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आवरण कथाः कोविड के संग जिंदगी

रोग की चपेट में आ चुके लोगों के तजुर्बे यही हैं कि ज्यादातर पर इसका हल्का असर ही हुआ, जिन्हें सघन चिकित्सा की जरूरत पड़ती है, उन्हें इससे दिलासा मिल सकती है कि ठीक होने की दर अपेक्षाकृत अधिक और मृत्यु दर कम है.

इलाज के दौरान दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में एक मरीज के साथ डॉक्टर इलाज के दौरान दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में एक मरीज के साथ डॉक्टर

दिल्ली के नवाबगंज इलाके के 106 वर्षीय मुख्तार अहमद कोविड-19 से ग्रस्त होने के बाद भले-चंगे होकर लौटे तो पूरे मोहल्ले में उम्मीद की लहर दौड़ गई. वे तमाम लोग, जो अभी ज्यादा अरसा नहीं हुआ कि चारों तरफ फैले वायरस के डर से रुपए के हरेक नोट को धूप दिखा रहे थे और अखबार को भी सेनिटाइज कर रहे थे, अब किराने का सामान खरीदने बिना मास्क पहने यहां-वहां घूमते देखे जा सकते थे. अगर अहमद इस पकी उम्र में भी कोरोना से बच सकते हैं, तो बेशक वे तो बच ही निकलेंगे.

लेकिन ठीक यही वह यकीन या ‘आशावादी नजरिया’ है, जिसके खिलाफ डॉक्टर और विश्लेषक आगाह करते हैं, खासकर जब यह बीमारी अब भी दुनिया को दहला रही है. भारत 6 जून को दुनिया का पांचवां सबसे अधिक कोरोना-ग्रस्त देश बन गया. उस दिन संक्रमित मरीजों की तादाद 2,45,670 पर पहुंच गई, जो स्पेन से अधिक है. इस वक्त जब भारत लंबे लॉकडाउन से बाहर निकल रहा है, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव चेतावनी देते हैं, ‘‘हमें अब भी आशंकित रहना चाहिए. हम रातोरात कोविड-मुक्त दुनिया में नहीं जा सकते.’’ (देखें बातचीत: ''अब जिंदगियां बचाना सबसे जरूरी’’).

हालांकि देश में अभी संक्रमण के सामुदायिक प्रसार की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, मगर यह साफ है कि हम वायरस को खत्म करने की बात छोड़ दें, संक्रमण पर काबू पाने से भी दूर हैं. 10 जून को कोविड मरीजों की तादाद 2,76,583 थी और देश में टेस्ट किए गए हर 100 में लगभग पांचवां व्यक्ति इस वायरस की रिपोर्ट में पॉजिटिव निकल रहा है. यह दर अमेरिका की 9.4 फीसद की दर से कम लेकिन दक्षिण अफ्रीका की 2.3 फीसद से दोगुनी से भी ज्यादा है.

अलबत्ता, 10 जून को देश में मरीजों के ठीक होने की दर 48.8 फीसद थी और संक्रमण मृत्यु अनुपात (सीएफआर) 2.8 फीसद वैश्विक अनुपात 5.7 फीसद, अमेरिका की 5.6 फीसद या ब्राजील के 5.2 फीसद से बेहतर थी. यहां तक कि किसी संक्रमण से ग्रस्त व्यक्ति से एकदम नए इलाके में संक्रमण फैलने की दर (आरओ) 6 मई को 2.0 से घटकर 6 जून को 1.2 पर आ गई. यह देश में 70 दिनों के लॉकडाउन का नतीजा हो सकता है. लेकिन कम संक्रमण अनुपात की वजह यह भी हो सकती है कि देश में बिना लक्षण वाले कोविड मरीजों की बड़ी संख्या है.

दिल्ली के 30,000 मामलों में से 75 फीसद में कोई लक्षण दिखाई नहीं दिए, जबकि महाराष्ट्र में 83 फीसद मामले बिना लक्षण वाले थे. यह भी माना जा रहा है कि बिना लक्षण वाले मरीजों से संक्रमण फैलने का कम खतरा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की महामारी-विज्ञानी मारिया वान कर्खोव ने 9 जून को जेनेवा में एक प्रेस वार्ता में कहा कि बिना लक्षण वाले कोविड मरीजों से संक्रमण फैलने के मामले ‘बहुत कम’ हैं. हालांकि अगले दिन उन्होंने सफाई दी कि इसका यह मतलब नहीं कि बिना लक्षण वाले संक्रमित लोगों से संक्रमण लगने को पूरी तरह नकारा जा सकता है और एक मॉडल अध्ययन का आकलन है कि ऐसे लोगों से संक्रमण के फैलने की आशंका छह से 44 फीसद के बीच है. पत्रिका नेचर मेडिसिन के 15 अप्रैल के अंक में प्रकाशित एक चीनी अध्ययन में इसके 44 फीसद होने का अनुमान है.

