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मैंने सोचा, सोनिया मुझे बतौर पीएम चुन सकती हैं

मैं सरकार में शामिल होने को अनिच्छुक था और यह बात मैंने सोनिया गांधी को बता दी थी. लेकिन उन्होंने जोर दिया कि मुझे सरकार में शामिल होना चाहिए क्योंकि मैं उसके कामकाज के लिए बेहद अहम होऊंगा.

अगस्त 1997 कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में मनमोहन ‌सिंह के साथ अगस्त 1997 कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में मनमोहन ‌सिंह के साथ

गठबंधन की सरकारों और सियासत के दौर पर लिखे गए प्रणब मुखर्जी के आत्मकथात्मक अफसाने के खास अंशः 

राजीव गांधी के बाद कांग्रेस

पी.वी. नरसिंह राव ने नाजुक मोड़ पर हिंदुस्तान की शानदार अगुआई की. उन्होंने न सिर्फ गोता लगाती अर्थव्यवस्था को संभाला और उसका कायापलट किया, बल्कि हिंदुस्तान की विदेश नीति में भी नई जान फूंकी. वे अल्पमत सरकार की अगुआई कर रहे थे, लेकिन इस तथ्य ने उन्हें जरूरी सुधारों को अंजाम देने से रोका नहीं. 1996 के आम चुनाव में पी.वी. नरसिंह राव की अगुआई में कांग्रेस पार्टी को बड़ी पराजय का मुंह देखना पड़ा और लोकसभा में उसकी ताकत 232 से घटकर 140 पर आ गई.

इस चुनावी पराजय की वजहों को समझ पाना मुश्किल था, क्योंकि पीवी के अनुकरणीय मार्गदर्शन में देश भुगतान संतुलन के संकट से बाहर आ गया था और बड़े आर्थिक सुधारों को अंजाम दिया जा चुका था. हालांकि पीवी को इससे हैरानी नहीं हुई. असल में चुनाव से पहले कांग्रेस की हार की आशंका उन्होंने मेरे साथ साझा की थी. हकीकत यह थी कि शुरुआती चरण के आर्थिक सुधारों ने मोटे तौर पर बड़े लोगों या कुलीनों पर असर डाला और उनके संभावित फायदे आम लोगों तक पहुंचने अभी बाकी थे. आखिर चुनावों के लिए अनिवार्य तौर पर आम लोगों की सियासत करनी होती है और राव सरकार के कामकाज में लोकलुभावन अपील लगभग नदारद थी.

केसरी का तकिया कलाम ''मेरे पास वक्त नहीं है"

बतौर कोषाध्यक्ष (सीताराम) केसरी का कार्यकाल सोलह साल लंबा था और वे एआइसीसी के भीतर थोड़े-बहुत मजाक का विषय बन गए थे. एक मजाक उनके हिसाब-किताब के तरीके को लेकर था, ''न खाता न बही, जो केसरी कहें वही सही." कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर सीताराम केसरी ने संयुक्त मोर्चे की सरकार को अस्थिर करने में अहम भूमिका निभाई थी, जिसकी अगुआई पहले 1996-97 में (एच.डी.) देवेगौड़ा ने और फिर 1997-98 में आइ.के. गुजराल ने की थी.

देवेगौड़ा की सरकार जान-बूझकर कांग्रेस को निशाना बना रही थी. पुलिस पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव सहित कांग्रेस के सदस्यों पर भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमे चला रही थी. देवेगौड़ा सरकार ने बोफोर्स का मुद्दा भी एक बार फिर खोदकर निकाल लिया था. कांग्रेस पार्टी ऐसी सरकार का समर्थन नहीं कर सकती थी, जो उसके नेतृत्व को बदनाम और परेशान करने पर आमादा थी.

इस तथ्य के बावजूद कि गुजराल शुरुआत से ही डावांडोल पचमेल गठबंधन की अगुआई कर रहे थे, उन्होंने जैन आयोग के नतीजे बाहर आने के बाद गठबंधन से द्रमुक को हटाने की कांग्रेस की मांग मानने से इनकार कर दिया. तो, फिर कांग्रेस ने समर्थन वापस क्यों लिया? या केसरी जब बार-बार कहते थे कि श्मेरे पास वक्त नहीं है्य तो उससे उनका क्या मतलब होता था?

कई कांग्रेस नेताओं को लगा कि यह  प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा का संकेत है. एक तरफ वे चौतरफा हावी भाजपा-विरोधी भावनाओं का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे थे, वहीं साथ ही साथ खुद को एक गैर-भाजपा सरकार के मुखिया के तौर पर उछालने के मकसद से संयुक्त मोर्चा सरकार की जड़ें खोद रहे थे. वजह चाहे जो हो, पर आइ.के. गुजराल द्रमुक के मंत्रियों को नहीं हटाने के अपने फैसले पर मजबूती से अड़े रहे.

