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जनादेश-2019 इम्तहान तेज का

तेजस्वी यादव के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है. पिता लालू प्रसाद यादव की गैर-मौजूदगी में वे बिहार में लोकसभा चुनावों में राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन के अभियान की कमान संभाले हुए हैं. क्या वे कामयाब हो पाएंगे?

सोनू किशन सोनू किशन

तेजस्वी के तेहरे पर भूख साफ नजर आ रही है. वे बड़ी तत्परता के साथ चाउमीन और मंचूरियन ग्रेवी के कटोरे में अपना कांटा डुबो रहे हैं. वे कहते हैं, ''दो परांठे खाके निकले थे." शाम के 7 बजे हैं और तेजस्वी खगडिय़ा, मधेपुरा और मधुबनी जिलों में चार सार्वजनिक सभाओं को संबोधित करके अभी-अभी पटना में मां राबड़ी देवी के सरकारी निवास 10, सर्कुलर रोड लौटे हैं. पिता, राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद के चारा घोटाले में दोषी ठहराए जाने के बाद न्यायिक हिरासत में होने और राबड़ी के सक्रिय राजनीति से कदम पीछे खींचने के बाद वे ही राजद के कर्णधार हैं.

लालू फैक्टर

लालू के दो बेटों में से छोटे 29 साल के तेजस्वी को पता है कि उन्हें बड़ी जिम्मेदारी संभालनी है. 2019 का लोकसभा चुनाव राजद की पहली ऐसी बड़ी चुनावी लड़ाई है, जिसमें उसका नेतृत्व संभालने के लिए लालू प्रसाद मौजूद नहीं हैं. यह कहना तथ्य बयान करना ही होगा कि पार्टी लालू की राजनैतिक समझदारी, करिश्माई व्यक्तित्व और असरदार भाषण शैली की कमी शिद्दत से महसूस करेगी. हालांकि लालू का अपना संसदीय करियर तो सितंबर, 2013 में ही समाप्त हो गया था जब चारा घोटाले के पहले मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उनकी लोकसभा सदस्यता चली गई थी और वे आगे भी चुनाव लडऩे के अयोग्य करार दे दिए गए थे.

लेकिन बिहार की जनता के साथ अपने गहरे जुड़ाव के कारण वे एक बड़ी सियासी हैसियत में बने रहे. जमानत पर बाहर रहते हुए उन्होंने 2014 के लोकसभा और 2015 के विधानसभा चुनावों में राजद के लिए प्रचार किया. राजद के ही एक नेता का कहना था, ''लालू प्रसाद में प्रचार अभियान को गढऩे की जोरदार काबिलियत है. वे मतदाताओं की नब्ज भांप लेते हैं और 'इधर-उधर' में पड़े लोगों को अपने पक्ष में मोड़ सकते हैं. वे हमेशा से वोटों को जोडऩे वाले रहे हैं."

लेकिन तेजस्वी को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने उन लोगों को खामोश कर दिया है जो दिसंबर, 2017 में लालू के जेल जाने के बाद राजद का नेतृत्व संभालने की उनकी काबिलियत पर सवाल उठा रहे थे. उसके बाद से बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी ने अपनी जीत का सिलसिला कायम रखा है. जुलाई, 2017 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल (युनाइटेड) के महागठबंधन छोड़कर एनडीए में शामिल होने के बाद से राजद ने राज्य में तीन उपचुनाव जीते हैं—जोकीहाट, जहानाबाद विधानसभा सीटें और अररिया लोकसभा सीट.

संघर्ष की राह से निकला नेता

एक राजनीतिक के रूप में तेजस्वी की लोगों को जोडऩे की काबिलियत साफ दिखाई देती है. 11 अप्रैल को मतदान वाले एक क्षेत्र जमुई में उन्होंने एक सभा में दर्शकों में से एक बच्चे को मंच पर बुलाया और उससे पूछा, ''टेंडर जानते हो? फाइनेंशियल बिड क्या होता है?" बच्चे को इन सवालों पर बगले झांकते देखकर तेजस्वी ने भीड़ की तरफ मुड़कर कहा, ''मैं भी इसी उमर का था. अब बताइए, क्या 10-12 साल का कोई बच्चा जान सकता है कि टेंडर क्या होता है? फिर भी सीबीआइ ने रेलवे टेंडर में गड़बडिय़ों का आरोप लगाते हुए मेरे खिलाफ मामला दर्ज कर लिया." उनकी इस बात पर दर्शकों में उनके प्रति समर्थन का जोश उमड़ा. तेजस्वी ने अपनी बात दर्ज करा दी थी.

हालांकि, अब भी उनके लिए सीखने के ही दिन हैं. 2014 में एनडीए बनाम राजद-कांग्रेस और जद (यू)-भाकपा गठबंधन एक-दूसरे के खिलाफ मुकाबले में थे. इस बार राजद की अगुआई वाला गठबंधन एनडीए के साथ सीधी टक्कर में है जिसमें भाजपा, जद (यू) और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) शामिल हैं. राजद का मूल मुस्लिम-यादव आधार, बिहार की कुल आबादी का 31 फीसदी, किसी भी बहुकोणीय मुकाबले में निर्णायक साबित होता रहा है. लेकिन किसी सीधे मुकाबले में शायद वह नाकाफी साबित हो.

