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आवरण कथाः कैसे थमे कोविड का दूसरा थपेड़ा

कोरोनावायरस के नए स्ट्रेन, टीका लगाने की झिझक, और अमूमन कोविड को लेकर बेपरवाही की वजहों से देश में संक्रमण के मामलों में खतरनाक दूसरा उछाल. अब हमें सतर्कता तथा निगरानी बढ़ाने और टीकाकरण के अभियान को रफ्तार देने से ज्यादा कुछ करने की दरकार.

टेस्ट की बात दिल्ली के आइएसबीटी में रैपिड एंटी-जेन टेस्ट टेस्ट की बात दिल्ली के आइएसबीटी में रैपिड एंटी-जेन टेस्ट

सोनाली आचार्जी

कोविड हमेशा ही घात लगाकर वार करने वाला दुश्मन है. मार्च 2020 में यह बगैर वाजिब चेतावनी के घुस आया. मार्च 2021 में जब हमें लगा कि हम वायरस पर भारी पड़ रहे हैं, हमने मास्क उतार दिए, आपस में दूरी बनाए रखने को तिलांजलि दे दी, अपने दफ्तर, विवाह स्थल, होटल, जिम, सिनेमा हॉल और यहां तक कि स्वीमिंग पूल भी खोल दिए, तभी इसने दोबारा हमला बोला और बड़ी बेअदबी से हमें याद दिलाया कि यह अभी गया नहीं है. मार्च की शुरुआत में रोज 1,000-2,000 नए मामलों से महीने का अंत आते-आते रोज संक्रमणों या नए मामलों की तादाद 7,000-8,000 पर पहुंच गई.

1 अप्रैल को देश में सक्रिय मामलों की तादाद 6,10,927 पर पहुंच गई, जो महज एक महीने पहले 1,65,000 थी. 6 अप्रैल को देश में 24 घंटों के भीतर 1,15,312 नए मामले आए, जो महामारी की शुरुआत के बाद सबसे बड़ा आंकड़ा है. कोविड कई गुना फैलता रहा है. यह बूंदाबांदी से शुरू हुआ और मूसलाधार बारिश में बदल गया. इसे केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली सरीखे राज्य कम से कम दो बार होते देख चुके हैं. यह ऐसा है जिसे बाकी देश भूल चुका था.

वायरोलॉजिस्ट टी. जैकब जॉन कहते हैं, ''यह सीधा-सा गणित है. अगर एक शख्स से दूसरे को संक्रमण लगता है, तो एक दिन में एक नया मामला होता है. लेकिन जब दो लोगों से दो और लोगों को संक्रमण लगता है, तो दो नए मामले होते हैं, फिर चार, फिर आठ और इसी तरह आगे.’’ इसे प्रजनन संख्या या ‘आर’ मूल्य के रूप में जाना जाता है और यह महामारी का प्रमुख निर्धारक है. मामले तब कम होते हैं जब आर मूल्य 1 से नीचे हो. 6 अप्रैल को देश में आर मूल्य 1.3 था, जबकि महज दो हफ्ते पहले यह 1.2 था.

दूसरी लहर बहुत तेजी से आई और स्थानीय स्तर पर बढ़ती संक्रमण दरों पर लगाम कसने में ढिलाई से इसे मदद मिली. अलग-अलग राज्यों में हालात और बदतर हैं—उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ का आर मूल्य 1.6 है, जबकि संक्रमण की चौथी लहर झेल रही दिल्ली में यह 1.5 है. इन तमाम राज्यों के आंकड़े महामारी के शुरू होने के बाद सबसे ऊंचे मुकाम पर हैं. महाराष्ट्र का आर मूल्य इस हक्रते 1.2 है.

सक्रिय मामलों की तादाद से कहीं ऊंचे आर मूल्य को वायरोलॉजिस्ट और डॉक्टर खतरे का सबब मानते हैं. गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल के चेयरमैन डॉ. नरेश त्रेहन कहते हैं, ''कोविड संक्रमण शरीर में फैलने में कुछ दिन लेता है. इसलिए जिन्हें कल संक्रमण लगा, वे कुछ दिनों बाद आंकड़ों में नजर आएंगे.’’ दूसरे शब्दों में, जो लोग अप्रैल में सरकारी मशीनरी के हरकत में आने से पहले संक्रमण का शिकार हुए, उन्हें कोविड के मामलों में गिना जाना अभी बाकी है.

