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आवरण कथाः क्या उबर पाएगा हिंदुस्तान?

इंडिया टुडे के अर्थशास्त्रियों का बोर्ड (बीआइटीई) इस बात का अंदाजा लगा रहा है कि यह कितने दिनों तक चलने वाला है और इस बीमार अर्थव्यवस्था को चंगा करने के लिए उनकी क्या सलाह है  

मैत्रीश घटक, प्रोफेसर, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स मैत्रीश घटक, प्रोफेसर, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स

अर्थव्यवस्था: विशेषज्ञों की राय

पहले से ही संकटों में घिरी भारत की अर्थव्यवस्था को कोविड ने जोरदार झटका दिया है और देश के सामने एक बड़ी मंदी मुंह बाए खड़ी है. इंडिया टुडे के अर्थशास्त्रियों का बोर्ड (बीआइटीई) इस बात का अंदाजा लगा रहा है कि यह कितने दिनों तक चलने वाला है और इस बीमार अर्थव्यवस्था को चंगा करने के लिए उनकी क्या सलाह है  

मैत्रीश घटक,

प्रोफेसर, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स

डी.के. श्रीवास्तव,
चीफ पॉलिसी एडवाइजर अर्न्स्ट ऐंड यंग

प्रणब सेन

कंट्री डायरेक्टर, इंडिया टीम, इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर

डी.के. जोशी
मुख्य अर्थशास्त्री, क्रिसिल

सौम्य कांति घोष
चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया

प्र. क्या भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी से गुजर रही है? आपके अनुमान के मुताबिक, यह कब तक खत्म हो सकता है?

मैत्रीश घटक
हां, हर संकेतक यही कहता है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के मुताबिक, 2020-21 के दौरान देश की अर्थव्यवस्था 4.5 फीसद सिकुड़ जाएगी, जबकि नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) का पूर्वानुमान है कि कोई बहुत बड़ा प्रोत्साहन न मिले तो यह सिकुडऩ 12.5 फीसद तक हो सकता है.

2020-21 की पहली तिमाही में विकास दर के आकलन का केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) का आंकड़ा जल्द ही आने वाला है और ऐसा लग रहा है कि यह भी नकारात्मक ही होगा. हर तरफ से, 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी के आकार में कमी का अंदाजा महत्वपूर्ण रूप से सामने आया है. इसकी पुष्टि दूसरे आर्थिक संकेतकों से भी होती है, जिनमें विश्व बैंक के अध्ययन के मुताबिक, बिजली की खपत के सैटेलाइट चित्र भी शामिल हैं.

ऐसे में दूसरी तिमाही में विकास दर के सकारात्मक होने का अंदाजा लगाना भी मुश्किल ही है और दो लगातार तिमाहियों में सिकुडऩ को मंदी माना जाता है. यह कहना कठिन है कि यह कब खत्म होगा. जब तक महामारी को वैश्विक स्तर पर और भारत में नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा, तब तक अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौट आने की उम्मीद कम है.  

डी.के. श्रीवास्तव
भारत की वृद्धि के 2020-21 की पहली और दूसरी तिमाही में कम होने के अंदेशे हैं. विश्व बैंक और आइसीआरए के मुताबिक, पूरे साल भर में, कई बहुपक्षीय संस्थाएं और रेटिंग एजेंसियां 3.2 फीसद से 9.5 फीसद तक के संकुचन की भविष्यवाणी कर रही हैं. असल में, वित्तीय वर्ष के सभी चारों तिमाहियों में यह सिकुडऩ देखने को मिल सकती है. बहरहाल, मुझे उम्मीद है कि भारतीय अर्थव्यवस्था कम से कम 2020-21 की चौथी तिमाही से सराकात्मक विकास दर की राह पर चल पड़ेगी.

प्रणब सेन
भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से मंदी के दौर से गुजर रही है. वित्त वर्ष 21 की पहली तिमाही में यकीनन 20 फीसद के आसपास सिकुडऩ दिखेगी और दूसरी तिमाही में भी, 5 से 10 फीसद की कमी दर्ज की जाएगी. यह मंदी कम से कम एक और तिमाही तक जारी रहेगी क्योंकि मुझे अंदेशा है कि तीसरी तिमाही में भी विकास दर नकारात्मक ही रहेगी. चौथी तिमाही में, हम बेस इफेक्ट की वजह से हल्की-फुल्की सकारात्मक विकास दर देख पाएंगे लेकिन महामारी लंबे समय तक चलती रही तो यह भी बदल जाएगा.

