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आवरण कथाः धरती को आखिर बचाएं तो कैसे

10 ऐसी बड़ी पहलकदमियां जिनके जरिए जलवायु पर लगातार टूट रहे कहर से बचा जा सकता है.

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भारत अब दुनिया के शीर्ष पांच पवन ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल है भारत अब दुनिया के शीर्ष पांच पवन ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल है

प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को नाटकीय चीजें पसंद हैं. ग्लासगो में 1 नवंबर को जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन के उद्घाटन के अवसर पर ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉनसन ने मौजूदा हालात की तुलना स्कॉटलैंड के प्रतिष्ठित व्यक्ति, काल्पनिक खुफिया एजेंट जेम्स बॉन्ड की हालत से की, जिसे एक 'कयामत बरपाने वाले उपकरण’ से बांध दिया जाता है जो पूरी धरती को तबाह कर देगा.

टाइमर तेजी से जीरो की ओर उलटी गिनती शुरू कर रहा है और बॉन्ड उसे निष्क्रिय करने की हर संभव कोशिश कर रहा है. इसके बाद जॉनसन ने कहा, ''हम वैश्विक नेता कमोबेश उसी स्थिति में हैं जिसमें आज जेम्स बॉन्ड है, फर्क बस इतना है कि यह त्रासदी कोई मूवी नहीं है...कयामत लाने वाला उपकरण असली है...जलवायु परिवर्तन से होने वाली तबाही रोकने के लिए चंद घड़ियां बची हैं.

वैश्विक नेताओं का वार्षिक जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन 'बकवासबाजी’ का महज एक और आयोजन होने वाला था, जैसा कि स्वीडन की जलवायु एक्विविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने कहा था. लेकिन इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आइपीसीसी) की हालिया रिपोर्ट की चेतावनी के बाद यह 'आखिरी मौके’ के रूप में बदल गया. रिपोर्ट में चेताया गया है कि हाल के दशकों में पृथ्वी इतनी तेजी से गर्म हो रही है कि 2050 तक जलवायु को अपरिवर्तनीय नुक्सान पहुंचेगा.

कार्बन फुटप्रिंट किसका ज्यादा
कार्बन फुटप्रिंट किसका ज्यादा

इससे पहले यह अनुमान था कि इस तरह की तबाही सदी के आखिर में ही होगी. इनसानों के इस्तेमाल के लिए ऊर्जा तैयार करने की खातिर पेट्रोलियम और कोयला जैसे जीवाश्म ईंधनों को बड़े पैमाने पर जलाने की वजह से ग्लोबल वार्मिंग पैदा करने वाली ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) का स्तर पिछले 100 साल में करीब दो गुना हो गया है (देखें ग्राफिक). नतीजतन, दुनिया का औसत तापमान 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है, जिससे गंभीर बाढ़ और सूखा पड़ने समेत मौसम का मिजाज तेजी से बदला है.

इनकी वजह से बड़े पैमाने पर लोगों की जान गई है, माल का नुक्सान हुआ है और तबाही हुई है. इस दौरान समुद्रों के गर्म होने की वजह से ध्रुवों पर जमी बर्फ तेजी से कम होने लगी है, जिससे समुद्र का जल स्तर औसतन 23 सेंटीमीटर बढ़ गया है, और इससे मुंबई के कुछ हिस्सों के डूबने समेत कई द्वीप देशों और तटीय नगरों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है.

जलवायु परिवर्तन का सेहत पर असर
जलवायु परिवर्तन का सेहत पर असर

विकसित देशों, खासकर अमेरिका, जो दुनिया के तीन प्रमुख जीएचजी उत्सर्जकों में होने के बावजूद जलवायु परिवर्तन रोकने के मामले में फिसड्डी रहा है, ने आइपीसीसी के नतीजों का इस्तेमाल 2050 तक दुनिया के देशों को अपना कार्बन उत्सर्जन 'नेट जीरो’ यानी शून्य घोषित करने की मांग करने के लिए किया. नेट जीरो का मतलब है कि सभी देशों को अपने जीएचजी उत्सर्जन को विभिन्न उपायों के जरिए वातावरण से हटाकर उसका असर खत्म करना है.

लेकिन भारत समेत विकासशील देशों ने नए लक्ष्य को 'बड़ा छल’ करार दिया और विकसित देशों पर अपनी प्रतिबद्धताओं से पल्ला झाड़ने का आरोप लगाया. इन देशों ने 2015 में पेरिस एग्रीमेंट के तहत 2030 तक अपने जीएचजी उत्सर्जन में पर्याप्त कमी लाने की प्रतिबद्धता जाहिर की थी. वे इसे विकसित राष्ट्रों के विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के विनाशक प्रभाव से निबटने के लिए वित्तीय और हरित प्रौद्योगिकी मुहैया करने की अपनी प्रतिबद्धता से मुकरने के तरीके के रूप में देख रहे हैं.

