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विपक्षः पराजय की परतों में ही छिपे हैं सबक

किसी भी विपक्षी दल के पास भाजपा की संगठनात्मक शक्ति और उसके नैरेटिव को मात देने का माद्दा नहीं है. 2024 के आम चुनाव से पहले इस बिखरे शिराजे को समेटना आसान न होगा.

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खेला गठजोड़ःउत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के साथ ममता बनर्जी खेला गठजोड़ःउत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के साथ ममता बनर्जी

विधानसभा चुनाव 2022 । विपक्ष

समाजवादी पार्टी 2012 में उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटों में 227 जीतकर और 29 फीसद वोट हासिल कर सत्ता में पहुंच गई थी. दशक भर बाद पार्टी की वोट हिस्सेदारी बढ़कर 32 फीसद तक पहुंच गई मगर वह सीटें सिर्फ 111 ही पा सकी. नतीजा, वह भाजपा को कोई खास चुनौती दे पाने में नाकाम रही, जो राज्य में पिछले चार चुनावों—2014 तथा 2019 के लोकसभा और 2017 तथा 2022 के विधानसभा चुनावों—में 40 फीसद वोट हिस्सेदारी कायम रखने में कामयाब हुई है.

देश में 80 लोकसभा सीटों वाले एवं राजनैतिक रूप से सबसे अहम राज्य में भगवा पार्टी का पूरी तरह दबदबा इस बात का संकेत है कि विपक्षी पार्टियों के सामने कितनी बड़ी चुनौती है. सत्तारूढ़ भाजपा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में सरकार बनाने जा रही है. इससे यह साबित हो रहा है कि कोविड महामारी के प्रतिकूल आर्थिक असर से उपजे असंतोष के बावजूद विपक्षी पार्टियां भाजपा की संगठनात्मक शक्ति और नए-नए नैरेटिव गढ़ने की उसकी काबिलियत की तोड़ निकाल पाने में नाकाम हो गईं.

विपक्ष की उम्मीद की इकलौती रोशनी पंजाब में आम आदमी पार्टी (आप) की भारी जीत है, जहां उसे 117 सदस्यीय विधानसभा में से 92 सीटें मिल गईं. लिहाजा, आप एक से ज्यादा राज्यों में सत्ता में इकलौती गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस पार्टी हो गई है. ये अटकलें भी शुरू हो गई हैं कि क्या अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली पार्टी 2024 में विपक्षी गठजोड़ का नेतृत्व कर सकती है. इस धारणा के पैरोकारों का दावा है कि पंजाब की जीत दिल्ली से बाहर केजरीवाल की स्वीकार्यता को साबित करती है.

विपक्षः पराजय की परतों में ही छिपे हैं सबक
विपक्षः पराजय की परतों में ही छिपे हैं सबक

हालांकि आप के विपक्षी एकता की धुरी बनने की राह में कई अड़चनें हैं, क्योंकि किसी तरह के गैर-भाजपा गठजोड़ के ढांचे और नेतृत्व पर अभी कोई रजामंदी नहीं है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव तक इसके कई दावेदार हो सकते हैं. विपक्ष में इकलौती राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस अपनी मुख्य भूमिका छोड़ने को तैयार नहीं दिखती. देश की सबसे पुरानी पार्टी की कार्यकारिणी (सीडब्ल्यूसी) के एक सदस्य कहते हैं, ''कांग्रेस की अखिल भारतीय मौजूदगी के मद्देनजर कांग्रेस के बिना कोई विपक्ष हो ही नहीं सकता.’’

बंगाल में 2021 में तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद ऐसा ही नैरेटिव उभरा था. ममता बनर्जी को ऐसी नेता के तौर पर पेश किया गया था, जो 2024 में विपक्षी एकता की धुरी बन सकती हैं. उन्होंने केजरीवाल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे समेत कई विपक्षी नेताओं से मुलाकात की.

राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पैठ बनाने के लिए उनकी पार्टी ने गोवा के चुनावों में आक्रामक अभियान चलाया मगर हाथ कुछ नहीं आया. हालांकि पंजाब में आप की कामयाबी बंगाल में मुख्यालय वाली पार्टी को शायद अपने मॉडल का दूसरे राज्यों में प्रयोग करने और आखिरकार आप को उसी के खेल में पटखनी देने की मिसाल पेश करे. तृणमूल के एक सांसद कहते हैं, ''आप को पंजाब जीतने में दस साल लगे. हमने तो विस्तार अभी 2021 में ही शुरू किया है. देखते हैं, आने वाले वर्षों में क्या होता है.’’

आप के खिलाफ यह बात भी जा सकती है कि दिल्ली और पंजाब को मिलाकर सिर्फ 20 लोकसभा सीटें बनती हैं, जबकि बंगाल से 42 सांसद हैं और कांग्रेस शासित दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ से 37 सांसद संसद के निचले सदन में पहुंचते हैं. इसके अलावा आप की विधानसभा चुनावों में कामयाबी संसदीय चुनावों में नतीजा नहीं दिखा पाई है.

दिल्ली में दो लोकसभा चुनावों में वह एक भी सीट नहीं जीत पाई और पंजाब में 2017 के विधानसभा चुनावों में 22 सीटें जीतने के बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में महज एक सीट ही जीत पाई, जबकि 2014 में वहां से उसके चार सांसद थे. दिल्ली से भाजपा के सांसद मनोज तिवारी कहते हैं, ''इससे जाहिर होता है कि केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर नहीं देखे जाते.’’

विपक्षः पराजय की परतों में ही छिपे हैं सबक
विपक्षः पराजय की परतों में ही छिपे हैं सबक

आप की असली परीक्षा अब इसी साल आखिर में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों में होगी, जहां वह भाजपा-कांग्रेस के बीच दोतरफा लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने की उम्मीद कर रही है. भाजपा यहां तकरीबन दो दशक से विधानसभा या लोकसभा एक भी चुनाव नहीं हारी है. हालांकि कांग्रेस ने 2017 में कड़ा मुकाबला किया और विधानसभा में 16 अतिरिक्त सीटें हासिल कर लीं लेकिन भाजपा 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में सभी 26 संसदीय सीटें जीत गई. नाम न छापने की शर्त पर गुजरात भाजपा के एक नेता कहते हैं, ''आप के आने से गैर-भाजपा वोट बंटेंगे और हमें फायदा होगा.’’

गुजरात के अलावा दस दूसरे राज्यों—हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड और मिजोरम में भी 2024 के लोकसभा चुनावों के पहले विधानसभा चुनाव होंगे. इन सबको मिलाकर 146 लोकसभा सीटें बनती हैं, जिसमें भाजपा के पास फिलहाल 121 हैं और इन सभी राज्यों में भाजपा को चुनौती देने वाली इकलौती कांग्रेस है.

गुजरात, हिमाचल, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में कुल 95 संसदीय सीटों पर कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला है. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस 2018 से सत्ता में है. उसने 2018 में मध्य प्रदेश का विधानसभा चुनाव भी मामूली अंतर से जीता था. फिर भी वह 2019 में सिर्फ तीन ही सांसद इन राज्यों से भेज पाई थी.

देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए यह उसके वजूद को चुनौती की तरह है क्योंकि वह उन राज्यों में भी संसदीय चुनावों में भाजपा का विकल्प नहीं बन पाई, जहां वह सीधी टक्कर में है. राज्यों के चुनावों में भी उसकी जीत विरले ही हो रही है. कांग्रेस अब देश भर की कुल 3,933 विधानसभा सीटों में सिर्फ 692 यानी 17 फीसद पर ही काबिज है. इसलिए आश्चर्य नहीं कि उसके नेताओं, खासकर दिग्गजों में नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट है.

