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आवरण कथाः मंदी का वायरस

कोविड संक्रमण के प्रकोप से बुरी तरह पस्त देश की अर्थव्यवस्था मंदी की ओर लुढ़कती जा रही है. उसे गर्त से निकालने के लिए सरकार को फौरन उठाने होंगे कुछ बड़े ही साहसिक कदम.

 देश की अर्थव्यवस्था मंदी की ओर देश की अर्थव्यवस्था मंदी की ओर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • केंद्र खजाना खोले, राजकोषीय घाटे का लक्ष्य मौजूदा जीडीपी के तीन फीसद से बढ़ाकर चार फीसद करे
  • राज्य सरकारों की खर्च करने की क्षमता बढ़ाने के लिए कर्ज-जीडीपी लक्ष्य मौजूदा 20 फीसद से बढ़ाकर 30 फीसद किया जाए
  • गरीब परिवारों को आमदनी और कमजोर कारोबारी इकाइयों

नवी मुंबई के पनवेल में अपनी छोटी-सी कपड़े की दुकान में बैठे 48 वर्षीय महादेव कदम पथराई आंखों से अगस्त महीने की एक सुबह बरसते आसमान को देख रहे हैं कि एक दिन और ग्राहकों को ताकते बीतेगा या फिर एकाध ग्राहकों से ही संतोष करना पड़ेगा.

वे बताते हैं कि मार्च के आखिरी हफ्ते से जून के अंत तक केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन के लॉकडाउन की वजह से कोई बिक्री नहीं हुई. जून के आखिर में दुकान खुलने पर शुरू में थोड़ा-बहुत काम चला भी तो जल्दी ही खत्म हो गया.

स्थानीय अधिकारियों के निर्देश के मुताबिक, ग्राहकों को अंदर जाने से रोकने के लिए दुकान के दरवाजे पर बंधी रस्सी के उस पार एक कुर्सी में धंसे-से वे कहते हैं कि अपने तीन दशकों के कारोबारी जीवन में उन्होंने ऐसा बदतर वक्त नहीं देखा. वे कहते हैं, ‘‘नया माल भरने की बात ही कहां है? अभी नए साल पर लाया माल ही नहीं बिक पाया है.

गणेश उत्सव (जो 22 अगस्त को शुरू हुआ) में भी कोई फर्क नहीं पड़ा.’’ उन्हें हर महीने 8,000 रु. दुकान का किराया चुकाना है और एक पर्सनल लोन की किस्त का मोरेटोरियम भी अगस्त में खत्म हो रहा है. इस तरह उनके आगे अनिश्चित भविष्य ठाठें मार रहा है.

कोविड-19 महामारी, सख्त लॉकडाउन और मांग टूटने से देश भर में छोटे-बड़े करोड़ों कारोबार तबाह हो गए हैं और कदम जैसे अनेक लोगों को दिवालिया होने की कगार पर धकेल गए हैं. सबसे बुरा हाल तो सेवा क्षेत्र, खासकर खुदरा व्यापार, होटल-रेस्तरां और आवाजाही क्षेत्र का है.

अनेक एमएसएमई (लघु, छोटे और मझोले उद्यम) तो वजूद बचाने के लिए ही जूझ रहे हैं या क्षमता से काफी कम काम कर पा रहे हैं. कुछ तो अपना काम ही बदलने पर मजबूर हो गए हैं. मसलन, इंजीनियरिंग उत्पाद या रासायनिक सामान के बदले हैंड सैनिटाइजर, साबुन, निजी सुरक्षा उपकरण और भारी मांग वाले मास्क बनाने लगे हैं लेकिन पहले से कमाई काफी घट गई है.

बड़े कारोबारी भी अपनी इकाइयां काफी कम क्षमता पर चला रहे हैं और थोड़े-से स्टाफ से काम लेकर बाकी की छंटनी कर रहे हैं. ये हालात चारों ओर अब दिखने भी लगे हैं. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) का कहना है कि लॉकडाउन शुरू होने के बाद से 1.89 करोड़ वेतनभोगी लोग नौकरी गंवा चुके हैं, करीब 50 लाख नौकरियां तो जुलाई में ही खत्म हो गईं.

नतीजतन, मांग टूटी और कमजोर मांग से निवेश भी गिर गया. कारोबारी बैंक से कम कर्ज उठा रहे हैं क्योंकि निवेश रोक दिया गया है. बैंकिंग क्षेत्र सरकारी अनुमान के मुताबिक, पहले ही 7.27 लाख करोड़ रु. के डूबत कर्ज के बोझ तले दबा है, आने वाले महीनों में डूबत कर्ज (एनपीए) के और बढऩे का अंदेशा है क्योंकि महामारी के चलते कारोबारी तबाही की वजह से कर्ज की किस्तें न चुका पाने की आशंका भी बढ़ रही है.

कड़वी हकीकत
कई एजेंसियां जीडीपी वृद्घि दर का अनुमान लगा रही है और सबमें यह साझा है कि गिरावट बड़ी है. इस पर आम राय-सी लगती है कि देश की अर्थव्यवस्था मौजूदा वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में 13 फीसद से 23 फीसद तक सिकुड़ गई है. बदतर तो यह है कि जानकार पूरे वित्त वर्ष में नकारात्मक वृद्धि का अनुमान लगा रहे हैं, कुछ का अनुमान है कि 3.2 फीसद से 9.5 फीसद तक वृद्धि सिकुड़ सकती है. मसलन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस वित्त वर्ष में 4.5 फीसद तक सिकुड़ जाएगी.