बिना लक्षण वाले संक्रमित लोगों में बड़ी संख्या नौजवानों की है जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है. दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल के आइसीयू वार्ड की डॉक्टर ऋचा नारंग याद करती हैं, ‘‘अप्रैल में जब ऐसे मरीज हमें मिले, तो वे यह मानने को राजी नहीं थे कि वे बीमार हैं, क्योंकि उन्हें खांसी तक नहीं थी.’’

हालांकि संक्रमण से ग्रस्त लोगों की संक्चया सबसे अधिक इसी आयु वर्ग में है. संक्रमण के शिकार हो रहे कई परिवारों के उदाहरणों से पता चलता है कि इस बीमारी का संक्रमण पहले युवा सदस्यों को लगा जो अपना ज्यादातर वक्त बाहर बिताते थे. मुंबई के जसलोक अस्पताल में संक्रामक रोगों के प्रमुख डॉ. ओम श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘काम पर या दुकान-बाजार में जाने वाले मोटे तौर पर युवा थे, लिहाजा, हम उनमें ज्यादा बड़ी तादाद संक्रमण से ग्रस्त पाते हैं.’’

यह भी ज्यादा से ज्यादा साफ होता जा रहा है कि 60 साल की उम्र से ऊपर के और दूसरी बीमारियों से ग्रस्त लोगों में बीमारी गंभीर रूप ले लेती है और उनके दम तोड़ देने का जोखिम सबसे ज्यादा होता है. मसलन, दिल्ली में 60 साल से ऊपर के लोगों की मृत्यु दर 4.8 फीसद है जबकि 50 साल से नीचे के लोगों के मामले में यह महज 0.3 फीसद है (देखें ग्राफिक: महामारी की धीमी रफ्तार). महामारी की सबसे अधिक चपेट वाले महाराष्ट्र में 85 फीसद मामले 60 साल से नीचे के आयु वर्ग में हैं लेकिन 47 फीसद मौतें 60 साल से ऊपर के वर्ग में हुई हैं. 106 वर्षीय अहमद का इलाज करने वाले दिल्ली के राजीव गांधी एसएस अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. बी.एल. शेरवाल कहते हैं, ‘‘तीन महीने पहले थोड़े ही बुजुर्ग मरीज थे; अब बढ़ रहे हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से ऐसे मामले ज्यादा गंभीर हैं और नेगेटिव टेस्ट आने में कहीं ज्यादा वक्त लगता है.’’

डॉक्टर अब पक्के तौर पर कहते हैं कि साथ में दूसरी बीमारियां ही मौत का बड़ा कारण है. दिल्ली और महाराष्ट्र में कोविड से हुई क्रमश: 86.8 फीसद और 69 फीसद मौतें दूसरी बीमारियों की वजह से थीं. दिल्ली में कोविड से मरने वाले 50 साल से नीचे के 80 फीसद और 60 साल से ऊपर के 93 फीसद लोग दूसरी बीमारियों से भी ग्रस्त थे. महाराष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि मरने वालों में 32 फीसद को डायबिटीज और उच्च रक्तचाप दोनों थे. मैक्स हेल्थकेयर साकेत के डायबिटीज विभाग के प्रमुख डॉ. अंबरीश मीत्तल कहते हैं, ‘‘हमें पता चल रहा है कि जिन्होंने अपनी डायबिटीज को नहीं संभाला, वे इस संक्रमण से नहीं लड़ पा रहे हैं. अनियंत्रित रक्त शर्करा रोग प्रतिरोधक क्षमता को सीमित कर देती है और ऐसा केवल कोरोना वायरस के मामलों में ही नहीं है.’’

जयपुर के एसएमएस अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. सुधीर भंडारी कहते हैं, ‘‘हमारे यहां बिना लक्षण वाले मरीज अब भी बड़ी संख्या में आ रहे हैं, जो कम चिंता की बात है. लेकिन जिनकी सांस फूलती है या खांसी है, उन्हें ज्यादा निगरानी की जरूरत होती है क्योंकि उनकी स्थिति अचानक बिगड़ सकती है. ऐसा कब और क्यों होता है, इसका पता चलना अभी बाकी है.’’

हालांकि महज 4-5 फीसद संक्रमित लोगों को ही आखिरकार सघन चिकित्सा की जरूरत पड़ती है. दिल्ली में सिर्फ 3 फीसद को सघन चिकित्सा की जरूरत पड़ी, जिनमें 2.3 फीसद को ऑक्सीजन देना पड़ा और 0.3 फीसद को वेंटिलेटर के सहारे की जरूरत पड़ी. दूसरी तरफ, महाराष्ट्र में 4 फीसद संक्रमित मरीजों को सघन चिकित्सा की जरूरत पड़ी.