नीति आयोग के सदस्य डॉ वी.के. पॉल कहते हैं, ‘‘हम बद से बदतर की तरफ जा रहे हैं. कोविड अब भी सक्रिय है और ठीक उस वक्त हमला बोलेगा जब हमें लगेगा कि हमने इस पर काबू पा लिया है. जब आंकड़े घट रहे थे, किसी भी राज्य को संतुष्ट नहीं होना चाहिए था, क्योंकि महामारी खत्म नहीं हुई थी.’’ वे मानते हैं कि पूरा देश अब जोखिम में घिरा है, बावजूद इसके कि 84 फीसद मामले महज आठ राज्यों से हैं—महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल, पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश. वे कहते हैं, ‘‘अगर मामले इसी तरह बढ़ते रहे तो हमारी व्यवस्था दबाव में आ जाएगी. अगर हम सतर्कता बनाए नहीं रखते हैं तो संक्रमण की शृंखला को कभी तोड़ नहीं पाएंगे. मास्क, आपसी दूरी और हाथों की सफाई जारी रहनी ही चाहिए.’’

कई मुंह वाला वायरस
देश में कोविड की दूसरी लहर की अलहदा बात यह है कि देश शुरुआती चीनी वायरस (डी614जी) के एक नहीं बल्कि चार अलग-अलग रूपों से जूझ रहा है. हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्यूलर ऐंड मॉलीक्यूलर बॉयोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. राकेश मिश्र कहते हैं, ''हर उस नए व्यक्ति के साथ जिसे यह संक्रमित करता है, वायरस के नया रूप बदलने की संभावना होती है.

ये बदलाव छोटी-मोटी गलतियों के तौर पर तकरीबन उस वक्त होते हैं जब वायरस अपनी नकल तैयार करने के लिए कोशिका पर कब्जा करने लगता है. मजबूर करता है कि यह अपने जेनेटिक कोड के उन्हीं टुकड़ों को चुने जो इसे जिंदा रहने में मददगार हैं. ज्यादातर मामलों में इसके रूप बदलने का ज्यादा असर नहीं पड़ता. लेकिन कभी-कभी वे वायरस को ज्यादा संक्रामक होने, रोग प्रतिरोधक क्षमता से बचने और बीमारी ज्यादा गंभीर करने में मदद करते हैं. फिर वे नए रूप बन जाते हैं.’’

देश में अब तक वायरस के 7,000 नए रूप दर्ज किए गए हैं. मगर एक स्ट्रेन, जो पिछले साल दिसंबर में देखा गया था, अपनी नकल तैयार करने में खास तौर पर कामयाब रहा है. यह महाराष्ट्र के 1,600 में से करीब 20 फीसद (लगभग 206) मामलों में पाया गया है. यह संख्या भले कम लगती हो, लेकिन हकीकत यह है कि यह स्ट्रेन अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले ज्यादा तेजी से फैल रहा है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि इसकी उस नोकदार प्रोटीन में दो बदले हुए रूप हैं जो मानव कोशिका तक इसका पहुंचना आसान बनाते हैं. इसका ‘एस्कैप’ या ई484क्यू रूप दक्षिण अफ्रीकी और ब्राजीलियाई स्ट्रेनों से मिलता-जुलता है और पहले बने एंटी-बॉडी से बच निकलने में मदद करता है. दूसरी तरफ, इस वायरस के एल452आर रूप की खासियतें कैलिफोर्नियाई रूप से मिलती-जुलती हैं जो इसे और ज्यादा संक्रामक बना देती हैं. यही बदला हुआ रूप नवंबर 2020 के बाद प्रबल वायरस बन गया है.

