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''मुझे एहसास हुआ कि जिहाद कश्मीर की समस्याओं को हल करने का रास्ता नहीं हो सकता''

हमारे युवाओं ने महसूस किया है कि वे जो कर रहे थे वह गलत था और इससे उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला

दानिश डार 21 वर्ष, पूर्व आतंकी, शोपियां दानिश डार 21 वर्ष, पूर्व आतंकी, शोपियां

उनका व्हाट्सऐप स्टेटस कहता है, 'मेरे माजी (अतीत) को मत देखो. मेरा उससे अब कोई वास्ता नहीं.' 21 वर्षीय दानिश डार शोपियां जिले में रहते हैं जो कभी कश्मीर में आतंकवाद का गढ़ था. सिर्फ तीन साल पहले की बात है कश्मीर के कई अन्य प्रभावशाली युवाओं की तरह किशोरवय दानिश भी सरकार के खिलाफ जिहाद छेड़ना चाहते थे.

अन्य युवाओं की तरह हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी युवा दानिश का आदर्श हुआ करता था, जिसे जुलाई 2016 में सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया. पाकिस्तान में रहने वाले कजिन से प्रभावित होकर दानिश ने अपने लिए एक कैमफ्लाज (फौजियों जैसी वर्दी) खरीदी. उसके बाद मफलर से चेहरा ढककर फेसबुक पोस्ट के जरिए बताया कि वह भी दहशतगर्दों में शामिल है. तब उन्होंने दावा किया कि वे सुरक्षा बलों पर पथराव में शामिल थे और उन्हें लगता था कि इससे समाज में इज्जत बढ़ेगी और लड़कियां उन पर जान छिड़केंगी.

हालांकि, इससे पहले कि कुछ होता शोपियां के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक संदीप चौधरी के नेतृत्व में स्थानीय पुलिस की उनके फेसबुक पोस्ट पर नजर गई और दानिश को गिरफ्तार कर लिया गया. एक होनहार युवा आइपीएस अधिकारी चौधरी, आतंकवाद से निपटने के लिए नरम और गरम दोनों रुख अपनाने में विश्वास रखते थे. जहां जरूरत हो वहां वह बहुत सख्ती दिखाते थे लेकिन अगर वे किसी को दूसरे मौके के काबिल पाते तो बहुत नरमदिली दिखाते हुए उसे सुधरने को प्रेरित भी करते थे.

ऐसे ''सीमावर्ती मामलों''—एक श्रेणी जिसके तहत दानिश जैसे विचाराधीन कैदी आते थे—में चौधरी सीधे जेल में डालने के बजाए पकड़े गए लोगों के माता-पिता और गांव के बुजुर्गों को बैठक के लिए बुलाया करते थे. चौधरी उस बैठक में गांव के लोगों को भरोसा देते कि वे उनके बच्चों के साथ नरमी बरतने को तैयार हैं लेकिन इसके बदले समुदाय को एक करार करना होगा कि वह अपने गांव के बच्चे के अच्छे बर्ताव की जिम्मेदारी लेने को तैयार है.

दानिश के पिता मोहम्मद अकबर डार उस दिन को याद करते हैं जब उन्हें चौधरी के कार्यालय से वह फोन आया था. बेटे पर लगे आरोपों की जानकारी होने के बाद डार अपने अनुभव सुनाते हैं, ''लगता था जैसे मेरे बेटे ने छुरे से मेरा सीना चीरकर कलेजा ही निकाल लिया है.'' डार, जिनके दानिश के अलावा एक और बेटा और एक बेटी है, कहते हैं कि दानिश तब तक एक होनहार छात्र हुआ करता था. डार ने चौधरी को लिखित में वचन दिया कि वे अपने बेटे की जिम्मेदारी लेंगे और उसकी रिहाई की गुहार लगाई. चौधरी मान गए लेकिन उनकी टीम ने दानिश पर कड़ी नजर बनाए रखी.

जर्द चेहरा और बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ एक पुरानी टी-शर्ट पहने दानिश शोपियां के पास ही बसे एक गांव गंगू के अपने साधारण से घर में बैठे आज उन वर्षों को याद करके ही सिहर उठते हैं. दानिश कहते हैं, ''मैं तब अपने होश में नहीं था. मैं सिर्फ 17 साल का था. कुछ लोगों ने मुझे उकसाया और काफी सिखाया-पढ़ाया. मैं आंख बंद करके उनकी बातें मानता चला गया.

मैं गुमराह हो गया था और जहन्नुम की ओर चला जा रहा था.'' वे मानते हैं कि अल्लाह ने उन्हें बचाने के लिए चौधरी को भेजा था. दानिश याद करते हैं, ''मैं बौखलाया हुआ था लेकिन उन्होंने कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया और मुझे अच्छी सलाह दी. मैंने महसूस किया कि कश्मीर की वाजिब समस्याओं को दूर करने का जरिया, जिहाद हर्गिज नहीं हो सकता. अगर तुम्हारे वालदैन तुम्हें जिहाद के रास्ते नहीं भेजना चाहते, तो अल्लाह ऐसा कैसे चाहेगा?''

दानिश ने अब कॉलेज में दाखिला ले लिया है, हालांकि कोविड के प्रकोप के कारण उनका कॉलेज अभी बंद है. उनका बड़ा भाई भेड़ पालता है, छोटी बहन बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी में जुटी है. शोपियां में दहशतगर्दी में नाटकीय रूप से गिरावट आई है. दानिश कहते हैं, ''युवाओं ने महसूस किया कि वे जो कर रहे थे वह गलत था और इससे उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होने वाला.'' उनकी तमन्ना पुलिस में शामिल होने की है, चाहे वह कांस्टेबल के रूप में ही क्यों न हो.

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