कड़वी हकीकत यह है कि देश 1979-80 के बाद पहली दफा मंदी की गिरफ्त में है. तब अर्थव्यवस्था 5.8 फीसद सिकुड़ गई थी (उस वक्त कृषि पर निर्भरता भारी थी और दो साल लगातार मॉनसून खराब रहा था). अमेरिका स्थित थिंक टैंक नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च के मुताबिक, मंदी वह है जब 'अर्थव्यवस्था में चौतरफा आर्थिक गतिविधियों में काफी गिरावट कुछ महीनों से ज्यादा जारी रहे, अमूमन वास्तविक जीडीपी, वास्तविक आमदनी, रोजगार, औद्योगिक उत्पादन और थोक-खुदरा बिक्री में गिरावट दर्ज हो.’

6 अगस्त को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि देश की जीडीपी वृद्धि पहली छमाही में ''सिकुडऩे के दायरे में रह सकती है,’’ और वास्तविक जीडीपी वृद्धि वित्त वर्ष 2021 में नकारात्मक रहने का अनुमान है. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं, ''दो तिमाहियों में नकारात्मक वृद्धि का मतलब मंदी होता है, और जून तथा सितंबर की तिमाही में तो शर्तिया नकारात्मक वृद्धि रही है.’’

उनका अनुमान है कि देश में आर्थिक उत्पादन जून में खत्म हुई तिमाही में 25 फीसद गिर गया. वे कहते हैं, ''यह गिरावट भारी है लेकिन अप्रत्याशित नहीं,’’ इसी अवधि में अमेरिका में आर्थिक उत्पादन 30 फीसद और ब्रिटेन में करीब 26 फीसद गिरा. जो भी हो, भारत में वृद्धि के चारों प्रमुख इंजन—घरेलू खपत, निजी निवेश, सरकारी खर्च और निर्यात—बैठते जा रहे हैं.

कोविड की कीमत
कोविड लॉकडाउन की वजह से कारोबारों के बंद होने, नौकरियां खत्म होने और तनख्वाह में कटौती ने मांग पर बुरा असर डाला है—कम आमदनी से स्वाभाविक तौर पर खर्च कम हो गए हैं. 25 अगस्त को जारी अपनी सालाना रिपोर्ट में, रिजर्व बैंक ने कहा है कि 'लॉकडाउन के बाद मई और जून में (उपभोग के मामले में) ऊपर जा रहा ग्राफ जुलाई और अगस्त में आकर धीमा हो गया, उसकी मुक्चय वजह लॉकाडाउन का दोबारा लगाना या उसे कड़ाई से लागू करना रहा है.’

इससे पता चला कि खपत पर लगा झटका गंभीर है और इसके मायने यह हैं कि 'आर्थिक गतिविधियों में सिकुडऩ दूसरी तिमाही में भी जारी रहेगी’, यह भी गौरतलब है कि जुलाई में उपभोक्ताओं का भरोसा अब तक के लिहाज से सबसे अधिक टूटा, हाल के एक सर्वेक्षण में अधिकतर लोगों में सामान्य आर्थिक परिस्थितियों, रोजगार, महंगाई और आमदनी के प्रति गहरी हताशा है. यह उपभोग के आंकड़ों में भी दिखता है—सामान और सेवाओं की मांग में अब तक की सबसे अधिक कमी देखी जा रही है.

मसलन, रियल एस्टेट सेक्टर में अनबिकी जायदाद भरी पड़ी है. इस साल मार्च के आखिर में आठ बड़े शहरों में 4,55,351 घर अनबिके पड़े हैं, जिनकी कीमत 3.7 लाख करोड़ रु. है. इसी तरह, वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में यात्री वाहनों और शहरी क्षेत्रों में उपभोक्ता सामान की बिक्री पिछले साल की तुलना में क्रमश: पांचवां हिस्सा और एक-तिहाई ही रह गई है.

खपत कम होने से निजी निवेश भी गिर गया है—अपने उत्पादों के लिए बाजार के बगैर, कंपनियों में नई परियोजनाओं पर खर्च करने का बिल्कुल उत्साह नहीं है. सीएमआइई के मुताबिक, नई निवेश परियोजनाओं की वार्षिक वृद्धि दर 2019-20 में महज 1.85 फीसद रह गई है. ठीक पांच साल पहले, यह आंकड़ा 103 फीसद था. मंदी का नतीजा यह भी है कि कंपनियों ने अपनी तिजोरी बंद कर दी है और उधारी कम कर दी है.

भारतीय उद्योगों की फंड उगाही कैलेंडर वर्ष 2020 की पहली तिमाही में 78 फीसद कम हो गई है, क्योंकि कंपनियां अपने खर्चे का काम फंड उगाही की बजाए मौजूदा नकद प्रवाह से ही चलाना चाह रही हैं. कई निजी इन्न्विटी फंड में ‘ड्राइ पाउडर’ (उगाही जा चुकी रकम) की मात्रा बढ़ गई हैं क्योंकि उन्हें निवेश के रास्ते नहीं मिल रहे.