कार्बन डाइऑक्साइड का खतरा
कार्बन डाइऑक्साइड का खतरा

विकसित देशों ने पेरिस में विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप बदलने और उसे रोकने के लिए 2020 से 2030 तक हर साल 100 अरब डॉलर के बराबर वित्तीय मदद देने का वादा किया था. लेकिन उन्होंने पहले साल उससे काफी कम पैसा दिया और अब इसे 2023 से शुरू करने की चाल चल रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ग्लासगो में जीएचजी कम करने की भारत की प्रतिबद्धता को और बढ़ाने के साथ ही यह भी ऐलान कर दिया कि हम 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन वाले राष्ट्र बन जाएंगे. उन्होंने टांग खींचने वालों की जमकर आलोचना की.

उन्होंने कहा, ''हम सब इस सत्य को जानते हैं कि जलवायु (परिवर्तन से निबटने के लिए) वित्त पोषण के वादे अभी तक खोखले साबित हुए हैं. आज जब भारत ने नई प्रतिबद्धता और उत्साह के साथ आगे बढ़ने का प्रण किया है तो ऐसे समय में जलवायु वित्त पोषण और कम लागत वाली प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

प्रधानमंत्री सही कह रहे हैं. विकासशील देशों को जीएचजी उत्सर्जक जीवाश्म ईंधनों से हटाकर अक्षय ऊर्जा के स्रोतों जैसे स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों की ओर ले जाने के लिए पैसा और हरित प्रौद्योगिकी बेहद जरूरी हैं. कयामत रोकने के लिए वैश्विक सहमति जरूरी है. यह सहमित आगे के पन्नों पर बताई गईं 10 प्राथमिक पहल को बढ़ाने समेत जलवायु न्याय और समानता के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए. विशेषज्ञों ने इन्हें ऐसी पहल माना है जो इस ग्रह के बचे रहने और निरंतर विनाश के बीच फर्क पैदा कर सकती हैं.

1 अब बैटरी पर बल
बिजली से कार चलाओ, दुनिया को प्रदूषण से बचाओ
हम जिस तरह कहीं जाते-आते हैं, वह कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण बनता है. दुनिया के जीएचजी उत्सर्जन में वाहन क्षेत्र का हिस्सा करीब 16 फीसद है. इसका 48 फीसद 90 करोड़ यात्री कारों से पैदा होता है. बिजली से चलकर शून्य कार्बन उत्सर्जित करने वाली कारों के आने के साथ ही एक क्रांति आने वाली है.

बिजली से चलने वाली कारें (इलेक्ट्रिक कार) पिछले पांच साल में हर साल 40 फीसद से ज्यादा की दर से बढ़ रही हैं. इस भारी वृद्धि के बावजूद सड़कों पर मौजूद 80 लाख इलेक्ट्रिक कारें दुनिया में यात्री कार बाजार का एक फीसद से भी कम हैं. भारत में भले ही एक दर्जन से भी ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता हैं, लेकिन देश में कुल यात्री वाहनों में इलेक्ट्रिक कारों का हिस्सा नगण्य है.

वैसे, बैटरी बाजार में लिथियम-आयन (लि-ऑन) प्रौद्योगिकी के हावी होने के साथ इसमें वृद्धि की अपार संभावना है. पिछले एक दशक के दौरान बैटरी की कीमत 85 से ज्यादा कम हो गई है. इसके बावजूद इस प्रौद्योगिकी को आदर्श नहीं माना जा सकता. लि-ऑन बैटरी से चलने वाले वाहन सीमित मात्रा में ही बिजली स्टोर कर सकते हैं—औसतन वे उसके दम पर करीब 200 किमी जा सकते हैं और उसे पूरी तरह चार्ज करने के लिए 4-6 घंटे लगते हैं. यह शहरों में चलने वाली कारों के लिए तो सही हो सकती है लेकिन लंबी दूरी नापने वाले मालवाहक ट्रकों के लिए सही नहीं है.

कई प्रमुख शोध केंद्र लि-ऑन बैटरियों के आगे के संस्करण पर काम कर रहे हैं, जिनमें लिथियम-सल्फर और जिंक-एयर जैसे नए रसायन शामिल हैं. जून में अमेरिका की एक साइंस कंपनी ने इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी के क्षेत्र में बड़ी कामयाबी का ऐलान किया. उसने कमर्शियल ग्रैफाइट पाउडर में सिलिकॉन नैनोवायर को फ्यूज किया, जिससे गाड़ी की औसत माइलेज तीन गुना हो गई और चार्जिंग का समय तथा लागत भी कम हो गई. लेकिन चार्जिंग केंद्र समेत इन्फ्रास्ट्रक्चर भी उतना ही जरूरी है. दिल्ली सरकार ने ऐलान किया है कि वह अपार्टमेंटों, अस्पतालों, मॉल और दूसरी व्यावसायिक जगहों के पार्किंग क्षेत्रों में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए मामूली शुल्क लेकर प्राइवेट चार्जर लगाने की इजाजत देगी. 

2 हरियाली की राह
एक सूरज, एक धरती, एक ग्रिड

हमें अक्षय ऊर्जा के सबसे ज्यादा संभावनाओं वाले स्रोत—सौर—का दोहन करने के लिए एक बैटरी क्रांति की जरूरत है. मोदी के नेतृत्व में भारत ने अपनी सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता 2014 में 2.6 गीगावाट (जीडब्ल्यू) से बढ़ाकर फिलहाल 40 जीडब्ल्यू तक पहुंचा दिया है और 2030 तक इसे 280 जीडब्ल्यू तक पहुंचाने बड़ा लक्ष्य रखा है. मोदी ने ग्लासगो में ऐलान किया कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 50 फीसद हिस्सा सौर, पनबिजली, पवन और बायोमास जैसे अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से पूरा करेगा.

इसका मतलब यह हुआ कि गैर जीवाश्म ऊर्जा की क्षमता 500 जीडब्ल्यू तक बढ़ाना होगा, जिसमें सौर ऊर्जा का हिस्सा 60 फीसद होगा. इस बीच भारत ने पेरिस जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में इंटरनेशनल सोलर अलाएंस (आइएसए) को बढ़ावा दिया, जिसमें 100 से ज्यादा देशों को दुनियाभर में सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए सहयोग करते देखा गया. लेकिन सौर ऊर्जा केवल सूरज की रोशनी में ही बन सकती है लिहाजा इसकी आपूर्ति बाधित होती रहती है जो बड़ी खामी है.

रात में इस्तेमाल के लिए बिजली संरक्षित करना दूसरी बड़ी समस्या है. लेकिन अच्छी खबर यह है कि बैटरी फार्मों और बैंकों के विकास के साथ ही स्टोरेज टेक्नोलॉजी तेजी से सुधर रही है. इनमें 1 जीडब्ल्यू तक ऊर्जा स्टोर की जा सकती है. इसके बावजूद इनकी अपनी सीमाएं हैं. इससे पार पाने के लिए आइएसए ने ग्लासगो शिखर समिट में ब्रिटेन और भारत के नेतृत्व वाली ग्रीन ग्रिड इनिशिएटिव (जीजीआइ) के साथ एक सूरज, एक धरती, एक ग्रिड (ओएसओडब्ल्यूओजी) नामक बड़ी पहल शुरू की.

आइएसए के महानिदेशक अजय माथुर का कहना है कि हम ग्लोबल टेलीफोनी की तरह ही हरित बिजली के लिए अंतरराष्ट्रीय ग्रिड बना सकते हैं. विभिन्न देशों को जोडऩे वाले बिजली के ग्रिड को बनाकर एक देश की अतिरिक्त सौर ऊर्जा को जरूरतमंद दूसरे देश को बेचा जा सकता है, जिससे बड़े बैटरी स्टोरेज प्लांट्स या संयंत्रों की जरूरत कम हो जाएगी.

दुनियाभर में विभिन्न देशों में दिन का समय अलग-अलग होने की वजह से इन स्मार्ट ग्रिडों के जरिए निरंतर और अबाध ऊर्जा प्रवाहित हो सकती है और इस तरह बिजली की कटौती की समस्या दूर हो सकती है. आइएसए के महानिदेशक माथुर का कहना है, ''हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि सौर ऊर्जा दुनियाभर में सस्ती और विश्वसनीय हो. इससे हमें दुनियाभर में बिजली पारेषण और वितरण की खातिर इन विश्वव्यापी ग्रिडों के लिए जरूरी निवेश हासिल होगी. 

3 आग्रह नए ईंधन का
गैस की ओर ध्यान दें जनाब

असल में दुनिया के विकसित देश अब कार्बन-मुक्त अर्थव्यवस्था की तरफ निर्णायक ढंग से बढ़ रहे हैं. दूसरी ओर, औद्योगिक क्रांति में पीछे छूट गए विकासशील देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए सबसे लागत-प्रभावी विकल्प के तौर पर तेल और कोयले पर अत्यधिक निर्भर हैं.

अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता तेजी से बढ़ाने के बावजूद भारत अपनी 80 फीसद ऊर्जा जरूरतें अब भी जीवाश्म ईंधन स्रोतों से पूरी करता है, जिनमें कोयले से चलने वाले तापबिजली संयंत्र भी शामिल हैं. आर्थिक विकास प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत का बढ़ना जरूरी बना देता है और 2050 तक भारत की ऊर्जा जरूरत में पांच गुना बढ़ोतरी की उम्मीद है. इसका अर्थ है कि भारत को दशकों तक जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर रहना होगा.

अंतरिम समाधान के तौर पर विशेषज्ञ एक ऐसे जीवाश्म ईंधन पर जोर दे रहे हैं जो वायुमंडल में बहुत कम कार्बन डाइऑक्साइड मुक्त करे, जैसे प्राकृतिक गैस. अपनी मौलिक किताब द नेक्स्ट स्टॉप: नेचुरल गैस ऐंड इंडियाज जर्नी टुवड्रर्स अ क्लीन एनर्जी फ्यूचर में विक्रम सिंह मेहता, जो शेल इंडिया के पूर्व सीईओ और सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस (सीएसईपी) के चेयरमैन हैं, और अन्य विशेषज्ञ स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते हुए संक्रमण ईंधन के रूप में गैस की वकालत करते हैं.

आश्चर्य की बात यह है कि जबरदस्त संभावनाओं के बावजूद भारत की ऊर्जा बास्केट में गैस का हिस्सा कम ही है. मेहता इसके दो कारण बताते हैं. एक, कीमतों पर अत्यधिक नियंत्रण, जिससे गैस भंडारों के उत्खनन और दोहन में निवेश बाधित हुआ और इसके व्यावसायिक तौर पर मुफीद होने पर भी असर पड़ा. दूसरा, बुनियादी ढांचे की कमी, खासकर उत्पादन केंद्रों से उपभोक्ता तक गैस ले जाने के लिए पाइपलाइनों का न होना.

स्वच्छ ऊर्जा के लिए गैस को सेतु ईंधन के रूप में मान्यता देते हुए मोदी सरकार ने साल 2017 में ऐलान किया कि साल 2030 तक उसके ऊर्जा मिश्रण में 15 फीसद हिस्सा गैस का होगा. पिछले साल मोदी सरकार ने 'एक देश, एक गैस ग्रिड’ कार्यक्रम का ऐलान किया, जिसमें तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के बुनियादी ढांचे का विस्तार करते हुए साल 2030 तक 407 जिलों में 15,000 गैस पाइपलाइनें बिछाई जाएंगी. मेहता बताते हैं कि भविष्य में हाइड्रोजन सरीखी ज्यादा स्वच्छ दूसरी गैसों की ढुलाई के लिए इस पाइपलाइन नेटवर्क के बड़े हिस्से को उन्नत बनाया जा सकता है.

4 स्लेटी से हरे की ओर
हाइड्रोजन पर है बड़ा दांव

हाइ स्कूल के ज्यादातर छात्रों को विज्ञान का वह सीधा-सादा प्रयोग याद होगा, जिसमें बिजली के एक तार से पानी में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को अलग किया जाता था. इस प्रक्रिया को इलेक्ट्रोलीसिस कहते हैं. उनमें से कम ही ने इसमें स्वच्छ ऊर्जा की वैश्विक तलाश का समाधान देखा होगा, खासकर इमारतों को गर्म रखने, लंबी दूरी के परिवहन या सीमेंट स्टील और एल्यूमिनियम सरीखे भारी उद्योगों में ऊंचा तापमान उत्पन्न करने के लिए.

अजीब बात यह कि दशकों से 95 फीसद औद्योगिक ऑक्सीजन कोयले या प्राकृतिक गैसों से निकाली जाती रही, जिससे उत्पादित हाइड्रोजन के हरेक टन पर 12 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ. स्लेटी से (कम कार्बन छोड़ने वाली) ब्लू हाइड्रोजन और अब उसके कहीं ज्यादा महंगे ग्रीन और स्वच्छ ईंधन संस्करण की तरफ यह यात्रा हाल में शुरू हुई जब देश ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर सख्ती से लगाम कसने लगे.