तेजस्वी के अपने कवच में भी वैसे कुछ छेद हैं. बड़े भाई तेज प्रताप ने पार्टी नेतृत्व और पार्टी उम्मीदवारों के खिलाफ बोलकर अक्सर राजद को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है.

तेजस्वी की छाया में रहने से परेशान तेज प्रताप, बताते हैं, मामा साधु यादव के हाथों खेल रहे हैं. हालांकि तेजस्वी ने सब कुछ सामान्य जताने की कोशिश की है. उन्होंने तेज प्रताप से उनके जन्मदिन 16 अप्रैल को मुलाकात की और लोकसभा चुनावों को ''लोकतंत्र के लिए ज्यादा बड़ी जंग" बताया. बिहार में राजद के पांच दलों के महागठबंधन में कांग्रेस के अलावा उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान अवाम मोर्चा और मुकेश सहनी की विकासशील इनसान पार्टी शामिल हैं.

विरोधी भी होशियार

राजद की नौका को पार लगाने में तेजस्वी की क्षमता पर भाजपा को अंदेशा है. पटना में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना था, ''कितनी भी कोशिश कर लें पर तेजस्वी लालू प्रसाद नहीं हैं."

वे इस बात की ओर इशारा करते हैं जब तेजस्वी ने मोदी सरकार के सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए शिक्षा/नौकरी में 10 फीसदी आरक्षण की घोषणा के खिलाफ अभियान छेड़ा था.

लालू के कहने पर छेड़े गए अभियान में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए मौजूदा आरक्षण में वृद्धि की भी मांग की गई. कई लोगों का कहना था कि इस मामले में राजद ने अपना जनाधार और मजबूत करने का मौका गंवा दिया.

भाजपा नेता का कहना था, ''लालू होते तो उन्होंने इस मुद्दे का इस्तेमाल अगड़ी और पिछड़ी जातियों के बीच दरार को और चौड़ा करने में किया होता. तेजस्वी के अभियान की हवा शायद बीच ही में निकल गई."

हालांकि एक अन्य भाजपा नेता का मानना था कि लालू की गैर-मौजूदगी उनके विरोधियों के लिए 'दुधारी तलवार' सरीखी भी हो सकती है. ''इसकी प्रबल संभावना है कि लालू के समर्थक सहानुभूति में पूरे दमखम के साथ वोट दें." राजद को भी इस क्षमता का अंदाजा है.

राबड़ी देवी ने एक वीडियो संदेश भी जारी किया है जिसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि भाजपा राजद प्रमुख को न्यायिक हिरासत में जहर देने की साजिश रच रही है. तेजस्वी ने लालू के मुलाकातियों पर पाबंदी के झारखंड जेल प्रशासन के फैसले को 'अमानवीय' कहा है.

यादव साम्राज्य का ताना-बाना

यादव और उनकी कई सारी उप-जातियां बिहार में सबसे बड़ा जाति-समूह हैं और आबादी में उनकी 14 फीसदी भागीदारी है. उन्हीं की बदौलत लालू 1990 में चुनावी मैदान में चमके और पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. 2014 के लोकसभा चुनावों में यादव युवाओं के एक हिस्से ने भाजपा के लिए वोट दिया था.

लेकिन यादव वोट बैंक के भरोसे लालू 2015 में फिर से सत्ता में लौटे और राजद की लड़ी गई सीटों पर पार्टी ने 44 फीसदी वोट बटोरे. विश्लेषकों का मानना है कि उनके वोटों की यह ताकत 2019 में भी बरकरार रहेगी.

आबादी में 17 फीसदी हिस्सा रखने वाले मुसलमानों के साथ मिलकर लालू का मुस्लिम-यादव मेल खासी ताकत रखता है.

2014 के लोकसभा चुनाव में राजद-कांग्रेस का वोट प्रतिशत 29 फीसदी था.

अत्यंत पिछड़े वर्ग यानी ईबीसी का आबादी में 30 फीसदी हिस्सा है और 2006 में जब से नीतीश ने पंचायतों में 20 फीसदी सीटें उनके लिए आरक्षित करने का फैसला किया, वे मजबूती से उनका साथ देते रहे हैं. राज्य की जिन पंचायतों को पहले अगड़ी जातियों और दबंग पिछड़ी जातियों की जागीर समझा जाता था, उन्हें अब ईबीसी के दबदबे वाली सीटें समझा जाता है. नीतीश की 2009 के लोकसभा और 2010 तथा 2015 के विधानसभा चुनावों में जीत में ईबीसी की खास भूमिका रही है.

पर मांझी और कुशवाहा को एनडीए से अलग करके और सहनी की पार्टी को खेमे में शामिल कर तेजस्वी उम्मीद लगा रहे हैं कि वे एनडीए को पछाड़ देंगे. कुशवाहा (7 फीसदी) ओबीसी में सबसे बड़ा गैर-यादव समूह हैं. इसी तरह मांझी के भी 4 फीसदी मुसहर वोटों समेत दलित वोट खींचने की उक्वमीद है और सहनी मल्लाहों के वोट महागठबंधन की तरफ ला सकते हैं. तेजस्वी के पास फिलहाल खुश होने की वजहें हो सकती हैं लेकिन क्या 23 मई को वे वाकई ठहाका लगा सकेंगे?

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