संबंधित अधिकारी इस स्ट्रेन पर नजर रखे हैं, लेकिन डब्ल्यूएचओ (विश्व स्वास्थ्य संगठन) या सीडीसी (सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन, अमेरिका) सरीखी वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाओं ने इसे अभी तक 'चिंताजनक वायरस’ का तमगा नहीं दिया है. ऐसा कुछ तो इसलिए है कि ये दो बदले हुए रूप कोविड-19 के 43 दूसरे रूपों में भी पाए गए हैं. लेकिन यह 'दिलचस्प रूप’ निश्चित तौर पर है क्योंकि इसका बदला हुआ रूप संक्रमण या टीकाकरण की वजह से शुरुआती चीनी रूप के खिलाफ पैदा पहले के एंटी-बॉडी को पछाड़ सकता है.

यह भारत में टीके लगाने के अभियान के लिए जरा चिंता की बात है. खासकर जब कोविशील्ड या कोवैक्सिन टीकों में से किसी एक की पहली डोज 7.5 करोड़ लोगों को और दूसरी डोज 1 करोड़ से ज्यादा लोगों को दी जा चुकी है. जाने-माने कॉर्डियोलॉजिस्ट और आइएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) के पूर्व डायरेक्टर डॉ. के.के. अग्रवाल कहते हैं, ''ई484क्यू रूप बेहद चिंताजनक है क्योंकि यह न केवल वायरस को कोशिका में आसानी से घुसने में मदद करता है, बल्कि यह रोग प्रतिरोधक क्षमता से बच निकलने में भी मदद करता है.

अगर इसका यह रूप फैलता है तो मतलब यह है कि पिछले साल हासिल तमाम रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिहाज से हम जहां से चले थे फिर वहीं पहुंच गए हैं.’’ वाकई, इसके ब्राजीलियाई रूप ने, जो मिलता-जुलता बदला हुआ रूप है, अमेजन के मानौस शहर में हजारों लोगों को फिर संक्रमित कर दिया, बावजूद इसके कि यहां के 75 फीसद नागरिक वायरस के शुरुआती चीनी रूप से पहले ही संक्रमित हो चुके थे.

इतनी ही चिंता की बात यह है कि ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में मिले विदेशी रूप भारत में भी पाए गए हैं. ब्रिटेन में मिले रूप के 737 मामले (ज्यादातर पंजाब में), दक्षिण अफ्रीकी रूप के 34 मामले और ब्राजीलियाई रूप का एक मामला दर्ज किया गया है.

तो भी विशेषज्ञ अकेले इन रूपों को देश में दूसरी लहर के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराते. राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के डायरेक्टर डॉ. सुजीत कुमार सिंह कहते हैं कि वायरस के बदले हुए ये रूप जरूर मिले हैं, लेकिन ''डेटा अभी हमें मामलों में बढ़ोतरी का सीधा संबंध इनसे जोडऩे की इजाजत नहीं देता.’’ डॉ. मिश्र भी कहते हैं कि वायरस के भारतीय रूप अब महीनों से देखे जाते रहे हैं, इसलिए ये नई लहर की वजह कतई नहीं हैं.

असल में, इसे अपनी मौजूदगी महसूस करवाने में इतना लंबा वक्त लगा, इसका यह मतलब भी हो सकता है कि यह शुरुआती चीनी रूप से ज्यादा संक्रामक नहीं है. वे कहते हैं, ‘‘जिम, यात्रा, स्कूल, इस साल सब कुछ खुल गया और कोविड की सावधानियों को घूरे के ढेर पर डाल दिया गया. ऐसी बेपरवाही संक्रामक रोगों को फलने-फूलने देती है.’’

क्या दूसरी लहर ज्यादा जानलेवा है?
देश में 2 अप्रैल को 713 मौतें दर्ज हुईं, जो इस साल एक दिन में हुई सबसे ज्यादा मौतें थीं. अगर कोविड की वजह से मार्च में करीब 100 मौतें रोज हो रही थीं, तो अप्रैल के पहले कुछ दिनों में यह आंकड़ा 400 पर पहुंच गया. विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमण के मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए मौतों में इजाफा होना स्वाभाविक है, लेकिन कुल मामलों में मौतों का प्रतिशत या मृत्यु दर (सीएफआर) उतनी ही है.

असल में, इस महीने हमारी 1.3 फीसद सीएफआर पिछले महीने के 1.5 फीसद से कम है. हालांकि बढ़ते मामलों की सबसे ज्यादा तादाद वाले दो राज्यों महाराष्ट्र (1.5) और पंजाब (1.8) में सीएफआर राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है. फिर भी इसे नए रूपों से जोडऩे का कोई निर्णायक सबूत नहीं है.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआइ) के चेयरमैन डॉ. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं कि वायरस अपना रवैया बदलकर ज्यादा संक्रामक भले हो रहा हो, लेकिन यह ज्यादा जानलेवा नहीं है. साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में कोविड वार्ड के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. विवेक नांगिया तस्दीक करते हैं, ''यह अब भी वही वायरस है और अब भी वही लक्षण हैं. संक्रमण फैला है, हमारे यहां अब ज्यादा मामले आ रहे हैं, लेकिन यह वायरस ज्यादा जानलेवा नहीं है.

बीमारी की बढ़त और नैदानिक साज-संभाल अब भी वही है.’’ मगर डॉक्टर यह जरूर कहते हैं कि अस्पतालों में भीड़ नहीं उमड़ पड़ी है और ज्यादा लोग ठीक हो रहे हैं, इसका यह मतलब नहीं कि यह वायरल संक्रमण कम घातक है. वाशी, नवी मुंबई के फोर्टिस में कोविड वार्ड की आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. फराह इंगले कहती हैं, ‘‘कोविड को हल्के में नहीं लिया जा सकता. हल्का संक्रमण भी गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है. निजी और मानवीय कीमत भी बहुत भारी है.’’

हमारी पांचस्तरीय रणनीति कितनी अच्छी है?
दूसरी लहर से लडऩे के लिए केंद्र ने नई रणनीति तैयार की—जांच करना, पता लगाना, इलाज करना, सार्वजनिक अनुपालन और टीके लगाना. इस रणनीति के पहले तीन हिस्से अब एक साल से भी ज्यादा वक्त से कायम हैं. तो भी, मौजूदा उछाल स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे पर असर डाल रही है. मसलन, दिल्ली में निजी अस्पतालों से अपने 30 फीसद बिस्तर कोविड के मरीजों के लिए सुरक्षित रखने के लिए कहा गया है.

बिहार में एक्वस पटना के 80 बिस्तरों वाले वार्ड में 4 अप्रैल को 90 मरीज थे, जबकि शहर के दूसरे अस्पतालों ने बताया कि उनके बिस्तर तेजी से भर रहे हैं. सबसे बदतर मार महाराष्ट्र और खासकर मुंबई को झेलनी पड़ रही है. बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) को ज्यादा गंभीर लक्षणों वाले मरीजों के वास्ते बिस्तर के लिए बगैर लक्षण वाले मरीजों को जल्दी छुट्टी देने का फैसला करना पड़ा.

इस बीच, शहर में रेम्डेसिविर और स्टेरॉइड सरीखी अहम दवाइयों के खत्म होने को लेकर भी चिंताएं हैं. स्वास्थ्यकर्मियों को फिर उतने ही घंटे काम करना पड़ रहा है जितने वे एक साल पहले करते थे. डॉ. इंगले कहती हैं, ‘‘हालत फिर वही हो गई है जो एक साल पहले थी. ये आंकड़े इसी तरह कई गुना बढ़ते रहे तो बिस्तर ही नहीं बल्कि स्वास्थ्यकर्मियों और दवाइयों की लाचारी के बारे में भी सोचना होगा.’’ डॉ. पॉल इसमें इतना और जोड़ते हैं कि राज्यों को इस आने वाली लहर के लिए तैयार रहना चाहिए.

वे कहते हैं, ‘‘कोविड के लिए जो समर्पित अस्पताल स्थापित किए गए थे, उन्हें फिर नया करना, जांचना-परखना और पूर्वाभ्यास करना होगा, ताकि मरीजों की तादाद बढ़े तो उन्हें असरदार ढंग से संभाल पाएं.’’