सोनिया के साथ रिश्तों में गरमाहट

1988 में पंचमढी सम्मेलन में मेरी सक्रिय भागीदारी के बाद सोनिया गांधी मुझसे अक्सर ज्यादा सलाह-मशविरा करने लगीं. पहले हमारे रिश्ते में जो निश्चित तटस्थता मौजूद थी, वह धीरे-धीरे गरमाहट और एक दूसरे के प्रति आदर में बदल गई. मैं मानता हूं कि यह तटस्थ भाव और किसी खास के प्रति विशेष झुकाव न रखना ही सोनिया की सबसे बड़ी ताकत है. इससे हिंदुस्तान के सियासी इतिहास के एक और अहम पहलू की झलक मिलती है. अपने परिवार के दूसरे प्रतिष्ठित सदस्यों की तरह सोनिया ने भी सच्चा अखिल भारतीय नजरिया अपना लिया है. आम लोगों तक पहुंचने की उनकी काबिलियत और आम लोगों का उन्हें अपनी नेता के तौर पर स्वीकार करना ही वह अहम खासियत है जो उन्हें हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनने के योग्य बनाती है. इसमें दो राय नहीं कि इस ओहदे के लिए अनिवार्य दूसरी योग्यताएं तो वे सत्ता में पहुंचने के बाद भी हासिल कर सकती थीं.

शरद पवार प्रधानमंत्री बनना चाहते थे

1999 के चुनावों से पहले इस संभावना के खिलाफ चौतरफा विद्रोह फूटता लग रहा था कि सोनिया गांधी कांग्रेस की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार बन सकती हैं. मेरी राय में शरद पवार को उम्मीद थी कि पार्टी, सोनिया गांधी की बजाए, लोकसभा में विपक्ष का नेता होने के नाते उनसे आग्रह करेगी कि वे सरकार बनाने के लिए अपना दावा पेश करें. बतौर कांग्रेस अध्यक्ष अपनी तरक्की के बाद सोनिया तमाम अहम मुद्दों पर शरद पवार की बजाए पी. शिवशंकर से सलाह-मशविरा करती थीं. अलगाव और मोहभंग की यही भावना सोनिया के विदेशी मूल को लेकर उनके बयानों और बाद में 1999 में उनके पार्टी छोड़कर जाने के लिए जिम्मेदार रही हो सकती है.

सिंह ही वाकई किंग

2004 के आम चुनाव में कांग्रेस की फतह के बाद जब सोनिया ने प्रधानमंत्री का पद संभालने से इनकार कर दिया, तब आम तौर पर यही संभावना व्यक्त की जा रही थी कि प्रधानमंत्री के पद के लिए अगली पसंद मैं होऊंगा. यह संभावना शायद इस तथ्य पर टिकी थी कि मुझे सरकार का बहुत व्यापक अनुभव था, जबकि मनमोहन सिंह का विशाल अनुभव लंबे समय तक अफसरशाह और पांच साल तक सुधारवादी वित्त मंत्री रहने का ही था. मीडिया में कुछ टिप्पणीकारों ने कहा कि मैं सरकार में शामिल नहीं होऊंगा क्योंकि मैं मनमोहन सिंह के मातहत काम नहीं कर सकता था, जो उस वक्त मेरे जूनियर रहे थे जब मैं वित्त मंत्री था.

हकीकत यह थी कि मैं सरकार में शामिल होने को अनिच्छुक था और यह बात मैंने सोनिया गांधी को बता दी थी. हालांकि उन्होंने जोर दिया कि मुझे सरकार में शामिल होना चाहिए क्योंकि मैं उसके कामकाज के लिए बेहद अहम होऊंगा और डॉ. सिंह का सहारा भी बन सकूंगा. पता यह चला कि डॉ. सिंह तमाम अहम मुद्दों पर मुझसे बात करते और मुझ पर पूरी तरह निर्भर जान पड़ते थे. हमारे बीच अच्छा कामकाजी रिश्ता बन गया था. बतौर प्रधानमंत्री उनकी नियुक्ति को लेकर तमाम बहस-मुबाहिसे के बावजूद आर्थिक नीति-निर्माण में मनमोहन सिंह से ज्यादा तजुर्बेकार कोई और नहीं हो सकता.

