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आवरण कथाः भारत के लिए सबसे बड़ा अवसर

आर्थिक मोर्चे पर मुकाबला ही 21वीं सदी का ‘‘ग्रेट गेम’’ होने वाला है. भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं के लिए अपने द्वार खोलने होंगे. इससे अल्पावधि में रचनात्मक क्षति तो होती है लेकिन दीर्घावधि में यह आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर करता है.

किशोर महबूबानी किशोर महबूबानी

नया दौर, नई राहें 2021
भू-राजनीति

किशोर महबूबानी

हमेशा की तरह, शेक्सपियर सही थे. उन्होंने कहा, ''अवसर, पुरुषों के जीवन में एक ज्वार की तरह आता है. जो उसका फायदा उठा लेता है, उसकी किस्मत खुल जाती है.’’ ऐसा ही ज्वार अब भारत के तटों पर पहुंच गया है. अगर भारत इस ज्वार का इस्तेमाल करने का फैसला करता है, तो उसके लिए कामयाबी के नए रास्ते खुलेंगे.


एक तथ्य निर्विवाद है. किसी भी देश की अपनी क्षमता और उसके प्रदर्शन के बीच जैसा फासला भारत में दिखता है, वैसा किसी और देश में नहीं है. अब, वैश्विक आंकड़े उपलब्ध हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारतीय अगर आर्थिक रूप से सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी नहीं हैं तो भी, वे सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी जीवों में से तो हैं.

दुनिया की सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी मानव प्रयोगशाला अमेरिका में, भारतीय सबसे अधिक औसत घरेलू आय (लगभग 1,00,000 डॉलर) वाले जातीय समूह हैं. अमेरिका में भारतीयों की जितनी औसत आय है, अगर भारत में रहने वालों की आय उसकी आधी भी हो जाए (मान लें, 50,000 डॉलर), तो भारत की अर्थव्यवस्था आज 20 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होगी जो अमेरिका के लगभग बराबर है.

यह तथ्य क्यों महत्वपूर्ण है? जाहिर है कि एक नया असाधारण खेल शुरू हो चुका है. अमेरिका और चीन के बीच एक बड़ी भू-राजनीतिक प्रतियोगिता शुरू हो चुकी है, जिसे मैंने अपनी पुस्तक हैज चाइना वन में दस्तावेजों के साथ प्रस्तुत किया है. इस प्रतियोगिता का परिणाम कैसे तय होगा? क्या यह दोनों देशों के बेड़े में मौजूद विमान वाहकों की संख्या से तय होगा? या इसके उपभोक्ता बाजारों के आकार और समृद्धि से? उत्तर स्पष्ट है. नतीजा, बाजार तय करने वाला है.

आंकड़ों का छोटा सा हिस्सा यह इंगित कर देता है कि कौन जीत रहा है. 2009 में, चीन में खुदरा वस्तुओं के बाजार का आकार 18 खरब डॉलर था जबकि अमेरिका उसके मूल्य के दोगुने से अधिक 40 खरब डॉलर पर था. दस साल बाद 2019 में चीनी बाजार तीन गुना से अधिक बढ़कर 60 खरब डॉलर का हो गया जबकि अमेरिकी बाजार 55 खरब डॉलर तक बढ़ सका. दस साल बाद, खासकर कोविड-19 के बाद, चीनी बाजार बहुत बड़ा हो जाएगा.

भारत भाग्यशाली है कि यह नया महान खेल आर्थिक क्षेत्र में खेला जाएगा. रिकॉर्ड से पता चलता है कि विभिन्न प्रवासी समुदाय अपने सर्वश्रेष्ठ दिमाग अमेरिका में भेजते हैं और उनके बीच जब भी भयंकर प्रतिस्पर्धा होती है तो जिस जातीय समुदाय ने सफलता की सबसे बड़ी कहानियां लिखी है, वह भारतीय ही है. भारतीय दुनिया के दो सबसे बड़े कॉर्पोरेशन—माइक्रोसॉफ्ट को सत्य नडेला और गूगल को सुंदर पिचाई—चला रहे हैं.

फिर भी, भारत के साथ एक महान विरोधाभास भी देखने को मिलता है. दुनिया के लगभग हर देश में प्रवासी और उनमें से भी भारतीय व्यापारिक समुदाय ही सबसे अधिक सफल हैं. फिर भी, प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अब बांग्लादेश, जिसे हेनरी किसिंजर ने कभी ''पूरी तरह असहाय’’ देश कहा था, से पिछडऩे वाला है.

2019 में, भारत की प्रति व्यक्ति आय 2,092 डॉलर और बांग्लादेश की 1,815 डॉलर थी. आइएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) के अनुसार, 2020 में भारत की प्रति व्यक्ति गिरकर 1,877 डॉलर हो जाएगी जबकि बांग्लादेश की आय बढ़कर 1,888 डॉलर तक हो जाएगी. यह विरोधाभास क्या बताता है? भारतीय प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं. लेकिन प्रतिस्पर्धा करने के लिए उन्हें प्रतिस्पर्धा के अवसरों की आवश्यकता है.