डी.के. जोशी
भारत जैसे विकासशील देशों में मंदी दुर्लभ ही होती है. आजादी के बाद से, हमने पांच मंदी ही देखी हैं जब पूरे वित्त वर्ष में जीडीपी कम हो गई हो. अगर हम किसी वित्तीय वर्ष में जीडीपी में विकास दर कम होने के संदर्भ में मंदी को देखें तो हमारे सामने यह मंदी स्पष्ट रूप से दिख रही है. क्रिसिल को अंदेशा है कि पिछले वित्त वर्ष की तुलना में इस साल जीडीपी में 5 फीसद की कमी दर्ज होगी.

पूर्वानुमान का यह काम इस तथ्य से और कठिन हो गया है कि लॉकडाउन के बाद डेटा संग्रह के लिए प्रतिक्रिया दर अनिश्चित हैं और आर्थिक आंकड़े अविश्वसनीय हो गए हैं. पर हम उपलब्ध बिंदुओं को मिला सकते हैं. वैसे अप्रैल में बेहद कड़े लॉकडाउन के बाद से अर्थव्यवस्था काफी खुली है, फिर भी गूगल मोबिलिटी इंडिकेटर ने जून-जुलाई में आवागमन में कोविड-पूर्व के दिनों के मुकाबले भारी कमी दर्ज की है.

जब हमने यह समझा कि आर्थिक गतिविधियां रास्ते पर आ रही हैं, टियर 2 और टियर 3 शहरों में कंटेनमेंट उपायों के फिर से लागू किए जाने और कुछ सेवाओं पर जारी बंदिशों (हवाई सेवाओं, खेलों, मनोरंजन और सत्कार) और उपभोक्ताओं के जोखिम न उठाने की प्रवृत्ति ने बंटाधार कर दिया.

मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं के लिए परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआइ) अभी भी 50 के नीचे है और यह मंदी की ओर इशारा कर रहा है. हवा की गुणवत्ता और यातायात के आंकड़े सामान्य से कम आर्थिक गतिविधियों की ओर इशारा करते हैं. पेट्रोलियम उत्पादों की खपत, जीएसटी की उगाही और वाहनों का पंजीकरण भी इसी तरह के ट्रेंड को दर्शा रहे हैं.

इसलिए, हालांकि अर्थव्यवस्था में अप्रैल की भारी गिरावट के मुकाबले सुधार दिखा, फिर भी, यह अब भी आम दिनों के कारोबार से बेहद नीचे है. फिर भी, हमारे लिए नकारात्मक जोखिम तब तक ऊंचा बना रहेगा जब तक कि कोविड-19 वैक्सीन नहीं खोजी जाएगी और बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन नहीं होता.

अभी जो कुछ हम कह सकते हैं: इस तिमाही (जुलाई-सितंबर) के बाद के हिस्सों में अगर यह महामारी अपने चरम पर पहुंच कर ढलान की ओर बढ़ती है तो चौथी तिमाही से जीडीपी वृद्धि थोड़ी सकारात्मक स्थिति की ओर बढ़ेगी.

सौम्य कांति घोष
हां, अर्थव्यवस्था में मंदी आ गई है और यह दौर कुछ वक्त के लिए बना रह सकता है. हम चौथी तिमाही में बस इसके पटरी पर आने की उम्मीद भर कर सकते हैं. पर इसका सटीक समय बता पाना कठिन है. महामारियों का लंबा इतिहास है, जिनका काल कुछ वर्षों से लेकर कई लहरों के साथ 100 साल तक का रहा है.

वैसे अर्थव्यवस्था में अप्रैल की भारी गिरावट के मुकाबले सुधार दिखा, फिर भी यह आम दिनों के कारोबार से बेहद नीचे है. हालात ऐसे ही रहेंगे जब तक वैक्सीन नहीं आती’’
—डी.के. जोशी

 

प्र.क्या भारत में महसूस की जा रही मंदी दुनियाभर में चल रही गिरावट से अलग है?
मैत्रीश घटक 
भारत में एक बड़ा अनौपचारिक क्षेत्र है, और इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है कि इस पर कितनी बुरी मार पड़ी है. सामान्य तौर पर, सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और आर्थिक मंदी के लिहाज से ब्राजील, मेक्सिको, और दक्षिण अफ्रीका जैसी ही स्थिति है—कुछ देशों में प्रभाव भारत की तुलना में बदतर है—लेकिन बिगड़ते स्वास्थ्य परिदृश्य को देखते हुए भारत के लिए सकारात्मक संकेत नहीं हैं. इसके अलावा, इस संकट के दस्तक देने से पहले ही भारत आर्थिक मंदी की राह पर था जो स्थितियों में सुधार की संभावना को और खराब करता है. 

