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आवरण कथाः आपसी संबंधों को नए सिरे से गढऩे की जरूरत

हालांकि भारत और चीन के संबंध ’60 के दशक के बाद से इतने खराब कभी नहीं हुए थे, फिर भी दोनों देशों के पास अपने संबंधों का नए सिरे से आकलन करने का बेहतर मौका.

चीनी नीतिः चीन का पतिकार चीनी नीतिः चीन का पतिकार

लद्दाख में 15 जून को हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिकों और अज्ञात संख्या में पीएलए (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) के फौजियों की मौत ने भारत-चीन संबंधों को एक खासे कड़वे मकाम पर ला खड़ा किया है. झड़प इस साल अप्रैल से सीमा पर चीनी व्यवहार में बदलाव का नतीजा थी. पीएलए ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थायी ठीया बनाने का प्रयास किया है, नियंत्रण रेखा पर भारी संख्या में सैन्य तैनाती की और लद्दाख में कई स्थानों पर भारतीय सैनिकों को सामान्य गश्त से रोका.

चीन की हरकतों का नतीजा यह रहा कि इसने सीमा पर उस यथास्थिति को बदल दिया है जिसका दोनों पक्ष 1993 में हुए कई द्विपक्षीय समझौतों के तहत सम्मान के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं. भारत-चीन संबंधों को नए सिरे से गढऩा अब अपरिहार्य और आवश्यक हो गया है.

आज हम कहां हैं?

15 जून की झड़पें, 2012 के बाद से भारत-चीन सीमा पर लगातार, लंबी अवधि तक और गंभीर घटनाओं के एक सिलसिले का नतीजा हैं. 2013 में पीएलए ने एलएसी पर घुसपैठ की और डेप्सांग में तंबू गाड़ दिया और ढाई हफ्ते से ज्यादा की वार्ता के बाद पीछे हटी. सितंबर 2014 में जिस दिन राष्ट्रपति शी जिनपिंग राजकीय यात्रा पर भारत आए थे, एक हजार से अधिक पीएलए सैनिकों ने चुमार क्षेत्र में घुस आए और शी की यात्रा के तीन हफ्ते बाद उसे खाली किया.

2017 में भूटान और चीन के बीच विवादित डोकलाम पठार क्षेत्र में अपनी गश्त वाले इलाके में पीएलए ने डेरा जमा लिया. भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच 72 दिनों तक चले गतिरोध के बाद दोनों पक्ष पीछे हटे. तब से हालांकि चीनी सेना ने विवादित जगह को तो खाली कर दिया है लेकिन वहां स्थायी संरचनाओं का निर्माण किया है और पूरे वर्ष डोकलाम पठार के बाकी हिस्सों में मौजूद रहती है.

हालांकि, इस साल लद्दाख में घुसपैठ बड़ी थी क्योंकि वे एलएसी पर डेप्सांग, गलवान, हॉट स्प्रिंग्स, पैंगाऌंग त्सो और स्थानीय लद्दाखियों के अनुसार कुछ और क्षेत्रों में भी घुस आए थे. पूर्वी और मध्य क्षेत्रों में भी चीनी तैनाती बढ़ी है. अप्रैल से शुरू हुई चीनी कार्रवाइयों पर नरेंद्र मोदी सरकार की प्रतिक्रिया कूटनीतिक रूप से संकोची जबकि बयानबाजी में बेहद आक्रामक रही है.

भारत सरकार ने चीन के साथ चल रही चर्चा में साफ कर दिया कि बातचीत एलएसी पर यथास्थिति, सेना को पीछे हटाने और शांति बहाली को लेकर होगी. चीन ने भी बातचीत की इच्छा जाहिर की और सेनाओं के बीच 'बफर जोन’ बनाने की बात चल रही है.

हम यहां तक कैसे पहुंचे?

2017 में डोकलाम के बाद कई संवेदनशील मुद्दों पर मोदी सरकार के सार्वजनिक रूप से चीन का साथ देने के बावजूद उसने यह सिला दिया. आधिकारिक तौर पर डोकलाम पठार में चीनी कब्जे, बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव, शिनजियांग की घटनाओं, हांगकांग, दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर, ताइवान और कोविड-19 महामारी फैलने में चीन के हाथ या महामारी पर डब्ल्यूएचओ की चर्चा में ताइवान को लाने की जरूरत जैसे मुद्दों पर भारत ने या तो चीन की मिनमिनाते हुए आलोचना की या फिर मौन रहा. भारत में तिब्बतियों की गतिविधियों पर अंकुश लगाया गया है.