कारोबार के तमाम बड़े आका अब हाइड्रोजन ऊर्जा से संचालित भविष्य पर दांव और पैसा लगा रहे हैं. रिलांयस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने इसी सितंबर में ऐलान किया कि वे ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए जामनगर फैक्ट्री में गीगा इलेक्ट्रोलाइजर लगा रहे हैं. दुनिया ग्रीन हाइड्रोजन की उत्पादन लागत 2 डॉलर प्रति किलो तक लाने में जुटी है. अंबानी ने कहा है कि भारत को और भी ज्यादा महत्वाकांक्षी लक्ष्य साधकर इस ईंधन में विश्व अगुआ बनना चाहिए.

अंबानी ने इसे 1-1-1 फॉर्मूला कहा, यानी 1 दशक में 1 किलो ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत घटाकर 1 डॉलर पर लाएं और इसे पेट्रोलियम आधारित ईंधनों से भी सस्ता बना दें. ग्रीन हाइड्रोजन के सस्ते उत्पादन की कुंजी यह है कि इलेक्ट्रोलाइजर फैक्ट्रियों के बगल में सौर या पवन ऊर्जा संयंत्र लगाएं ताकि इसे बनाने में सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा का ही इस्तेमाल हो. अंबानी जामनगर के 5,000 एकड़ में जो ग्रीन एनर्जी कॉम्लेक्स बना रहे हैं, उसमें ठीक यही कर रहे हैं.

इस साल अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन का ऐलान किया. इसमें बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोडन का उत्पादन और देश भर में उसका उपयोग किया जाएगा और इसे नीति, टेक्नोलॉजी और नियमन में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं के अनुरूप बनाया जाएगा. जलवायु संकट के समाधान के लिए हाइड्रोजन ईंधन दुनिया भर में अगला बड़ा धमाका होने जा रहा है.

5 परमाणु ऊर्जा की वापसी
फ्यूजन पर नजरें

जी वाश्म ईंधन का प्रमुख विकल्प होने के बावजूद फ्रांस जैसे कुछ देशों को छोड़कर परमाणु ऊर्जा को तवज्जो देने में लगातार गिरावट दिखी है. इसका एक कारण लोगों और पर्यावरणविदों की तरफ से कुछेक परमाणु दुर्घटनाओं के बाद आई तीखी प्रतिक्रिया भी है, जैसा कि 2011 में फुकूशिमा दायची परमाणु संयंत्र हादसे के बाद देखने को मिला.

तब से परमाणु ऊर्जा संस्थान रिएक्टर तकनीक को अधिक सुरक्षित बनाने में काफी मेहनत कर रहे हैं. भारत समेत अन्य कई देशों में नाभिकीय ऊर्जा तेजी से वापसी कर रही है क्योंकि एमआइटी समेत कुछ और प्रतिष्ठित शोध संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि अगर नए ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा को शामिल न किया गया तो स्वच्छ ईंधन की कीमत चार गुनी बढ़ जाएगी. 

भारत में सभी तरह के ऊर्जा उत्पादन में परमाणु ऊर्जा का हिस्सा 3.3 प्रतिशत है. सरकार ने हाल ही में 700 मेगावाट के 10 परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने की अनुमति दी है जो 2030 तक बनाए जाएंगे. परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व चेयरमैन अनिल काकोदकर मानते हैं कि प्रौद्योगिकी पर हमारी दक्षता को देखते हुए भारत को कई छोटे परमाणु संयंत्र स्थापित करना चाहिए.

वे इस बात की भी वकालत करते हैं कि पुराने और बेकार कोयले से चलने वाले ऊर्जा संयंत्रों को बंद कर दिया जाए और उनके बदले बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाए जाएं. फिलहाल भारत फास्ट ब्रीडर रिएक्टर लगाने में तेजी से प्रगति कर रहा है, चूंकि ये ईंधन का दोबारा इस्तेमाल होता है इसलिए ये कहीं ज्यादा किफायती हो जाते हैं.

असली उम्मीद परमाणु विखंडन (फिशन) से नहीं बल्कि संलयन (क्रयूजन) से है-न्यूक्लियर रिएक्शन जिसके अनंत कार्बन मुक्त ऊर्जा उत्पादन से सूर्य चमकता है. दक्षिण फ्रांस में भारत, अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपियन यूनियन जैसे 35 देशों के सहयोग से विश्व के सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में शामिल थर्मोन्यूक्तियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर (आइटीईआर) के तहत दुनिया के सबसे बड़े टोकामैक बनाने पर काम चल रहा है.

टोकामैक एक विशालकाय चुंबकीय यंत्र है जिसे फ्यूजन प्रौद्योगिकी की उपादेयता सिद्ध करने की खातिर डिजाइन किया गया है. इस अविश्वसनीय रूप से जटिल प्रक्रिया में हाइड्रोजन एटम को फ्यूज कर ऊर्जा उत्पादन के लिए दस लाख डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान पैदा किया जाता है. आइटीईआर के 2025 तक कामयाब होने की उम्मीद है, अगर यह सफल रहा तो पूरी दुनिया को वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिए उपलिब्ध होगा. और काकोदकर इसी का इंतजार कर रहे हैं.