प्रणब मुखर्जी 1983 में एम. एल. फोतेदार और पीवी नरसिंह राव के साथ

प्रणब को रक्षा मंत्रालय क्यों मिला

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने कांग्रेस के संभावित मंत्रियों को लेकर बातचीत की. उस सिलसिले में सोनिया ने मुझे बुलाया और पूछा कि मैं इन चार मंत्रालयों में कौन-सा लेना चाहूंगा. उनकी इच्छा यह थी कि मैं वित्त मंत्रालय लूं. हालांकि मैंने उनसे कहा कि मनोनीत प्रधानमंत्री के साथ आर्थिक नीतियों पर विचारधारात्मक मतभेदों की वजह से मैं नहीं चाहूंगा कि मुझे वित्त मंत्रालय का काम दिया जाए. मैंने उनसे यह भी कहा कि मैं विदेश मामलों की बजाए गृह को तरजीह दूंगाकृमैं गृह मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष के तौर पर छह साल से ज्यादा काम कर चुका था और मंत्रालय से बखूबी वाकिफ था—और यह कि मुझे रक्षा मंत्रालय का कोई तजुर्बा नहीं था. उन्होंने मुझे पूरा सुना, पर कुछ कहा नहीं और न ही कोई इशारा किया, सिवा यह कहने कि रक्षा अपने आप में एक पूरी दुनिया है और मेरी वरिष्ठता को देखते हुए रक्षा मंत्रालय मुझे अधिकतम स्वायत्तता प्रदान करेगा. शपथ के वक्त ही मुझे पता चला कि मुझे अगला रक्षा मंत्री बनना है.

नेवल वॉर रूम लीक को संभालना

बदकिस्मती से नेवल वॉर रूम लीक मामले के प्रमुख अभियुक्तों में से एक रवि शंकरन था, जो नौसेना का एक पूर्व अधिकारी था. वह तब नौसेना अध्यक्ष एडमिरल अरुण प्रकाश की पत्नी का रिश्तेदार भी था. प्रकाश प्रतिष्ठित नौसैन्य लड़ाकू पायलट थे और अपने बेहद ईमानदारी तथा पेशेवर रवैये के लिए जाने जाते थे. शंकरन शैंक ओशन इंजीनियरिंग नाम की एक कंपनी का मालिक था और नौसैन्य आपूर्तियों के कारोबार से जुड़ा था. उसने जानकारियां हासिल करने के लिए नौसेना निदेशालय में अफसरों के साथ अपने रिश्तों का कथित तौर पर इस्तेमाल किया.

इस खुलासे के सामने आने के बाद एडमिरल प्रकाश ने वीर सैनिकों की सच्ची परंपरा का पालन करते हुए अगस्त 2006 में मुझसे मुलाकात की और अपना इस्तीफा सौंप दिया. हालांकि मैंने उनकी नेकनीयती के इस इजहार की तारीफ की, पर जब तक उनके खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद न हो, मैं उनका इस्तीफा स्वीकार करने को अनिच्छुक था. मेरा फैसला इस उसूल से प्रभावित था कि हरेक शख्स खुद अपनी कारगुजारी के लिए जिम्मेदार है और एक अभियुक्त के किसी भी आपराधिक या अनुचित काम का बोझ उसके रिश्तेदारों पर तब तक नहीं पडऩा चाहिए जब तक कि कोई उलट सबूत न हो. और आज दिन तक मैं महसूस करता हूं कि मेरा वह फैसला सही साबित हुआ क्योंकि अभी तक ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया है जो एडमिरल प्रकाश को उनके रिश्तेदार की गलत करतूतों से जोड़ सके.

हेनरी किसिंजर को फटकार

जब मैं रक्षा मंत्री बना तब मुझे बखूबी एहसास था कि हिंदुस्तान को अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रूस पर अपनी निर्भरता लंबे वक्त में कम करनी होगी. इसके अलावा शीत युद्ध की सैन्य धड़ेबंदियों के ध्वस्त होने से भारत और अमेरिका के बीच पुराने मतभेदों में कमी आई थी. दोनों ही लोकतांत्रिक देश हैं और बुनियादी स्तर पर दोनों के हितों में भिन्नता की बजाए मेल ज्यादा है. अमेरिका के साथ बातचीत करने का वक्त आ गया था और मैंने मंत्रालय को निर्देश दिया कि पेंटागन के साथ ज्यादा करीबी रिश्ते बनाने की दिशा में काम करें.

मेरी अमेरिका यात्रा से पहले 2004 में साउथ ब्लॉक में पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के साथ मेरी एक छोटी-सी मुलाकात और बातचीत हुई.

मुलाकात के दौरान उन्होंने अमेरिकी वाणिज्य मंत्री रॉन ब्राउन के कार्यकाल के दौरान दोनों राष्ट्रों के बीच मजबूत व्यापार संबंधों की बात की और रक्षा संबंधों में ऐसी ही साझेदारी और मजबूती न होने को लेकर सवाल खड़ा किया. उनके सवाल का जवाब देते हुए मैंने साफ-साफ कहा कि भारत-अमेरिका के रक्षा संबंधों को भरोसे की संपूर्ण कमी की वजह से नुक्सान उठाना पड़ा है. मैंने उन्हें बेहद अहम क्रायोजेनिक सौदे को रोकने के अमेरिकी फैसले की याद दिलाई, जो हिंदुस्तान के सर्वोच्च राष्ट्रीय हित का सौदा था. इसने हिंदुस्तान को स्वदेशीकरण की ओर धकेला.

