scorecardresearch
 

आवरण कथाः गठरी बन गई गुदड़ी

मांग में सिकुडऩ ने कपड़ा इकाइयों को डांवाडोल स्थिति में पहुंचा दिया है. निर्यात बढ़ाने के लिए अभी इसे प्रोत्साहन दिए जाने की जरूरत.

शरद गुप्ता,  वलैनो इंक. नई दिल्ली शरद गुप्ता, वलैनो इंक. नई दिल्ली

भारत का कपड़ा उद्योग, कृषि के बाद दूसरा सबसे अधिक रोजगार देने वाला क्षेत्र है. पर बुनियादी ढांचे की कमी और उत्पादकता की चुनौतियों ने इसकी वृद्धि रोक दी और बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, वियतनाम और कंबोडिया जैसे देशों ने भारत के वैश्विक बाजार में पीछे छोड़ दिया. कोविड से इस क्षेत्र को ज्यादा समस्याएं झेलनी पड़ीं. श्रमिकों की वापसी ने कपड़ा इकाइयों की उत्पादन क्षमता और विदेशी मांग को पूरा करने की उनकी क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया.

घरेलू कपड़ों और जरूरी पहनावे को छोड़ घरेलू मांग भी टूट गई. रेटिंग एजेंसी आइसीआरए के मुताबिक, धागे, कपड़ों और परिधानों के सेगमेंट में वित्त वर्ष 21 में बीते वर्ष की तुलना में 25-35 फीसद की कमी होगी. वित्त वर्ष 21 के दूसरे हिस्से में मांग की वृद्धि निर्यात में प्रोत्साहन के उपायों और उपभोक्ताओं के विवेकपूर्ण खर्च पर निर्भर करेगी.

देश के सबसे बड़े कपड़ा केंद्रों में से एक तिरुप्पुर के एक निर्यातक कुमार दुरैसामी कहते हैं कि इस क्षेत्र में उम्मीद के मुताबिक सुधार नहीं हुआ और कैजुअल वियर या फैंसी क्लोथिंग की मांग बहुत कम है. महामारी से दुनिया के कई हिस्सों में चीन-विरोधी भावनाएं हैं जिससे घरेलू वस्त्र निर्माताओं को उम्मीद है कि यह भारत के लिए बड़े वैश्विक ऑर्डर में तब्दील होंगे.

भारतीय उत्पादक और निर्यातक अब लागत कम करने और अधिक सक्षम होने की दिशा में काम कर रहे हैं. दुरैसामी की कंपनी ईस्टर्न ग्लोबल क्लोथिंग की बिक्री में 20-30 फीसद की कमी आई है. वे अब अपनी तीन फैक्ट्रियों को मिलाकर एक बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं.

कपड़ा इकाइयों के मालिक कहते हैं कि सरकार को नौकरी गंवाने वाले श्रमिकों को वेतन में मदद, जीएसटी रिफंड में तेजी, कम ब्याज पर कर्ज और तकनीक इस्तेमाल से लेकर फैक्ट्री आउटपुट बढ़ाने में भी सहयोग करना चाहिए.

शरद गुप्ता, 55 वर्ष
सीईओ, वलैनो इंक. नई दिल्ली

 

शरद गुप्ता इसके उदाहरण हैं कि किस तरह लॉकडाउन ने कपड़ा उद्यमियों पर असर डाला है. गुप्ता की हरियाणा के फरीदाबाद की फैक्ट्री में बुनाई वाले कपड़े बनते थे. उनके यहां करीब 200 कर्मचारी थे और उनके उत्पादन का 90 फीसद निर्यात होता था. कोविड संकट ने गुप्ता को अपनी इकाई को बंद करने और ऑर्डर को आउसोर्स करने पर मजबूर कर दिया.

वे कहते हैं कि लॉकडाउन और कारोबार करने की दुश्वारियों ने उनकी कार्यशील पूंजी को भी चौपट कर दिया और यहां तक कि उनका जीएसटी रिफंड भी सरकार ने रोक रखा है और बैंक कर्ज देने को तैयार नहीं हैं. गुप्ता के ऑर्डर की फाइल में कुछ साल पहले के मुकाबले महज 20-30 फीसद ऑर्डर ही हैं और उन्हें भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है.

‘‘मैंने अपना कारोबार बहुत कम कर दिया है. अभी मेरे पास अपनी उत्पादन इकाई को फिर से लगाने की कोई योजना नहीं है’’

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें