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भारत-चीन संबंधः ड्रैगन के निशाने पर

संकटों में इजाफा और एकाधिक मोर्चों पर शत्रुतापूर्ण संबंधों के साथ आगे बढ़ने की चीन की बढ़ती फितरत के चलते नया वर्ष दक्षिण एशिया के लिए उथलपुथल भरा होने वाला है जिसके केंद्र में भारत होगा.

चीन  राष्ट्रपति शी जिनपिंग चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग

चीन और भारत

एंड्र्यू स्मॉल

चीन के विश्लेषक लगातार इसके आदी होते जा रहे हैं कि बीजिंग का रवैया किसी खास स्थिति में क्या हो सकता है, इस पर नए सिरे से सोचा जाए, क्योंकि यह उसके अतीत के रवैए से तय नहीं होगा. दक्षिण एशिया और दूसरी जगहों पर भी लंबे समय से चली आ रही विदेश नीति के मानकों और समझौतों को उलट देना चीनी नजरिए के मामले में अब आम हो गया है.  

सिद्धांत रूप में, 2022 पिछले दो वर्षों की तुलना में अधिक स्थिर वर्ष होना चाहिए. आगामी पार्टी कांग्रेस के मद्देनजर आम तौर पर कोई भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी महासचिव बाहरी वातावरण में शांति बनाए रखना चाहेगा. लेकिन इसे गारंटी मान कर नहीं चला जा सकता. निश्चित रूप से यह तय करने की कोशिश होगी कि शरद ऋतु में शी जिनपिंग जब अपनी सत्ता को मजबूत करने अगले चरण में प्रवेश कर रहे होंगे, तब उनको किसी अप्रिय आश्चर्य का सामना न करना पड़े.

लेकिन कोविड -19 महामारी के शुरुआती चरणों के दौरान चीनी रवैए से स्पष्ट हो चुका है कि बचाव और असुरक्षा की अवधि और अधिक आक्रामकता और अत्याचार-उत्पीड़न के नए-नए तरीकों को जन्म देती है, न कि सुलह-सफाई की प्रवृत्तियों को.

चीन में संकटों को बड़ा करने की भूख पहले से ज्यादा है और जाहिर है कि वह खुद को कई मोर्चों पर विरोधी संबंधों के साथ जीने में सक्षम मानता है. यह तथ्य भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि पिछली पार्टी कांग्रेस के आयोजन के पहले डोकलाम टकराव का बीज बो दिया गया था. संभव है कि हम हिमालयी सीमाओं के प्रति चीन का पहले से ज्यादा व्यामोह और उस साल की गई उन गलतियों को न दोहराने का दृढ़ संकल्प देखें जिनके कारण उसे लगा था कि उसे बचाव की मुद्रा अपनानी पड़ी. 

हालांकि चीन की सत्तारूढ़ पार्टी का पंचवर्षीय सम्मेलन का असर 2022 के बड़े हिस्से पर पड़ेगा, लेकिन ऐसी बड़ी वजहें भी हैं, जो इस क्षेत्र में चीन के रवैये को प्रभावित कर सकती हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है वाशिंगटन के साथ बीजिंग के संबंधों का स्वरूप. चीन के साथ संवाद करने वाले लगभग हर देश ने यह अनुभव किया है कि वह अपने द्विपक्षीय संबंधों को उस बड़े टकराव से अलग करके देखने को तैयार नहीं है, जो वह अमेरिका के साथ बढ़ता देखता है.

चीन का मुख्य सिरदर्द केवल वाशिंगटन ही नहीं है, बल्कि क्वाड, एयूकेयूएस, जी 7 और अन्य समूहों के साथ संतुलनकारी करार भी हैं जो बाइडेन प्रशासन के अधीन अमेरिकी नीति का केंद्र बने हैं और  जिन्हें शी 'छुटभैए गुट’ की संज्ञा देते हैं. ये करार टिकते हैं और गहराते हैं, तो वे शक्ति का एक दीर्घकालिक वैश्विक संतुलन तैयार करेंगे जो हिंद-प्रशांत सुरक्षा से लेकर तकनीकी होड़ तक, कई क्षेत्रों में चीन के विरुद्ध काम करेंगे.

भारत इन अतिव्यापी गठबंधनों में से कई के केंद्र में है और उम्मीद की जानी चाहिए कि चीन उसे द्विपक्षीय संबंधों के बजाय ज्यादातर मौकों पर भू-राजनीतिक विचारों के चश्मे से देखगा और उसी तरह व्यवहार करेगा. चीनी कूटनीति के इस अधिक चपल चरण में विभिन्न देशों को वाशिंगटन से अलग होने और दूरी बनाए रखने पर लाभन्वित करने के प्रयास हो सकते हैं. चीन के अधिक परिष्कृत विदेश नीति जानकारों की चिंता का मुद्दा है कि आजकल बीजिंग लगभग हर मामले में लट्ठबाजी कर रहा है.

इससे क्षेत्र में ब्लॉक राजनीति की ओर दीर्घकालिक रुझान तेज होता है. अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, गहराते अमेरिका-भारत संबंध, कमजोर पड़ते अमेरिका-पाकिस्तान संबंध, चीन-पाकिस्तान का पहले से ज्यादा निकटता के साथ जुड़ाव, और बिगड़ते चीन-भारत संबंध दक्षिण एशिया की अतीत में पतली राजनीतिक रेखाओं को मोटा करती हैं. यह चीन के मित्रों के लिए भी असहज करने वाला प्रसंग है.