मैंने उन्हें जवाब दिया, ''अगर अमेरिका हिंदुस्तान के राष्ट्रीय हित को स्वीकार नहीं करता है, तो हमें आपके राष्ट्रीय हित को क्यों स्वीकार करना चाहिए और ज्यादा गहरे रक्षा संबंध क्यों कायम करने चाहिए?" फिर जल्दी ही सांस्थानिक तंत्र कायम किए गए और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध स्थापित करने की हिंदुस्तान की इच्छा पर जोर दिया गया. डोनाल्ड रम्सफेल्ड (अमेरिकी रक्षा मंत्री) और मैंने 28 जून, 2005 को ऐतिहासिक ''न्यू फ्रेमवर्क फॉर यूएस-इंडिया डिफेंस रिलेशंस" (अमेरिका-भारत रक्षा संबंधों के लिए नई रूपरेखा) पर दस्तखत किए. यह आने वाले दशकों में दो राष्ट्रों के बीच ज्यादा करीबी रक्षा संबंध स्थापित करने का रोडमैप था.

बांग्लादेश की दो बेगमों का बचाव

बांग्लादेश के राष्ट्रपति इयाजुद्दीन अहमद ने चुनावों (जनवरी 2007 में) से ठीक पहले इमरजेंसी की घोषणा कर दी और बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार डॉ. फखरूद्दीन अहमद की सदारत में कामचलाऊ सरकार की स्थापना कर दी. इस वक्त के दौरान तमाम प्रमुख सियासी नेताओं को कैद कर लिया गया. शेख हसीना को भी घूसखोरी और भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में डाल दिया गया. हिंदुस्तान ने कामचलाऊ सरकार के साथ बातचीत करना तो जारी रखा, पर वहीं हमने शांतिपूर्ण, विश्वसनीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के जरिए लोकतंत्र की पूर्ण बहाली की जरूरत पर जोर दिया.

जनवरी 1997 में नई दिल्ली में सीताराम केसरी के साथ प्रणब मुखर्जी

बांग्लादेश के सेना प्रमुख मोईन अहमद फरवरी 2008 में छह दिनों की यात्रा पर भारत आए. वे मुझसे भी मिले. अनौपचारिक बातचीत के दौरान मैंने उन्हें सियासी कैदियों को छोडऩे की अहमियत समझाई. उन्हें आशंका थी कि जेल से रिहाई के बाद शेख हसीना उन्हें बर्खास्त कर देंगी. लेकिन मैंने निजी जिम्मेदारी ली और जनरल को भरोसा दिलाया कि हसीना के सत्ता में लौटने के बाद भी वे बने रहेंगे. मैंने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश से भी मिलने का वक्त मांगा, ताकि उनसे इस मामले में दखल देने और खालिदा जिया और शेख हसीना, दोनों की रिहाई पक्की करने का आग्रह कर सकूं. तब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन के जरिए हस्तक्षेप करके मैंने तमाम सियासी कैदियों की रिहाई और मुल्क की स्थिरता की ओर वापसी पक्की की. कई साल बाद मैंने कैंसर से लड़ रहे जनरल मोईन को अमेरिका में इलाज की सुविधा दिलवाने में भी मदद की.

शेख हसीना नजदीकी पारिवारिक दोस्त रही थीं और जब मैं विदेश मंत्री था, हिंदुस्तान ने बांग्लादेश में कामचलाऊ सरकार के बाद स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए काफी अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाकर उनका मकसद पूरा करने में मदद करने की कोशिश की थी. दरअसल अवामी लीग के कुछ नेता जब हसीना को छोड़कर चले गए, वह भी तब जब वे जेल में थीं, तब मैंने उनके इस रुख के लिए उन्हें फटकार लगाई और उनसे कहा कि किसी को उसके बुरे वक्त में इस तरह छोड़ देना अनैतिक है. आखिर बांग्लादेश में आम चुनाव दिसंबर 2008 में हुए और शेख हसीना भारी बहुमत से जीतकर आईं.

भारत-अमेरिका परमाणु करार की कवायद

विदेश मामलों के मंत्री के तौर पर मेरे कार्यकाल की सबसे संतोषजनक उपलब्धियों में से एक भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार पर अक्तूबर 2008 में दस्तखत थे. हमने विपक्षी पार्टियों के तीखे सियासी विरोध के बावजूद यह कामयाबी हासिल की. इन पार्टियों में वामपंथी भी शामिल थे, जो उस वक्त सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा थे. (पहली कामयाबी तब मिली) जब डॉ. मनमोहन सिंह ने जापान में जी-8 शिखर सम्मेलन में बतौर पर्यवेक्षक शिकरत करते वक्त कहा कि सरकार भारत-केंद्रित सुरक्षा उपाय समझौता जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी बोर्ड के सामने रख देगी.

