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आवरण कथाः क्या गुजर गया बदतरीन दौर?

रोजाना संक्रमणों की गिरती रफ्तार और बड़े पैमाने पर टीका अभियान से उम्मीदें बढ़ीं कि संभावित तीसरी लहर उतनी विनाशकारी शायद न हो जितनी दूसरी थी, मगर वायरस के बदलते रूपों का मंडराता खतरा और आसन्न त्यौहारों के चलते विशेषज्ञों ने कोविड संबंधी सावधानियों के पालन की अहमियत पर जोर दिया.

कोविड के दौर में भीड़-भाड़ गणेश चतुर्थी के अवसर पर मुंबई में दादर के फूल बाजार का नजारा कोविड के दौर में भीड़-भाड़ गणेश चतुर्थी के अवसर पर मुंबई में दादर के फूल बाजार का नजारा

सोनाली आचार्जी

आम लोगों को कोविड के टीके लगाने का अभियान देश में 1 मार्च से शुरू हुआ. तब से 28 सितंबर तक 87.1 करोड़ टीके लगा देना कोई छोटी कामयाबी नहीं है. देश के आकार और आबादी के मद्देनजर अधिकारियों और टीके लगाने वालों को न सिर्फ भारी-भरकम लक्ष्य का पीछा करना था, बल्कि उन्हें बुनियादी ढांचे, मुश्किल और दूरदराज के इलाकों, सांस्कृतिक संवदेनशीलताओं और लोगों के बीच टीके लगवाने में हिचक पैदा करने वाली बहुत-सी गलत जानकारियों की चुनौतियों से भी पार पाना था.

राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत काम में लगे हजारों स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की अथक कोशिशों से तमाम मुश्किलों से पार पाया जा सका और हम सफलता की अनोखी कहानियों से रू-ब-रू हुए.

मसलन, केरल के पलक्कड़ जिले की माधवी पिल्लै को लीजिए. 92 बरस की विधवा पिल्लै पूरे वक्त दो घरेलू सहायकों की मदद से जिंदगी बसर करती हैं. वे टीका लगवाने नजदीकी टीका केंद्र तक जा पातीं, इसकी कोई उम्मीद नहीं थी. मदद के लिए स्थानीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आगे आईं और पिल्लै को टीका केंद्र तक लेकर गईं.

हिमाचल प्रदेश में पूरी हकदार आबादी को पहला टीका लग चुका है, मगर वहां टीका लगाने वाले चंबा जिले में सुदूर बालोथ गांव के लिए पहाड़ी रास्तों से 20 किमी चढ़कर पैदल गए और वहां टीका शिविर लगाया. उन्होंने हिलोतवां में बिस्तर पर पड़े एक मरीज की खातिर वन्यजीव अभयारण्य में भी शिविर लगाया.

कोविड पर राष्ट्रीय टास्कफोर्स के चेयरमैन डॉ वी.के. पॉल कहते हैं, ''हमने जो हासिल किया, वह जबरदस्त है. टीकाकरण की रफ्तार बढ़ रही है. इतनी विशाल और भौगोलिक तौर पर दूर-दूर बसी आबादी तक पहुंचने के मद्देनजर यह खास तौर पर गौर करने लायक है. करीब दो-तिहाई वयस्क आबादी को पहला टीका लगा चुका है. करीब एक-चौथाई वयस्क आबादी दोनों टीका ले चुकी है.’’

देश में 17 सितंबर को एक दिन में रिकॉर्ड 2.5 करोड़ कोविड के टीके लगे. अभी तक छह राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में हकदार आबादी को पहला टीका लग चुका है. ये हैं लक्षद्वीप, चंडीगढ़, गोवा, हिमाचल प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह और सिक्किम. चार अन्य—दादरा और नगर हवेली, केरल, लद्दाख और उत्तराखंड—में पहला टीका लगाने का 90 फीसद से ज्यादा काम पूरा हो चुका है.

