दिशा तय कर रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर तो इस हद चले गए कि उन्होंने कह दिया कि अगर भाजपा बंगाल जीत जाती है तो देश में एक राष्ट्र, एक पार्टी की सुदूर संभावना जीवंत हो जाएगी. विपक्ष को अपने आत्मसंतोष से झकझोरकर जगाने के लिए भी वे बढ़ा-चढ़ाकर ऐसा कह रहे हो सकते हैं, लेकिन अगर बंगाल भाजपा की झोली में आ जाता है तो संभावना यही है कि इसका 2022 में होने वाले राज्य चुनावों के अगले दौर में, खासकर उत्तर प्रदेश की अहम लड़ाई में, कई गुना ज्यादा असर होगा.

अलबत्ता भाजपा की निगाहें बड़े इनाम पर जमी हैं और वह है  2024 में लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में लौटना. अगर भाजपा आम चुनाव के पहले ज्यादातर बड़े विधानसभा चुनाव जीत लेती है तो यह काम कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा. विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में प्रोफेसर अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘‘पश्चिम बंगाल भाजपा को वह चुनावी वैधता दे सकता है जिसकी उसे बहुत जरूरत है, लेकिन अगर वह हार जाती है तो इसका अगले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों पर गंभीर असर पड़ेगा.’’

नतीजों से यह भी पता चलेगा कि किसान आंदोलन ने उसकी लोकप्रियता में सेंध लगाई है या नहीं. अपनी जीत से ऐसे और ज्यादा सुधारों को पूरा करने का उसका उत्साह बढ़ जाएगा. अलबत्ता नड्डा भाजपा की चुनाव जीतने की बेलगाम आक्रामकता का श्रेय चुनावी असुरक्षा को नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा बड़े मकसद को देते हैं. वे कहते हैं, ''अगर भारत को तेज तरक्की करनी है और हमारे पास नरेंद्र मोदी जैसा ऊर्जावान नेता है, तो भाजपा को वक्त क्यों बर्बाद करना चाहिए? हमें पूरा लाभ उठाकर यह पक्का करना ही होगा कि हम बदलाव लाकर जमीनी स्तर पर लोगों को ताकतवर बना सकते हैं.’’

फिर भी, विधानसभा चुनावों के मौजूदा दौर में फैसला चाहे जिसके हक में हो, भाजपा को कई मुद्दों पर अपने भीतर झांकने की जरूरत है. इन मुद्दों में यह बढ़ती धारणा भी है कि भाजपा अवसरवादी पार्टी बन गई है जो किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करने को आमादा है. राज्यों में विपक्ष को धूल में मिलाने और सत्ता पर कब्जा करने के लिए दलबदल करवाना उसकी रणनीति का हिस्सा बन गया है. पश्चिम बंगाल में वह जितने टीएमसी विधायकों और नेताओं को लुभाकर अपने पाले में लाई, उनकी गिनती तक रख पाना मुश्किल है.

मध्य प्रदेश में भाजपा ने रातोरात विधायकों के खासे बड़े धड़े का दलबदल करवाकर कमल नाथ की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार को गिरा दिया. इससे पहले गोवा और कर्नाटक में भी उसने यही किया. राजस्थान में कांग्रेस की सरकार को अपदस्थ करने की उसकी कोशिश नाकाम रही. इस सबका सिला उसे महाराष्ट्र में मिला जहां उसकी सहयोगी पार्टी शिवसेना सरकार बनाने के लिए उसके विरोधियों के साथ जा मिली. इन्हीं वजहों से भाजपा के आलोचक इस पार्टी को नई कांग्रेस कहने लगे हैं.

अपने इंटरव्यू में नड्डा इस आरोप को बेताबी से गलत ठहराते हैं. दलबदल करवाने के नैतिक और अनैतिक तरीकों के बीच फर्क बताते हुए वे विधायकों और नेताओं की खरीद-फरोख्त के आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं कि पार्टी ने अपने सिद्धांतों या विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया और अब पार्टी इतनी बड़ी हो चुकी है कि दूसरी पार्टियों के नाराज लोगों को जगह दे सकती है.