इसका दूसरा पहलू यह है कि बैंक, खासकर सार्वजनिक बैंक, हालिया अतीत में बड़े नुक्सान झेलने के बाद कर्ज देने को लेकर एहतियात बरत रहे हैं. क्रिसिल के अनुमान के मुताबिक, इस वित्त वर्ष में बैंक क्रेडिट वृद्धि दर कई दशकों के सबसे निचले स्तर 0.1 फीसद पर गोता लगा सकती है.

हालांकि, शेयर बाजार का रुख एकदम उलट है. अप्रैल-जून की तिमाही में बाजार में करीब 20 फीसद की बढ़त दर्ज की गई—पिछले 11 साल में यह सबसे अधिक तिमाही वृद्धि है—और इससे महामारी के दौर के शुरुआती दिनों के नुक्सान की भरपाई हो गई. 26 अगस्त को बीएसई सेंसेक्स 230 अंक की बढ़त के साथ 39,073.92 पर बंद हुआ.

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की आमद के मामले में भारत ने अन्य उभरते बाजारों को पीछे छोड़ दिया है—अगस्त, 2020 में अब तक करीब 6 अरब डॉलर की आमद हुई है. विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन के शुरुआती झटके से परेशान होने के बाद शेयर बाजार देश के दीर्घकालिक विकास की कहानी पर लौट रहा है, और इसकी क्षमता लॉकडाउन के पहले के अपने 42,000 के अंक को वापस पा लेने की है.

कई लोगों ने निजी निवेश खासकर इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में आई गिरावट की भरपाई सरकारी खर्चों के जरिए होने की उम्मीद जताई थी. उन्हें उम्मीद थी कि इससे रोजगार पैदा होंगे और सीमेंट और स्टील वगैरह की मांग बढ़ेगी. पिछले साल दिसंबर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अगले पांच साल के लिए 102 लाख करोड़ रु. की इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की घोषणा की थी. ये परियोजनाएं  बिजली, रेलवे, शहरी सिंचाई, परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों की हैं.

इस साल अप्रैल में सरकार ने अगले दो साल में 15 लाख करोड़ रु. की लागत से सड़कों के निर्माण का लक्ष्य भी तय किया. इन घोषणाओं के बावजूद बहुत थोड़ा ही जमीन पर उतर पाया. मसलन, सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि सड़क निर्माण पर खर्च 2018-19 में 1.37 लाख करोड़ रु. से घटकर 2019-20 में (नवंबर, 2019 तक)    85,275 करोड़ रु. रह गया है.

यही नहीं, सड़क निर्माण भी 2018-19 में 10,855 किमी प्रति वर्ष से घटकर 2019-20 में (दिसंबर, 2019 तक) 6,940 किमी रह गया. उम्मीद थी कि राज्य सरकारें 2025 तक नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन के मद में 111 लाख करोड़ रु. का कम से कम 40 फीसद खर्च करेंगी, पर उन्होंने भी अचानक पूंजीगत खर्चों को 2019-20 में घटा दिया.

केयर रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, ''सार्वजनिक निवेश में राज्यों का हिस्सा दो-तिहाई है, लेकिन वे अभी स्वास्थ्य को छोड़कर किसी भी क्षेत्र में अधिक खर्च करने की स्थिति में नहीं हैं.’’

यहां तक कि निर्यात में भी संकट है जो जुलाई में लगातार पांचवें महीने घटता हुआ दर्ज किया गया है. पेट्रोलियम, रत्नों और आभूषण, चमड़े और चमड़े के उत्पादों और इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे क्षेत्रों में कमी की वजह से वार्षिक आधार पर निर्यात में 10.21 फीसद की कमी आई है. उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2020 में वस्तुगत निर्यात 1.77 लाख करोड़ रु. पर रहा, जो 2019 की जुलाई में 1.81 लाख करोड़ रु. था.

यह 2.14 फीसद की नकारात्मक वृद्धि है. अप्रैल-जुलाई की अवधि के लिए, भारत का कुल निर्यात लगभग 141.82 अरब डॉलर होने का अनुमान है, जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 21.99 फीसद कम है. कोविड-19 की वजह से वायरस के फैलाव को रोकने के लिए देशों ने परिवहन पर बंदिशें आयद कर दी हैं, ऐसे में वैश्विक व्यापार पर इसका असर अपरिहार्य है.

बहरहाल, भारतीय निर्यात संगठनों के परिसंघ के महानिदेशक अजय सहाय कहते हैं कि निर्यात में सुधार आ रहा है—इसके कम आंकड़े इस वजह से दिख रहे हैं क्योंकि निर्यात के सामान अधिकतर कम कीमत वाले कच्चे माल हैं. वे कहते हैं, ''इस वित्त वर्ष की शुरुआत परिधान निर्यात में 65 फीसद की कमी के साथ हुई थी, जिसमें जून में आकर सुधार हुआ और वह 12 फीसद हो गया है.’’

फार्मा और तकनीकी वस्त्रों के लिए, बाजार बहुत अच्छा है और भारत अधिक से अधिक हिस्सेदारी पर कब्जा कर रहा है. वे कहते हैं, ''खाद्य पदार्थों के मामले में भी चीन को काफी झटका लगा है और यह भारत के हित में है.’’ परिधानों, फुटवियर, रत्नों और आभूषण और हस्तशिल्प के निर्यात के साथ समस्या पर वे बताते हैं कि कम अवधि के लिए ऑर्डर आ रहे हैं.

