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‘‘अगर सब कुछ ताकत के बूते किया जाएगा तो अमन कायम नहीं होगा’’

डार ने यह जुआ खेला क्योंकि सेब के सामान्य पेड़ों को फलने में 12 साल लगते हैं, जबकि घने पेड़ डेढ़ साल के भीतर फल देने लगते हैं.

जावेद अहमद डार जावेद अहमद डार

‘‘अगर सब कुछ ताकत के बूते किया जाएगा तो अमन कायम नहीं होगा’’
जावेद अहमद डार 41 वर्ष
सेब के बाग के मालिक, पुलवामा

घाटी के सेब के बागों में एक मौन क्रांति देखी जा रही है. यह क्रांति कश्मीर का नाम दुनिया के फलों के प्रमुख निर्यातकों में शुमार करा सकती है. पुलवामा जिले में एक बड़े सेब बाग के मालिक 41 वर्षीय जावेद अहमद डार इस बदलाव को सबसे पहले गले लगाने वालों में से हैं.

घाटी में कोल्ड स्टोरेज की सबसे बड़ी शृंखला चलाने वाले उद्योगपति खुर्रम मीर ने 2016 में जब अधिक घनत्व वाले सेब के पेड़ लगाने के प्रस्ताव के साथ डार और उनके पड़ोस के अन्य लोगों से संपर्क किया, तो डार तुरंत तैयार हो गए लेकिन उनके पड़ोसियों के मन में कुछ संदेह था. अधिक घनत्व की नस्ल के पेड़ लगाने का मतलब था कि कुछ मौजूदा पेड़ों को उखाड़ा जाए और उनकी जगह आयातित कलमों से नए पेड़ लगाए जाएं. 

डार ने यह जुआ खेला क्योंकि सेब के सामान्य पेड़ों को फलने में 12 साल लगते हैं, जबकि घने पेड़ डेढ़ साल के भीतर फल देने लगते हैं. उन्हें पानी की भी कम आवश्यकता होती है जिससे ड्रिप सिंचाई तकनीक का उपयोग किया जा सकता है. चूंकि ये पेड़ बहुत लंबे नहीं होते इसलिए फल तोड़ने के लिए श्रम की भी जरूरत कम होती है और पैदावार भी पारंपरिक पेड़ों की तुलना में पांच गुना ज्यादा होती है.

साथ ही, नई किस्मों के फलों की गुणवत्ता समान रहने से बाजार में उनकी मांग अधिक है. हालांकि शुरुआती निवेश महंगा था लेकिन डार का कहना है कि पहले साल में ही वे अपनी लागत वसूलने में कामयाब रहे और अब मुनाफा कमा रहे हैं. पुलवामा और शोपियां में सरकार की प्रोत्साहन रकम की मदद से बहुत से किसान अब अपने बागों को ऐसे ही अधिक घनत्व वाले सेब के बागों में बदल रहे हैं.

डार कहते हैं, ‘‘इससे हमारा रोजगार संकट तो दूर हो ही रहा है साथ ही यह दूल्हों के लिए अच्छे रिश्तों का एक पैमाना भी बन गया है क्योंकि पिता अपनी बेटियों की ऐसे परिवारों में ब्याहने पर जोर दे रहे हैं जिनके पास अधिक घनत्व वाले सेब के बाग हैं.’’

डार कश्मीर के एशिया में सेब उत्पादन का केंद्र बनने को लेकर बहुत ज्यादा आशावादी नजर आते हैं लेकिन केंद्र की तरफ से राज्य के सियासी हालात को संभालने के तौर-तरीकों से निराश हैं. वे कहते हैं, ''ईमानदारी से कहूं तो कश्मीरियों के लिए भारत सरकार की अस्पष्ट नीतियों के कारण लोगों का सरकार पर भरोसा नहीं रहा. हमें अंदेशा रहता है कि कल जाने क्या हो जाए.

370 निरस्त करने के एक दिन पहले हमें यह कहकर घरों में बंद कर दिया गया था कि सरकार की ऐसी कोई योजना नहीं है. फिर रातोरात हमारे साथ धोखा क्यों हुआ? आप मुझे कहें कि इस टिन में शक्कर रखा है, लेकिन कल सुबह मुझे इसमें नमक मिले तो कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि मैं आप पर यकीन करूंगा?’’ फिर क्या होना चाहिए, इस प्रश्न पर सरकार को उनकी सलाह है:

''कोई भी फैसला लेने से पहले लोगों को भरोसे में लेना चाहिए और उन्हें खबर करना चाहिए. अगर सब कुछ जोर-जबरदस्ती से किया जाता रहा तो यह मंजूर नहीं होगा. इससे अमन का माहौल नहीं बनेगा. सरकार को जो चीज जीतने की कोशिश करनी चाहिए वह है हमारा भरोसा.’’ डार जो कह रहे हैं, कमोबेश पूरी घाटी ऐसा ही मानती है और जिस पर मोदी सरकार को ध्यान देने की जरूरत है. ठ्ठ 

5,500
हेक्टेयर
रकबे में जम्मू और कश्मीर सरकार अधिक घनत्व वाले पौधे लगाना चाहती है.

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