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आवरण कथाः लंबा खंचा संकट

पिछले वर्ष लॉकडाउन के बाद बड़े पैमाने पर उनके पलायन ने आम तौर पर अदृश्य रहने वाले कार्यबल के संकटों के बारे में हमारी आंखें खोली थीं. क्या उनकी दुर्दशापूर्ण स्थिति में कोई सुधार हुआ है?

थककर चूर महाराष्ट्र से लौटे प्रवासी कामगार 10 अप्रैल 2021 को पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन के बाहर आराम करते हुए थककर चूर महाराष्ट्र से लौटे प्रवासी कामगार 10 अप्रैल 2021 को पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन के बाहर आराम करते हुए

दिल्ली के छतरपुर इलाके में एक कमरे की झुग्गी में रह रहे बिहार के बहादुरपुर गांव के 24-वर्षीय चंदर कुमार को एक सप्ताह से अधिक समय से लग रहा है कि वह अतीत को दोहराकर जी रहा है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के एक घर में घरेलू कामगार के रूप में काम करने वाले कुमार का स्मार्ट फोन उसे दिल्ली में कोविड-19 मामलों की लगातार बदलती स्थिति की जानकारी देता रहता है.

वह भ्रमित है और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की दिल्ली नहीं छोडऩे की अपील के बावजूद वह और उसके दोस्त राष्ट्रीय राजधानी में 20 अप्रैल को घोषित सप्ताह भर के बंद के बारे में चिंतित हैं.

सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, सभी भारतीय शहरों में प्रवासी कामगार कोविड मामलों की ऊंची होती लहर और आंशिक लॉकडाउन तथा रात के कर्फ्यू जैसे प्रतिबंधों का बढऩा देख कर आशंकित हैं. वायरस के डर से अधिक उन्हें आर्थिक अनिश्चितता का भय सता रहा है. पिछले मार्च की यादें अभी भी उनके दिमाग में ताजा हैं जब अचानक तालाबंदी ने उन्हें रोजगारहीन, भोजनहीन और घर वापसी के लिए साधनहीन बना दिया था.

हताश होकर उनमें से अनेक लोग अपनी छोटी सी गृहस्थी और परिवार को साथ लेकर पैदल ही चल पड़े थे. इस बार वे कोई चूक नहीं करना चाहते. महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, तमिलनाडु और कर्नाटक में वे पहले से ही ट्रेन आरक्षण काउंटर पर कतार में लगे हैं. कुमार बताते हैं, ‘‘मैंने अगले हफ्ते का टिकट भी खरीद लिया है. उम्मीद करता हूं कि ट्रेनें रद्द नहीं होंगी.’’

दिल्ली में लॉकडाउन के दौरान भी अंतरराज्यीय ट्रेनें और बसें चलती रहेंगी, जिससे राहत मिलेगी. उधर बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले ही बिहारी प्रवासियों से कोविड की उग्र होती दूसरी लहर के मद्देनजर जल्द लौटने का अनुरोध करते हुए कहा है कि सरकार वापसी करने वालों के लिए काम की व्यवस्था करेगी.

यहां तक कि आधिकारिक सूत्र भी स्वीकार करते हैं कि पिछले साल लॉकडाउन ने प्रवासियों की घर वापसी का ऐसा सिलसिला शुरू किया था जिसके परिणामस्वरूप विभाजन के बाद दूसरा सबसे बड़ा सामूहिक स्थान परिवर्तन हुआ.

विभाजन के बाद 1.4 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे जबकि कौशल विकास मंत्रालय के डेटाबेस के अनुसार, पिछले साल के लॉकडाउन में छह राज्यों के 116 जिलों में 67 लाख प्रवासियों ने घर वापसी की थी. स्वतंत्र अनुमानों के अनुसार यह संख्या इससे बहुत ज्यादा, लगभग छह करोड़ या आधिकारिक गणना से नौ गुना अधिक थी.