वे कहते हैं, ''इस समय तक सामान्य तौर पर हमें अगले साल के फरवरी-मार्च तक के ऑर्डर हासिल हो जाते थे, पर अभी हमें क्रिसमस पूर्व के समय के ऑर्डर ही मिल रहे हैं. खरीदार लंबे समय के फैसले नहीं ले रहे क्योंकि वे बाजार को लेकर अनिश्चित हैं.’’

इन सबके बीच, भारत को वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार से चीनी घुसपैठ का भी सामना करना पड़ रहा है और इससे दोनों देशों के बीच कई हफ्तों तक तनाव जारी रहा और दोनों ओर के फौजी मारे गए. इस तनाव की वजह से लोगों ने चीनी सामान का बहिष्कार करने की मांग की और नतीजतन, भारत ने 59 चीनी ऐप को प्रतिबंधित कर दिया और उस देश से निवेश के प्रवाह पर बंदिशें लगा दीं.

साथ ही, सरकार का आत्मनिर्भर अभियान कई क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं के निर्माण पर केंद्रित है, जिसका खास मकसद चीनी कंपनियों और उत्पादों को बाहर रखना है.


अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभों के डगमगाने के साथ ही इस वित्त वर्ष की शेष तिमाहियों के लिए आर्थिक परिदृश्य पर अंदेशों के बादल छाए हैं. संकट से पार पाने के लिए कंपनियों ने अपनी पेटी कस रखी है, ऐसे में नौकरियों का बाजार भी ढीला ही रहेगा.

असंगठित क्षेत्र और एमएसएमई पर इसका सबसे बुरा असर पड़ेगा. इस बीच खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में वृद्धि से महंगाई में बढ़ोतरी मध्य वर्ग के बजट को जोर का झटका दे रही है और नीति-निर्माताओं की एडिय़ों से पसीना आ रहा है.

आगे क्या
महामारी ने कारोबारों के बंद होने, नौकरियों के जाने और तनख्वाहों में कटौती के नतीजतन आर्थिक वृद्धि के चार इंजनों को यह जो नुक्सान पहुंचाया है, संभावना यही है कि इसकी वजह से उन्हीं चार मोर्चों पर अभी और भी बुरी खबरें सुनने को मिलेंगी.

मसलन, नौकरियों के जाने को ही लीजिए. कुछ कारोबार खासकर ट्रैवल, विमानन और हॉस्पिटैलिटी में काम कर रही सेवा क्षेत्र की फर्मों पर, वैश्विक और घरेलू लॉकडाउन की विशेष रूप से जबरदस्त मार पड़ी है. बाजार हिस्सेदारी के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी विमान कंपनी इंडिगो अपना 10 फीसद स्टाफ या करीब 2,300 लोगों की छंटनी कर चुकी है.

यह रुझान तब तक चलता रहेगा जब तक महामारी और लॉकडाउन बने रहते हैं. क्रिसिल की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत के हवाई यात्रियों के यातायात में इस वित्त वर्ष में जबरदस्त गिरावट आने का अंदेशा है—घरेलू यात्राओं में 40-50 फीसद और अंतरराष्ट्रीय यात्राओं में 60-65 फीसद. इसी तरह, केयर रेटिंग्ज के अनुमान के मुताबिक, हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र 2019-20 में करीब 1.25 लाख करोड़ रु. का राजस्व गंवा चुका है.

यह इशारा करता है कि अभी और नौकरियां जा सकती हैं, जिसका और भी बदतर असर आर्थिक वृद्धि पर पड़ेगा. मैन्युफैक्चरिंग एक और क्षेत्र है जो इस दुष्चक्र में फंस गया है. एमएसएमई, जिसमें करीब 12 करोड़ लोग काम करते हैं और जो भारत के निर्यात में 45 फीसद का योगदान देता है, खास तौर पर कमजोर है.

ऑटोमोटिव क्षेत्र भी इसी से मिलते-जुलते संकट की स्थिति में है. करीब 4.4 करोड़ लोगों को रोजगार और देश की जीडीपी में 9.4 फीसद का योगदान देने वाले इस क्षेत्र में इस साल जून में कुल बिक्री घटकर आधी रह गई, जिससे वेतन और अनुबंध पर काम करने वालों की नौकरियां जोखिम में पड़ गई हैं.

'फोर्ब्स मार्शल’ के को-चेयरमैन और भारतीय उद्योग परिसंघ के पूर्व अध्यक्ष नौशाद फोद्ब्रर्स कहते हैं, ''मासिक वेतन वाली नौकरियों में जो हो रहा है, वह बेहद चिंताजनक है.’’ वे कहते हैं कि तमाम उद्योगों की फर्मों को इस तूफान में टिके रहने के लिए सरकारी सहायता की जरूरत है, जो वैसी ही कर्ज की गारंटियों की शक्ल में हो सकती है जो एमएसएमई क्षेत्र को दी गई हैं.

नौकरियों की फिसलन को रोकना बहुत ही ज्यादा जरूरी है क्योंकि इससे खर्च में और भी ज्यादा गिरावट का सिलसिला शुरू होगा, जिससे फिर और नौकरियां जाएंगी और इस तरह यह दुष्चक्र चलता रहेगा.