सरकारी नेताओं ने पिछली सरकारों के विपरीत 2014 के बाद से सार्वजनिक रूप से दलाई लामा से मुलाकात नहीं की है. पिछले कुछेक वर्षों में भारत ने चीनी संवेदनशीलता का सम्मान करते हुए भी अमेरिका के साथ रक्षा संबंधों को आगे बढ़ाया है. उसके साथ ऐसे समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं जो पिछली सरकारों को कठिन लगते थे. भारत-अमेरिका संबंध उस बिंदु तक पहुंच गए हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत को जी-7 में देखना चाहते हैं.

चीन के साथ संबंधों को बेहतर करने और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ व्यक्तिगत स्तर पर रिश्ते बनाने में मोदी ने जितनी कूटनीतिक ऊर्जा लगाई है उतना प्रयास किसी अन्य भारतीय प्रधानमंत्री ने नहीं किया. वे 18 बार शी से मिल चुके हैं जो किसी भी अन्य विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार के प्रमुख से उनकी मुलाकातों से ज्यादा है.

मोदी ने नौ बार चीन का दौरा किया है, जिसमें से पांच बार प्रधानमंत्री के रूप में गए हैं. सीमा संघर्ष दर्शाता है कि राष्ट्रपति ट्रंप के साथ मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति तो बहुत सफल रही पर दुनिया की सबसे पुरानी और कठिन नौकरशाही के साथ नाकाम.

मोदी का शुरुआती जोर चीन के साथ आर्थिक संबंधों पर था और उसमें सफलता मिली भी. भारत में चीनी निवेश 2014 में मोदी के सत्ता में आने तक कुल 1.8 अरब डॉलर था. अब उसके 26 अरब डॉलर होने का अनुमान है, और कई भारतीय स्टार्ट-अप और यूनिकॉर्न चीनी निवेश के बूते खड़े हुए हैं.

यह फिनटेक जैसे क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी और पैसा दोनों देता है (चीन में भारतीय निवेश 2019 के अंत तक कुल 0.92 अरब डॉलर का था). बिजली, दवा, ऑटोमोबाइल और दूरसंचार जैसे संवेदनशील भारतीय क्षेत्रों में चीन की अहम पैठ है.

पिछले तीन साल में भारत-चीन संबंध दिक्कततलब रहे हैं. यह बात साफ हो गई है कि 1988 में राजीव गांधी की चीन यात्रा के दौरान आपसी सामंजस्य का हुआ समझौता अब नहीं चल सकता. समझौता शांति बनाए रखते हुए सीमा विवाद जैसे मतभेद वार्ता के जरिए सुलझाने और उन्हें व्यापार, यात्रा वगैरह से न जोडऩे की बात करता है.

2012 के बाद से उस आपसी समझ में तनाव के संकेत तेजी से स्पष्ट हो गए हैं क्योंकि 1988 में भारत के बराबर रही चीन की जीडीपी आज उसके लगभग पांच गुना हो गई है. चीन एक आर्थिक महाशक्ति और एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सैन्य शक्ति बन गया.

आर्थिक विषमता और राजनैतिक असंगति के बावजूद 40 साल तक सीमा पर शांति बनी रही, तो शायद इसलिए कि सीमा पर प्रयोग करने योग्य शक्ति का प्रभावी सैन्य संतुलन उतना तिरछा नहीं था जितने कि जीडीपी के आंकड़े और यह सैन्य बजट से दिखता था. भारतीय सरकारों ने 2004 से सीमा सड़कों और बुनियादी ढांचे का निर्माण करके उस संतुलन को बनाए रखने की जरूरत महसूस की.

2010 के बाद से दो माउंटेंन डिविजन बने, सीमा के पास विमानों के लिए उन्नत लैंडिंग ग्राउंड बने, 2013 के बाद से एक माउंटेन स्ट्राइक कोर का गठन और इसी तरह के कई अन्य प्रयास हुए. चीन ने आज यथास्थिति बदलने की कोशिश की है, उससे यही लगता है कि वह शायद सोचता है, सीमा पर शक्ति संतुलन अब उसके पक्ष में झुका है या फिर अन्य कारक, जैसे कि राजनैतिक शर्मिंदगी का भारत सरकार का डर.

हम किस ओर बढ़ रहे हैं?