आइसीआरआइईआर (इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस) और आइएसएसआरएफ (इनफरेंशियल सर्वे स्टैटिस्टिक्स एंड रिसर्च फाउंडेशन) के एक हालिया अध्ययन में, छह राज्यों—उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जहां कुल कामगारों के दो तिहाई ने वापसी की थी- के 2,917 प्रवासियों का सर्वेक्षण कर लॉकडाउन के दौरान, उससे पहले और उसके बाद उनकी स्थिति का आकलन करने का प्रयास किया.

अध्ययन में पाया गया कि 38.6 प्रतिशत लोगों को घर लौटने के बाद कोई काम नहीं मिला और घरेलू आय में लॉकडाउन के तत्काल बाद 85 प्रतिशत की गिरावट आई.

उत्तर प्रदेश के 32 साल के निर्माण मजदूर मनोज कुमार का ही मामला लीजिए जिन्हें लॉकडाउन में दिल्ली में नौकरी खोनी पड़ी थी. एक महीने तक घर लौटने के लिए संघर्ष करने के बाद जब आखिरकार मई के अंत में वे संत रविदास नगर जिले में अपने गांव कसिदहा पहुंचे तो उन्हें पता चला कि वहां उनके लिए कोई काम नहीं था.

जुलाई तक वे दिल्ली वापस आ गए थे. अंबेडकर नगर जिले के अन्नूपुर गांव के उनके मित्र चमन कुछ अधिक भाग्यशाली थे. घर पहुंचने के दो हफ्तों के भीतर चमन को राज्य के अधिकारियों ने मनरेगा (महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम 2005) के तहत काम का प्रस्ताव किया था.

प्रवासियों की दुर्दशा को देखते हुए नीतिगत हस्तक्षेप और उनकी जीवन-दशाओं में सुधार के लिए दीर्घकालिक उपायों के लिए पिछले दिनों काफी शोरगुल हुआ था. भारत में इस बेआवाज जनसांख्यिकीय वर्ग के हितों की रक्षा के लिए कभी कोई व्यापक कानून ही नहीं था; अंतर-राज्य प्रवासी कामगार (सेवा का विनियमन और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1979 के प्रावधान केवल किसी ठेकेदार के माध्यम से भर्ती किए गए लोगों पर लागू होते हैं.

गत 29 सितंबर को इस अधिनियम को एक अधिसूचना के माध्यम से व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्तें (ओएसएच) संहिता, 2020 के अधीन लाया गया था. संहिता में अच्छी कार्यदशाओं, न्यूनतम मजदूरी, शिकायत निवारण तंत्र, दुर्व्यवहार और शोषण से सुरक्षा तथा प्रवासी श्रमिकों सहित संगठित और असंगठित सभी श्रेणियों के श्रमिकों के कौशल तथा सामाजिक सुरक्षा के संवर्धन की व्यवस्था की गई है. यह संहिता हर उस प्रतिष्ठान पर लागू होती है जिसमें पिछले साल में एक भी दिन 10 या उससे अधिक अंतर-राज्य प्रवासियों की नियुक्ति रही हो. 

इसके अलावा, केंद्रीय श्रम और रोजगार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष कुमार गंगवार ने 22 मार्च को लोकसभा में जो कहा उसके अनुसार, ''प्रवास संबंधी समस्याओं के निदान के लिए बहुमुखी कार्रवाई की जानी है जिसमें ग्रामीण विकास, बेहतर बुनियादी सुविधाएं, क्षेत्रीय विषमताएं दूर करने के लिए संसाधनों का न्यायसंगत बंटवारा, रोजगार सृजन, भूमि सुधार, साक्षरता उन्नयन, वित्तीय सहायता और विभिन्न सरकारी कल्याण व सामाजिक सुरक्षा योजनाएं शामिल हैं.’’

गंगवार के मंत्रालय के अनुरोध पर नीति आयोग ने ‘प्रवासी श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना’ नामक छत्र नीति का ढांचा तैयार किया है. इसमें सामाजिक संरक्षण की स्थान-परिवर्तनीयता, मताधिकार, नगरीय अधिकार तथा स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास सुविधाओं को उनकी जीवन दशाओं में सुधार के मुख्य बिंदुओं के रूप में पहचाना गया है.

