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आवरण कथाः आखिर कैसे रफ्तार पकड़े अर्थव्यवस्था

कोविड की दूसरी घातक लहर ने पहले से लहूलुहान अर्थव्यवस्था की चूलें हिला दीं, उपभोक्ताओं का भरोसा, उद्योग-धंधों और रोजी-रोजगार की बहाली के लिए अब असाधारण नजरिए और कदमों की दरकार.

अचानक ठप्प 1 जून को मुंबई में सिले-सिलाए वस्त्रों का थोक बाजार मंगलदास मार्केट अचानक ठप्प 1 जून को मुंबई में सिले-सिलाए वस्त्रों का थोक बाजार मंगलदास मार्केट

मई में जब प्रियजनों के लिए अस्पतालों में बिस्तर, ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए जद्दोजहद करते लोगों और श्मशानों में लंबी कतारों के मनहूस दृश्य खबरों में छाए थे, कोविड 2.0 चुपचाप कहीं और भी कहर बरपा रहा था और वह थी अर्थव्यवस्था. दूसरी लहर ने जिस अप्रत्याशित प्रचंडता से हमला बोला, उसने पिछले वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में देश में हुई थोड़ी-बहुत आर्थिक बहाली को भी पटरी से उतारने का खतरा पैदा कर दिया है (ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वित्त वर्ष की पहली छमाही में नकारात्मक वृद्धि के मुकाबले दूसरी छमाही की दोनों तिमाहियों में सकारात्मक वृद्धि दर्ज हुई).

हालांकि इस बार देशव्यापी लॉकडाउन से बचा गया, लेकिन राज्य लॉकडाउन लगाने पर मजबूर हुए. लिहाजा, निवेश फर्म बार्कलेज के मुताबिक, देश को मई के हर हफ्ते करीब 8 अरब डॉलर या 58,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की कीमत चुकानी पड़ी.

फैक्ट्रियों में बंदी और छंटनी ने बेरोजगारी दर को दहाई अंकों में धकेल दिया. 23 मई को खत्म सप्ताह में यह 14.73 फीसद पर पहुंच गई. लॉकडाउन की पाबंदियों के साथ नौकरियों के जाने और तनख्वाह में कटौतियों के चलते एफएमसीजी (उपभोक्ता सामान) श्रेणी की कई चीजों के साथ टीवी, रेफ्रिजरेटर, परिधान और फूटवियर सरीखे टिकाऊ उपभोक्ता सामान की बिक्री थम गई.

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (एफएडीए) के मुताबिक, कारों की बिक्री में मार्च के मुकाबले अप्रैल में 25 फीसद से ज्यादा की गिरावट आई, जबकि दोपहिया वाहनों की बिक्री 27 फीसद से ज्यादा गिरी. 2020 के सख्त लॉकडाउन से लहूलुहान ट्रैवल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र अब भी खस्ताहाल है.

कई फर्मों ने देश की वृद्धि के 11-12 फीसद के अनुमानों को घटाकर 8 फीसद या उससे भी कम कर दिया है (देखें ग्राफिक हताशाजनक अनुमान). पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं, ‘‘वृद्धि में तीन फीसद कमी का भी मतलब है अर्थव्यवस्था के लिए 6-6.5 लाख करोड़ रुपए का नुक्सान. पिछले साल हम 20 लाख करोड़ रुपए से हाथ धो बैठे थे.’’

तीसरी लहर की स्थिति में बार्कलेज भारत में 'मंदड़िया दौर’ की चेतावनी देता है. मौजूदा वित्त वर्ष में वृद्धि अंतत: 7.7 फीसद रह सकती है, जो आरबीआइ (भारतीय रिजर्व बैंक) के 10.5 फीसद के अनुमान से काफी कम है. वह भी तब जब पिछले वित्त साल में भारत की वृद्धि में 7.3 फीसद की गिरावट आई. अधिकारियों का अनुमान था कि अर्थव्यवस्था 8 फीसद सिकुड़ जाएगी.