यह स्पष्ट है कि भारत-चीन संबंध बेहद पेचीदा हैं और उनमें अब बड़ा बदलाव होने वाला है. झड़पों के फौरन बाद भारत में चीनी उत्पादों के बहिष्कार के आह्वान के रूप में लोकप्रिय प्रतिक्रिया दिखी है. यह आह्वान सत्तारूढ़ भाजपा के समर्थकों, इसके कुछ संगठनों और ट्रेड यूनियनों से समर्थित है. इसे हासिल करना आसान नहीं होगा: चीन भारत में सामान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, और सेवाओं की बात करें तो अमेरिका के बाद इसका दूसरा स्थान है.

चूंकि भारत और चीन अपने संबंधों में अधिक खुले तौर पर प्रतिकूल दौर में प्रवेश कर चुके हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि भारत सरकार दूरसंचार, रेलवे, बिजली जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में चीनी कंपनियों और उत्पादों के संपर्क को सीमित करने और 5जी नेटवर्क के लिए समझौतों में प्रवेश के समय शर्तों को बदलकर चीनी कंपनियों को रोकने का कार्य कर सकती है.

चीनी उत्पादों पर भारत की निर्भरता और डब्ल्यूटीओ तथा अन्य समझौतों के तहत उसके दायित्व को देखते हुए व्यापार पर प्रतिबंध थोपना ज्यादा कठिन होगा और यह एक तरह से युद्ध छेडऩे जैसा होगा.

चीन के साथ व्यापार के बहिष्कार का आह्वान यहां के बाजार में उसकी बड़ी उपस्थिति से उपजा है. आठ वर्षों की बातचीत के बाद भारत ने चीन, आसियान, जापान, कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते से खुद को अलग रखने का विकल्प चुना है, जो संभवत: विश्व का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र है और जिसमें विश्व अर्थव्यवस्था का 40 प्रतिशत हिस्सा शामिल है.

कोविड-19 महामारी के मद्देनजर विश्व अर्थव्यवस्था के धराशायी होने से भारतीय प्रधानमंत्री भी चीन में राष्ट्रपति शी की तरह आत्मनिर्भरता का आह्वान करने को विवश हुए हैं. दोनों मामलों में यह स्पष्ट नहीं है कि आत्मनिर्भरता के बारे में उनका विचार कितना आत्मकेंद्रित है और दो अर्थव्यवस्थाएं किस हद तक व्यापारिक और संरक्षणवादी व्यवहार को बढ़ाएंगी जो वैश्वीकरण के दशकों की सबसे बड़े लाभार्थी रही हैं.

व्यापार बहिष्कार या भारत और चीन के बीच आर्थिक विषमता को दूर करने के कदमों से सीमा पर यथास्थिति बहाल नहीं होगी, न चीन से निबटने में भारतीय क्षमता में तुरंत वृद्धि होगी. और हमें फोकस करना होगा सीमा पर प्रभावी संतुलन बहाल या मजबूत करने पर. इस मामले में भारत के पास जैसे को तैसा वाली रणनीति अपनाने से लेकर और भी कई विकल्प हैं.

फौरी संकट समाप्त होने के बाद खुफिया नेटवर्क, सैन्य जवाब, कूटनीतिक प्रयास और सरकार की प्रतिक्रिया के संदर्भ में इस पूरे प्रकरण की समीक्षा के दौरान हमें बहुत से सबक मिलेंगे. मानक संचालन प्रक्रियाओं और सीमा पर जवाब देने जैसे कई मुद्दों को लेकर सीमा प्रबंधन में भारत के रुख में निश्चित रूप से बदलाव होंगे.

भारत को ऐसी तैयारियां करनी होंगी जिससे सीमा पर तनाव बढ़ाने को लेकर चीन डरे. दूसरे शब्दों में, इन घटनाओं से हमें सैन्य सुधार सहित आत्म-सशक्तीकरण के उपायों की एक शृंखला शुरू करनी चाहिए.

इसके साथ ही, सीमा से इतर इलाकों में चीन की लागत बढ़ाने पर भी काम हो. सड़क और बिजली क्षेत्रों में चीन के अनुबंधों और चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने के साथ इसकी शुरुआत हो गई है. भारत-चीन के बीच विवाद व्यापक होने के साथ अब यह हिंद महासागर में भी बढ़ रहा है.