पहले की लहरों के मुकाबले टेस्ट पॉजिटिविटी दर में गिरावट
पहले की लहरों के मुकाबले टेस्ट पॉजिटिविटी दर में गिरावट

टीकों की कमतर आपूर्ति से शुरुआती महीनों में टीका अभियान धीमा  था, मगर अब सुधार आया है. केंद्र ने 83.50 करोड़ टीके मुहैया कराए हैं. 1.1 करोड़ और आ रहा है. यह भारी-भरकम काम था, जिसमें नई और अनदेखी मुश्किलें कभी भी आ सकती थीं. एक मुश्किल लोगों की मानसिकता भी थी. एम्स नई दिल्ली के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं, ''एक चुनौती लोगों को वैक्सीन के डर से उबारने की थी, ताकि वे पहले टीके के लिए आएं. दूसरी चुनौती उनका मनोबल बनाए रखने की थी, ताकि वे दूसरे टीके के लिए लौटें.’’

खुश होना अभी जल्दबाजी 
मगर स्वास्थ्य विशेषज्ञों को अभी भरोसा नहीं है कि अभी चल रहे कोविड टीका कार्यक्रम का मतलब महामारी को जल्द पीछे छोड़ देना होगा. वे कहते हैं कि फिलहाल इतने पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं, जिनके आधार माना जा सके कि बदतरीन वक्त गुजर चुका है. डॉ. पॉल कहते हैं, ''कोविड के मामले में ढेरों लगातार बदलती सचाइयां हैं. हम जो उपाय कर रहे हैं, वे रिसर्च और विज्ञान पर आधारित हैं. हम सबको कम से कम अगले एक साल तक मास्क पहनना और कोविड की सावधानियों का पालन करना होगा.’’

संक्रामक रोग विशेषज्ञ तथा महाराष्ट्र के कोविड टास्कफोर्स के सदस्य डॉ. ओम श्रीवास्तव कहते हैं कि महामारी के खात्मे की तारीख की भविष्यवाणी करना अभी काफी जल्दबाजी होगी. वे कहते हैं, ''हमें पक्का पता नहीं है कि कोविड वायरस आने वाले वक्त में कैसा बर्ताव करेगा. कुछ महीनों पहले हमने जो सोचा था (कि ऐसा होगा), वह आज से (जो हो रहा है उससे) अलग है. हर गुजरते दिन हमें नए डेटा मिल रहे हैं.’’  

फिर भी, संक्रमण और अस्पताल में भर्ती की मौजूदा दरें आशाजनक संकेत हैं और देश को खुशी मनाने की वजह देती हैं. देश में अब तीन महीनों से ज्यादा वक्त से रोज 50,000 से कम मामले आ रहे हैं. 27 सितंबर को महज 26,041 मामले आए. बीते 94 दिनों के लिए साप्ताहिक टेस्ट पॉजिटिव दरों का राष्ट्रीय औसत 3 फीसद से कम है, जो डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के 5 फीसद से कम के मानक से नीचे है. बड़े शहरों के अस्पतालों में अप्रैल के मुकाबले बहुत कम कोविड मरीज देखे जा रहे हैं, जब कोविड के डेल्टा वैरिएंट ने देश में जानलेवा दूसरी लहर बरपा दी थी (देखें क्या कोविड देश में आम बीमारी जैसा होता जा रहा है?).

पहले की लहरों के मुकाबले टेस्ट पॉजिटिविटी दर में गिरावट
पहले की लहरों के मुकाबले टेस्ट पॉजिटिविटी दर में गिरावट

दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 28 सितंबर को राज्य में सिर्फ 1 फीसद कोविड बिस्तर, 1.9 फीसद ऑक्सीजन बिस्तर, 2 फीसद आइसीयू बिस्तर और 3 फीसद वेंटिलेटर मरीजों के काम आ रहे थे. केरल में, जहां सक्रिय मामले सबसे ज्यादा हैं, अस्पतालों में केवल 4 फीसद कोविड मरीजों को गंभीर लक्षण थे. फिर भी, डॉक्टर बेफिक्र न हो जाने की हिदायत देते हैं. नई दिल्ली के मणिपाल अस्पताल में संक्रामक रोगों की कंसल्टेंट डॉ. अंकिता बैद्य कहती हैं, ''मामलों की संख्या भले कम हो गई हो, पर कोविड और उसके घातक असर को कम करके नहीं आंका जा सकता.’’