कोविड 2021 की युद्ध योजना में ‘जांच करना, पता लगाना, इलाज करना’ के अलावा दो और बातें जोड़ी गई हैं. ये हैं सार्वजनिक अनुपालन और टीके लगाना. डॉ. त्रेहन कहते हैं, ‘‘हम टीके लगाने के अपने मौजूदा लक्ष्य पर टिके रहते हैं, तो छह महीनों में हर्ड इम्यूनिटी का लक्ष्य लेकर चल सकते हैं. संक्रमण के इस हमले के साथ टीके से जुड़ी हिचकिचाहट से लडऩा और ज्यादा से ज्यादा लोगों को टीके लगाना बेहद जरूरी है. हम बेकाबू दूसरी लहर झेल नहीं सकते.’’

दूसरी लहर के लिए टीकाकरण 
भले ही देश में करीब 7 करोड़ लोगों को टीके की एक डोज मिल गई हो, कोविड के सबसे अधिक सक्रिय मामलों वाले पांच राज्यों ने अभी तक अपनी आबादी के 15 प्रतिशत का भी टीकाकरण नहीं किया है. राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा और भी कम 6 फीसद है. इसके विपरीत, इज्राएल ने अपनी जनसंख्या के कम से कम 59 प्रतिशत, भूटान ने 62 प्रतिशत, ब्रिटेन ने 47 प्रतिशत और अमेरिका ने 32 प्रतिशत लोगों को डोज दे दी है. इन देशों की टीकाकरण रणनीतियों में कुछ चीजें एक समान हैं, जिन्हें अपनाने में भारत विफल रहा है. इनमें से पहली रणनीति टीके की आपूर्ति से जुड़ी है.

इज्राएल ने पर्याप्त डोज के लिए फाइजर के साथ साझेदारी की, अमेरिका ने पर्याप्त मात्रा में टीकों के लिए 14 अरब डॉलर की सरकारी-निजी साझेदारी की और भूटान ने तब तक इंतजार किया जब तक उसके टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करने के लिए पर्याप्त मात्रा में डोज नहीं आ गई. भारत में टीकाकरण शुरू होने के दो महीने हो चुके हैं, इसके बावजूद, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कोवैक्सीन की डोज खत्म हो गई है और 5 अप्रैल को सिर्फ चार और दिनों के लिए कोविशील्ड का स्टॉक शेष था. तेलंगाना, राजस्थान, हरियाणा और ओडिशा का भी कहना है कि वे टीके के स्टॉक की किल्लत से जूझ रहे हैं.

दूसरी रणनीति, भारत की तरह इन देशों में भी वैक्सीन कार्यक्रम प्राथमिकता समूहों के साथ शुरू हुआ, लेकिन कुछ हफ्तों में 16 वर्ष से ऊपर के सभी लोगों के लिए खोल दिया गया. ब्रिटेन एकमात्र ऐसा देश है, जहां टीकाकरण अभी भी सभी के लिए खुला नहीं है लेकिन इसके पहले चरण में 15 समूह शामिल हैं और इसमें दूसरे चरण की तुलना में अधिक लोग हैं. इससे यह तय हो गया है कि शीशियां (वायल्स) बेकार नहीं जाएंगी और वे सभी लोग जो टीका लेना चाहते हैं, इसे ले सकते हैं.

भारत में, स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स के साथ 60 साल से ऊपर और पहले से बीमारियों से ग्रस्त लोगों (कोमॉर्बिडिटी) से आगे बढऩे में ही लगभग एक महीने का समय लग गया. इस तथ्य को देखते हुए कि पहले समूह में रुचि कम थी, विशेषज्ञों का कहना है कि आम जनता के लिए टीकाकरण बहुत पहले शुरू हो जाना चाहिए था. वैक्सीन विशेषज्ञ डॉ. गगनदीप कंग कहती हैं, ‘‘हमें उच्च जोखिम वाले लोगों का पूरा टीकाकरण कर देना चाहिए और उसके बाद आगे बढऩा चाहिए.’’