यह जरूरी है कि भारत उपमहाद्वीप में अपना खेल बढ़ाए और नेपाल, श्रीलंका और अन्य देशों के साथ संबंधों में प्रगाढ़ता लाए. हमारा दीर्घावधि का लक्ष्य इनके साथ घनिष्ठता बढ़ाना, उपमहाद्वीप को आर्थिक रूप से एकीकृत करने पर काम करना और पड़ोसियों को यह विश्वास दिलाना है कि उनके राष्ट्र निर्माण कार्य में भारत उनका स्थायी और सुरक्षित स्रोत है. इसके लिए पड़ोसियों के साथ संबंधों के प्रभाव को भारत के भीतर चुनावों और स्थानीय राजनीति पर प्रभावों से परे जाकर सोचना होगा.

बाहर संतुलन बनाने के लिहाज से भारत का अमेरिका के साथ राजनैतिक, रक्षा और खुफिया संबंधों को मजबूत करना शामिल होगा. हालांकि भारत-चीन के बीच मध्यस्थता की अमेरिकी राष्ट्रपति की पेशकश से लगता है कि अमेरिका सीधे इस टकराव में शामिल होने की बजाए तटस्थ रहना चाहेगा. भारत-अमेरिका के बदले हुए संबंध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिकूल चीनी हरकतों के प्रभाव को कम करने में सहयोग के लिए एक मंच मुहैया करते हैं, और हम बेहतर समन्वय की उम्मीद कर सकते हैं.

पिछले डेढ़ दशक में भारत ने अमेरिका के एशियाई सहयोगियों और चीन के दूसरे पड़ोसियों के साथ मिलकर काम करना शुरू कर दिया है जो चीनी आक्रामकता से त्रस्त हैं. भारत की तरह उनमें से हरेक के चीन के साथ कुछ हित जुड़े हैं जो उन्हें प्रतिकारी कदम उठाने से रोकते हैं. लेकिन हम अमेरिका और दूसरे साझेदारों से यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे क्वाड (ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ) को मजबूत करने और दक्षिण-पूर्व एशियाई भागीदारों के साथ चीन को चारों ओर से घेरने और क्षेत्र में चीनी प्रभाव कम करने के लिए मिलकर काम करें.

भारत-चीन के बीच मौजूदा हालात भारत-रूस संबंधों को भी जिंदा कर सकते हैं जो भारत के नजरिए से लंबे समय से रणनीतिक रहा है. लेकिन हाल के दिनों में इसमें ठहराव आ गया है. भारत के प्रमुख हथियार रूसी हैं. भारतीय और रूसी हित अफगानिस्तान और मध्य एशिया में मेल खाते हैं और दोनों का उस क्षेत्र में एक साथ काम करने का इतिहास है.

रूस और ईरान दो शक्तियां हैं, जो भारत की रणनीतिक दुविधा का कुछ जवाब दे सकती हैं क्योंकि चीन यूरेशियाई महाद्वीप में खुद को मजबूत कर रहा है. इसलिए ईरान और रूस पर मौजूदा अमेरिकी नीतियों को पूर्ण समर्थन देकर भारत नासमझी दिखा रहा है.

कुल मिलाकर, मौजूदा एशियाई मंच पर भारत के चीन को बाहर से संतुलित कर पाने की सीमाएं हैं. अमेरिका और उसके सहयोगी मुख्य रूप से समुद्री क्षेत्र या मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत में रुचि रखते हैं. भारत एक महाद्वीपीय शक्ति भी है और चीन के साथ हमारे मुद्दे जमीन को लेकर हैं.

अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए भारत के पास खुद पर भरोसा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. चीन के लिए लडऩा और बातचीत करना कोई विरोधाभासी नहीं है, लेकिन इसका मतलब है कि भारत के लिए रास्ता खुला है कि वह भी दोनों काम एक साथ जारी रख सकता है और भारत को यह सबक सीखना चाहिए.

तीन काल्पनिक परिदृश्य जो इस असहज रिश्ते के बीच सुखद भविष्य दिखाते हैं: एक नए समझौते की सफलता जो 1986 के सुमदोरोंग चू संकट के बाद पैदा हुई स्थितियों से हुआ था; सशस्त्र संघर्ष के जाल में आ उतरना; या अंतत: जिसकी सबसे ज्यादा संभावना है, न युद्ध न शांति का परिदृश्य. इसमें दोनों पक्ष सीमा पर और आर्थिक मोर्चे पर एक बहुत खराब संबंधों में बने रहें.

विरोधाभास यह है कि हालांकि भारत और चीन साठ के दशक के बाद से अब तक के सबसे खराब दौर में हैं और युद्ध के करीब हैं, फिर भी उनके पास अपने संबंधों को नए सिरे से गढऩे और पुनर्निर्माण करने का अवसर भी है. चुनाव उनका है.

(शिवशंकर मेनन पूर्व विदेश सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं.)

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