भाजपा अध्यक्ष तब कहीं ज्यादा मजबूत जमीन पर खड़े नजर आते हैं जब वे उस बूथ प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करने की बात करते हैं जिसे शाह ने परवान चढ़ाया था. नड्डा ने एक कदम आगे बढ़कर उसका गठन किया है जिन्हें ‘पन्ना समितियां’ कहा जाता है और जो मतदाता सूची के हरेक पन्ने पर दर्ज वोटरों से मिलकर उन्हें रिझाती हैं.

वे कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने और पार्टी की उपलब्धियां मतदाताओं तक पहुंचाने की गरज से ब्लॉक स्तर के नेताओं के नाम तय करने के साथ पार्टी की चुनाव रणनीति की दशा-दिशा तय करने के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा भी ले रहे हैं जिसमें विस्तृत डेटा एनालिसिस भी है. दूसरी पार्टियों से दलबदल करवाने के बजाए इस किस्म के कदम चुनावों में पार्टी को कहीं ज्यादा फायदा पहुंचा सकते हैं.

समर्थन जुटाने के लिए भाजपा राष्ट्रवाद, पहचान और विकास का इस्तेमाल कर रही है, वहीं मतदाताओं में घोर ध्रुवीकरण का सहारा लेना, जैसा कि वह बंगाल में कर रही है, जोखिमों से भरा है. इससे चुनावी फायदा भले हो, लेकिन भारी कीमत भी चुकानी होगी. भाजपा के पास मोदी सरकार के विकास एजेंडे और खासकर गरीबों को शौचालय, पेयजल, आवास, रसोई गैस और सड़कें देने की शक्ल में तुरुप का पत्ता तो है ही.

2019 में मोदी के दोबारा चुने जाने की वजहों में यह भी था और इसकी बदौलत पार्टी आने वाले विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है. दूसरी तरफ, विभाजनकारी नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) पर जोर देने को और कुछ नहीं बल्कि चुनावी हथकंडे के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर जब असम और पश्चिम बंगाल में इसके अमल को लेकर खुद भाजपा ही अस्पष्ट दिखाई दे रही है.

पार्टी को तब भी शर्मसार होना पड़ा जब तमिलनाडु में उसके चुनावी सहयोगी एआइएडीएमके ने चुनाव अभियान के दौरान ही कह दिया कि अगर वह सत्ता में लौटी तो सीएए लागू नहीं करेगी. अगर भाजपा इन राज्यों में चुनाव हार जाती है तो सीसीए की किस्मत पर ताला पड़ जाएगा. सीएसडीएस के दुबे कहते हैं, ‘‘ये नतीजे भारत में अल्पसंख्यक राजनीति की दिशा तय करेंगे. हम इसका इंतजार कर रहे हैं.’’

दूसरा मसला विधानसभा चुनाव जीतने के लिए मोदी पर भाजपा की अतिशय निर्भरता है जो लगातार बढ़ रही है. बेशक महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़णवीस और हरियाणा में एम.एल. खट्टर सहित कई सारे नेताओं को मोदी के बल पर प्रमुख ओहदों पर बैठा दिया गया है. मगर पश्चिम बंगाल में मजबूत स्थानीय नेतृत्व के अभाव का जवाब पार्टी को अपने भीतर झांककर खोजना होगा.

राज्य के प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं, ''मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का ऐलान करने की जरूरत नहीं है. पार्टी किसी चेहरे के बगैर भी मुद्दे उठाकर विमर्श खड़ा कर सकी है.’’ मगर यह कैफियत ममता के इस आरोप का प्रतिकार नहीं करती कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो राज्य पर ‘‘बाहर के लोग हुकूमत’’ करेंगे.