हालांकि अधिकांश राज्यों में मई की दूसरी लहर की भयावहता के बाद से मामलों और पॉजिटिव दरों में खासी कमी आई है, पर चिंताजनक इलाके बने हुए हैं. मसलन, केरल में 28 सितंबर को पॉजिटिव दर 25 फीसद और सक्रिय मामले 1,57,204 थे. मिजोरम में 24 सितंबर को खत्म सप्ताह में मामलों की तादाद में पिछले सात दिनों के मुकाबले 25 फीसद की बढ़ोतरी हुई.

महाराष्ट्र में इसी अवधि के दौरान साप्ताहिक मामलों की बढ़ोतरी में 59 फीसद का इजाफा हुआ. दोनों राज्यों में कोविड का डेल्टा वैरिएंट हावी है. लेकिन नई लहर तभी आ सकती है, जब कोई स्ट्रेन हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता मात देने वाला आए. विशेषज्ञ जोर देकर कहते हैं कि वायरस को संक्रमित होने देना उसे म्यूटेट होने या नया रूप धारण करने के मौका देना है.

चिंताजनक इलाके
चिंताजनक इलाके

बड़े पैमाने पर लोग इसलिए आश्वस्त होते लग रहे हैं कि देश में 'हर्ड इम्यूनिटी’ आ गई है. जुलाई में 70 जिलों में किया गया आइसीएमआर (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) का सर्वे बताता है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश की दो-तिहाई के करीब आबादी में कोविड ऐंटीबॉडी विकसित हो चुके हैं.

कोविड के खिलाफ इम्यूनिटी के ख्याल से दिल्ली की फैशन डिजाइनर 34 वर्षीया गौहर कौर ने इस साल दीवाली की पार्टी का मनसूबा बनाया है. वे कहती हैं, ''दिल्ली में महज कुछ सौ मामले हैं. अगर हममें से ज्यादातर कोविड के प्रति इम्यून हैं, तो डरकर क्यों जिएं?’’

विशेषज्ञ सतर्क हैं. सीरोप्रीवैलेंस अध्ययन कोविड के प्रकोप और रुख को समझने में मदद तो करता है, लेकिन यह हर्ड इम्यूनिटी का निश्चित संकेत कतई नहीं है. डॉ. श्रीवास्तव कहते हैं, ''लोग अक्सर ऐंटीबॉडी टेस्ट करवाते हैं और सोचते हैं कि वे सुरक्षित हैं, पर खास बात यह देखना है कि ऐंटीबॉडी कैसी है और कितने वक्त से है.’’

डॉ. बैद्य कहती हैं, ''कोविड इम्यूनिटी के लिए कम से कम दो या तीन महीनों तक ऐंटीबॉडी को बेअसर करने की जरूरत होती है. महज ऐंटीबॉडी की गिनती भर से यह नहीं बताया जा सकता कि आपके शरीर में कोविड से सुरक्षा के लिए जरूरी कारगर ऐंटीबॉडी हैं या नहीं.’’ डॉ. बैद्य यह भी कहती हैं कि इंटरनेट की जानकारियों के आधार पर लोगों का रवैया वायरस के नए वैरिएंट के लिए मददगार हो सकता है. वे कहती हैं, ‘‘हमें यह भी नहीं पता कि वैक्सीन हमें कितने लंबे वक्त तक सुरक्षित रखेगी. लिहाजा सावधानी ही आज का दस्तूर होना चाहिए.’’

टीकों का असर कब तक?
भुवनेश्वर में आइसीएमआर के क्षेत्रीय चिकित्सा अनुसंधान केंद्र में 614 ऐसे स्वास्थ्यकर्मियों पर एक अध्ययन किया गया, जिन्हें दो टीके लग चुके थे. अध्ययन में दूसरे टीके के चार महीने के भीतर कोविड ऐंटीबॉडी में काफी गिरावट देखी गई. सितंबर में प्रकाशित अध्ययन की सह-लेखिका डॉ. संघमित्रा पति कहती हैं, ''इसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. टी और बी सेल भी वायरस से लडऩे की मेमोरी बनाने में मदद करते हैं.’’ यह समझना महत्वपूर्ण है कि ऐंटीबॉडी केवल हमारी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का एक हिस्साभर हैं, अपने आप में पूरा प्रतिरक्षा तंत्र नहीं.