डी.के. श्रीवास्तव
महामारी के आक्रमण से पहले ही भारत में आर्थिक मंदी दिखाई दे रही थी. भारत के विकास की संरचनात्मक के साथ-साथ चक्रीय समस्याएं भी हैं. ऐसा बचत और निवेश दरों में लगातार गिरावट, हाल के वर्षों में वास्तविक और नॉमिनल जीडीपी विकास दर में गिरावट और केंद्रीय कर राजस्व की वृद्धि में तेज गिरावट के कारण हुआ. यह सब कोविड के पहले से देखा जा रहा था.

महामारी के प्रभाव ने नीति-निर्माताओं को राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम के मानदंडों से भी ज्यादा उधार आधारित प्रोत्साहन बढ़ाने को विवश किया. 2020-21 के अंत तक सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में संयुक्त ऋण, एफआरबीएम की 60 फीसद सीमा के करीब 20 फीसद अंक तक अधिक हो सकता है. ऐसी संभावना है कि जब कोविड पर नियंत्रण पा लिया जाएगा, उसके बाद भी भारत की नीतिगत चुनौतियां बनी रहने वाली हैं.

प्रणब सेन 
कोविड-19 प्रेरित मंदी की प्रकृति पूरी दुनिया में एक जैसी है क्योंकि कारण एक ही है—राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन जिसमें जरूरी वस्तुओं और सेवाओं को छोड़कर सभी उत्पादन बंद हैं. भारत की स्थिति थोड़ी अलग है कि क्योंकि यह एक बहुत बड़ा देश और संघीय राज्य है. इन दो विशेषताओं के नतीजतन, महामारी ने अलग-अलग समय में देश के विभिन्न हिस्सों को प्रभावित किया, जिसने राज्य सरकारों को स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन लगाने के लिए प्रेरित किया है.

इसके दो प्रभाव हैं: पहला, भारत में लॉकडाउन प्रभाव की अवधि लंबी है; और दूसरा, आपूर्ति शृंखला में सुधार की गति अभी भी अपेक्षाकृत धीमी देखी जा रही है. लेकिन केवल भारत में ही ऐसी स्थिति नहीं है. अमेरिका में भी स्थितियां ऐसी ही हैं और वहां भी ऐसे ही परिणाम दिख रहे हैं.

डी.के. जोशी 
कई अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक अर्थव्यवस्था की तुलना में इस बार भारत की अर्थव्यवस्था पर ज्यादा बड़ी चोट पडऩे की आशंका है. यहां तक कि वित्त वर्ष 2009 में वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान भी भारत की जीडीपी में सालाना 3.1 फीसद की वृद्धि हुई थी, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में संकुचन देखा गया था.

भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था की तुलना में करीब 300 आधार अंक तेजी से बढ़ा था. अब हम इस वित्त वर्ष में 5 फीसद के संकुचन की उम्मीद कर रहे हैं, जो कि 2020 तक एसऐंडपी ग्लोबल के अनुमानित 3.9 फीसद के वैश्विक संकुचन से भी नीचे है.

हालांकि, एसऐंडपी ग्लोबल को उम्मीद है कि मध्यम अवधि में एशिया-प्रशांत अर्थव्यवस्थाओं (चीन और भारत को छोड़कर) में जीडीपी को औसतन 3 प्रतिशत का स्थायी नुक्सान होगा, भारत के लिए हम 10 प्रतिशत का नुक्सान मान रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि भारत ने कमजोर विकेट पर वर्तमान संकट का सामना किया था और उसके पास कम बफर थे. महामारी ने चुनौतियां बढ़ाईं और व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर बदहाली और भय बढ़ा है.

साथ ही, भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जहां से जीडीपी का लगभग आधा हिस्सा आता है, अपनी शहरी अर्थव्यवस्था की तुलना में बेहतर है.