अलबत्ता मई में सरकार ने जिन प्रोत्साहन उपायों का ऐलान किया था, उनका वांछित असर दिखाई नहीं देता. 20 लाख करोड़ रु. के पैकेज में मोटे तौर पर बैंकों में नकदी बढ़ाने पर जोर दिया गया था ताकि एमएसएमई को कर्ज की उपलब्धता और बढ़े और किसानों तथा आर्थिक पिरामिड के सबसे निचले हिस्से के लोगों को आमदनी में सहारा मिले. इस पैकेज से उम्मीद में शुरुआती उछाल आया था, लेकिन अब लगता है कि यह अर्थव्यवस्था की तकलीफों से निबटने के लिए अत्यंत नाकाफी है.

हालांकि छोटी फर्मों के कारोबार की संभावनाओं में सुधार के लिए कई उपाय किए गए थे. मसलन, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर ऐसी फर्मों को देय राशि तेजी से चुकाने के लिए जोर डाला गया था, जबकि बैंकों से कहा गया था कि वे कर्ज चुकाने पर छह महीने के लिए मोरेटोरियम लागू करें और वृद्धि को प्रोत्साहन देने के लिए एमएसएमई से जुड़े नियम-कायदों को नए सिरे से तय करें. महीनों बाद ज्यादातर छोटे कारोबार अब भी अपने वजूद के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं.

लघु उद्योग भारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आर.के. भारद्वाज कहते हैं कि असल समस्या यह है कि खपत पूरी तरह चौपट हो गई है. वे कहते हैं, ''मांग में अनिश्चितता है, जो हमें सबसे ज्यादा चोट पहुंचा रही है.’’ हालांकि दूसरी कारोबारी परेशानियों में कमी आई हैं. मसलन, कामगारों की कमी हो गई थी, क्योंकि प्रवासी कामगार लॉकडाउन की वजह से अपने गृह राज्य से अपने रोजगार के शहर तक आ-जा नहीं पा रहे थे.

लेकिन मांग में इस गिरावट का मतलब है कि कारोबार उतना नहीं कमा सकते जितना वे कमाया करते थे. कर्ज पर मोरेटोरियम, पीएसयू से बकाया रकमों का मिलना और कर्ज आसानी से मुहैया होना मांग में गिरावट सरीखी बुनियादी परेशानी की भरपाई नहीं कर सकता.

मसलन, लुधियाना के निटवियर क्लब के चेयरमैन विनोद थापर कहते हैं कि खुदरा दुकानों के लगातार बंद रहने से मांग को धक्का पहुंचा है और इसने फैक्ट्रियों को महज 30-35 फीसद क्षमता पर चलने को मजबूर कर दिया है. (लुधियाना ऊंची कीमत वाले परिधानों की मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र है.) इस बीच पीएसयू को आपूर्ति करने वाले एमएसएमई का कहना है कि इन उद्यमों ने मोटे तौर पर लंबित भुगतान जारी करना शुरू कर दिया है, लेकिन नए ऑर्डर नदारद हैं.

यहां तक कि कुछ क्षेत्रों में अच्छे बदलाव भी चेतावनी के साथ आए हैं. मसलन, निर्यातकों का कहना है कि कपड़ों, ऑटोमोबाइल कलपुर्जों, खेल के साजो-सामान और हाथ के औजारों में मांग कुछ हद तक लौटी है, लेकिन तब भी मांग कोविड से पहले के स्तर से कम ही है.

उम्मीद की अकेली किरण ग्रामीण अर्थव्यवस्था मालूम देती है. भाजपा के लोकसभा सांसद और वित्तीय मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष जयंत सिन्हा कहते हैं, ''भारत की 60-70 फीसद आबादी को सहारा और जीडीपी में 46 फीसद का योगदान देने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उछाल आ रहा है. तकरीबन 10 करोड़ किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के जरिए आमदनी में सहायता के तौर पर 40,000 करोड़ रु. मिले हैं.’’

यहां उम्मीद की कुछ वजहें हैं. जुलाई में खरीफ की बुआई में हुई मजबूत प्रगति के दम पर ट्रैक्टर की बिक्री में 38.5 फीसद की बढ़ोतरी हुई, वहीं इसी महीने में मोटर साइकिलों की बिक्री में आ रही गिरावट कुछ थमी और जून की 35.2 फीसद से घटकर जुलाई में 4.9 फीसद रह गई. गैर-टिकाऊ उपभोक्ता वस्तु बाजार में भी तेजी आई है.

हालांकि यहां बड़ी चेतावनियां भी हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि ग्रामीण मांग देश की जीडीपी में महज 15 फीसद का योगदान देती है और यह क्षेत्र इतना बड़ा नहीं है कि अपने दम पर समग्र अर्थव्यवस्था को जिला दे. साथ ही, रिजर्व बैंक के मुताबिक, ‘‘ग्रामीण मांग की और ज्यादा बहाली तनख्वाहों में मंद वृद्धि ने रोक रखी है, जो अब भी प्रवासी संकट और उससे जुड़े रोजगार के नुक्सानों की बंधक है.’’

महंगाई एक और परेशानी है. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ, उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की एक बास्केट की कीमतों का औसत भारांश) पर आधारित महंगाई जुलाई में 6.9 फीसद पर पहुंच गई, जो लगातार चौथे महीने रिजर्व बैंक के मुद्रास्फीति के लक्ष्य की ऊपरी सीमा से भी आगे निकल गई है. खपत पर इसके नतीजे होंगे.