जनवरी 2010 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ प्रणब मुखर्जी

प्रधानमंत्री के इस कथन की रोशनी में वामपंथी दलों ने हमारे ऊपर वादे सेकृजो जाहिरा तौर पर मैंने किया था—मुकरने का आरोप लगाया और यूपीए से समर्थन वापस ले लिया. मैंने वाम दलों को समझाने-बुझाने की कोशिश की और ज्योति बसु से दखल देने की मांग की, जो परमाणु करार की खूबियों से सहमत हो गए थे. ज्योति बसु ने प्रकाश करात से बात की और सुझाव दिया कि करात का मुझसे मिलना अहम हो सकता है. करात मुझसे मिले जरूर, पर अपने तीखे विरोध पर जस के तस अड़े रहे और इस बात पर भी कि वाम दल यूपीए को सत्ता से बेदखल करने के लिए भाजपा के साथ मिलकर वोट देंगे. ज्योति बसु और बंगाल लॉबी की उनकी खुली अवहेलना हैरान करने वाली थी. वाम दलों के समर्थन वापस ले लेने के बाद यूपीए सरकार को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा.

भारत-अमेरिका परमाणु करार उस मजबूत तालमेल के बगैर अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाता, जो मेरे और अमेरिकी विदेश मंत्री डॉ. कोंडालीजा राइस के बीच था. इतना ही नहीं, अपने तीखे अमेरिका-विरोधी रुख के लिए जानी जाने वाली क्वयांमार सरकार तक पहुंचने की मेरी कोशिशों ने अमेरिकी कूटनीतिकों और सैलानियों को अहम रियायतें दिलाने में खासी मदद की और दो लोकतांत्रिक देशों के बीच ज्यादा गहरी समझ की बुनियाद रखी. मगर यह राष्ट्रपति बुश का मजबूत समर्थन ही था जिसने वाकई करार को अंजाम तक पहुंचाया. प्रोटोकॉल का उल्लंघन करके भी उन्होंने कई बार और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर भी व्हाइट हाउस में मुझसे मुलाकात की. भारत-अमेरिका परमाणु करार डॉ. मनमोहन सिंह का सबसे शानदार लम्हा था.

26/11: राइस से दो-टूक

उस घटना (26/11) के बाद पहला फोन कॉल कोंडालीजा राइस का आया. वे इसके नतीजों को लेकर खासी फिक्रमंद थीं. मैंने उनसे कहा, ''हालत गंभीर है. मैं रिश्तों को रूमानी बनाने या किसी भी किस्म के एडवेंचरिज्म में पडऩे में यकीन नहीं करता, पर धैर्य की एक सीमा होती है. हम सचमुच फिक्रमंद हैं." मैंने जोर देकर उनसे यह भी कहा कि अमेरिका सीमा-पार आतंकवाद को रोकने के लिए पाकिस्तान पर दबाव आयद करे. मैंने अमेरिका के हाथों पाकिस्तान को अत्याधुनिक हथियार और सैन्य साजो-सामान बेचे जाने पर कड़ा एतराज जाहिर किया. मैंने राइस की इस दलील को मानने से सिरे से इनकार कर दिया कि अल-कायदा और तालिबान सरीखे दहशतगर्द धड़ों के खतरे को रोकने की गरज से पाकिस्तान को इन हथियारों की आपूर्ति की गई थी. मैंने उन्हें बताया कि ये हथियार असल में भारत के खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे हैं.

मैं जानता था कि विश्व नेताओं तक पहुंचने और पाकिस्तान की कुटिल साजिशों का पर्दाफाश करने की हमारी कूटनीतिक पहल के कामयाब होने के लिए सबसे अहम बात थी वक्त. अगले तीन दिनों के दौरान मैंने अलग-अलग टाइम जोन में फैले 100 से ज्यादा देशों के विदेश मंत्रियों से टेलीफोन पर बात की. सभी ने हमले की निंदा करते हुए हमारे साथ एकजुटता जाहिर की. वे सभी आतंकवाद के बढ़ते खतरे को लेकर फिक्रमंद थे. पाकिस्तान के ''गैर-सरकारी अदाकारों" के बहाने को स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं था.

मैंने बस एक इज्राएल से समर्थन नहीं मांगा क्योंकि इसमें हिंदुस्तान का समर्थन कर रहे 54 इस्लामिक देशों को अलग-थलग करने का जोखिम निहित था. चीन की प्रतिक्रिया उम्मीद के मुताबिक ही थी. हालांकि वहां के नेतृत्व ने भारत के प्रति अपनी संवेदना जाहिर करने में खासी फुर्ती बरती, पर उन्होंने यह हकीकत स्वीकार नहीं की कि ये हमले पाकिस्तान की धरती से संचालित तत्वों ने किए थे. उनके इस सतर्क नजरिए का इंतजाम खुद पाकिस्तान ने किया था. मगर वहां के नेतृत्व ने हमलों पर पेश मेरी रिपोर्ट को जरूर स्वीकार किया.

