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विकास और नौकरियों का न होना ही हमारे सामने सबसे बड़ी परेशानियां हैं

आरिफा अंदेशा जताती  हैं, ''हमारे यहां पहले ही बेरोजगारी की गंभीर परेशानी है. बाहर के लोग आएंगे और उन्हीं नौकरियों के लिए होड़ करेंगे तो परेशानी और बढ़ जाएगी.’’

आरिफा जान आरिफा जान

‘‘विकास और नौकरियों का न होना ही हमारे सामने सबसे बड़ी परेशानियां हैं’’

आरिफा जान 26 वर्ष

सरपंच, लालपोरा गांव, बारामूला

यह रिटायर्ड हेडमास्टर और आरिफा जान के पिता मोहम्मद अजीम थे जिन्होंने उसे अक्तूबर, 2018 के पंचायत चुनाव में नामांकन के लिए प्रेरित किया. इससे पहले तक यह विज्ञान स्नातक युवती समजासेवा कर रही थी.

अजीम कहते हैं, ‘‘लोग गांव में हमारा भरोसा करते हैं. मुझे लगा कि उसकी सरीखी लड़कियां आगे आएंगी और जिम्मेदारी लेंगी तो माहौल बदलेगा. यह महिलाओं को सच्ची ताकत देना है जिसकी कश्मीर को बहुत जरूरत है.’’ 

पंचायत चुनाव चुनाव पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की महबूबा मुफ्ती की सरकार के गठबंधन से भाजपा के अलग होने के कुछ दिनों बाद राष्ट्रपति शासन के दौरान हुए, जिनका सभी राजनैतिक दलों ने बहिष्कार किया. लेकिन यह खुद को पराजित करने वाला कदम साबित हुआ क्योंकि 18,835  पंचायत क्षेत्रों के लिए हुए चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से 60 फीसद मतदान देखने को मिला.

जीत के साथ ही 26 वर्षीया आरिफा बारामूला के दूरस्थ गांव लालपोरा की सरपंच बन गईं. वे घाटी में चुने गए 2,735 सरपंचों में से एक हैं. अब वे दूसरे और तीसरे स्तर के नेतृत्व का हिस्सा हैं जिसे केंद्र घाटी में विकसित करना चाहता है. इन पर अतीत की छाया नहीं है और न ही नेशनल कॉन्फ्रेंस या जेऐंडके पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी जैसे राजनैतिक दलों से कोई ताल्लुक है. 

बतौर सरपंच उन्हें 11 वार्डों के 7,000 लोगों की सबसे बड़ी समस्या उन्हें बेरोजगारी लगती है. वे मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून) के तहत मिलने वाली रकम से युवाओं को आमदनी मुहैया करवा रही हैं. पंचायत की बैठकों में शिरकत करने के साथ जान को सड़क, जलापूर्ति और नालियों समेत विकास के कार्यों की देखरेख भी करनी पड़ती है.

जम्मू-कश्मीर के बदले हुए दर्जे पर उनका क्या सोचना है, इस पर वे कहती हैं कि यह स्वायत्तता नहीं बल्कि उनके बीच बाहरी लोगों के आने का भय है. आरिफा अंदेशा जताती  हैं, ''हमारे यहां पहले ही बेरोजगारी की गंभीर परेशानी है. बाहर के लोग आएंगे और उन्हीं नौकरियों के लिए होड़ करेंगे तो परेशानी और बढ़ जाएगी.’’

हालांकि वे नए प्रशासनिक निजाम से खुश हैं. उन्होंने अनुदान और विकास निधियों को रफ्तार दी है. वे कहती हैं, ''पहले कोई जवाबदेही नहीं थी और कोई नहीं जानता था कि पंचायत कितना खर्च कर रही थी. अब पैसा दिया जा रहा है और ज्यादा पारदर्शिता है.’’ आरिफा अब चाहती हैं कि केंद्र पानी की आपूर्ति और कृषि तथा बागवानी के लिए ज्यादा सहायता दे, क्योंकि ये रोजगार पैदा कर सकते हैं.

क्या उनकी उम्र काम करवाने में आड़े आती है? वे कहती हैं, ''नहीं. बड़े मेरी इज्जत करते हैं और पूरा सहयोग देते हैं. सभी विकास और प्रगति चाहते हैं.’’ 

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सरपंच चुने गए जम्मू और कश्मीर में अक्तूबर 2018 के चुनाव में.

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