तीसरी रणनीति, इन देशों ने किसी भी टीके के निर्यात से पहले अपनी आबादी को प्राथमिकता दी. अमेरिका ने तो उन सामग्रियों का निर्यात भी रोक दिया है जिसे अन्य देशों को टीके बनाने के लिए आवश्यकता हो सकती है, ताकि वह सामग्री घरेलू उपयोग के लिए अधिक मात्रा में उपलब्ध हो. टीके की खरीद का इसका वर्तमान सौदा अपनी पूरी आबादी के दो बार टीकाकरण के लिए पर्याप्त है. दूसरी ओर, भारत ने 1 अप्रैल को वैक्सीन मैत्री पहल के तहत वैश्विक समुदाय को 6 करोड़ डोज की आपूर्ति की थी.

इनमें 1.04 करोड़ अनुदान के रूप में, 3.57 करोड़ डोज की वाणिज्यिक रूप से और 1.82 करोड़ टीके की कोवैक्सपहल के माध्यम से आपूर्ति की गई. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भले ही कहता हो कि उसके पास एक महीने में 6-7 करोड़ डोज बनाने की क्षमता है, लेकिन उसका समझौता भारत सरकार को 10 करोड़ डोज की आपूर्ति का ही है. भारत बॉयोटेक वर्तमान में लगभग 1 करोड़ की आपूर्ति कर रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि आबादी को देखते हुए, घरेलू जरूरत देश की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. अब तक, इस बात पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है कि दोनों कंपनियों में से किसी ने भारत के लिए अधिक डोज का वादा किया है या नहीं. हालांकि, केंद्र ने 4 अप्रैल को बयान जारी कर आश्वस्त किया कि भविष्य के सभी चरणों के लिए टीके का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है.

चौथी रणनीति है कि जिन देशों के टीकाकरण कार्यक्रम के आंकड़े बड़े दिखते हैं, उनकी व्यवस्था की पहुंच हर आदमी तक है. इससे अधिक से अधिक लोगों को टीकाकरण के लिए तैयार करने में मदद मिली है. डॉ. त्रेहन कहते हैं, ‘‘भारत में टीकों को लेकर कई झूठी अफवाहें और संदेह फैलाए गए हैं. टीके पूरी तरह से सुरक्षित हैं. अफवाहों और गलत सूचनाओं के कारण लोग उन्हें लेने में संकोच कर रहे हैं.’’

अमेरिका ने भी टीके की आपूर्ति और वितरण दोनों के लिए निजी क्षेत्र के साथ बड़े पैमाने पर साझेदारी की. भारत में, निजी क्षेत्र अभी भी केवल आंशिक रूप से कार्यक्रम में शामिल है—निजी अस्पताल केवल कोविशील्ड रख सकते हैं और छोटे क्लीनिकों को अभी तक शामिल नहीं किया गया है. स्वास्थ्य मंत्रालय के एक सूत्र के अनुसार, निजी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को टीका लगाने की अनुमति देने के लिए कई अनुरोध किए हैं. पर अनुचित तरीके से टीकाकरण, नकली टीके, जमाखोरी और वैक्सीन डेटा के विकेंद्रीकरण के डर से केंद्र अनुमति देने से हिचक रहा था.

हालांकि कुछ शर्तों के साथ एक खिड़की खोली गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि टीके के लिए पात्रता के साथ-साथ टीकों की आपूर्ति बढ़ाने, दोनों रणनीति पर ध्यान देने की आवश्यकता है. मुंबई स्थित संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. ओम श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘हमारे सभी प्राथमिकता समूह अभी भी शामिल नहीं हैं. 45 वर्ष से कम उम्र के लोग जो पहले से ही कई रोगों से ग्रस्त हैं, वे टीके का इंतजार कर रहे हैं. यह टीका अब सभी को दिया जाना चाहिए.’’