नड्डा के बड़े कामों में ऑपरेशन कमलम को जमीन पर उतारना भी है. यह पांच दक्षिणी राज्यों—आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और पुदुच्चेरी—में जहां उसकी मौजूदगी ज्यादा नहीं है, अपने काडर का निर्माण करने का कार्यक्रम है. ये राज्य मिलकर 102 सांसद लोकसभा में भेजते हैं और यहां से भाजपा के फिलहाल महज चार सांसद हैं. इन राज्यों में जीत से भाजपा के राज्यसभा सांसदों की तादाद बढ़ेगी, जो अभी 95 है (सामान्य बहुमत के लिए 123 चाहिए) और जिसकी वजह से उसे अहम विधेयकों को पारित करवाने के लिए सहयोगी और समानधर्मा पार्टियों की मदद लेनी पड़ती है.

इसलिए तमिलनाडु में वह एआइएडीएमके की पीठ पर सवार है, जहां विधानसभा चुनावों के लिए वह महज 20 सीटों पर राजी हो गई लेकिन 2024 के आम चुनाव में राज्य की 39 लोकसभा सीटों में से ज्यादा से ज्यादा पाने के लिए अपनी सहयोगी पार्टी को राजी और मजबूर करने की कोशिश करेगी.

केरल में भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव महज एक सीट जीती थी, लेकिन अब वह 115 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और महज 25 सीटें उसने अपने सहयोगी दलों के लिए छोड़ी हैं. हिंदुओं को एकजुट करने के अपने अभियान के साथ-साथ वह राज्य के ईसाइयों के अलावा मुसलमानों के कुछ धड़ों को भी रिझा रही है. यहां तक कि अपने नए समर्थकों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने एक संबद्ध संगठन राष्ट्रीय ईसाई मंच बनाया है और मुस्लिम मंच को भी नए सिरे से सजा-संवार रहा है.

भाजपा और उसके घटक दलों ने राज्य के 34,780 में से 30,450 चुनाव बूथों पर समितियां गठित की हैं. संगठन की यह नई साज-सज्जा भविष्य में भाजपा की चुनाव युद्ध मशीन को परवान चढ़ाएगी. पार्टी को उम्मीद है कि इस सबसे वह राज्य की 20 लोकसभा सीटों पर चुनाव लडऩे के लिए ज्यादा ताकत हासिल कर लेगी.

अब जब मोदी ने इंदिरा गांधी सरीखा कद्दावर दर्जा हासिल कर लिया है और पार्टी की तकदीर उनकी वोट जुटाने की क्षमता पर बहुत ज्यादा निर्भर है, सवाल पूछे जा रहे हैं: मोदी के बाद कौन? क्या उनके बगैर भाजपा चुनाव जीत सकती है? अपनी बढ़ती शोहरत और अहमियत के बावजूद शाह भी लोकप्रियता में मोदी के जरा नजदीक नहीं हैं. बंगाल की जीत से शाह की नंबर दो की हैसियत पुख्ता हो जाएगी.

नड्डा कहते हैं, ''इस वक्त मोदी ही पर्याप्त मजबूत हैं. उन्हें पूरा नियंत्रण हासिल है और वे लंबे वक्त तक रहेंगे. हमारे लिए मौका है कि हम इसका बेहतरीन इस्तेमाल करें और उनकी अगुआई में काम करें.’’ तो भी एक जरूरी बात तो है ही. भाजपा को, सुदूर भविष्य में जो अब उतना सुदूर भी नहीं है, केंद्र और राज्यों दोनों में मजबूत दूसरी और तीसरी पांत के नेताओं को विकसित करना होगा.

नेताओं की इस कमी के कारण ही कई मंत्रियों को दो से ज्यादा मंत्रालय संभालने पड़ रहे हैं और उनमें नरेंद्र तोमर तो चार मंत्रालयों के प्रभारी हैं. यह प्रधानमंत्री के विकास एजेंडे में रोड़ा बन जाता है क्योंकि उन्हं् अपने तमाम कार्यक्रमों को जमीन पर उतारने के लिए समर्थ नेता नहीं मिल पाते और कई कार्यक्रमों की देख-रेख खुद प्रधानमंत्री कार्यालय को करनी पड़ती है.