दोनों टीका लगाना ही टीकाकरण की कुंजी
दोनों टीका लगाना ही टीकाकरण की कुंजी

श्वेत रक्त कोशिकाएं शरीर पर धावा बोलने वाले बाहरी तत्वों के खिलाफ लड़ने वाली शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की सेना हैं. विशेष रूप से, शरीर को दो प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाओं—बी सेल या (बी कोशिकाएं) और टी सेल (टी कोशिकाएं)—की आवश्यकता होती है. श्वेत रक्त कोशिकाएं अस्थि मज्जा में विकसित होती हैं और बी सेल में विकसित होने के लिए वहीं बनी रहती हैं या फिर टी सेल के रूप में विकसित होने के लिए थाइमस ग्रंथि में चली जाती हैं.

बी सेल वायरस को ढूंढती हैं, और फिर ऐंटीबॉडी बनाना शुरू करती हैं. ऐंटीबॉडी वायरस को घेर तो लेते हैं, लेकिन बिना मदद के उन्हें नष्ट नहीं कर सकते. ये टी सेल हैं जो ऐंटीबॉडी द्वारा चिह्नित रोग पैदा करने वाले को नष्ट कर देती हैं. शरीर पर उसी रोगाणु के फिर से हमले से निपटने के लिए ऐंटीबॉडी अलग-अलग अवधि के लिए रक्त में बनी रहती है. कुछ इसी तरह टीके बीमारियों को रोकते हैं—वे शरीर के साथ वायरस का परिचय इस तरह कराते हैं कि वे शरीर को बिना प्रभावित किए ऐंटीबॉडी को रोगाणु को पहचानने में मददगार हों. 

अध्ययनों से यह तो पता चला है कि कोविड टीकाकरण के कारण विकसित ऐंटीबॉडी का स्तर आगे चलकर गिर सकता है लेकन टी सेल की मेमोरी की भूमिका पर बहुत कम डेटा उपलब्ध है. 2020 में नेचर जर्नल में छपे 2003 में सार्स (सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम) महामारी से मिले सबक से संकेत मिला कि संक्रमित होने वाले कई व्यक्तियों में 17 साल बाद भी टी सेल मेमोरी मजबूत बनी रही.

इससे पता चलता है कि टी सेल प्रतिक्रियाएं लंबे समय तक बनी रह सकती हैं. हालांकि, टी सेल परीक्षण ऐंटीबॉडी परीक्षणों की तुलना में बाजार में दुर्लभ हैं और इनका परीक्षण भी बहुत अधिक तकनीकी है.

आइसीएमआर यह शोध कर रहा है कि कोविड-19 के खिलाफ शरीर की रोगरोधक क्षमता में ऐंटीबॉडी और टी सेल की सुरक्षा की भूमिका क्या है और वह कितने समय तक रहती है. इन अध्ययनों से इस पर रोशनी पड़ने की उम्मीद है कि टीके से तैयार हुई प्रतिरक्षा कितने समय तक चलती है और किन खास वजहों से यह तय होता है.

म्युटेंट पर नजर
म्युटेंट पर नजर

प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट डॉ. टी. जैकब जॉन कहते हैं, ''शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र में सुरक्षा का तत्व भी होता है जो गंभीर बीमारी के खिलाफ काम कर सकता है. हमने पाया है कि दोनों टीके लगा लेने से डेल्टा वैरिएंट भी घातक नहीं होता है.’’ 

कोविशील्ड का ही उदाहरण लें, जिसके 76.4 करोड़ टीके भारत में दिए गए हैं. सशस्त्र बलों के 16 लाख स्वास्थ्य सेवा कर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स पर एक अध्ययन से पता चला कि कोविशील्ड ने संक्रमण की आशंका को 93 प्रतिशत तक कम कर दिया और मृत्यु से पूरी तरह से सुरक्षित कर दिया.