6 हवा के साथ बहाव
ऊर्जा का एक विशाल पंख

जहां सौर ऊर्जा ने सुर्खियां बटोर ली है, वहीं पवन ऊर्जा भी दुनिया और भारत में लगातार प्रगति कर रही है. 39,000 मेगावाट की स्थापित क्षमता के साथ, जो देश के कुल उत्पादन का 10 फीसद है, भारत अब दुनिया के शीर्ष पांच पवन ऊर्जा उत्पादक देशों में शामिल है. बदलाव की बयार टर्बाइन के डिजाइन और निर्माण में बह रही है, जो उन्हें सस्ते दाम पर ज्यादा बिजली पैदा करने में सक्षम बनाएगी.

टर्बाइन की ब्लेड की लंबाई औसतन करीब 20 मीटर (लगभग क्रिकेट की एक पिच के बराबर) होती थी, जिन्हें अब बढ़ाकर 50 मीटर या उससे ज्यादा कर दिया गया है. उनमें से कई के पास अब एक औसत यात्री जेट विमान के पंख हैं. रोटर ब्लेड का रेडियस जितना अधिक होगा, उतना ही बेहतर तरीके से वे हवा का दोहन कर सकते हैं और विद्युत शक्ति का उत्पादन कर सकते हैं.

इसके साथ ही टर्बाइन लंबे भी होते जा रहे हैं, वे 250 मीटर की ऊंचाई को छू रहे हैं, यानी नरीमन पॉइंट स्थित एयर इंडिया के मुख्यालय से दोगुना. इन दोनों बदलावों से पवन टर्बाइन से बिजली उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है, जो करीब 5 मेगावाट है.

आगे बढ़ते हुए, पवन टर्बाइन प्रतिष्ठान खुले समुद्र में स्थानांतरित हो गए हैं, जहां हवा की गति आम तौर पर अधिक होती है, अधिक नियमित होती है और टावरों को खड़ा करने के लिए जगह की भी कोई कमी नहीं होती है. 7,500 किमी से अधिक तटरेखा के साथ भारत 127 गीगावाट अपतटीय पवन ऊर्जा पैदा कर सकता है.

लेकिन वह उस क्षमता का केवल एक अंश ही दोहन कर रहा है. देश के तटीय राज्यों को उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश और तकनीकी समर्थन की जरूरत है. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने 2030 तक 30 गीगावाट पवन ऊर्जा की अपतटीय क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य रखा है. लेकिन इसके लिए पहले इसे विभिन्न शुल्कों और करों को सुलझाने की जरूरत है.

7 हरित क्रांति 2.0
मांस उगाएंगे!

अगर दुनिया की अनुमानित 1.4 अरब गोजातीय आबादी का कोई अपना राष्ट्र होता तो वह दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश होता. अकेले भारत में लगभग 30 करोड़ गोजातीय पशु हैं जिनमें करीब 11 करोड़ भैंस और 8.1 करोड़ गाय हैं. दुनियाभर में गोजातीय पशु दूध और मांस, दोनों के उत्पादन में योगदान देते हैं.

एफएओ (खाद्य एवं कृषि संगठन) के मुताबिक, साल 2018 में दुनिया का मांस उत्पादन 34.2 करोड़ टन था. उसमें 38 फीसद सुअर का मांस (पोर्क), 33 फीसद चिकन और बीफ करीब 20 फीसद था. ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन में पशुधन का योगदान करीब 6 फीसद है. ग्लोबल वार्मिंग के मामले में, ये पशु जो मीथेन गैस पैदा करते हैं वह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 100 गुना ज्यादा शक्तिशाली है.  

दुनिया की आबादी लगातार बढ़ रही है, ऐसे में मांस की मांग भी तेजा सी बढ़ने की उम्मीद है. पौधों या पौधों के कचरे (इथेनॉल या कोई अन्य उन्नत जैव ईंधन) से ऊर्जा उत्पादन करने के लिए बढ़ते आंदोलन के साथ, पशुओं को खिलाने से खाद्य फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा होगी और वनों की कटाई की गति बढ़ने के अलावा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि होगी.