भाजपा का वैचारिक मार्गदर्शक आरएसएस सैद्धांतिक तौर पर कद्दावर नेताओं के विकसित होने के खिलाफ है, लेकिन अभी तक मोदी के दबदबे को विनम्रता से देखता रहा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि मोदी सरकार ने उसके एजेंडे की प्रमुख बातों को लागू किया है, जिनमें कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाना और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शामिल है. इसलिए राजकाज के मुद्दों पर भाजपा और आरएसएस के बीच तालमेल ज्यादा और टकराव कम है.

आरएसएस से जुड़े प्रमुख संगठनों के चिंता जाहिर करने के बावजूद प्रधानमंत्री पीएसयू को निजी हाथों में सौंपने और प्रमुख क्षेत्रों को एफडीआइ के लिए खोलने सहित बड़े आर्थिक सुधारों का रास्ता साफ कर पाए. इस पहल को आत्मनिर्भर भारत अभियान नाम देकर मोदी ने जताया कि यह संघ के एजेंडे के अनुरूप ही है, ताकि वह सुधार प्रक्रिया को पटरी से न उतार दे.

इस बीच, आरएसएस के साथ बेहतर तालमेल कायम करने की गरज से नड्डा आरएसएस के प्रचारकों को पार्टी संगठनों से जोड़ रहे हैं. लिहाजा, भाजपा ने पहली बार तीन प्रचारकों—वी. सतीश, सुदान सिंह और शिव प्रकाश—को महासचिव से पदोन्नत करके उपाध्यक्ष बनाया और उन्हें खास जिम्मेदारियां सौंपीं. मसलन, शिव प्रकाश को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अलावा पश्चिम बंगाल सरीखे अहम राज्य का प्रभारी बनाया गया.

फिलहाल कई फायदे भाजपा के हक में काम कर रहे हैं जिनकी बदौलत वह लंबे वक्त तक सत्ता कायम रख सकती है. एक नेता के शब्दों में उसकी ताकत यह है, ‘‘हमारे पास कार्यकर्ता, नेता और परिवार है.’’ उसके पास पैसे की ताकत भी है. पार्टी की खुशकिस्मती से विपक्ष भी बेतरतीब है और प्रमुख मुद्दों पर भाजपा को असरदार चुनौती देने में नाकाम रहा है. अगर भाजपा बंगाल में नहीं जीतती और असम में हार जाती है, तो स्थिति बदल सकती है.

इस बीच, मोदी-शाह-नड्डा की तिकड़ी की अगुआई में भाजपा लगातार बढ़ रही है. शाह कट्टर हिंदुत्व के समर्थक हैं तो मोदी ज्यादा बारीक बातों पर ध्यान देने का तरीका अपनाते हैं. मगर दोनों अव्वल दर्जे के रणनीतिकार हैं. वहीं नड्डा का काम रणनीतियों और योजनाओं को असरदार तरीके से जमीन पर उतारना और पार्टी के कामकाज की देख-रेख करना है. सख्त अनुशासन प्रिय और आक्रामक ढंग से काम करवाने वाले शाह के मुकाबले नड्डा ज्यादा मिलनसार हैं और टकराव में कम यकीन करते हैं.

भाजपा अध्यक्ष पार्टी को और राजकाज के मुद्दों पर ‘‘निरंतरता, नाप-जोख और संदर्भ’’ (एक अंदरूनी जानकार के शब्दों में) प्रदान करते हैं. खुद नड्डा कहते हैं, ‘‘साफ-साफ कहूं तो मैंने इस काम में कभी अकेला महसूस नहीं किया.’’ 15 करोड़ समर्थकों के साथ वे अकेला महसूस भला कर भी कैसे सकते हैं.

 

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