सौम्य कांति घोष
संकेतक बाकी दुनिया के समान ही हैं. पर हमें यह याद रखना चाहिए कि कोविड से पहले जब विश्व अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही थी, हम एक मंदी के दौर में थे. अंतर केवल इतना है कि हमारे पास एक युवा आबादी है, इसलिए हमारे पास तेजी से तंदुरुस्त होने की अधिक संभावना है.

कोविड से पहले ही यहां मंदी दिख रही थी. भारत के विकास की संरचनात्मक के साथ-साथ चक्रीय समस्याएं भी हैं’’
—डी.के. श्रीवास्तव

प्र. आपके विचार में, क्या 20 लाख करोड़ रुपए के पैकेज ने संकट को कम किया?

मैत्रीश घटक
अब तक यह साफ हो गया है कि 20 लाख करोड़ रु. की बताई गई रकम या 2019-20 में जीडीपी का 10 फीसद का आंकड़ा आर्थिक पैकेज को बढ़ा-चढ़ाकर बताने का मामला है. केंद्र सरकार ने जो तत्काल, (ऐसे उपायों को छोड़कर जो ऋण की गारंटी के माध्यम से भविष्य की देनदारियां बढ़ाएंगे), अतिरिक्त (संकट के आने से पहले जिनका बजट में उल्लेख नहीं था), वित्तीय (इनमें मौद्रिक नीतिगत उपाय शामिल नहीं) संसाधन पेश किए वह बताए गए प्रोत्साहन रकम से बहुत कम हैं और जीडीपी के करीब 1-2 फीसद के आसपास हैं.

अब, थोड़ा पैकेज भी बिना पैकेज से बेहतर है, और इस पैकेज के बिना संकट का असर बदतरीन हो सकता था. पर हम सामने रखे गए संसाधनों की मात्रा के संदर्भ में और  ज्यादा कर सकते थे, साथ ही नीतियों के मद में विविधता लाई जा सकती थी, जिसमें से एक मांग पक्ष पर अधिक ध्यान देना, मसलन क्या आमदनी, नौकरी या आजीविका में कमी की भरपाई के लिए प्रत्यक्ष आय समर्थन से मदद मिली? जवाब है हां.

डी.के. श्रीवास्तव
इस पैकेज में मौद्रिक और राजकोषीय दोनों उपायों का समावेश था. इसका अब तक का असर, सीमित रहा है क्योंकि लगातार लॉकडाउन की वजह से अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर विभिन्न किस्म की रुकावटें लगी हुई हैं. राजकोषीय प्रोत्साहन से बजटीय राशियों पर अतिरिक्त व्यय, जो जीडीपी के प्रतिशत के रूप में मापा गया है, सीमित रहा है. दूसरे कई देशों की तुलना में, भारत का आर्थिक प्रोत्साहन कम रहा है.

प्रणब सेन
20 लाख करोड़ रु. का पैकेज बचे रहने और आर्थिक पुनरोत्थान के लिए उपयुक्त है, लेकिन इसमें बड़ी गंभीर कमजोरियां है क्योंकि वित्तीय क्षेत्र में जोखिम उठाने और तनाव का स्तर काफी ऊंचा है, और यहीं से अधिकतर फंड के आने की उम्मीद थी. यही नहीं, यह पूरी तरह से अपर्याप्त और, वास्तव में, रिकवरी फेज के लिए अपर्याप्त भी था, जहां असली जरूरत समुचित वित्तीय प्रोत्साहन मांग पैदा करने की होनी चाहिए थी.

 डी.के. जोशी
प्रोत्साहन की कोई राशि महामारी के संकट से बचाने के लिए काफी नहीं है. यह सिर्फ पीड़ा कम कर सकता है. 20 लाख करोड़ रु. के आर्थिक पैकेज (मौद्रिक और राजकोषीय उपायों का मिश्रण) ने थोड़ी-बहुत मदद तो की. केंद्रीय बैंक के उपायों ने वित्तीय स्थिति को सहज बनाने में मदद की और वित्तीय मदद कमजोर वर्गों को सीधे दी गई. जैसा कि पहले बताया गया है, और अधिक किए जाने की जरूरत है, जिसकी सीमा सरकार की इच्छा और अपनी वित्तीय क्षमता में अधिकतम बिंदु तक जाने से तय होगी.