नौकरियों के नुक्सान और तनख्वाहों में कटौतियों के चलते उपभोक्ताओं के बजट पहले ही सिकुड़ गए हैं. कीमतों में बढ़ोतरी से मांग को और ज्यादा धक्का लगेगा. इस स्थिति में अनूठी बात यह है कि मुद्रास्फीति इसलिए नहीं बढ़ रही है क्योंकि बहुत ज्यादा धन बहुत कम वस्तुओं के पीछे भाग रहा है, बल्कि मांग और आपूर्ति दोनों में भारी जुड़वां गिरावट आई है, जिसके नतीजतन वस्तुओं के दाम बढ़े हैं.

इसका एक फौरी नतीजा व्यापक चर्चा में है और वह है नीतिगत ब्याज दरों में रिजर्व बैंक की कटौती के दौर का थम जाना. केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने 6 अगस्त को कोई बदलाव किए बगैर रेपो रेट (वह दर जिस पर व्यावसायिक बैंक रिजर्व बैंक से उधार लेते हैं) को 4 फीसद और रिवर्स रेपो रेट को 3.35 फीसद पर बनाए रखा. इससे महंगाई का दबाव जरूर कुछ कम हो सकता है, लेकिन इसका यह मतलब भी है कि कर्जों का और सस्ता होना रुक जाएगा, जिससे उधारी और निवेश की बढ़ोतरी नरम पड़ जाएगी.

समाधान
समस्या का मर्म बेशक कोविड-19 है. बहाली इस बात पर निर्भर करती है कि वैक्सीन कितनी जल्दी बनाई, बाजार में लाई और सबको मुहैया करवाई जा सकती है.

कई अल्पकालिक समाधान सुझाए जा रहे हैं. दूसरे प्रोत्साहन पैकेज के लिए काफी चीख-पुकार मची है. मसलन, एमएसएमई क्षेत्र जी-जान से अपनी यह मांग मंगवाने में लगा है कि सरकार कर्मचारियों की तनख्वाह चुकाने के लिए राहत पैकेज लाए. अलबत्ता निचले पायदान के लोगों को नकद खैरात पहले ही दी जा चुकी हैं.

ऐसे में सरकार कोई और बड़ा वित्तीय कदम उठाने से पहले अर्थव्यवस्था को हुए नुक्सान का आकलन करने के लिए इंतजार करो और देखो का रवैया अपनाती मालूम दे रही है.

इंडिया टुडे ने जिन विशेषज्ञों से बात की, उनमें से कइयों का कहना है कि सरकार को अपने बटुए की डोर ढीली करनी चाहिए. उनका कहना है कि केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को जीडीपी के मौजूदा तीन फीसद से बढ़ाकर चार फीसद कर देना चाहिए. साथ ही, राज्य सरकारों के कर्ज के लक्ष्य को जीडीपी के मौजूदा 20 फीसद से बढ़ाकर 30 फीसद कर देना चाहिए.

इससे सरकार की खर्च करने की क्षमता बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था के चार इंजनों में से एक में सीधे उछाल आएगा. (देखें क्या भारत उबर सकता है?). उनका यह भी कहना है कि इन निधियों को गरीब परिवारों को आय सहायता और कमजोर कारोबारों को वित्तीय सहायता देने पर खर्च किया जाना चाहिए. एक और पहलू कामकाजी पूंजी के संकट से निबटना है. अगर बड़ी कंपनियों को कम लागत में कर्ज सुलभ हो, तो वे अपने छोटे सप्लायरों को भुगतान करने की बेहतर स्थिति में होंगी.

अन्य विशेषज्ञ मांग बढ़ाने के लिए हस्तक्षेपों की वकालत करते हैं. प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और कर कटौतियां की बदौलत उपभोक्ताओं के हाथ में ज्यादा पैसा होगा, जिससे घरेलू खपत बढ़ेगी. वे सिफारिश करते हैं कि सरकार आय हस्तांतरण, मनरेगा सरीखी योजनाओं, केंद्र की तरफ से राज्य सरकारों को बकाया राजस्व देने में तेजी और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाने के लिए ज्यादा रकम आवंटित करे.

दूसरे प्रस्तावों में मुफ्त अनाज वितरण योजना का विस्तार करना शामिल है. वे बिजली वितरण कंपनियों का निजीकरण करने, जमीन अधिग्रहण की अड़चनें हटाकर रेलवे में एफडीआइ को प्रोत्साहन देने, खरीद के नियमों में ढील देने सरीखे मध्यम और लंबे वक्त के ढांचागत हस्तक्षेपों की भी सिफारिश करते हैं.

फोर्ब्स भी इन्हीं बातों के पैरोकार हैं. वे कहते हैं कि ढांचागत सुधार वक्त की जरूरत हैं. इनमें ऊंची ब्याज दरों में कमी लाने के लिए वित्तीय क्षेत्र के सुधार भी शामिल हैं. भारतीय उत्पादक फिलहाल कर्ज पर 12-14 फीसद ब्याज अदा करते हैं, जो उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ज्यादा है, यहां तक कि ब्लू चिप कारोबार भी 7-10 फीसद का ब्याज चुका रहे हैं. पूंजी की इतनी ऊंची लागत के चलते निर्यातकों के लिए उन देशों की कंपनियों से प्रतिस्पर्धा कर पाना नामुमकिन हो जाता है जहां पूंजी की लागत इस आंकड़े से आधी से भी कम है.