नीति आयोग का मसौदा इसके समन्वित कार्यान्वयन के लिए एक शासनिक ढांचे की भी संस्तुति करता है जिसमें श्रम मंत्रालय को नोडल बिंदु बना कर उसके अधीन एक समर्पित इकाई की स्थापना की जाएगी जो अंतर-मंत्रालय तथा केंद्र-राज्य समन्वय पर ध्यान केंद्रित करेगी. इसमें विशेष रूप से प्रमुख प्रवास गलियारों पर अंतर-राज्य प्रवास के संबंध में होने वाले प्रयासों को समन्वित करने के तंत्र का भी प्रस्ताव किया गया है.

आलोचकों का कहना है कि नीति आयोग का मसौदा प्रवासियों की क्षमताओं के दोहन के लिए उन्हें सुविधाएं देने या नगदी हस्तांतरण जैसे उपायों के बजाए अधिकार-आधारित दृष्टिकोण की वकालत तो करता है, लेकिन उनका संकट कम करने के लिए संरक्षित मजदूरी तक पहुंच के सवाल को संबोधित नहीं करता. यह एक हद तक प्रवास रोकने के लिए स्रोत राज्यों को न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के लिए कहता है लेकिन सामाजिक सुरक्षा कवर के रूप में किसी तरह की न्यूनतम वेतन गारंटी की बात नहीं करता.

यह चुप्पी महत्वपूर्ण है, विशेषकर लॉकडाउन के बाद की अवधि में जब कई राज्यों ने आर्थिक पुनरुत्थान को आसान बनाने के लिए श्रम सुरक्षा ढांचे को कमजोर कर दिया. अक्सर तर्क दिया जाता है कि गारंटीशुदा मजदूरी के कारण व्यवसाय बंद हो जाएंगे और रोजगार का नुक्सान होगा जबकि पर्याप्त रूप से इसके विपरीत साक्ष्य मौजूद हैं.

आर्थिक सर्वेक्षण (2019) सहित सरकार की रिपोर्टें इस तथ्य को उजागर करती हैं कि वास्तविक मजदूरी में ठहराव से गरीबों की खपत क्षमता घटी है, जिससे अर्थव्यवस्था में मंदी आई है. रिसर्च ऐंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (आरआईएस) के विशिष्ट फेलो प्रो. अमिताभ कुंडू कहते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने श्रम कानूनों को सीमित कर दिया है. कठिनाई से मिले श्रमिक अधिकारों को कमजोर कर दिया गया है. राज्यों को औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए श्रम कानूनों में दी गई छूटों पर पुनर्विचार करना चाहिए.’’

प्रवासियों की गणना
भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 10 प्रतिशत का योगदान देने के बावजूद प्रवासियों के काम और रहने तथा उनकी भर्ती प्रक्रिया के बारे में कहीं कोई दस्तावेज नहीं है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले साल 20 मई को यह बात स्वीकार की थी, जब उन्होंने कहा था कि सरकार के पास प्रवासियों का कोई आंकड़ा नहीं है.

इसी वजह से नीति आयोग के मसौदे में जिन बातों की सबसे पहले संस्तुति की गई है उनमें प्रवासियों पर एक केंद्रीय डेटाबेस बनाना शामिल है. गंगवार का कहना है कि सरकार लगभग 704 करोड़ रुपए की लागत से असंगठित कामगारों का एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस (एनडीयूडब्ल्यू) विकसित कर रही है जिसमें प्रवासी श्रमिक शामिल होंगे.

31 मार्च को केंद्र सरकार ने प्रवासी कामगारों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों और काम के मामले में उनकी बदलती प्राथमिकताओं को समझने के लिए एक सर्वेक्षण शुरू किया है. सर्वेक्षण के सह-अध्यक्ष प्रो. कुंडू कहते हैं, ‘‘हमारा सर्वेक्षण तीन चित्र देगा. पहला, पिछले साल फरवरी-मार्च में कोविड फैलने के पहले की स्थिति.