इसी को ध्यान में रखकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ऐसे मरीजों को घर में ही क्वारंटीन करने की सलाह दी है, जिन्हें डॉक्टरों ने उनकी उम्र और लक्षणों के आधार पर कम जोखिम वाला माना हो. इससे अस्पतालों का करीब 70 फीसद बोझ कम हो सकता है. दिल्ली सरीखे शहर में, जहां मरीजों की तादाद 8 जून को 30,000 के पार चली गई, इसका अर्थ है कि करीब 21,000 मरीज पैरासिटामोल, अधिक द्रव पदार्थों के सेवन और ऑक्सीजन के साथ पूरी तरह आराम करके संक्रमण से निजात पा सकते हैं. इससे स्वास्थ्य व्यवस्था ऐसे मरीजों पर ध्यान केंद्रित कर सकती है जो कुछ ज्यादा गंभीर हैं.

यह खासकर इसलिए भी अहम है क्योंकि देश में स्वास्थ्य का सीमित बुनियादी ढांचा मरीजों की बढ़ती तादाद के बोझ के नीचे चरमराने लगा है. राजधानी के सभी सातों प्राइवेट अस्पतालों में 27 मई को महज आठ कोविड बिस्तर उपलब्ध थे. दिल्ली में रहने वाली 37 वर्षीय अपूर्वा सिंह याद करती हैं, ‘‘हम अस्पताल में दाखिले के लिए गिड़गिड़ा रहे थे, डॉक्टरों से गुजारिश कर रहे थे. मेरे अंकल (63 वर्षीय) ने सांस घुटने के कारण हमारे सामने ही दम तोड़ दिया.

जब उनकी सेहत गिरने लगी तब शहर के एक भी अस्पताल ने दाखिला नहीं दिया. उन्हें बचाने के लिए 48 घंटे थे, लेकिन कहीं जगह ही नहीं थी.’’ कई दूसरे भी इसी मुश्किल से गुजरे. यहां तक कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब खुद को क्वारंटीन कर लिया, तो दिल्ली के अस्पतालों में सिर्फ दिल्लीवालों के इलाज का उनके आदेश को उप-राज्यपाल अनिल बैजल ने पलट दिया.

ऑल इंडिया ड्रग ऐक्शन नेटवर्क की सह-संयोजक मालिनी ऐसोला कहती हैं, ‘‘चिंता अब बीमारी से अधिक इलाज की हो गई है. देश में 2,00,000 से ज्यादा मामले हो चुके हैं, तो लोग इस दुश्चिंता में हैं कि मुझे संक्रमण लग जाए तो क्या करेंगे? क्या मुझ अस्पताल में बिस्तर मिलेगा? क्या इलाज का खर्चा उठा पाएंगे?’’ अहमदाबाद मेडिकल एसोसिएशन की प्रेसिडेंट डॉ. मोना देसाई भी लोगों की इन्हीं चिंताओं से रू-ब-रू हुई हैं, ‘‘पहले तो जांच में ही झंझट है. जांच के ढेरों नतीजे ही आने बाकी हैं और फिर उनकी जांच ही नहीं की जा रही है जिनमें लक्षण नहीं दिख रहे हैं या जिनके स्पष्ट संक्रमण संपर्क का पता नहीं है. कोई कैसे साबित करे कि वह पॉजिटिव मरीज से नहीं मिला है? लोग केवल कोविड से ही डरे नहीं हैं, वे जांच के नतीजों को लेकर भी चिंतित हैं, यह भी कि उन्हें अस्पताल में बिस्तर मिलेगा या नहीं, उन्हें प्लाज्मा मिलेगा या नहीं वगैरह.’’

इस बीच, डॉक्टर ज्यों-ज्यों बीमारी के बढ़ने-घटने के तौर-तरीकों को पहचान पा रहे हैं, वैसे-वैसे इलाज की मानक शक्ल उभरने लगी है. अप्रैल में ऐंटीवायरल और ऐंटी-एचआइवी दवाइयों पर जोर दिया जा रहा था, अब खून को पतला करने वाली दवाइयां दी जा रही हैं और ऑक्सीजन के स्तर तथा अहम अंगों की निगरानी की जा रही है. डॉ. शेरवाल कहते हैं, ''सबसे आम इलाज अब भी ऐंटीबायोटिक्स, पैरासिटामोल और बुखार की दवाई है. लेकिन निगरानी और सख्त हो गई है.