लेकिन आइसीएमआर के एक अध्ययन से पता चला कि कोविशील्ड लगवाने वाले 58 प्रतिशत लोगों में पहले टीके और 16 प्रतिशत लोगों में दोनों टीके लेने के बावजूद, कोई ऐंटीबॉडी मौजूद नहीं थी. इससे पता चलता है कि कम या बिना ऐंटीबॉडी के भी टीके संक्रमण और गंभीर कोविड रोग से सुरक्षा दे रहे हैं (देखें दोनों टीके लगाना टीकाकरण की कुंजी है). 

कोविड से बचाव में ऐंटीबॉडी की भूमिका और ऐंटीबॉडी के आवश्यक स्तरों पर अधिक मजबूत डेटा के अभाव में, भारतीय विशेषज्ञ बूस्टर वैक्सीन के पक्ष में नहीं हैं. उनका मानना है कि बूस्टर टीका केवल उन लोगों को ही चाहिए, जिनका शारीरिक प्रतिरक्षा तंत्र खराब है. अमेरिका में, फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) 16 साल से ऊपर के सभी लोगों के लिए एक बूस्टर डोज पर विचार कर रहा है. हालांकि, डब्ल्यूएचओ ने अमीर और गरीब देशों के बीच भारी टीकाकरण अंतर का हवाला देकर बूस्टर टीके पर अस्थायी रोक लगाने की अपील की है.

डॉ. पॉल कहते हैं कि बूस्टर टीके अभी भी विकास की पक्रिया में हैं और भारत की प्राथमिकता पूरी आबादी को दो बार टीका लगाना है. डॉ. गुलेरिया कहते हैं, ''फिलहाल बूस्टर टीके की आवश्यकता नहीं है. बूस्टर वैक्सीन कैसी हो, और कब जरूरी है, यह तभी स्पष्ट होगा जब हमारे पास अधिक आंकड़े उपलब्ध होंगे.’’ फिलहाल सबको मास्क लगाना जरूरी है. डॉ. गुलेरिया कहते हैं, ''आपको टीका लग चुका है या फिर आप कोविड से उबर रहे हैं तो भी आप वायरस को फैला सकते हैं. यह सोचना कि आप सुरक्षित हैं और एहतियात रखना छोड़ देना घातक गलती हो सकती है.’’ 
 
महामारी से आम बीमारी बनने की ओर
महामारी समूचे समुदाय, आबादी या क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों को चपेट में ले लेती है. कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी का दायरा बहुत बड़ा होता है और यह कई देशों या महाद्वीपों में फैलती है. आम बीमारी का प्रकोप एक सीमित क्षेत्र में बराबर बना रहता है लेकिन उसका बचाव या इलाज संभव है. कोई भी आम संक्रामक बीमारी महामारी का रूप ले सकती है, अगर संक्रमण दर ऊंची और अचानक हो.

मसलन, भारत में नियमित अंतराल में डेंगू या इन्फ्लूएंजा का प्रकोप होता है और उसमें उतार-चढ़ाव भी दिखता है. अगर पूरे वर्ष उसके संक्रमण की दर उच्च बनी रहती, तो वह महामारी का रूप ले लेती है. कोविड संक्रमण की वर्तमान दर को देखें तो लग सकता है कि कोविड भारत में आम बीमारी होने की राह पर है. हमारी टेस्ट पॉजिटिविटी दर, रोजाना संक्रमणों की संख्या और आर-वैल्यू पिछले तीन महीनों से कम और स्थिर बनी हुई है. 

चेन्नै के इंस्टीट्यूट ऑफ मैथमेटिकल साइंसेज के अनुसार, भारत में कोविड-19 के लिए आर-वैल्यू अगस्त के अंत में 1.17 से घटकर सितंबर के मध्य में 0.92 हो गई. सबसे अधिक सक्रिय मामलों वाले राज्य केरल और महाराष्ट्र में भी आर-वैल्यू 1 से नीचे है. क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लूर की वायरोलॉजिस्ट डॉ. गगनदीप कंग कहती हैं, ''कोविड पूरी तरह से खत्म नहीं होने जा रहा, यह सामान्य बनकर रहेगा.’’ वे कहती हैं कि अगर लोग आगामी त्योहारी सीजन के दौरान कोविड प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते हैं, तो देशव्यापी तीसरी लहर की आशंका है, हालांकि यह दूसरी लहर की तरह गंभीर नहीं होगी. 