दूसरा, सितंबर-अक्तूबर 2020 में जब कोविड का प्रभाव चरम पर था और तीसरा, मौजूदा स्थिति. हम यह भी देखने में सक्षम होंगे कि इस तरह की स्वास्थ्य आपदाएं अनौपचारिक श्रमिकों को कैसे प्रभावित करती हैं.’’ असंगठित श्रमिकों पर आंकड़े एकत्र करने और उनके स्वास्थ्य, आवास, कौशल, बीमा, वित्तीयन और भोजन पर नीतियां बनाने के लिए सूचना पोर्टल स्थापित करने की दिशा में यह पहला कदम हो सकता है.

पैसे कहां हैं?

वित्तमंत्री सीतारमण ने इस वर्ष के बजट में प्रवासियों का संकट कम करने के लिए उपायों की घोषणा की थी. इनमें ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ प्रस्ताव था जो एक स्थान-परिवर्तन योजना है जिसके माध्यम से गरीब प्रवासी देश में कहीं भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से सब्सिडी वाले खाद्यान्न ले सकते हैं. हालांकि, यह योजना अब तक सभी राज्यों ने लागू नहीं की है.

लेकिन फिर, एक कदम पीछे जाते हुए नीति आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी 75 से घटाकर 60 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 50 से कम कर 40 प्रतिशत तक करने का प्रस्ताव रखा है. नवंबर 2020 में, केंद्र ने पीडीएस के माध्यम से अतिरिक्त खाद्यान्न की आपूर्ति भी बंद कर दी. सेंटर फॉर वूमेंस डेवलपमेंट स्टडीज की पूर्व निदेशक, इंदु अग्निहोत्री कहती हैं, ‘‘पीडीएस के माध्यम से मिलने वाले खाद्यान्नों के पैमाने और आपूर्ति में कमी बहुत चौंकाने वाली है.’’

आइसीआरआइईआर-आइएसएसआरएफ के अध्ययन में यह भी कहा गया है कि सर्वेक्षण में शामिल 74 फीसदी प्रवासियों को ही सब्सिडी वाले खाद्यान्न मिला जबकि केवल 12 फीसदी को सब्सिडी वाली दाल मिली थी. पिछले साल लॉकडाउन के दौरान जब केंद्र ने कोविड राहत पैकेज में 80 करोड़ प्रवासी श्रमिकों को प्रति माह बिना राशन कार्ड के पांच किलो गेहूं और एक किलो दाल बांटी थी, तब भी बहुत से लोग इससे वंचित रह गए थे.

उदाहरण के लिए ओडिशा के केंद्रपाड़ा के प्लंबर अजय (38) लॉकडाउन के दौरान दो महीने तक दिल्ली में बेरोजगार रहे, लेकिन दो बार फॉर्म भरने के बावजूद उन्हें और उनके भाई प्रमोद को राशन नहीं मिला. लेकिन दिल्ली के लालबाग में रहने वाले 33 वर्षीय निर्माण श्रमिक सूर्य नाथ भाग्यशाली रहे क्योंकि उन्हें दो महीने तक खाद्यान्न मिला. उन्हें रात में 2 बजे से लाइन में खड़े होना पड़ता था, लेकिन पत्नी, नौ साल की बेटी और तीन साल के बेटे समेत चार लोगों के उनके परिवार के लिए यह जीवनदायी रहा.

इस साल, अब तक, केंद्र ने प्रवासियों के लिए किसी पैकेज की घोषणा नहीं की है. महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने राज्य में 15 दिन का कर्फ्यू लगाने से एक दिन पहले 14 अप्रैल को 5,476 करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की. इसमें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत पंजीकृत सात करोड़ लाभार्थियों को मुफ्त 3 किलो गेहूं और 2 किलो चावल, प्रति दिन 200,000 मुफ्त लंच पैकेट और पंजीकृत निर्माण श्रमिकों, हॉकरों और ऑटोरिक्शा चालकों को एकमुश्त भुगतान के रूप में 1,500 रुपए दिए जाने हैं.