देश में अव्वल स्टीम इंजीनियरिंग और कंट्रोल इंस्ट्रुमेंटेशन फर्म फोर्ब्स मार्शल के चेयरमैन नौशाद फोर्ब्स ने इंडिया टुडे से कहा, ''दूसरी लहर का लोगों के दिलो-दिमाग पर भीषण असर है. उनके बाहर निकलने और खर्चना शुरू करने में थोड़ा वक्त लगेगा.’’ वस्तुओं और लोगों की आवाजाही पर नजर रखने वाले गूगल के मोबिलिटी और दूसरे डेटा मई के तीसरे हफ्ते तक खुदरा, किराना, आवाजाही स्टेशनों और टोल नाकों पर कामकाज में मार्च और अप्रैल के मुकाबले गिरावट दिखा रहे हैं.

कोटक महिंद्रा ऐसेट मैनेजमेंट के मैनेजिंग डायरेक्टर नीलेश शाह कहते हैं, ''अर्थव्यवस्था पर पहली लहर के मुकाबले (कोविड-19 की) कहीं ज्यादा लंबी छाया पड़ी है. दबी हुई मांग ने पहली लहर के बाद बहाली को सहारा दिया था, पर इस बार उत्साह लौटने में कुछ वक्त लग सकता है.’’

अर्थव्यवस्था के 50 खरब डॉलर के लक्ष्य पर पहुंचने की उम्मीदें तो खैर पक्के तौर पर चकनाचूर हो चुकी हैं, खासकर महामारी से पहले भी यह उम्मीद से कम 5 फीसद की वृद्धि दर पर लड़खड़ा रही थी. नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल गरीब और लाचार लोगों के लिए गारंटीशुदा कर्ज और सामाजिक योजनाओं में 20 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा झोंके, पर कई सारे सुधार अब भी अधर में अटके हैं. 

अधर में नौकरियां
रिसर्च फर्म सीएमआइई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के मुताबिक, फरवरी और अप्रैल के बीच नब्बे लाख वैतनिक नौकरियां चली गईं. 97 फीसद परिवारों की आमदनियों में गिरावट आई. अर्थव्यवस्था में मांग फूंकने वाला मूल तबका मध्यम वर्ग भी बुरी तरह टूट चुका है.

अमेरिका स्थित प्यू रिसर्च सेंटर की मार्च की शोध रिपोर्ट से पता चला कि पिछले साल कोविड ने करीब 3.2 करोड़ हिंदुस्तानियों को मध्यम वर्ग के दायरे से नीचे धकेल दिया, जो रोजाना 10 डॉलर (724 रुपए) से 20 डॉलर (1,449 रुपए) कमाते थे. एक रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यम वर्ग एक-तिहाई तक सिकुड़ गया है—महामारी से पहले 9.9 करोड़ से अब 6.6 करोड़ पर आ गया है.

ग्रामीण इलाकों में हालात और बदतर हैं. पहली लहर में तो ग्रामीण वृद्धि और रोजगार ने अर्थव्यवस्था की गिरावट को संभाल लिया था. मगर इस बार ग्रामीण इलाकों में बढ़ते संक्रमण और पाबंदियों की वजह से ग्रामीण भारत में बेरोजगारी दर 13.5 फीसद पर पहुंच गई है, जबकि शहरी इलाकों में यह 17.4 फीसद है. सीएमआइई के सीईओ और एमडी महेश व्यास कहते हैं, ‘‘श्रम भागीदारी की दर 2016 से ही लगातार गिरती रही है.

2016-17 में 46.1 फीसद से यह 2021 में 39.9 फीसद पर आ गई है. देश में अच्छी नौकरियां नहीं हैं और महिलाओं के लिए श्रम बाजार में हिस्सा लेना ज्यादा से ज्यादा मुश्किल होता गया है.’’ इससे 1990 के दशक का फायदों का वह दौर उलट गया है जब कई लोग कृषि से फैक्ट्रियों में काम करने आ गए थे. व्यास कहते हैं, ''अब लोग फिर खेतों में लौट रहे हैं, जो अर्थव्यवस्था में प्रच्छन्न बेरोजगारी बढ़ा रहा है.’’

अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम कर रहे करोड़ों लोग अब मुश्किल में हैं, जो पहले अपने गांव और कस्बे छोड़कर शहर आ जाते थे और कम हुनर वाले काम-धंधों में, नाई की दुकान, ढाबे या किराने की दुकान सरीखे कामकाज में खपा लिए जाते थे. देश में मैन्युफैक्चरिंग की रीढ़ कहा जाने वाला एमएसएमई क्षेत्र सबसे नाजुक हालत में है. देश में 6.34 करोड़ एमएसएमई हैं, जो मैन्युफैक्चरिंग में 45 फीसद और निर्यात में 40 फीसद का योगदान और करीब 12 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं.

ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ऑर्गेनाइजेशन के जून 2020 के एक सर्वे से पता चला कि देश के 35 फीसद एमएसएमई और स्वरोजगार में लगे 37 फीसद लोगों को महामारी की वजह से कारोबार बंद करने पड़े. इस बार नुक्सान केवल आर्थिक नहीं है; कई उद्यमियों को कोविड की वजह से जान गंवानी पड़ी. एफआइएसएमई (फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो, स्मॉल ऐंड मीडियम एंटरप्राइजेज) के सेक्रेटरी जनरल अनिल भारद्वाज कहते हैं, ''इस बार नुक्सान दीर्घकालिक है.’’

ग्रामीण तबाही
पहली लहर में ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकटमोचन बनकर उभरी थी, जब अच्छी कृषि उपज और कुछ हद तक खपत ने संभाल लिया था. कामगार अपनी जेबों में बचत लिए शहरों से अपने गांवों में लौट गए थे और सरकार कमजोरों की मदद के लिए धन झोंक रही थी. कई ने लौटकर खेती-किसानी संभाल ली और दूसरों ने सरकार की ग्रामीण बेरोजगार गारंटी योजना मनरेगा में रोजगार पकड़ लिए.

अलबत्ता, कृषि अर्थशास्त्री और दिल्ली के जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) में एसोसिएट प्रोफेसर हिमांशु कहते हैं कि दूसरी लहर में देश के देहात में कोविड-19 के प्रकोप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तगड़ा धक्का लगा. राज्य सरकारों को नकदी की तंगी है और लोग अपनी बचत खर्च कर चुके हैं. कृषि में उपजों के दाम घट रहे हैं जबकि खेती की लागत लगातर बढ़ रही है. बहुत रोजगार देने वाला निजी निर्माण क्षेत्र ठहरा पड़ा है. 

मोदी सरकार ने 2020 में कुछ खास तबकों, प्रवासी कामगारों, रेहड़ी-पटरी लगाने वाले, छोटे उद्योग-धंधों के लिए कई योजनाएं घोषित की थीं. मसलन, गरीब कल्याण रोजगार अभियान का लक्ष्य गांव लौट रहे मजदूरों को बुनियादी ढांचे के निर्माण सहित 25 अलग-अलग किस्म के कामों में 125 दिन का रोजगार मुहैया करना था. योजना में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा सरीखे राज्यों 116 जिलों में लौटे 25,000 प्रवासी कामगारों को शामिल करना था.

प्रधानमंत्री रेहड़ी-पटरी आत्मनिर्भर निधि (पीएम-स्वनिधि) योजना का लक्ष्य रेहड़ी-पटरी वालों को सस्ती ब्याज दर पर 10,000 रुपए तक के कर्ज मुहैया कराना था. इसी तरह, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना का लक्ष्य मैन्युफैक्चरिंग फर्मों को प्रोत्साहन देना था. पीएम-स्वनिधि में 27.3 लाख रेहड़ी-पटरी वालों को कर्ज मिले. केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक, कंपनियों ने पीएलआइ के तहत 1,300 करोड़ रुपए का निवेश किया और अपने कामकाज के पहले पांच महीनों में करीब 22,000 नौकरियों का सृजन किया.