आर्थिक प्रतिस्पर्धा का मतलब पैसे कमाने से नहीं है. यह गरीबी घटाने और मानव कल्याण में सुधार के लिए नैतिक रूप से बहुत असरदार होता है. यहां भी आंकड़े स्पष्ट हैं. ऐसे देश जो अपनी अर्थव्यवस्थाओं को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खोलते हैं वे गरीबी तेजी से घटा पाते हैं. 1992 में वियतनाम का कुल व्यापार $5.1 अरब डॉलर का था और इसकी गरीबी दर 52 प्रतिशत थी.

चूंकि 2018 तक इसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 100 गुना बढ़ोतरी हुई और यह $527 अरब डॉलर हो गया, इसलिए इसकी गरीबी दर घटकर 1.9 प्रतिशत हो गई. इसी तरह 1992 में चीन का कुल व्यापार 166 अरब डॉलर का था और गरीबी दर 56.7 प्रतिशत थी. 2018 तक इसका अंतरराष्ट्रीय व्यापार 28 गुना बढ़कर 4.6 ट्रिलियन डॉलर हो गया और परिणामस्वरूप इसकी गरीबी दर घटकर 0.5 प्रतिशत रह गई.

गरीबी और व्यापार का ऐसा ही परस्पर संबंध भारत के साथ भी दिखता है. 1991 में भारत अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने और उदारीकरण की शुरुआत (मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया के नेतृत्व में) से पहले उसकी गरीबी में 1977 से 1992 तक बहुत धीमी गिरावट रही और यह 63 प्रतिशत से घटकर 47.6 प्रतिशत ही हुई. 1992 में इसका कुल व्यापार 45 अरब डॉलर और गरीबी दर 47.6 प्रतिशत थी. 2018 तक अंतराष्ट्रीय व्यापार के 20 गुना बढ़कर 940 अरब डॉलर हो जाने से, कुछ अनुमानों के अनुसार, इसकी गरीबी दर गिरकर 7 प्रतिशत तक रह गई.

ये आंकड़े कहते हैं कि एक दशक से अधिक तक समझौता वार्ता में सक्रिय रहने के बावजूद, क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) से बाहर रहना, हाल के दिनों में भारत का सबसे अनर्थकारी भू-राजनीतिक निर्णय था. अनर्थकारी क्यों? शेक्सपियर इसका जवाब देते हैं. यह वह महान बाढ़ थी जो भारत की किस्मत बदल सकती थी.

आरसीईपी के बारे में भारत सहित काफी लोगों की सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि इसका नेतृत्व चीन करता है. अगर चीन ने इसका नेतृत्व किया होता तो यह विफल हो जाता. क्यों? यह कोई रहस्य नहीं है कि जापान और दक्षिण कोरिया, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया सहित कई आरसीईपी सदस्य चीन को लेकर बहुत आशंकित रहते हैं. वे चीन के नेतृत्व वाले आरसीईपी में शामिल नहीं होते.

आरसीईपी सफल रहा क्योंकि आसियान ने इसका नेतृत्व किया. वास्तव में, आरसीईपी केवल इसलिए हुआ क्योंकि आसियान ने पहले ही सभी पांच अन्य आरसीईपी भागीदारों (और भारत भी) के साथ कई एफटीए (मुक्त व्यापार समझौते) पर हस्ताक्षर किए थे. इस महान सुरक्षात्मक आसियान छतरी के नीचे, एक चमत्कार संभव हुआ: चीन, जापान और दक्षिण कोरिया ने तीनों के बीच एक एफटीए पर हस्ताक्षर किए. अगर पूर्वी एशिया की इन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने आपस में त्रिपक्षीय एफटीए पर बातचीत करने की कोशिश की होती तो वे विफल हो जाते. विश्वास की कमी रहती. लेकिन तीनों ने आसियान पर भरोसा किया. 

उन्होंने आसियान पर भरोसा क्यों किया? उत्तर फिर से विरोधाभासी है. आसियान पर भरोसा इसलिए नहीं किया जाता है क्योंकि यह मजबूत है. आसियान पर भरोसा इसलिए किया जाता है क्योंकि वह कमजोर है. उसकी कमजोरी ही उसकी ताकत बन जाती है. चूंकि आसियान पर भरोसा किया गया है इसलिए यह आरसीईपी और ईएएस (पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलन) सहित कुछ सबसे सफल बहुपक्षीय पहलों को शुरुआत करने और उन्हें बरकरार रखने में सफल हो सकता है.