मार्च 2008 में व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ प्रणब

मुंबई हमलों का मजेदार मध्यांतर

इसी वक्त के आसपास एक हल्का-फुल्का लम्हा तब आया जब एक खास घटना घटी जिसके नतीजतन पाकिस्तान की वायु सेना को अलर्ट पर रख दिया गया और सशस्त्र बलों को किसी भी स्थिति से निबटने का फरमान जारी कर दिया गया.

कथित तौर पर मेरे दफ्तर से राष्ट्रपति (आसिफ अली) जरदारी को एक फोन कॉल किया गया और उन्हें खौफनाक नतीजे भुगतने की धमकी दी गई. कोलकाता में उतरते ही मैंने अपने दफ्तर से इसके बारे में सुना. जब मैं दमदम हवाई अड्डे से अपने घर की तरफ जा रहा था, मुझे बताया गया कि अमेरिकी विदेश मंत्री बड़ी बेताबी से मुझसे संपर्क करने की कोशिश कर रही हैं. मैंने घर पहुंचते ही उन्हें फोन किया. उन्होंने ताजा हालत के बारे में जानना चाहा और इस इत्तिला की सचाई जाननी चाही कि मैंने पाकिस्तान को खौफनाक नतीजे भुगतने की धमकी दी थी.

हालांकि उन्होंने मुझे नहीं बताया कि उन्हें पाकिस्तानी सत्ताधारियों ने इसकी जानकारी दी थी, पर अन्य स्रोतों ने मुझे बताया कि उन्हें यह जानकारी वाकई पाकिस्तानी नेतृत्व ने ही दी थी, जो सचमुच दहशतजदा जान पड़ता था. मैंने अमेरिकी विदेश मंत्री से कहा, ''अगर ऐसी कोई संभावना होती, तो क्या आप मानती हैं कि देश का विदेश मंत्री राजधानी से 1,200 किमी दूर होता? मैं कोलकाता में हूं और कल राज्य की राजधानी से और 250 किमी दूर अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाने का मंसूबा बना रहा हूं. आपने जो कुछ सुना, वह अफवाहों के अलावा कुछ नहीं है."

भारत-अमेरिका परमाणु करार को लेकर वामपंथियों के साथ टकराव के दौरान मई 2008 में येचुरी के साथ

बाद में पाकिस्तानी अखबार डॉन ने रिपोर्ट छापी कि राष्ट्रपति जरदारी को एक शख्स ने फर्जी फोन कॉल किया था और यह शख्स पाकिस्तान की एक जेल में बंद था. उसने राष्ट्रपति के दफ्तर को फोन मिलाया और झूठ कहा कि वह प्रणब मुखर्जी के दफ्तर से बोल रहा था. लेकिन हैरानी यह थी कि उसकी असलियत जानने की कोशिश नहीं की गई. दरअसल तनाव से भरी उस हालत में इस समूचे प्रसंग ने थोड़ी मजेदार राहत मुहैया की.

शिवराज पाटील की बर्खास्तगी

यह वही वक्त था जब कई लोग तीखी आलोचना की जद में आए. उनमें से एक शिवराज पाटील भी थे. हमलों के बाद के फलक पर चर्चा के लिए 29 नवंबर को कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई थी. इस बैठक के दौरान पी. चिदंबरम बहुत रूखे ढंग से शिवराज पाटील के खिलाफ मुखर थे और उन्होंने गृह मंत्री को बदलने की सलाह दी. मैंने जज्बात को थोड़ा शांत करने की कोशिश की, यह कहकर कि हमें एक व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराना चाहिए; हम सभी में अपनी-अपनी कमजोरियां होती हैं. इस पूरी चर्चा के दौरान शिवराज पाटील ने निर्लिप्त भाव से चुप्पी ओढ़े रखी. 1 दिसंबर की सुबह मेरे पास डॉ. सिंह का फोन आया और उन्होंने सुझाव दिया कि मैं जितना जल्दी-से-जल्दी हो सके, उनसे मिलूं. मैं फौरन रेस कोर्स रोड के लिए रवाना हो गया.

मेरी कार जब भीतर दाखिल हो रही थी, मैंने देखा कि शिवराज पाटील की कार बाहर निकल रही थी, पर उस वक्त मुझे कोई आहट नहीं थी कि क्या होने वाला है. ज्यों ही मैं डॉ. सिंह के दक्रतर में दाखिल हुआ, उन्होंने मुझे बताया कि शिवराज पाटील ने इस्तीफा दे दिया है और सोनिया गांधी ने सुझाव दिया था कि मैं बतौर गृह मंत्री काम संभाल लूं. उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने सोनिया गांधी को इसके खिलाफ सलाह दी क्योंकि मैं विदेश मामलों के मंत्री के तौर पर जंग सरीखी हालत को संभाल रहा था और मंत्रालय इस वक्त यह बदलाव गंवारा नहीं कर सकता. इसलिए यह तय किया गया था कि पी. चिदंबरम शिवराज पाटील की जगह लेंगे. लगभग इसी वक्त पी. चिदंबरम भी बैठक में शामिल हो गए और हमने बदलाव के बारे में बातचीत की. (कुछ ही वक्त बाद मुखर्जी ने वित्त मंत्री के तौर पर पी. चिदंबरम की जगह ली.)