पशुओं को मारने की जरूरत को खत्म करते हुए स्टेम-सेल तकनीक का इस्तेमाल करके मांस उगाने के लिए दुनियाभर की प्रयोगशालाओं में शोध चल रहे हैं. नीदरलैंड में एक खाद्य प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप, मोसा मीट ने आठ साल पहले स्टेम-सेल से उगाए गए पहले हैमबर्गर को पेश किया था. वह अब सेल-संवर्धित किफायती बीफ पर काम कर रहा है.

कंपनी का दावा है कि अगर उनका शोध कामयाब हुआ तो एकल गोजातीय से प्राप्त स्टेम-सेल एम्सटर्डम जैसे बड़े शहर को खिलाने के लिए पर्याप्त मांस का उत्पादन कर सकते हैं. अन्य स्टार्ट-अप अब कृत्रिम मांस का उत्पादन कराने की दौड़ में हैं. यह खाद्य उत्पादन में दूसरी हरित क्रांति ला सकता है और हानिकारक उत्सर्जन में उल्लेखनीय कटौती कर सकता है. यह एक तरह परिवर्तनकारी शोध और प्रौद्योगिकी है जिसमें दुनिया को निवेश करने की जरूरत है.

8 नेट जीरो
कार्बन कारोबार

वर्ष 2050 तक नेट जीरो एमिशन (शून्य उत्सर्जन) के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पेरिस सम्मेलन में सूचीबद्ध अंतरराष्ट्रीय कार्बन व्यापार प्रणाली की नींव तैयार करना ग्लासगो शिखर सम्मेलन के प्रमुख मकसदों में शामिल था. यह राष्ट्रों को एक-दूसरे को क्रेडिट हस्तांतरित करने और अपने जीएचजी उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने में सक्षम करेगा.

ट्रेडिंग सिस्टम के आलोचकों का कहना है कि यह सबसे ज्यादा प्रदूषण करने वाले विकसित देशों और कंपनियों को छूट देगा ताकि वे गरीब देशों से शोषणकारी कीमतों पर क्रेडिट खरीदकर अपने खुद के उत्सर्जन में गहरी कटौती करने से बच सकें. इसको लेकर भी मतभेद हैं कि क्या नई व्यापार प्रणाली पहले के प्रोटोकॉल के तहत अनुमत ऐतिहासिक उत्सर्जन को मान्यता देगी.

अन्य ऐसे नियम चाहते हैं जो दोहरे क्रेडिट की अनुमति दें—कार्बन कम करने की किसी विशेष परियोजना को वित्तपोषित करने वाले राष्ट्र के लिए, और फिर इसे लागू करने वाले देश के लिए. तीसरा मुद्दा यह है कि क्या इस तरह के द्विपक्षीय व्यापार समझौते से राजस्व का एक हिस्सा संयुक्त राष्ट्र के एडेप्टेशन फंड में जाएगा. ऐसे क्रेडिट के लिए अकाउंटिंग सिस्टम की अखंडता को लेकर भी चिंताएं हैं.   

इस बीच यूरोपीय संघ, चीन और रूस ने कुछ उद्योगों के लिए पहले ही कार्बन बाजार शुरू कर दिया है. दो तरह के स्कीम प्रचलन में हैं. पहला कैप ऐंड ट्रेड नामक उत्सर्जन व्यापार योजना है, जहां सरकार एक इकाई के लिए जीएचजी उत्सर्जन की सीमा निर्धारित करती है. दूसरा विकल्प कार्बन टैक्स है, जहां जीएचजी उत्सर्जन पर एक सामूहिक शुल्क लगाया जाता है ताकि संस्थानों को कम उत्सर्जन करके कम टैन्न्स देने के लिए प्रोत्साहन मिले.

9 जलवायु निधि
पैसे तो दो

इस साल 1992 में जलवायु समझौते की शुरुआत से ही यह तथ्य केंद्र में रहा है कि काफी समय पहले से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कर वातावरण में डाल रहे विकसित देश, विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने और नए उपाय अपनाने में आर्थिक मदद करें. ''साझा लेकिन विभिन्न दायित्व रियो में सहमति पर बने इस सिद्धांत पर आधरित हैं कि प्रदूषण फैलाने वाले को तो आर्थिक भरपाई करनी होगी लेकिन इसकी पेरिस समझौते में अनदेखी कर दी गई और स्वैच्छिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित उत्सर्जन घटाने के उपायों को अपनाया गया.

इससे ऐतिहासिक स्तर यानी लंबे समय से प्रदूषण फैला रहे अमेरिका जैसे देश बच निकले. अब दूसरा प्रमुख सिद्धांत जिस पर पेरिस समझौता टिका है वह भी सिरे नहीं चढ़ सका. इसके तहत विकसित देशों को विकासशील देशों में जलवायु पर काम करने के लिए मदद के तौर पर साल 2020 तक करीब 100 अरब डॉलर की रकम जुटानी थी.

संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी ने कहा कि प्रतिबद्धता की यह रकम जलवायु वित्त पोषण के लिहाज से न्यूनतम थी न कि अधिकतम. लेकिन स्वतंत्र विशेषज्ञों की की एक रिपोर्ट कहती है कि ये देश न्यूनतम से भी नीचे चले गए और 2018 का अनुमानित वित्त पोषण ही 40-60 अरब डॉलर रहा.

ग्लासगो में दानदाता देशों ने 100 अरब डॉलर देने के अपने वचन को 2023 तक के लिए खिसका लिया है जिससे विकासशील देश नाखुश हैं. भारत ने दोहराया है कि उत्सर्जन से जुड़ी उसकी नई प्रतिबद्धताएं विकसित देशों की तरफ से आने वाले धन पर टिकी हुई हैं. भारत का अनुमान है कि विकसित देश अगर अपेक्षा रखते हैं कि विकासशील देश उत्सर्जन लक्ष्यों को हासिल करें तो उन्हें 1 अरब डॉलर सालाना का योगदान करना होगा.

विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण इशारा करती हैं, ''मुद्दे की बात यह है कि भारत समेत दुनिया का 66 प्रतिशत हिस्सा 30 प्रतिशत कार्बन बजट पर निर्भर है, शेष को विकसित देश पहले ही खर्च कर चुके हैं. क्या आप इन 66 प्रतिशत से जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए धरती से गायब हो जाने को कहेंगे?

दुनिया की 16 प्रतिशत आबादी वाला अफ्रीका कार्बन बजट के सिर्फ 4 प्रतिशत हिस्से पर काबिज है. क्या आप चाहते हैं कि अफ्रीका हमेशा अंधेरे में रहे या आप वहां सोलर प्रोजेन्न्ट के लिए पैसे खर्च करेंगे? अगर जलवायु परिवर्तन के लक्ष्य हासिल करने हैं तो धनी देशों को पैसा वहां खर्च करना होगा जहां इसकी जरूरत है.

10 वैश्विक करार
एक रहे तो बचेंगे, बंटेंगे तो मरेंगे

परोपकारी अरबपति और अब पर्यावरण प्रचारक बिल गेट्स ने अपनी नई पुस्तक, हाऊ टु अवाइड क्लाइमेट डिजास्टर, में तर्क रखा है कि ''बाजार, प्रौद्योगिकी और नीतियां ये तीनों लीवर हैं जिन्हें हमें जीवाश्म ईंधन से पिंड छुड़ाने के लिए खींचना होगा. वे सभी वस्तुओं और सेवाओं पर ग्रीन प्रीमियम लगाने की वकालत करते हैं ताकि लोग प्रीमियम कम करने के लिए शून्य उत्सर्जन को अपनाएं.

योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया मानते हैं कि सरकारी नीतियां और व्यावहारिक राजकोषीय प्रोत्साहन स्वच्छ ईंधन की तरफ जाने की रफ्तार बढ़ा सकते हैं. वे कहते हैं, ''ईयू ने ऐलान कर दिया है कि इंटर्नल कंबस्चन इंजन वाली कारों को 2035 के बाद बेचने की अनुमति नहीं होगी. भारत को भी स्वच्छ तकनीक अपनाने के लिए ऐसा ही कोई कदम अवश्य उठाना होगा.

इस दिशा में सबसे पहला कदम यह हो सकता है कि केंद्र सरकार ऐलान कर दे कि वह 2023 के बाद सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन ही खरीदेगी या किराये पर लेगी. इसके साथ ही 42 केंद्रीय पीएसयू कंपनियों को भी ऐसी ही घोषणा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.

भूमंडलीय खतरे का स्तर देखते हुए इस तरह के स्थानीय और राष्ट्रीय कदम वक्त की जरूरत बन गए हैं. हमें इस आपात स्थिति से निपटने के लिए विश्व समुदाय की तरह व्यवहार करते हुए स्वार्थों को त्यागकर संयुक्त प्रयास करने होंगे. कोविड महामारी ने दिखा दिया कि वैक्सीन प्रौद्योगिकी के संयुक्त प्रयासों से क्या हासिल हो सकता है. साथ ही यह भी दिखाया कि वैन्न्सीन के मामले में असमानता और अन्याय भी व्यापक है.

अगर हमें सामूहिक जलवायु आपदा को टालना है तो हमें मुख्य हरित प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए तत्काल वैश्विक समझौते की जरूरत होगी जिसमें विपन्न के लिए संपन्न भुगतान करेंगे.

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