लेकिन भारत एकमात्र ऐसा देश नहीं है, जो अपने अधिकांश लोगों के टीकाकरण के लिए संघर्ष कर रहा है. सुदूरवर्ती विकसित देश भी इसके लिए संघर्षरत हैं—फ्रांस ने केवल 14 प्रतिशत लोगों को, जर्मनी ने 12 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया ने 1.9 प्रतिशत और जापान ने मात्र 0.8 प्रतिशत आबादी का टीकाकरण किया है. चीन, जहां पांच टीकों को मंजूरी दी गई है, वहां भी कमी देखी जा रही है और अब तक प्रति 100 लोगों में केवल 10 लोगों के लिए टीके का प्रबंध हो पा रहा है. ब्रिटेन 56 और अमेरिका 50 लोगों के लिए टीके का प्रबंध करने में सफल है.

दुर्भाग्य से भारत काफी पीछे है और प्रति 100 लोगों पर 6.1 डोज का ही प्रबंध है. हालांकि, चीन जून 2021 तक 56 करोड़ या 40 प्रतिशत आबादी को टीका लगा देने की बात कर रहा है. वह लोगों को टीका लेने के लिए समझाने के लिए वॉलेंटियर्स की सेवाएं लेने और मुफ्त आइसक्रीम देने जैसी रचनात्मक पहल की योजना बना रहा है. कुछ देश टीकाकरण के लिए प्रोत्साहित करने के लिए वैक्सीन पासपोर्ट देने की योजना बना रहे हैं, ताकि वे यात्रा करें तो उन्हें बार-बार आरटी-पीसीआर जांच न करानी पड़े. विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोत्साहन-वाली रणनीति भारत में भी काम कर सकती है.

स्ट्रेन पर निगरानी की जरूरत
देश में प्रभावी स्ट्रेन निगरानी प्रणाली और डेटा विश्लेषण की जरूरत है. वर्तमान में, हमारे पास बहुत सीमित जानकारी है. अशोका यूनिवर्सिटी में त्रिवेदी स्कूल ऑफ बॉयोसाइंसेस के निदेशक डॉ. शाहिद जमील कहते हैं, ‘‘वायरस कैसे विकसित हो रहा है और नए वैरिएंट किस हद तक फैल गए हैं, यह समझने के लिए और अधिक नमूने लेने की जरूरत है.’’ दरअसल, ब्रिटिश, ब्राजीलियाई और दक्षिण अफ्रीकी वैरिएंट के भारत में मौजूद होने की जानकारी 18 राज्यों के केवल 10,787 नमूनों पर आधारित है.

इसी तरह, पंजाब में ब्रिटिश स्ट्रेन की उपस्थिति राज्य से केवल 401 नमूनों पर आधारित है. महाराष्ट्र में भारतीय वैरिएंट केवल 1,600 नमूनों में पाया गया था. डॉ. अग्रवाल कहते हैं, ‘‘हम अधिक सीक्वेसिंग नहीं करते हैं तो पता लगाना मुश्किल होगा कि क्या कोई एक वैरिएंट अधिक हावी हो गया है.’’

दिसंबर 2020 में, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने घोषणा की थी कि भारतीय सार्स-कोवि 2 जीनोमिक्स कंसोटियम यानी आइएनएसएसीओजी अपने सीक्वेसिंग प्रयोग को तेज करेगा. देश ने हर राज्य से 5 प्रतिशत कोविड-पॉजिटिव नमूनों और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के सभी सकारात्मक नमूनों की जीनोमिक सिक्वेंसिंग की योजना बनाई थी. हालांकि, जनवरी और 18 मार्च के बीच कुल कोविड पॉजिटिव नमूनों में से 1 प्रतिशत या 7,664 से कम जीनोम की सीक्वेंसिंग हुई. देश में इस अवधि में 1,022,335 नए मामले आए, इस लिहाज से 51,117 नमूनों की सीक्वेंसिंग होनी चाहिए थी.

लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है क्योंकि हमारे पास अधिक नमूनों की सीक्वेंसिंग की क्षमता की कमी है. दिसंबर में जारी आइएनएसएसीओजी के मार्गदर्शन दस्तावेज के अनुसार, कंसोर्टियम के 10 संस्थानों में प्रति माह 30,000 से अधिक नमूनों की सीक्वेंसिंग की क्षमता है. इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स ऐंड इंटीग्रेटिव बॉयोलॉजी अकेले महीने में 10,000 से अधिक नमूनों की सीक्वेंसिंग की क्षमता रखता है. लेकिन इसे 18 मार्च तक केवल 3,186 नमूने मिले थे, जिनमें 1,586 की सीक्वेंसिंग की गई थी.

अधिकांश मामलों में लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें इसका कारण बनती हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, केवल आरटी-पीसीआर जांच और रैपिड एंटीजन टेस्ट के नमूने सीक्वेंसिंग के पात्र हैं. उन्हें भी जांच के पॉजिटिव आने के बाद 3-4 दिन बाद भेजा जाना चाहिए और -80 डिग्री सेल्सियस पर रखा जाना चाहिए. कोविड-पॉजिटिव नमूनों को ले जाने के लिए साधनों का इंतजाम भी कुछ राज्यों में मुश्किल हो गया है.

सीक्वेंसिंग में कमी के लिए वित्तीय बाधाएं भी हैं—दिसंबर में लॉन्च होने के तीन महीने बाद भी कंसोर्टियम को केंद्र सरकार से 90 करोड़ रु. ही मिले थे. डॉ. मिश्र, जिनका संस्थान कंसोर्टियम का हिस्सा है, का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों में लॉजिस्टिक और वित्तीय दोनों मुद्दों को सुलझा लिया गया है. वे कहते हैं, ‘‘हमारे पास अधिक निगरानी करने की क्षमता है, इसलिए हमें भारत में विभिन्न वैरिएंट्स और उनकी प्रकृति पर अधिक जानकारी हासिल करने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए.’’

सीडीसी के अनुसार, पांच मुख्य कारणों से वैरिएंट चिंतित करने वाले हैं, ये हमारे हर कवच को भेद देते हैं और जानलेवा साबित होते हैं. इन पांचों में से आखिरी लक्षण तो दक्षिण अफ्रीकी, ब्राजीलियाई और नए उभरते भारतीय म्यूटेंट में पहले ही देखा जा चुका है. विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही टीके किसी भी प्रकार के वैरिएंट के आगे विवश हो जाते हों, फिर भी नियंत्रण और सुरक्षा तो ज्यादातर हमारे ही हाथों में है.

अगले एक साल के लिए कोविड को लेकर सतर्कता जरूरी है. इसके साथ ही, सरकार को अपने टीकाकरण अभियान का विस्तार देने और निजी खिलाडिय़ों को शामिल करने की आवश्यकता है. आखिरकार, ढिलाई कोविड की तुलना में अधिक घातक हो सकती है.

‘‘हम बद से बदतर की ओर बढ़ रहे हैं. कोविड अभी भी बेहद सक्रिय है, जैसे ही सोचेंगे कि काबू में आ गया, वह तेजहो जाएगा.’’
डॉ. वी.के. पॉल,  सदस्य, नीति आयोग

‘‘ई484क्यू म्यूटेशन वाले वायरस का प्रकोप अगर बढ़ता है तो समझिए, पिछले साल हमने जो प्रतिरोधक क्षमता हासिल की थी, वह सब शून्य हो गई.’’ 
डॉ. के.के. अग्रवाल
पूर्व डायरेक्टर, आइएमए

‘‘जिम, स्वीमिंग पूल, स्कूल, यातायात सब इस साल खुल गए. ऐसी बेपरवाही ही तो संक्रामक रोगों के लिए मुफीद होती है.’’
डॉ. राकेश मिश्र, 
डायरेक्टर, सीसीएमबी

‘‘वायरस कैसे रूप बदल रहा है और प्रकोप किस पैमाने पर है, सही जानकारी के लिए ज्यादा नमूनों की सिक्वेंसिंग जरूरी.’’
डॉ. शाहिद जमील
डायरेक्टर, त्रिवेदी स्कूल ऑफ बॉयोसाइंसेज, 
अशोका युनिवर्सिटी

—सोनाली आचार्जी, इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास

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