दिल्ली सरकार ने भी पंजीकृत निर्माण श्रमिकों को 5,000 रुपए की वित्तीय सहायता की घोषणा की है. इस तरह के उपायों का स्वागत है, लेकिन इनका लक्ष्य लाभार्थियों तक पहुंचना चुनौती बना हुआ है. महाराष्ट्र में, 2016 में लगभग 560,000 पंजीकृत निर्माण श्रमिक थे, लेकिन उनमें से 50 प्रतिशत पिछले साल अमान्य पाए गए थे. वास्तव में, भारत भर में अधिकांश निर्माण श्रमिक अपंजीकृत हैं. यही कारण है कि दिल्ली सरकार ने निर्माण श्रमिकों का पंजीकरण शुरू किया है, जिससे नए पंजीकृत लोग भी लाभान्वित हो सकते हैं.

केंद्र का मानना है कि आत्मनिर्भर भारत और सेक्टर-विशेष पर जोर देने का प्रवासियों को सीधा लाभ मिल सकता है. गंगवार कहते हैं, ‘‘आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत रु. 27 लाख करोड़ का वित्तीय पैकेज दिया गया है जिससे अन्य चीजों के अलावा प्रवासी तथा असंगठित क्षेत्र के कामगारों को रोजगार देने, एमएसएमई को मजबूत करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का काम होगा.’’

बजट में अन्य योजनाएं भी थीं. कृषि, विनिर्माण, सार्वजनिक सेवाएं और निर्माण जैसे प्रवासी श्रमिकों को बड़ी संख्या में सेवायोजित करने वाले 13 क्षेत्रों समेत उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं के लिए पांच वर्षों में 1.97 लाख करोड़ रुपए का परिव्यय निर्धारित है. निर्माण उद्योग में लगभग 5.1 करोड़ कामगार हैं, जिनमें से लगभग आधे के मौसमी प्रवासी होने का अनुमान है.

फिर कपड़ा क्षेत्र है जो भारत में रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है जिसके दिल्ली, तिरुपुर तथा बेंगलूरू जैसे बड़े परिधान केंद्रों में 70 प्रतिशत कर्मचारी चक्रीय या अस्थायी प्रवासी हैं (2017 आइएलओ रिपोर्ट). आगामी तीन वर्षों में सात मेगा टेक्सटाइल पार्कों की स्थापना के साथ इस क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलेगा. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने 700 परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिनमें प्रवासी मजदूरों को काम मिल सकता है. परंतु, पर्यटन और आतिथ्य जैसे महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों को कोई सीधी मदद नहीं मिली.

बजट में सबसे बड़ी निराशा प्रवासी संकट के उपरिकेंद्र रहे शहरी क्षेत्रों के लिए बहुत कम वित्त पोषण की रही है. श्रम और रोजगार मंत्रालय के तहत श्रम, रोजगार और कौशल विकास पर खर्च में लगभग 10 प्रतिशत वृद्धि हुई है, लेकिन कुल रु. 54,581 करोड़ रुपए के बजट परिव्यय के साथ शहरी विकास को कुल बजट का मात्र 1.5 प्रतिशत मिला है.

वास्तव में, शहरी स्थानीय निकायों का कुल परिव्यय पिछले साल के रु. 25,098 करोड़ की तुलना में वर्तमान में रु. 22,114 करोड़ ही रह गया है. आवासन क्षेत्र को देखें तो जून 2020 में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने प्रधानमंत्री आवास योजना की उप-योजना के रूप में सस्ते किराये वाले आवासीय संकुलों की योजना की घोषणा की थी. योजना का लक्ष्य 300,000 लाभार्थी थे. योजना में मार्च 2022 तक कर अवकाश दिया गया है, लेकिन महामारी में यह अब केवल कागज पर है. 
 
बचाव के लिए मनरेगा
देश के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा एक सुरक्षा जाल के रूप में उभरा है. 2020-2021 में 1 अप्रैल 2021 तक 11.17 करोड़ लोगों ने इसका लाभ उठाया जबकि 2019-20 में लाभार्थियों की संख्या 7.88 करोड़ थी. फिर भी, पिछले साल अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के एक अध्ययन से पता चला है कि लॉकडाउन के दौरान जब भारत के 95 प्रतिशत आंतरिक प्रवासियों की नौकरी चली गई थी, तब मनरेगा के माध्यम से उन्हें काम देने के प्रयासों से केवल 7 प्रतिशत लाभान्वित हुए.