विशेषज्ञों का कहना है कि इन योजनाओं ने कुल मिलाकर भुखमरी के हालात पैदा नहीं होने दिया. मगर भारत जितने विशाल देश में इन समाधानों को ज्यादा दूरगामी और प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत है.

नई जान फूंकने का नुस्खा
विशेषज्ञों का कहना है कि एक तो देश को छोटी, मध्यम और दीर्घ अवधि के लिए क्रमबद्ध आर्थिक उपायों की जरूरत है. गर्ग के मुताबिक, सरकार की चुनौती मौजूदा तकलीफ को दूर करके ज्यादा ऊंची वृद्धि दर का इंतजाम करना है. छोटे वक्त में उन मजदूरों को राहत देनी होगी, जो काम न होने से हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं.

मसलन, दिल्ली सरकार ने हरेक पंजीकृत ऑटो और टैक्सी ड्राइवर को 5,000 रु. का अनुदान देने का ऐलान किया है. महाराष्ट्र ने अप्रैल के मध्य में आर्थिक तौर पर कमजोर तबकों के लिए 5,476 करोड़ रु. के राहत पैकेज का ऐलान किया.

केंद्र ने भी मई के आखिर में कोविड पीड़ित परिवारों को राहत देने के लिए पहल शुरू की. उसने कोविड से अनाथ हुए हरेक बच्चे के लिए उसके 18 साल का होने पर 10 लाख रुपए की धनराशि मिलना पक्का करने के उपाय की घोषणा की. कर्मचारी राज्य बीमा निगम योजना के तहत पेंशन का दायरा बढ़ाकर उसमें कोविड से मृत लोगों के आश्रितों को भी शामिल किया गया. कर्मचारियों की जमा से जुड़ी बीमा योजना के लाभ ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) के तहत पंजीकृत सदस्यों को भी दिए गए.

फोर्ब्स कहते हैं कि मध्यम अवधि में सरकार को हॉस्पिटैलिटी और रिटेल सरीखे संकटग्रस्त क्षेत्रों को उबारने में मदद देने की जरूरत है. उन्हें लगता है कि लंबे वक्त में देश को रोजगार वृद्धि की मजबूती बहाल करने के लिए काम करना चाहिए. वे कहते हैं, ''अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर कार्यक्रमों को वापस पटरी लाना बेहद अहम है.’’

केंद्र ने 2019 में पांच साल की अवधि में 110 लाख करोड़ रु. की महत्वाकांक्षी नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन परियोजना शुरू की थी, लेकिन मंदी की अर्थव्यवस्था ने इसकी प्रगति ठप कर दी. कुछ का कहना है कि केंद्र अगर राज्यों को जीएसटी के बकाया 63,000 करोड़ रुपए (31 मार्च 2021 तक) का भुगतान कर दे, तो इससे उनका वित्तीय बोझ कुछ हल्का हो सकेगा.

चाहिए 1991 वाला जज्बा
कोटक के शाह का कहना है कि देश को ''1991 जैसे जज्बे’’ की दरकार है. वैसे ही संकल्प की, जिससे नरसिंह राव सरकार ने आर्थिक उदारीकरण एजेंडे से देश की व्यापार और औद्योगिकी नीतियों को पूरी तरह बदल डाला था. इनसे अंतत: निजी उद्यमशीलता और उसके बाद वृद्धि को बढ़ावा मिला. वे कहते हैं, ''आरबीआइ ने नकदी बढ़ाने का शानदार काम किया है. अब यह सरकार पर है कि वह उद्यमियों को सहारा दे.’’ आइटी, फार्मास्यूटिकल्स और जिंसों के क्षेत्र में कार्यरत कंपनियां बढ़ रही हैं जबकि वाहन, एमएसएमई, ट्रैवल और टूरिज्म और खुदरा क्षेत्र लड़खड़ा रहे हैं. 