हालांकि सोनिया गांधी पार्टी की अध्यक्ष हैं मगर राहुल गांधी ही असली मुखिया बने हुए हैं. राहुल और उनकी बहन प्रियंका गांधी ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ नवजोत सिंह सिद्धू का पक्ष लिया और कैप्टन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को मजबूर किया गया. इस बार पंजाब और प्रियंका के प्रभार वाले उत्तर प्रदेश में पार्टी के सफाए से राहुल विरोधी धड़े को शायद शह मिलेगी. उनके आलोचक उन्हें उत्तराखंड में हार के लिए भी जिम्मेदार मानते हैं, जहां कई राजनैतिक पंडितों ने कांग्रेस की भाजपा पर जीत की उम्मीद की थी.

कांग्रेस के एक लोकसभा सदस्य के मुताबिक, सितंबर में पार्टी अध्यक्ष पद पर राहुल की वापसी शायद आसान नहीं होगी. वे कहते हैं, ''गांधी ब्रांड अब अपनी चमक खो चुका है. उत्तराखंड और पंजाब में राहुल और उनके करीबियों की दिलचस्पी जीत पक्की करने से ज्यादा दिग्गजों को तंग करने में थी. प्रियंका उत्तर प्रदेश में नहीं चल पाईं. वक्त आ गया है कि कांग्रेस गांधी परिवार से मुक्त हो.’’ पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ''संगठनात्मक नेतृत्व’’ में बदलाव की मांग पहले ही कर चुके हैं.

यहां तक कि संभावित सहयोगी भी गैर-भाजपा गठजोड़ का नेतृत्व राहुल के हाथ में देने को तैयार नहीं हैं. ममता यूपीए के खात्मे का ऐलान कर चुकी हैं, शरद पवार कह चुके हैं कि कांग्रेस को अपने नेतृत्व के मुद्दे पर आत्मनिरिक्षण करना चाहिए और विपक्षी गठजोड़ में नेतृत्व की भूमिका की आकांक्षा नहीं पालनी चाहिए. फिर भी पवार ने यह स्वीकार किया है कि कांग्रेस की अखिल भारतीय मौजूदगी उसे इकलौती पार्टी बनाती है, जो भाजपा का राष्ट्रीय विकल्प मुहैया करा सकती है.

वाकई चुनावी गणित कांग्रेस को अपरिहार्य बनाता है. चार राज्यों में वह सरकार में है—दो में अकेले और दो में जूनियर सहयोगी के नाते. पार्टी 15 राज्यों में प्रमुख विपक्षी दल है. अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड में कांग्रेस-भाजपा की सीधी टक्कर है. लेकिन इन राज्यों में कांग्रेस की निपट नाकामी ही भाजपा की लोकसभा चुनावों में लगातार जीत की प्रमुख वजह है. वह इन राज्यों की 102 लोकसभा सीटों में सिर्फ चार जीत पाई.

पंजाब, असम, कर्नाटक, केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, गोवा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और नगालैंड में कांग्रेस निर्णायक भूमिका निभा सकती है और उससे दूरी बनाने का मतलब गैर-भाजपा वोटों का और ज्यादा बंटवारा होगा. इन राज्यों में कुल 543 लोकसभा सीटों में से 155 हैं. इसके अलावा कांग्रेस 2019 में भले 52 सीटें जीती हो, मगर वह बाकी 403 में से 196 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही.

इसलिए विपक्षी गठजोड़ की शक्ल तो इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद साफ होगी, लेकिन उसका वजूद और कामयाबी इस पर निर्भर करेगी कि विभिन्न विपक्षी पार्टियां अपने संबंधित राज्यों में 2024 में कैसा प्रदर्शन करती हैं. सबमें साझा आधार कम होने से उन्हें एक ऐसा नैरेटिव भी तैयार करना होगा, जो वोटरों को यह यकीन दिलाए कि उनमें कोई एक नेता मोदी का विकल्प बन सकता है.

विपक्ष के लिए उम्मीद का एकमात्र दीया आम आदमी पार्टी की पंजाब में हुई जीत है, जिसने 117 में से 92 सीटें जीतकर धमाकेदार प्रदर्शन किया है.

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