दूसरे विशेषज्ञ एमएसएमई और वेतनभोगी कर्मचारियों पर लगातार ध्यान देते रहने का सुझाव देते हैं. एक प्रस्ताव 'शहरी मनरेगा’ किस्म की एक योजना लाने का है, जिसमें असंगठित क्षेत्र की छोटी फर्मों के कामगारों को सरकार की तरफ से 200 रु. रोज मिले. इसके तीन फायदे होंगे. एक, नौकरियां बची रहेंगी, नियोक्ताओं के वेतन बिल में कमी आएगी और इस योजना के लिए पंजीकरण से असंगठित क्षेत्र के प्रशासनिक डेटाबेस में सुधार आएगा, जिससे अर्थव्यवस्था ज्यादा औपचारिक बनने की तरफ बढ़ेगी.

नाम न जाहिर करने की शर्त पर एक नीति निर्माता कहते हैं, ''हमें एमएसएमई को रोजगार समर्थन और राज्यों को और ज्यादा धन देने के लिए अतिरिक्त 3-3.5 लाख करोड़ रु. खर्च करने की जरूरत है. हमें बुनियादी ढांचे पर भी आक्रामक ढंग से खर्च करने की जरूरत है.’’

सरकार का ध्यान अभी तक उनको बचाने पर रहा है जो सबसे ज्यादा खतरे में हैं—एमएसएमई और सबसे निचले पायदान के लोग. हालांकि दूसरे भी हैं जिन्हें तत्काल सहायता की जरूरत है. मसलन, जब नौकरियां गंवाने की बात आती है, तो दो विशिष्ट समूहों को मदद की जरूरत है. एक वे जो अपनी नौकरियां पहले ही गंवा चुके हैं और दूसरे वे जिनके सिर पर अपनी नौकरी गंवाने का खतरा मंडरा रहा है.

दूसरे देशों ने इन मुद्दों से निबटने के लिए अनूठे मॉडल अपनाए हैं. मसलन, कनाडा 30 फीसद राजस्व से हाथ धो बैठने वाली कंपनियों को वेतन बिल में सब्सिडी की पेशकश कर रहा है. भारत में दो वजहों से यह बहुत जोखिम भरा होगा. एक, विश्वसनीय डेटा का न होना और दूसरा, धोखाधड़ी की हमेशा मौजूद आशंका.

मध्यम से लंबे वक्त के समाधानों में जिस एक क्षेत्र में ध्यान देने की जरूरत है, वह है विदेशी निवेश. अभी तक वैश्विक निवेशक कुछ हद तक कानूनों की जटिलताओं की वजह से भारत में निवेश करने से कतराते रहे हैं. हालांकि देश ने स्मार्टफोन सरीखे इलेक्ट्रॉनिक्स में निवेश आकर्षित करने में प्रगति की है, लेकिन ये क्षेत्र इतने छोटे हैं कि जीडीपी की सुई को वाकई ज्यादा आगे नहीं बढ़ा सकते. ज्यादा बड़े उद्योगों के लिए भी ऐसे ही प्रोत्साहन की जरूरत है.

कइयों का कहना है कि रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय को मांग को मजबूत करने के लिए रकम झोंकने के तरीकों की पड़ताल करनी चाहिए. इनमें हाथ में ज्यादा नकदी रखने के लिए मुद्रा की ज्यादा छपाई सरीखे उपाय भी शामिल हैं. कुछ अर्थशास्त्रियों की दलील है कि सुस्त या मंदी की आशंका से ग्रस्त अर्थव्यवस्था के लिए मांग की मजबूती की खातिर अधिक मुद्रा का प्रवाह कोई बुरी बात नहीं है.

दूसरों का कहना है कि ऊंची मुद्रास्फीति केवल उस मुद्रास्फीति से कमाने वालों को फायदा पहुंचाती है. सबनवीस कहते हैं, ''जब खाद्य कीमतें ऊंची हैं, तो विक्रेता को फायदा मिलेगा. यह मैन्युफैक्चरिंग के लिए प्रोत्साहन हो सकता है.’’ रिजर्व बैंक अपनी सालाना रिपोर्ट में और ज्यादा वित्तीय विकल्पों की साफ जरूरत को सामने रखती है और कहती है कि बैंक फाइनेंस के विकल्पों को बढ़ावा देना होगा, जिनमें कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार भी शामिल है.

वह ऐसी विशेषीकृत एनबीएफसी की जरूरत को भी सामने रखता है, जो बुनियादी ढांचा वित्तीय कंपनियों के तौर पर वर्गीकृत हों ताकि बुनियादी ढांचे की विशिष्ट वित पोषण की समस्याओं से निबट सकें.

अंतिम समाधान चाहे जो हो, सरकार को अपनी रणनीति को बहुत अच्छी तरह नापना-तौलना होगा. कुछ का कहना है कि मौजूदा मंदी व्यावसायिक चक्र की वजह से नहीं है, इसलिए सुधारों को तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक अर्थव्यवस्था पूरी तरह खुल नहीं जाती और असली नुक्सान का पता नहीं चल जाता.