इसका अर्थ यह है कि 2021 भारत के लिए भू-राजनीतिक दृष्टि से एक कठिन वर्ष होगा. इसे कठिन चुनाव करने होंगे. चीन को उत्तरोत्तर अलग-थलग करने और उसके मुकाबले शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए वाशिंगटन के ''डीप स्टेट’’ के साथ गहरे ताल्लुकात कायम करने का मजबूत प्रलोभन होगा. क्वाड को लेकर भारत की उत्कंठा उसी दिशा में एक कदम है. स्वतंत्र और तटस्थ होने का दिखावा करते हुए, भारत प्रभावी रूप से अमेरिका का एक अर्ध-सहयोगी बन जाएगा, जिस प्रकार 1980 के दशक में चले शीत युद्ध में चीन बन गया था

 फिर भी, अमेरिका के साथ एक अर्ध-गठबंधन की भी बड़ी कीमत हो सकती है. 2020 का अमेरिका 1980 के दशक वाले अमेरिका जैसी भरोसेमंद महाशक्ति नहीं है. यह भारत के लिए अपने बाजार उदारतापूर्वक नहीं खोलेगा. यहां तक कि ट्रंप ने विकासशील देशों के विकास के लिए बनाई गई अमेरिकी व्यवस्था जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रीफ्रेंसेज से भारत को हटाकर और भारतीयों के लिए एच1बी वीजा को प्रतिबंधित करके भारत का काफी नुक्सान किया.

लगभग तय है कि बाइडन प्रशासन मॉस्को पर दबाव बढ़ाएगा. इस प्रतियोगिता में अमेरिका के साथ एक भारतीय अर्ध-गठबंधन लगभग निश्चित रूप से मॉस्को और इस्लामाबाद के बीच घनिष्ठ संबंधों को जन्म देगा. यह देखना विडंबनापूर्ण हो सकता है कि रूस और पाकिस्तान साथ मिलकर, अफगानिस्तान में अमेरिका और भारत के हितों के खिलाफ काम कर रहे होंगे.

फिर भी, इस अर्ध-गठबंधन के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि भू-राजनीति के नए महान खेल में भारत हार जाएगा. इस खेल का मुक्चय आयाम सैन्य नहीं है. यह आर्थिक है. भारत दशकों से यूएनएससी (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) का स्थायी सदस्य बनने के लिए अभियान चला रहा है. इसमें संदेह नहीं है कि भारत को तुरंत और बिना शर्त वीटो शक्ति से लैस स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया जाना चाहिए.

फिर भी, राजनैतिक अभियान कहीं अधिक प्रभावी होता है यदि उसके साथ आर्थिक ताकत जुड़ती है. अंतत: 21वीं सदी के इस नए महान खेल में, केवल एक आंकड़ा मायने रखेगा वह है देश के जीएनपी का आकार. भारत दुनिया के कुछ देशों में से एक है जो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की प्रबल आकांक्षा रख सकते हैं.

दरअसल, पिछले 2,000 वर्षों में से 1,800 वर्षों में, भारत और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं जी2 के एक्सक्लूसिव सदस्य थे. ये आसानी से इस क्लब को फिर से बना सकते हैं. बहुत हाल यानी 1980 तक, चीन और भारत की अर्थव्यवस्थाओं का आकार लगभग समान था. आज, चीन का जीएनपी पांच गुना अधिक है.

चीन की अर्थव्यवस्था बढ़ी क्योंकि इसने अर्थव्यवस्था को खोला और वैश्वीकरण के बड़े महासागर में चीन को प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति दी. प्रारंभ में, इसे ''रचनात्मक क्षति’’ का सामना करना पड़ा. भारत भी यदि आरसीईपी में शामिल होता है तो इसे अल्पकालिक ''रचनात्मक क्षति’’ महसूस होगी. हालांकि, अल्पकालिक ''रचनात्मक क्षति’’ दीर्घकालिक आर्थिक ताकत बनने के रास्ते खोलती है.

यह समझने के लिए कि अल्पकालिक ''रचनात्मक क्षति’’ दीर्घकालिक आर्थिक ताकत की ओर कैसे लेकर जाती है, भारत को आसियान के अनुभव का अध्ययन करना चाहिए. सिंगापुर को छोड़कर, कोई भी सदस्य आर्थिक ताकत नहीं माना जाता था.

दरअसल, 1980 और 1990 के दशक में इंडोनेशियाई नीति निर्धारक भी आर्थिक प्रतिस्पर्धा को लेकर उतने ही भयभीत थे जितने 2020 के दशक के भारतीय नीति नियंता. फिर भी, इंडोनेशिया ने वैश्वीकरण की महान बाढ़ में बहादुरी के साथ छलांग लगाई. आज, इंडोनेशिया और अन्य आसियान देश इस बाढ़ से अपने लिए महान भाग्य के रास्ते खोलने वाले हैं. यदि भारतीय संस्कृति और सञ्जयता के नौ सांस्कृतिक अंकुर बहादुरी दिखाते हुए छलांग लगा सकते हैं तो फिर भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता? 

किशोर महबूबानी एशिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रतिष्ठित फेलो और हैज चाइना वन? द चाइनीज चैलेंज टु अमेरिकन प्राइमेसी के लेखक हैं

 

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