अब हम इंटरल्यूकेन या डी-डायमर के उच्च स्तरों सरीखे मार्कर की निगरानी करते हैं, जिनसे जलन-सूजन या साइटोकाइन स्टॉर्म का संकेत मिलता है. बीमारी का रुख अब भी हर मामले में अलग-अलग है. अच्छी बात यह हुई है कि डॉक्टर और नर्सें कोविड वार्ड में काम करते हुए अब ज्यादा सहज हैं. पहले डर था; अब उन्होंने नए हालात के हिसाब से खुद को ढाल लिया है.’’

कोविड के लिए ज्यादातर दवाइयां अभी परीक्षण के दौर में ही हैं इसलिए देश में इसका इलाज अब भी लक्षणों के आधार पर हो रहा है. ऐंटीवायरल दवाई रेक्वडेसिविर में कुछ संभावना दिखाई दी और 2 जून को ‘गंभीर’ मामलों में इस्तेमाल के लिए पांच दिन के कोर्स को मंजूरी दे दी गई. भारत और विदेश में जिस कंपनी—गिलिएड—के पास इस दवाई का पेटेंट है, उसने 1 जून को अपने फेज 3 सिंपल ट्रायल के नतीजों का ऐलान किया.

इससे पता चला कि कोविड-19 के अस्पताल में भर्ती और रेम्डेसिविर दवाई पर चल रहे 65 फीसद मरीजों में 11वें दिन तक सुधार की कहीं ज्यादा संभावना थी, उन मरीजों के मुकाबले जिन्हें यह दवाई नहीं दी जा रही थी. हालांकि किडनी और लीवर की गड़बड़ियों वाले मरीजों के लिए इस दवाई के कुछ निश्चित जोखिम भी हैं; और ज्यादा परीक्षणों के नतीजे सामने आने के बाद (नौ महीनों में आने की उम्मीद) इन्हें और अच्छी तरह समझा जा सकेगा.

कुछ अस्पतालों, मसलन ईएसआइ गुडग़ांव और केरल के कोट्टयम मेडिकल कॉलेज, ने बताया है कि मरीज अक्सर गैर-ऐलोपैथी दवाइयों की भी मांग करते हैं. कोट्टयम मेडिकल कॉलेज के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. रेंजिन आर.पी. कहते हैं, ‘‘आम तौर पर हल्दी-दूध का अनुरोध किया जाता है, खासकर बुजुर्ग मरीजों की तरफ से.’’ आयुष मंत्रालय ने अभी तक चार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों को परीक्षणों के लिए सूचीबद्ध किया है, जबकि ऐलोपैथी के मोर्चे पर बड़े और प्रमुख परीक्षण फैविपीराविर (बुखार की जापानी दवा), आइतोलिजुमाब (क्यूबा में इसकी वजह से कम मौतें हुई बताई गई हैं) के लिए और बिल्कुल हाल ही में बांग्लादेश की ‘करामाती दवा’ आइवरमेक्टिन और डॉक्सीसाइक्लीन के लिए किए जा रहे हैं.

इस बीच हम उन लोगों से सीख सकते हैं जो कोविड से बचकर निकल आए हैं. उनके बारे में आगे के पन्नों में विस्तार से बताया गया है. पटना पैथ लैब के मालिक संजय कुमार भुनिया सरीखे कुछ लोगों ने इससे जुड़े लांछन से निपटना मुश्किल पाया. गाजियाबाद के भाटी दंपति का कहना है कि बेहतर तैयारी रखो. नरेश भाटी कहते हैं, ''हमें यकीन ही नहीं हुआ कि हम भी संक्रमित हो सकते हैं. हमने सावधानियां बरतीं, लेकिन घर को इसके लिए तैयार नहीं किया. लिहाजा जब हम रवाना हुए, हमें अपने बच्चों को अकेला छोड़कर जाना पड़ा. इससे तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया, जिससे बचा जा सकता था.’’

मुंबई के डॉ. सुमेध केसरिया तुरत-फुरत डायग्नोसिस करवाने की हिमायती हैं. वे सलाह देते हैं, ''कोविड के लक्षण आम सर्दी के लक्षणों से मिलते-जुलते हैं. अगर आप पॉजिटिव मरीज के संपर्क में आए हैं या आपके लक्षण तीन दिनों के भीतर नहीं जाते तो आराम करें.’’ हरियाणा के बैंकर अशोक ठक्कर कहते हैं कि अपने मनोबल को ऊंचा रखें. वे सुझाव देते हैं, ‘‘यह वायरस आपके दिमाग से उतना ही खेलता है, जितना शरीर से. बीमारी है, तेजी से डॉक्टर के पास जाएं और उसकी सलाह पर चलें.’’ अगली बार जब किसी ऐसे गेट के सामने से गुजरें, जिस पर लाल निशान चिपका हो और कहता हो ‘क्वारंटीन परिसर’, तो सतर्क हो जाएं लेकिन डरे नहीं.

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