पाकिस्तान दशकों से वाशिंगटन और बीजिंग के साथ अपने संबंधों का निर्वाह करता रहा है जो आम तौर पर बिना किसी बाधा के एक साथ चल रहे थे. अब विभिन्न क्षेत्रों में 'पक्ष चुनने’ के लिए दबाव बढ़ रहा है, और पाकिस्तान की प्राथमिकता अभी भी चीन पर बहुत बुरी तरह से निर्भर होने से बचने की है, फिर भी किसी तरह की पैंतरेबाजी की जगह कम होती जा रही है.

संरचनात्मक कारक दोनों पक्षों को एक साथ और अधिक निकटता से आगे बढ़ा रहे हैं, यह स्थिति चीन-पाकिस्तान संबंधों में किसी सुनहरे दौर से बहुत दूर है. दोनों देशों के संबंधों को व्यापक आधार प्रदान करते हुए महत्वाकांक्षी स्तर पर ले जाने वाली चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना ठप हो गई है.

कई वर्षों से, पाकिस्तान में घरेलू, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति ने न केवल दोनों पक्षों को महत्वपूर्ण नई परियोजना के लिए राजी होने के विरुद्ध बाधाओं की शृंखला खड़ी की है, बल्कि ग्वादर बंदरगाह जैसी मौजूदा प्रतिबद्धताओं के क्रियान्वयन में भी अड़चन पैदा की है.

हाल में सुरक्षा की स्थिति भी खराब हुई है. पिछले साल खैबर पख्तूनख्वा के दसू में बम विस्फोट किसी सीमा तक पाकिस्तान में चीनी कर्मियों पर सबसे बड़ा हमला था. इसके अलावा करीब से चूक जाने वाली घटनाओं की संख्या भी काफी परेशान करने वाली थी. बीजिंग इन घटनाक्रमों को अफगानिस्तान की स्थिति से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ मानता है.

अमेरिका की वापसी के बाद चीन का डर इस बात को लेकर कम था कि अफगानिस्तान में क्या हो सकता है, जहां उसके हित न्यूनतम हैं, लेकिन उसे व्यापक क्षेत्र, खास तौर पर पाकिस्तान में उसके प्रभाव की चिंता ज्यादा थी. सीपीईसी के लिए पहले से ही खराब स्थिति में चीन की सावधानी का स्तर बढ़ने से उम्मीद की जा सकती है कि इस पहल में कमजोरी नए वर्ष में बनी रहेगी, क्योंकि कोई भी बड़ी परिवर्तनकारी उम्मीद नजर नहीं आती.

यही सतर्कता सीमाओं पर बीजिंग की नीति की खासियत होगी. इसके बावजूद चीन तालिबान सरकार के साथ अच्छे कामकाजी संबंध रखने वाले कुछ देशों में से एक है, बीजिंग को इस मामले में तालिबान की ताकत पर भरोसा नहीं है कि वह उसकी आर्थिक परियोजनाओं को जोखिम में डाल सकता है. इसलिए, चीन का समर्थन मानवीय सहायता, मामूली व्यापार और कुछ छोटी परियोजनाओं तक सीमित रहेगा.

यह सब बढ़ सकता है, बशर्ते सुरक्षा स्थिति इसकी अनुमति दे और चीन सरकार राजनीतिक मांगों पर, विशेष रूप से उग्रवादी उइगुरों का दमन रोकने की दिशा में आगे बढ़े. व्यावहारिक स्तर पर इसका मतलब हो सकता है कि चीन प्रमुख परियोजनाओं पर वर्षों तक धीमी गति से काम करे और देश के मुश्किल से निकाले जा सकने वाले खनिज संसाधनों के प्रति कोई उत्साह दिखाने के बजाय खतरों की रोकथाम और जोखिम प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करे. अमेरिका के साथ व्यापक प्रतिस्पर्धा में बीजिंग अभी भी अफगानिस्तान को एक जाल के रूप में देखने का आदी है.

आने वाले समय में महाद्वीपीय एशिया के खाली किए गए स्थानों के बारे में फंसने से बचने के प्रति सावधानी के साथ शेष दक्षिण एशिया में तेज होती भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के मद्देनजर चीन अपने दृष्टिकोण में विविधता ला सकता है. एक क्षेत्र को देनदारियों के संभावित सेट के रूप में देखा जा सकता है, जहां चीन की जोखिम उठाने की क्षमता घट गई है, जो कुछ साल पहले बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव निवेश के दौरान थी.

दूसरा क्षेत्र प्रतिस्पर्धा के तेजी से 'गर्माते’ रंगमंच के रूप में देखा जा सकता है, जहां वह अतीत के व्यावहारिक, धैर्यवान, विवेकपूर्ण और एक जैसे रवैए को छोड़ कर अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए पुरानी व्यवस्थाओं को तोड़ने के लिए तैयार है. भारत की सीमाओं पर बीजिंग पहले ही इस बात को दिखा चुका है. 

एंड्रयू स्माल अमेरिका के जर्मन मार्शल फंड में वरिष्ठ ट्रान्स अटलांटिक फेलो हैं.

अमेरिका-चीन दुश्मनी से भारत-अमेरिका संबंध गहरे हो रहे हैं और चीन-पाकिस्तान के बीच गहरे होते रिश्तों का मतलब है दक्षिण एशिया में राजनैतिक रेखाओं का और ज्यादा पुख्ता होना. यह तनाव की स्थितियां बढ़ा सकता है और क्षेत्र में अशांति का कारण बनेगा.

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