जुलाई 2012 में राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में सलामी गारद का निरीक्षण करने आते प्रणब मुखर्जी

चिदंबरम के साथ मतभेद

चिदंबरम ने एक नया रुझान कायम किया था और कराधान की दरों में बेहद ऊंचे स्तर से समुचित निचले स्तरों तक जबरदस्त कमी करके भारतीय कराधान प्रणाली को नई दिशा दी थी. हिंदुस्तान के भीतर और बाहर की आर्थिक हालत के बारे में उनका विश्लेषण व्यावहारिक, पेशेवर और भावी नीति-निर्माताओं के लिए मार्गदर्शक का काम करने वाला था. चिदंबरम ने पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के 10 बजट पेश करने के रिकॉर्ड के बाद देश में दूसरे सबसे ज्यादा बजट पेश किए हैं. वे बौद्धिक दृष्टि से तीक्ष्ण और खासे जानकार हैं, हालांकि अपने बहुत मजबूत विश्वासों और उन्हें पेश करने की शैली की वजह से वे कभी-कभार मगरूर दिखाई देते हैं.

चिदंबरम और मेरे बीच मतभेदों को लेकर खासी चर्चाएं हुई हैं. मैं कहूंगा कि अगर कोई मतभेद रहे भी तो वे अर्थव्यवस्था को लेकर हमारे अलग-अलग नजरियों की वजह से थे. जहां मैं अनुदार था और सुधारों को लगातार चलने वाली प्रक्रिया मानता था और अर्थव्यवस्था के समावेशी और धीमे सिलसिलेवार कायापलट—नियंत्रित व्यवस्था—के हक में था. वे उदारीकरण के पक्षधर और बाजार समर्थक अर्थशास्त्री हैं.

पिछली तारीख वाले कर का कोई अफसोस नहीं

मेरा वह फैसला काफी बहस-मुबाहिसे का विषय रहा था और आज दिन तक है, जो मेरे इस गहरे विश्वास से उपजा था कि हिंदुस्तान की प्रत्यक्ष कर नीति को घरेलू और विदेशी संस्थाओं के बीच कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए. विवाद तब शुरू हुआ जब मैंने 2012-13 के अपने बजट भाषण में ऐलान किया कि वोडाफोन टैक्स मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेअसर करने के लिए मैं आयकर अधिनियम 1961 में पिछले प्रभाव से लागू होने वाले एक संशोधन का प्रस्ताव रखता हूं.

मनमोहन सिंह की पन्न्की राय थी कि आइटी ऐक्ट में प्रस्तावित संशोधन से देश में एफडीआइ के आने पर असर पड़ेगा. मैंने उन्हें बताया कि हिंदुस्तान ''नो-टैक्स" (कर नहीं) या ''लो-टैक्स" (कम कर) देश नहीं है. यहां सभी करदाताओं के साथ, चाहे वे यहां के बाशिंदे हों या गैर-बाशिंदे, बराबरी का बर्ताव किया जाता है. मैंने जोर दिया कि हमारे देश के कर कानूनों के मुताबिक, अगर आप एक देश में कर अदा करते हैं, तो आपको उस दूसरे देश में कर चुकाने की जरूरत नहीं है जहां आप अपना कारोबार संचालित करते हैं और जो डबल टैक्स एवॉयडेंस एग्रीमेंट (डीटीएए) के तहत आता है.

लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि आप कतई कोई कर ही अदा न करें. मैंने कैफियत दी कि कुछ संस्थाओं ने अपनी कर योजना कुछ इस तरह बनाई है कि उन्हें कतई कोई कर नहीं चुकाना पड़ता. मेरी मंशा साफ थीः जहां एक देश में परिसंपत्तियों का निर्माण किया गया है, वहां उस देश में उस पर कर वसूला जाएगा जब तक कि वह डीटीएए के दायरे में न आता हो. बाद में सोनिया गांधी, कपिल सिब्बल और पी. चिदंबरम ने भी यह आशंका जाहिर की कि पिछली तारीख से लागू होने के संशोधन से एफडीआइ के लिए नकारात्मक माहौल बनेगा.