सौम्य कांति घोष
20 लाख करोड़ रु. में से, 40 फीसद तरलता आरबीआइ के जरिए डाली गई. बाकी, ऐसी गारंटी और कृषि क्षेत्र में सुधार थे जिन्होंने बैंकों को इसकी छूट दी कि वह एमएसएमई सेक्टर की कमजोर पड़ रही इकाइयों को कर्ज दे सकें. यह ठीक रहा पर हमें यह निश्चित करने की जरूरत है कि आपूर्ति की अव्यवस्था पूरी तरह मांग की समस्या में नहीं बदले. इस संदर्भ में यह जरूरी है कि एक प्रत्यक्ष राजकोषीय समर्थन को एकीकृत किया जाए.

यह 20 लाख करोड़ रुपए का पैकेज बचे रहने और आर्थिक पुनरोत्थान के लिए उपयुक्त है, पर यह पूरी तरह अपर्याप्त हैं.
—प्रणब सेन

प्र. हर तरफ ऌगंभीर आर्थिक पूर्वानुमानों के मद्देनजर, क्या आपको लगता है कि सरकार को अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के तरीकों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है? आपका क्या नुस्खा है?

मैत्रीश घटक
हां, भारत की प्रतिक्रिया मोटे तौर पर आपूर्ति पक्ष को लेकर रही (मसलन, कर्ज गारंटी). लेकिन इस तरह के संकट में, जिसने हर तरफ आमदनी, रोजगार और मांग पर बहुत बुरा असर डाला है, आपूर्ति पक्ष को संचालित करने के लिए नीतियां पर्याप्त नहीं हैं. मेरा मानना है कि मांग पैदा करने वाले उपाय, मसलन प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण और करों में कटौती अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए जरूरी हैं. वहीं, इस संदर्भ में दूसरे उभरते विकासशील देशों की तुलना में भारत के कदम सीमित रहे हैं. मेरे ख्याल से तीन त्वरित कदम उठाए जाने चाहिए थे:

1. प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण और मनरेगा को अधिक संसाधन आवंटित करना;
2. राज्यों के बकाया राजस्व के हस्तांतरण में तेजी; और
3. सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करने के साथ बुनियादी ढांचे पर खर्च करना

डी.के. श्रीवास्तव
सरकार को इसे अपनी राजकोषीय और मौद्रिक नीति ढांचे को फिर से बनाने के अवसर में बदल लेना चाहिए ताकि उन्हें और अधिक विकासोन्मुख बनाया जा सके. असल में, हाल के वर्षों में मौजूदा मौद्रिक नीति ढांचे के तहत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) मुद्रास्फीति के अत्यधिक नियंत्रण और कर राजस्व वृद्धि में कमी के कारण वास्तविक और नॉमिनल जीडीपी विकास दर में कमी आई है, जिससे उपलब्ध राजकोषीय भंडार सिकुड़ गया. अगले कुछ वर्षों के लिए विशेष नीतिगत नुस्खा कुछ ऐसा है:

1. केंद्र का राजकोषीय घाटे को लक्ष्य जीडीपी के मौजूदा 3 फीसद की जगह बढ़ाकर 4 फीसद तक कर देना चाहिए और एफआरबीएमए को उसी के मुताबिक संशोधित किया जाना चाहिए. राज्य का कर्ज-जीडीपी लक्ष्य मौजूदा 20 फीसद से बढ़ाकर 30 फीसद तक करना चाहिए

2.  मौद्रिक अधिकारियों को औसतन सीपीआइ मुद्रास्फीति को 4 फीसद की बजाए 5 फीसद के लक्ष्य पर रखना चाहिए, जबकि इसमें टोरेलेंट रेंज +/- 2 फीसद पॉइंट होनी चाहिए. राजकोषीय और मौद्रिक नीति परिषद का गठन राजकोषीय और मौद्रिक अधिकारियों के बीच समन्वय के लिए किया जा सकता है

3.  2020-21 और 2021-22 के लिए, नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन की तय  सूची के अनुसार सरकारी पूंजीगत व्यय पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, ताकि अधिकतम रोजगार और आउटपुट गुणक सृजित किए जा सकें.