विशेषज्ञ वायरस के ऐसे नए वैरिएंट से पैदा होने वाली घातक लहर को लेकर आशंकित हैं जो पिछली ऐंटीबॉडी को चकमा दे सकता है. डब्ल्यूएचओ ने ऐसे दो वैरिएंट की पहचान की है जो अभी तक भारत में नहीं पहुंचे हैं—एमयू और सी.1.2 (देखें, म्यूटेंट परख). डब्ल्यूएचओ का कहना है कि इस जनवरी में पहली बार कोलंबिया में पहचाने गए एमयू वेरिएंट में ऐंटीबॉडी को चकमा देने की क्षमता है.

इसका वैश्विक प्रसार 0.1 प्रतिशत से कम हो गया है, लेकिन यह कोलंबिया (कुल मामलों का 39 प्रतिशत) और इन्न्वाडोर (13 प्रतिशत) में अब भी फैल रहा है. मई में दक्षिण अफ्रीका में पाया गया सी.1.2 वैरिएंट अधिक चिंता का विषय है क्योंकि उसमें अब तक ज्ञात सभी कोविड वैरिएंट में सबसे अधिक म्युटेशन हुआ है. दुनियाभर में इसके करीब 130 मामले पाए गए हैं. 

डॉ. बैद्य कहती हैं, ''सी.1.2 वैरिएंट के अनुवांशिक स्वरूप में काफी अधिक परिवर्तन देखे गए हैं, जो इसे अधिक संक्रामक बना सकता है. यह टीकों को बेअसर कर सकता है और संक्रमण के लक्षणों की प्रकृति को बदल सकता है. इन कारकों पर डेटा आगे चलकर और अधिक अध्ययनों के बाद ही सामने आएगा.’’ सी.1.2 वैरिएंट सी.1 से विकसित हुआ, जो मई 2020 में दक्षिण अफ्रीका में पहली लहर के दौरान हावी था.

दक्षिण अफ्रीका के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर कम्युनिकेबल डिजीज के शोधकर्ता सी.1.2 स्ट्रेन का अध्ययन कर रहे हैं और उनका कहना है कि इसमें वुहान से निकले मूल स्ट्रेन में सबसे अधिक म्यूटेशन हुआ है. इस स्ट्रेन की संक्रमण दर की तुलना शुरुआती दिनों में दक्षिण अफ्रीका के बीटा और डेल्टा वैरिएंट से की जाती है. 

डेल्टा वैरिएंट का प्रकोप भारत में फिलहाल सबसे ज्यादा  है. प्रकोप सिर्फ इसी का नहीं है. इससे निकले नए म्यूटेंट की संख्या पिछले कुछ महीनों में चार से 13 हो गई है. ये म्यूटेंट ही कोविड के नए मामले जोड़ रहे हैं और उनमें इजाफा कर रहे हैं. इसका एक वैरिएंट एवाइ.4 पहली बार ब्रिटेन में पाया गया था. बाद में महाराष्ट्र में इसके संक्रमण के सबूत मिले हैं. वहां अप्रैल में किए गए परीक्षण में 1 प्रतिशत नमूनों में यह पाया गया. लेकिन जुलाई में जांचे गए नमूनों में इसका अनुपात बढ़कर 2 फीसद और अगस्त में 44 फीसद हो गया.

कर्नाटक में भी इसका ही प्रकोप तेजी से बढ़ा है. वहां सितंबर में 41.1 प्रतिशत नमूनों में एवाइ.4 वैरिएंट पाया गया था जो डेल्टा (40 प्रतिशत) के प्रकोप से अधिक है. इसका एक अन्य वैरिएंट एवाइ.12 पहली बार इज्राएल में पाया गया, जहां पूरी तरह टीकाकरण हो जाने के बावजूद इसके संक्रमण की चपेट में 60 फीसद आबादी आई और एक नई लहर पैदा हुई.