मैंने उन्हें समझाया कि एफडीआइ तब आता है जब मुनाफा होता है और यह जीरो टैक्स की वजह से नहीं आता. कानून की मंशा को साफ करने के लिए स्पष्टीकरण देने वाले संशोधन पेश किए गए. इससे टैक्स के मामले में निश्चितता आएगी और साफ हो जाएगा कि हिंदुस्तान को मिलते-जुलते मामलों में भी कर वसूलने का हक है. मंत्रिमंडल के दो और साथियों ने भी अलग-अलग मुझे बीच का रास्ता अपनाने और इस फैसले पर दोबारा विचार करने की सलाह दी. लेकिन मैं अडिग रहा. मेरे प्रस्ताव ने मेरी पार्टी के भीतर और बाहर उस वक्त, और यहां तक कि अब भी, जैसी चिंता और व्यग्रता पैदा की, उसके बावजूद मुझे यह देखकर हैरानी होती है कि पिछले पांच साल में मेरे बाद आने वाले हरेक वित्त मंत्री ने वही रुख कायम रखा है.

आखिर राष्ट्रपति

मैं 2 जून, 2012 की शाम सोनिया गांधी से मिला. हमने राष्ट्रपति चुनाव को लेकर पार्टी के रुख की समीक्षा की और संभावित उम्मीदवारों तथा उन उम्मीदवारों के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की संभावना के बारे में बातचीत की. चर्चा के दौरान उन्होंने मुझसे साफ तौर पर कहा, ''प्रणब जी, इस पद के लिए सबसे अच्छे तौर पर आप उपयुक्त हैं, पर सरकार के कामकाज में आप जो बेहद अहम भूमिका निभा रहे हैं उसे भी आपको नहीं भूलना चाहिए. क्या आप कोई और नाम सुझा सकते हैं?" मैंने कहा, ''मैडम, मैं पार्टी का आदमी हूं. ताजिंदगी मैंने नेतृत्व की सलाह के मुताबिक काम किया है.

इसलिए मुझे जो भी जिम्मेदारी दी जाती है, मैं अपनी पूरी ईमानदारी से उसे पूरा करूंगा." उन्होंने मेरे रुख की तारीफ की. बैठक खत्म हो गई और मैं एक धुंधली-सी छाप लेकर लौटा कि वे यूपीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर मनमोहन सिंह पर विचार करने की इच्छुक हो सकती हैं. मैंने सोचा कि अगर उन्होंने राष्ट्रपति के ओहदे के लिए डॉ. सिंह का चयन किया तो वे मुझे बतौर प्रधानमंत्री चुन सकती हैं. 13 जून को ममता बनर्जी सोनिया गांधी से मिलीं.

बाद में सोनिया गांधी ने मुझसे कहा कि ममता बनर्जी ने उनके समक्ष राष्ट्रपति चुनाव के लिए यूपीए के दो उम्मीदवारों के नामों को हरी झंडी दी हैः हामिद अंसारी और मैं. ममता ने कहा कि इस मुद्दे पर उनकी मुलायम सिंह यादव से बातचीत चल रही थी और वे उनसे बात करके फिर बताएंगी. हालांकि उन्होंने अपने फैसले के बारे में सोनिया गांधी को कोई इत्तिला नहीं दी.

मुलायम सिंह यादव के घर पर क्या बातचीत हुई, मुझे नहीं पता. लेकिन उसी शाम उन्होंने एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की और उसमें ऐलान किया कि राष्ट्रपति पद के उनके उम्मीदवार ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, मनमोहन सिंह और सोमनाथ चटर्जी, इसी क्रम से, थे. ममता ने सोनिया गांधी के साथ अपनी मुलाकात का जिक्र भी किया और जोर देकर कहा कि सोनिया ने दो नाम सुझाए थे—हामिद अंसारी और प्रणब मुखर्जी—जिनमें से दोनों उन्हें नामंजूर थे.

14 जून को दोपहर 11 बजे मैं सोनिया गांधी से मिलने गया और उनके साथ लंबी बात हुई. मैंने पाया कि वे निर्णायक मनोदशा में थीं. उन्होंने ममता बनर्जी के साथ अपनी मुलाकात के बारे में मुझे बताया. वे इस बात से थोड़ी मायूस थीं कि ममता ने मुलायम सिंह यादव के साथ बैठक के बाद अपने फैसले के बारे में हमें नहीं बताया और इसके बजाए सीधे मीडिया को जानकारी दे दी.

उन्होंने सुझाव दिया कि इस मुद्दे पर कोर ग्रुप की बैठक में आगे चर्चा की जाए, जिसका 7 रेस कोर्स रोड पर होना पहले से ही तय था और जिसमें प्रधानमंत्री के साथ उन्होंने, ए.के. एंटनी, पी. चिदंबरम, अहमद पटेल और मैंने हिस्सा लिया. मैंने सोनिया गांधी से सिफारिश की कि वे मेरी नामजदगी के नतीजों पर पार्टी और सरकार दोनों के भीतर चर्चा कर लें. उस शाम कैबिनेट और कुछ कैबिनेट समितियों की एक के बाद एक बैठकें निर्धारित थीं. इन बैठकों के बाद डॉ. सिंह ने मुझे सोनिया गांधी के साथ हुई अपनी चर्चा और मुझे मनोनीत करने के संयुक्त फैसले की इत्तिला दी.

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