केयर रेटिंग्ज के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस कहते हैं कि सरकार को अपनी नीतिगत घोषणाओं पर अमल भी करना होगा. जन धन योजना उसे हरेक की पृष्ठभूमि जानने की सुविधा देती है, जिसका इस्तेमाल वह जरूरतमंदों के खातों में सीधे नकद हस्तांतरण के लिए कर सकती है. हालांकि ऐसे भी मामले हैं, जिनमें कुछ वरिष्ठ नागरिकों को पिछले साल घोषित पेंशन योजना के प्रति माह 1,000 रु. नहीं मिल पा रहे हैं.

उन्हें लगता है कि पीएलआइ योजना केवल बड़ी कंपनियों की मदद करेगी. वे कहते हैं, ''इलेक्ट्रॉनिक्स में विशाल मोबाइल कंपनियां ही कुछ कर पाएंगी,  एमएसएमई नहीं.’’ वे सिफारिश करते हैं कि सरकार संकटग्रस्त कंपनियों को कर छूट दे. टैक्स रिटर्न के जरिए इन कंपनियों की आसानी से पहचान की जा सकती है. हालांकि हर कोई मोरेटोरियम के पक्ष में नहीं है, क्योंकि वे भुगतान को केवल टालते भर हैं और वह भी बैंकों की वित्तीय सेहत की कीमत पर.

एमएसएमई में नई जान फूंकने के खातिर एफआइएसएमई ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से गुजारिश की है कि वे विशेष उल्लेख खातों (एसएमए) की मौजूदा प्रथा की समीक्षा करें. आरबीआइ ने एनपीए या डूबत कर्ज में बदलने की संभावना वाले खातों की पहचान के लिए 2014 में एसएमए की शुरुआत की थी. अगर कर्ज 90 दिनों के भीतर नहीं चुकाया जाता है तो वह एनपीए बन जाता है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र आरबीआइ से बातचीत कर रहा है ताकि एनपीए घोषित करने की अवधि मौजूदा 90 दिनों से बढ़ाकर कम से कम 120 दिन की जा सके. साथ ही, एमएसएमई को ठोस रियायती दरों पर कर्ज का मिलना जारी रहना चाहिए. एफआइएसएमई यह भी चाहती है कि केंद्र शीर्ष 10 कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की निगरानी करे और बढ़ी हुई कीमतों के संदिग्ध मामलों को भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग को भेज दे. साथ ही, प्रमुख कच्चे माल पर आयात शुल्क घटाकर शून्य कर दे.

‘ज्यादा रुपए छापो’
कोटक महिंद्रा बैंक के एग्जीक्यूटिव वाइस-चेयरमैन और एमडी उदय कोटक ने हाल में एक टेलीविजन इंटरव्यू में कहा कि कोविड से ध्वस्त अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए देश को नकदी छापने की जरूरत है. उन्होंने कहा, ''मेरे विचार से यह सरकार की बैलेंस शीट के विस्तार का वक्त है, जिसे आरबीआइ का यथोचित समर्थन मिले...

मौद्रिक विस्तार या धन की छपाई के लिए. हमारे लिए ऐसा कुछ करने का वक्त आ गया है... अगर अभी नहीं तो कब’’ अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी इसका अनुमोदन करते हैं और कहते हैं कि अतिरिक्त संसाधन गरीबों की सहायता कर सकेंगे.

अलबत्ता दिल्ली स्थित एनआइपीईपी (राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान) में प्रोफेसर इला पटनायक कहती हैं कि ऐसे कदम जोखिम का गुणा-भाग करने के बाद ही उठाए जाने चाहिए. यह अच्छी तरह तय कर लिया गया हो कि कितनी मुद्रा और छापने की जरूरत है और यह नकदी कब काम में लाई जाएगी. साथ ही, इससे बाहर निकलने की नीति भी साफ तौर पर तय कर ली गई हो.