यह निष्कर्ष आइसीआरआइईआर-आइएसएसआरएफ के अध्ययन से भी निकला था. हालांकि मनरेगा के तहत मजदूरी 182 रुपए से बढ़ाकर 202 रुपए प्रति दिन कर दी गई थी, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि शहरी श्रमिकों के लिए यह अपर्याप्त है. शायद यह भी एक कारण है कि ओडिशा के नाथ और उनके भाइयों ने घर वापस जाने का फैसला करने के पहले इंतजार करने का फैसला किया है.

अजय और प्रमोद कहते हैं, ‘‘वापस जाना कोई समाधान नहीं है क्योंकि हम अपने गांव में पर्याप्त कमाई नहीं कर सकते.’’ यहां तक कि उत्तर प्रदेश के दो निर्माण मजदूरों- मनोज और चमन-ने भी कम से कम एक सप्ताह के लिए कार्यस्थल पर ही रहने का फैसला किया है.

सेंटर फॉर माइग्रेशन ऐंड इनक्लूसिव डेवलपमेंट के सह-संस्थापक और कार्यकारी निदेशक बेनॉय पीटर कहते हैं, ''अगर किसी श्रमिक को अपने घर के पास मजदूरी के रूप में औसतन करीब 10,000 रुपए महीने मिलें, तो उनमें से ज्यादातर शहर नहीं जाएंगे जहां उनके साथ दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा व्यवहार होता है.

लेकिन भारत के गांवों में 10,000 रुपए मिलना भी अभी दूर का सपना है. प्रवासन घटाने के लिए मनरेगा के तहत काम कोई हल नहीं है क्योंकि उसमें बहुत कम मजदूरी, भ्रष्टाचार, संवितरण की धीमी प्रक्रिया और ग्रामीण परिवारों का सीमित वित्तीय समावेशन है.’’

महामारी के कारण कामगारों की घर वापसी सरकार के लिए ग्रामीण बुनियादी ढांचे के निर्माण, आजीविका के अवसरों का सृजन और ग्रामीण शासन में सुधार लाने के साथ ही बेहतर कृषि नीति लाने का एक अवसर थी. प्रो. अग्निहोत्री कहते हैं, ‘‘हमें यह पूछने की जरूरत है कि क्या इस मूलभूत समस्या के समाधान के लिए कोई उपाय किए गए.’’

गरीब कल्याण रोजगार अभियान ऐसा ही एक उपाय था. जून, 2020 में शुरू किए गए इस अभियान का उद्देश्य टिकाऊ ग्रामीण बुनियादी ढांचे और गावों में इंटरनेट जैसी आधुनिक सुविधाओं का निर्माण करना था. इसमें ग्रामीण प्रवासी श्रमिकों को घर के करीब रोजगार पाने की संभावना बढ़ाने के लिए उनका कौशल मानचित्रण भी किया जाता है.

50,000 करोड़ रुपए के आवंटन के साथ, यह योजना छह राज्यों में 116 जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करने और बुनियादी ढांचा बनाने के 25 लक्ष्य-संचालित कार्यों के कार्यान्वयन पर केंद्रित है. गंगवार का दावा है कि इस अभियान से अब तक 50.8 करोड़ मानव-दिवसों के रोजगार का सृजन हुआ है. मनरेगा के तहत कार्यदिवसों की संख्या को दोगुना करके 200 प्रति वर्ष प्रति परिवार करने की भी मांग होती रही है.

फिर भी, इन रोजगार योजनाओं से बहुतों को लाभ हुआ नहीं लगता क्योंकि ये या तो प्रवासियों तक पहुंचने में विफल रही हैं, या फिर जैसा कि आइएलओ अध्ययन कहता है, घर वापसी करने वाले प्रवासी मनरेगा के काम नहीं करना चाहते. 