एक वैश्विक बैंक से जुड़े एक अर्थशास्त्री आगाह करते हैं, ‘‘अगर हम व्यावसायिक चक्र की मंदी के लिए ज्यादा माकूल नीतियों को अभी अमल में लाते हैं तो हो सकता है बाद में हमें पता चले कि हम गलत राह पर दौड़ रहे थे.’’

बहरहाल, भारतीय अर्थव्यवस्था अपने अब तक के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है. यह पहले ही सुस्ती की हालत में थी जब कोविड-19 ने इसे बिल्कुल कगार पर ही धकेल दिया. इसलिए इसका इलाज और भी मजबूत करना होगा. सरकार को गहराई से समझने की जरूरत है कि आबादी के तमाम तबके किस तकलीफ से गुजर रहे हैं.

फिर अगर उसे कोविड के बाद के नए भारत का निर्माण करना है तो निश्चित डेटा तैयार करना होगा, लक्ष्यबद्ध नीतिगत हस्तक्षेप करने होंगे और प्रक्रियाओं को सरल बनाना होगा. कोविड-19 ने भारतीय अर्थव्यवस्था को फिर से तैयार भले ही करने दिया हो, लेकिन इस संकट को अवसर में बदलने के लिए नीति निर्माताओं को रफ्तार बनाए रखनी होगी और फुर्ती तथा मुस्तैदी से इसका जवाब देना होगा. तभी आगे की राह खुलेगी.


केंद्र खजाना खोले, राजकोषीय घाटे का लक्ष्य मौजूदा जीडीपी के तीन फीसद से बढ़ाकर चार फीसद करे
राज्य सरकारों की खर्च करने की क्षमता बढ़ाने के लिए कर्ज-जीडीपी लक्ष्य मौजूदा 20 फीसद से बढ़ाकर 30 फीसद किया जाए
 गरीब परिवारों को आमदनी और कमजोर कारोबारी इकाइयों को वित्तीय मदद मुहैया कराई जाए
कार्यशील पूंजी के संकट को दूर करें. अगर बड़ी कंपनियों को कम दर में कर्ज उपलब्ध होगा तो वे छोटे आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान करने में सक्षम होंगे
मांग बढ़ाने में मदद करें. प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और कर छूट से उपभोक्ताओं के पास पैसा आएगा, जिससे घरेलू मांग में इजाफा होगा
आमदनी बढ़ाने के उपाय किए जाएं—मनरेगा जैसी योजनाओं में इजाफा करें और केंद्र से राज्यों की देय राशि मुहैया कराने में तेजी लाएं
सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार लाएं, इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को दीर्घकालिक कर्ज मुहैया कराने के लिए विशेष एनबीएफसी बनाएं, ताकि इन कंपनियों की समस्याएं दूर की जा सकें
मध्यम और दीर्घ अवधि के उपायों पर गौर करें. मसलन, बिजली वितरण कंपनियों का निजीकरण करें और भूमि अधिग्रहण तथा खरीद प्रक्रिया को आसान बनाकर रेलवे में एफडीआइ का स्वागत करें
ऊंची ब्याज दरों को घटाने के लिए वित्तीय क्षेत्र में सुधार करें, भारतीय उत्पादकों को फिलहाल कर्ज पर 12-13 फीसद ब्याज देना पड़ता है, जो सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ज्यादा है
एमएसएमई और वेतनभोगी कर्मचारियों पर फोकस करें, 'शहरी मनरेगा’ जैसी योजना लाएं, जिसके तहत असंगठित क्षेत्र के छोटी इकाइयों के मजदूरों को सरकार से हर रोज 200 रु. मिले
जिनकी नौकरियां चली गईं और जिनकी नौकरियां जाने का खतरा है, उन्हें मदद करें. मसलन, कनाडा में 30 फीसद से अधिक आमदनी घटने वाली कंपनियों को सरकार वेतन के मद में सब्सिडी दे रही है
पेचीदा कानूनों को सरल बनाकर बड़े औद्येगिक क्षेत्र में एफडीआइ आकर्षित करें
बैंकों के अलावा कॉर्पोरेट बॉन्ड सहित अन्य वित्तीय विकल्प पैदा करें

''निवेश बढ़ाना होगा (आर्थिक बहाली के लिए).ऐसा नहीं हुआ तो तय मानिए कि हम 4.2 फीसद वृद्धि दर से गिरकर इस वर्ष शून्य से भी नीचे -7 या -8 फीसद की दर पर पहुंच जाएंगे’’ 
कौशिक बसु, पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री, विश्व बैंक
 

''आत्मनिर्भर भारत का फोकस एमएसएमई पर है, (जिनमें) सबसे अधिक रोजगार पैदा करने की क्षमता है. उन्हें कर्ज मुहैया कराने से (कोविड का आर्थिक) असर कम हुआ है’’
अरविंद सुब्रह्मण्यम, मुख्य आर्थिक सलाहकार, आर्थिक मामले विभाग, वित्त मंत्रालय
 

''भारत को संरक्षणवाद के तौर-तरीकों से ऊपर उठने की दरकार है. उसे दक्षिण पूर्व एशिया, यूरोपीय संघ और अमेरिका से व्यापार समझौते करने चाहिए’’
नौशाद फोर्ब्स, को-चेयरमैन, फोर्ब्स मार्शल
 

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