फिर, दिल्ली में सितंबर में किए गए परीक्षण में यह 10 फीसद नमूनों में पाया गया. कोविड-19 पर राष्ट्रीय टास्कफोर्स के सदस्य एन.के. अरोड़ा कहते हैं, ''देश की आबादी के एक बड़े हिस्से में अभी भी कोविड का संक्रमण नहीं फैला है. इस वजह से सिर्फ डेल्टा वैरिएंट ही कई क्षेत्रों में अपना प्रकोप फैला सकता है. इसलिए सावधान रहने की जरूरत है.’’ 

इसमें दो राय नहीं कि कोविड का वायरस दुनिया में संक्रमण फैला चुके दूसरे वायरसों से बहुत हद तक अलग है. इसलिए मानव शरीर के लिए उसकी पहचान मुश्किल रही है और अभी भी इस पर काबू नहीं पाया जा सका है. स्वाइन फ्लू ने अपने पहले वर्ष (2009) में विश्व स्तर पर 2,84,000 लोगों की जान ली थी; कोविड ने 20 लाख जानें ली हैं. कोविड स्वाइन फ्लू की तुलना में काफी अधिक संक्रामक है. उसमें तेजी से म्युटेशन होने के कारण यह अधिक संक्रामक है और हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को चकमा देने में सक्षम है.

दरअसल, टीकाकरण का एक वर्ष से भी कम समय का आंकड़ा उपलब्ध है और अभी देश की कुछ ही आबादी को टीके लग सके हैं. इस वजह से शोधकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि क्या टीके लगवा चुके और वायरस के संपर्क में पहले आ चुके लोग कोविड के वर्तमान स्ट्रेन से बचे रहने में सक्षम होंगे.

हालांकि, एक बात जो तय है, वह यह है कि मास्क लगाने, आपस में दूरी बनाए रखने और समय-समय पर जरूरत के मुताबिक खास इलाकों में लॉकडाउन लगाने से इसके संक्रमण की संख्या कम की जा सकती है. डॉ. गुलेरिया कहते हैं, ''कोविड की आशंकित तीसरी लहर कितनी विनाशकारी हो सकती है, यह लोगों के रुख और रुझानों पर निर्भर करता है.’’ 

बहरहाल, अक्तूबर की शुरुआत में नवरात्रों के साथ शुरू होने वाला लंबा त्योहारी मौसम संक्रमण के प्रकोप के लिहाज से काफी अहम हो सकता, जैसा की दूसरी लहर के वक्त देखा गया है. तब सरकार भी यह दावा कर रही थी कि कोविड लगभग विदा हो चुका है. धड़ल्ले से विशाल धार्मिक आयोजन और बड़ी-बड़ी चुनावी रैलियां की जाने लगी थीं.

लेकिन अगर देश में संक्रमण को इसके मौजूदा स्तर पर रोका जा सकता है तो कोविड धीरे-धीरे वैश्विक महामारी से आम बीमारी का रूप ले सकता है. यकीनन, वायरस अब हमारे बीच हमेशा बना रहने वाला है, और हमें इसके साथ जीना सीखना होगा. लेकिन टीकाकरण और उचित सावधानियों के साथ यह शायद बीमारी, मृत्यु और पीड़ा के उस स्तर का कारण नहीं बनेगा, जैसा कि देश ने इस साल गर्मियों की शुरुआत में डरावना मंजर देखा और झेला था.

—सोनाली आचार्जी

’’हमें पता नहीं है कि कोविड वायरस का रवैया आगे कैसा रहेगा और उसका प्रकोप किस रूप में दिखेगा. हम कुछ महीने पहले जो सोच रहे थे कि ऐसा होगा, आज हकीकत उससे काफी अलग है’’
डॉ. ओम श्रीवास्तव, संक्रामक रोग विशेषज्ञ तथा महाराष्ट्र कोविड टास्कफोर्स के सदस्य

‘‘आशंकित तीसरी लहर कितनी खतरनाक और विनाशकारी होगी, यह बिलाशक लोगों के रुख और रुझान पर निर्भर करेगा. आप सोचते हों कि टीके लगाने के बाद सुरक्षित हो गए, तो भारी गलती कर बैठ सकते हैं ’’
डॉ. रणदीप गुलेरिया, डायरेक्टर, एम्स, नई दिल्ली.

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