प्रणब सेन
अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने के तरीके सर्वविदित हैं और इसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ा जाना चाहिए. नई चीज सिर्फ यही है कि राजकोषीय अनुशासन की अहमियत से जुड़ा विचार कुछ समय के लिए रोक देना चाहिए. जिन तीन त्वरित कदमों की मैं सिफारिश करूंगा वे हैं:

1. प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण को बढ़ाया जाए जिनमें मुफ्त राशन बड़े पैमाने पर शामिल हो
2. इस साल और अगले साल के लिए बड़े पैमाने पर राजकोषीय प्रोत्साहन की घोषणा की जाए, और
3. सार्वजनिक निवेश को तेज करने पर विश्वसनीय तरीके से आगे बढ़ा जाए, राजकोषीय घाटे का वित्तपोषण चिंता का विषय नहीं होना चाहिए

 डी.के. जोशी
सरकार को अर्थव्यवस्था को समर्थन देने और उसे पुनर्जीवित करने मं़ महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी.
अच्छी खबर यह है कि कृषि से, जो कार्यबल के 40 फीसद हिस्से को सीधे या परोक्ष रूप से सहारा देते हैं, इस साल बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है. एक तरह से, खाद्य सुरक्षा से जुड़े संसाधनों के मसले इससे हल किए जा सकेंगे.

लेकिन गैर-कृषि अर्थव्यवस्था को लगे गहरे झटके को देखते हुए, जीडीपी के 1.2 फीसद प्रत्यक्ष राजकोषीय समर्थन—जो केंद्र के विभिन्न घोषित पैकेजों का कुल जोड़ है—वह असरदार प्रोत्साहन के लिए लिहाज से बेहद कम है. अर्थव्यवस्था को समर्थन की मात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कोविड-19 कितना लंबा चलेगा. कुछ बातें जिसे करने की जरूरत है:

1. यह देखते हुए कि संकट के वक्र ने अभी सरल रेखा में होने और फिर कम होने का कोई संकेत नहीं दिया है, सरकार को अपनी झोली खाली करनी होगी और जरूरतमंद परिवारों को आय का समर्थन (नकद सहायता) देनी होगी, और कमजोर पड़ रहे कारोबारों को राजकोषीय सहायता उपलब्ध करानी होगी ताकि इस संकट से रिकवरी की ओर एक पुल तैयार किया जा सके. मैं सुझाव दूंगा कि अब तक जो कल्पना की गई है, उस पर जीडीपी का कम से कम 1 फीसद अतिरिक्त प्रत्यक्ष राजकोषीय व्यय किया जाए

2  छोटे उद्यमों के लिए कार्यशील पूंजी की जरूरत को पूरा करने की ओर कदम बढ़ाए जाने चाहिए क्योंकि बड़ी कंपनियों ने भुगतान में देरी की है. यह काम बड़ी कंपनियों को कम दरों पर उपलब्ध कराए कर्ज से होगा ताकि वे भुगतान कर सकें

3.  इस महामारी के बाद के समय में मांग को पटरी पर लाने के लिए अतिरिक्त खर्च की जरूरत है. उस वक्त, सरकार को इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च पर अधिक भरोसा करना चाहिए और उसकी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए (परियोजनाओं की पहचान करना और अन्य चीजों के साथ उनकी फंडिंग) ताकि अर्थव्यवस्था, विकास के वक्र पर
फिर चढऩे लगे

सौम्य कांति घोष
हां, हमें नीति निर्माण में नए सिरे से सोचना होगा. इस सिद्धांत को लेकर अब शक होने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था 'अदृश्य हाथों’ के साथ बेहतर काम करती है. नीति निर्माताओं को अब इस बात पर यकीन हो गया है कि 'लक्षित सरकारी दखल’ अधिक बेहतर काम करती हैं. मुझे लगता है कि मौजूदा परिस्थिति में आर्थिक सिद्धांतों पर पुनर्विचार की जरूरत है. हमें जरूरत है:

1. एक बड़े प्रति-चक्रीय राजकोषीय नीति की, जो केंद्र और राज्य दोनों को मदद करे
2.  एमएसएमई को समर्थन के माध्यम से जीडीपी के प्रतिशत के रूप में मजदूरी में वृद्धि, मनरेगा में फेरबदल और असंगठित श्रम के लिए नीति, और
3.  पावर, टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में सुधार के जरिए निजी निवेशकों की वापसी के लिए उचित वातावरण तैयार करना और तटीय आर्थिक क्षेत्रों के लिए नीति.

अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए मांग पैदा करने वाले उपाय, मसलन प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण और करों में कटौती जरूरी हैं. इस दिशा में भारत के कदम सीमित हैं’’
—मैत्रीश घटक
‘‘नीति-निर्माताओं को अब इस बात पर यकीन हो गया है कि लक्षित सरकारी दखल अधिक बेहतर काम करती हैं’’
—सौम्य कांति घोष
 

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