सीमित विकल्पों के कारण बहुत से लोग प्रवासियों के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रावधान के रूप में शहरी रोजगार गारंटी योजना की वकालत करते हैं. वास्तव में, अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों में सामाजिक सुरक्षा सार्वभौमिक मानवीय अधिकार है और भारत इसका हस्ताक्षरी है. 2004 में स्थापित असंगठित क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यम आयोग (एनसीईयूएस) ने 2006 में साबित किया था कि न्यूनतम स्तर पर सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना आर्थिक रूप से संभव है.आयोग ने सार्वभौमिक पंजीकरण प्रणाली और स्मार्ट सामाजिक सुरक्षा कार्डों की भी संस्तुति की, लेकिन उन्हें अभी तक लागू नहीं किया गया है.

परंतु इस क्षेत्र के हितधारकों को जल्द ही बदलाव की उम्मीद है. पीटर कहते हैं कि ''हालांकि ऐसा बहुत ज्यादा नहीं हुआ है, फिर भी भारत ने प्रवासियों के काम और जीवन को बेहतर बनाने के लिए इस संकट का लाभ उठाया है.

ये कदम देरी से उठाए गए हैं, परंतु सरकार ने उनकी परेशानियां कम करने के लिए कई उपाय किए हैं. मेरे हिसाब से यह अच्छी शुरुआत है.’’ बहरहाल, चुनौती इस गति को बनाए रखने की है, विशेष रूप से तब जबकि एक और गंभीर कोविड लहर आर्थिक स्थितियों में सुधार को धक्का पहुंचा सकती है. 


प्रवासी मजदूरों के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना में न्यूनतम वेतन गारंटी पर चुप्पी खतरनाक है, वह भी ऐसे समय में जब राज्य श्रम कानून शिथिल कर रहे हैं

देश में 95%  प्रवासियों ने लॉकडाउन में रोजगार गंवाया और उबारने के प्रयासों में केवल 7% को ही मनरेगा का लाभ मिला

केस स्टडी
मनोज कुमार 32 वर्ष 
और चमन 18 वर्ष

पेशा: निर्माण श्रमिक
रोजगार का शहर: दिल्ली
मूल राज्य: उत्तर प्रदेश
2020 के लॉकडाउन में हुई मुश्किल : दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में एक साथ रहने वाले ये दोनों श्रमिक दो महीने तक बिना नौकरी के दिल्ली में फंसे रहे. बाद में दोनों ट्रेन से उत्तर प्रदेश चले गए, लेकिन दो महीने के भीतर ही मनोज दिल्ली लौट आया, क्योंकि उसे अपने गांव में उसे कोई काम नहीं मिला. चमन ने मनरेगा के तहत काम किया और फिर नवंबर में दिल्ली लौट आया. इस साल घर जाने का उनका कोई इरादा नहीं है.
सरकारी सहायता: दोनों को अनाज की कोई सहायता नहीं मिली.

केस स्टडी
अजय 38 वर्ष 
पेशा: प्लंबर
रोजगार का शहर: दिल्ली
मूल राज्य: ओडिशा

2020 के लॉकडाउन में हुई मुश्किल: वह अपने भाई के साथ दिल्ली के मसूदपुर में रहता है. लॉकडाउन के दौरान वे तीन महीने तक बेरोजगार रहे. उसका भाई घर चला गया, लेकिन गांव में उसे कोई काम नहीं मिला. अक्तूबर में वह दिल्ली लौट आया. इस साल, वे इंतजार करेंगे और देखेंगे कि क्या होता है.
सरकारी सहायता: कोई सहायता नहीं मिली.

केस स्टडी
सूर्यनाथ 33 वर्ष 
पेशा: निर्माण श्रमिक
रोजगार का शहर: शहर-दिल्ली
मूल राज्य: ओडिशा

2020 के लॉकडाउन में हुई मुश्किल: वे अपनी पत्नी, नौ साल की बेटी और तीन साल के बेटे के साथ दिल्ली के लालबाग इलाके में रहते हैं. लॉकडाउन के दौरान तीन महीने तक बेरोजगार रहे और 25,000 रुपए उधार लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. हालांकि वे पिछले जून में बिहार में अपने गांव गए थे, लेकिन एक महीने के भीतर ही वे लौट आए, क्योंकि मनरेगा से कमाए पैसे उनके परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं थे.
सरकारी सहायता: सरकार की तरफ से दो महीने का अनाज-गेहूं और दाल-मिला.
 

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