इंडिया टुडे विशेषज्ञों के बोर्ड के मुताबिक (देखें अर्थव्यवस्था बहाली का बेहतरीन नुस्खा), मध्यम अवधि का नजरिया इस पर निर्भर करता है कि देश तीन प्रमुख कारकों से कैसे निपटता है. ये हैं कोविड को बेअसर करना, भविष्य के एजेंडे को आगे बढ़ाना और कारोबार में स्वाभाविक जोश-खरोश दोबारा कैसे लौटे. विशेषज्ञों का मानना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था और लागत पर सब्सिडी की योजनाओं को खत्म करने सरीखे कृषि सुधारों को अंजाम देने का यह सही समय है.

खर्च करने की गुंजाइश
संसाधन की कमी से अलबत्ता सरकार के हाथ बंधे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि उसे ज्यादा राजकोषीय घाटे (आमदनी और खर्च के बीच अंतर) को लेकर बहुत चिंतित नहीं होना चाहिए, क्योंकि महज एक फीसद अतिरिक्त खर्च करके बहुत सारी तकलीफ दूर की जा सकती है.

वित्त वर्ष 2021 में केंद्र ने अपने राजकोषीय घाटे में 9.4 फीसद की तेज बढ़ोतरी के बाद बजट में मौजूदा वित्त वर्ष के लिए 6.8 फीसद राजकोषीय घाटे का लक्ष्य रखा था और मकसद इस घाटे को धीरे-धीरे कम करके 2026 के वित्त वर्ष तक 4.5 फीसद पर लाना था. केयर रेटिंग्ज के एक शोध पत्र के मुताबिक, मौजूदा और भावी स्थिति के अनुमान से इस लक्ष्य को हासिल कर पाने की संभावना है.

लॉकडाउन से वह इस वित्त वर्ष में कर संग्रह के बजट अनुमान से 15-20 फीसद या 46,000-62,000 करोड़ रुपए कम रहने की उम्मीद कर रही है. इसी तरह, 1.75 लाख करोड़ रुपए के विनिवेश लक्ष्य में भी 25-33 फीसद या 44,000-58,000 करोड़ रुपए की कमी रह सकती है.

आरबीआइ ने हाल में अपने अधिशेष से 99,122 करोड़ रुपए केंद्र को हस्तांतरित किए हैं, जो बजट अनुमान से 45,612 करोड़ रुपए ज्यादा हैं. फिर भी सरकार को कोविड से लडऩे के लिए और 49,000-66,000 करोड़ रुपए की जरूरत है.

मगर किसी भी अन्य चीज से पहले सरकार को साफ और समग्र वैक्सीन नीति बनाने की जरूरत है. टीके लगाने की बदलती रणनीति ने खर्च या निवेश के भरोसे को तोड़कर रख दिया है. मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर.सी. भार्गव कहते हैं, ''सरकार को जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा लोगों को टीके लगाने चाहिए.’’

लिहाजा, सरकार को चाहिए कि वह प्राथमिकताएं तय करे, पीड़ित लोगों को तत्काल राहत मुहैया करे, अर्थव्यवस्था को अधिक लीचीला बनाए, ताकि वह भविष्य के झटके झेल सके. कोविड ने अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है, पर देश पहले भी संकटों से उबरकर निकला है. सरकार अपना ध्यान वृद्धि और बहाली पर टिकाए रखती है, तो यह मानने का कोई कारण नहीं कि ऐसा फिर नहीं हो सकता.
 
—साथ में, अनिलेश महाजन    

‘‘पहली लहर के दौरान ठहरी हुई मांग से अर्थव्यवस्था में बहाली तेज हुई, मगर इस बार मनोबल काफी टूटा हुआ है ’’
नीलेश शाह
एमडी, कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट


‘‘जितनी जल्दी हो सके, ज्यादा से ज्यादा लोगों को वैक्सीन लगाई जाए. इससे यकीनन अर्थव्यवस्था की बहाली की रफ्तार तेज होगी’’  
आर.सी. भार्गव 
चेयरमैन, मारुति सुजुकी

‘‘इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को फिर जिंदा करना बहुत जरूरी है. उनसे रोजगार बढ़ेगा और लोगों के हाथ में पैसा आएगा’’ 
नौशाद फोर्ब्स, चेयरमैन, फोर्ब्स मार्शल

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