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समाजवादी पार्टीः थी खबर गर्म...पर तमाशा न हुआ

लगातार चार चुनावी शिकस्त किसी भी नेता के लिए बुरी खबर है, यह बात अखिलेश जानते हैं. भाजपा के कमजोर दौर में वे जीत नहीं पाए और भविष्य का रास्ता और संकीर्ण है.

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पहुंचने का प्रयास रायबरेली में अखिलेश के समर्थक उनका भव्य स्वागत करते हुए पहुंचने का प्रयास रायबरेली में अखिलेश के समर्थक उनका भव्य स्वागत करते हुए

विधानसभा चुनाव 2022 उत्तर प्रदेश/समाजवादी पार्टी

राहुल श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश के नतीजों ने शायद यह तय कर दिया कि कवि दुष्यंत कुमार के इशारे पर अखिलेश यादव ने पत्थर तो तबियत से उछाला मगर आसमान सख्त था, सुराख न हो सका. 2014 से तीन चुनाव में हार का सिलसिला तोड़ने का मौका 2022 में आया. लगा कि महामारी, किसान आंदोलन, जातीय प्रतिस्पर्धा, महंगा ईंधन और कड़वे तेल के उठते दाम, गिरती आमदनियों ने राजनैतिक बदलाव के लिए जमीन भी तैयार कर दी. लेकिन समाजवादी पार्टी कूद को छलांग न बना सकी. 

नतीजों का आकलन कहता है कि अखिलेश की मुहिम मोदी-योगी के राशन, प्रशासन और ध्रुवीकरण के ट्रिपल इंजन से मात खा गई. भाजपा ने सत्ता में रहने के लिए पिछले सात साल में जाति-धर्म, सरकारी नीतियों और बेहतर करिश्माई नेतृत्व की इतनी तहें बिछा दीं कि अनेक सीटों पर सपा दो या तीन की काट पा गई मगर एक दो रास्ता रोक के खड़ी हो गईं. 

2022 में अखिलेश सिंगल इंजन पर थे. पहली कमजोरी थी रण के इम्तिहान में देर से उतरना. 2017 और उसके बाद 2019 की भाजपा की जीत के कारण सपा, बसपा और कांग्रेस काफी समय तक सुन्न रहीं. यानी तिमाही और छमाही इम्तिहान में दिखी ही नहीं. योगी किसी प्रशासनिक पद पर नए थे. किसी सत्ताधारी पार्टी को सेटल न होने देने के लिए सबसे उपयुक्त समय गंवा दिया गया. 

चर्चा में आए तो कोरोना वैक्सीन पर अपने 'भाजपा की वैक्सीन’ बयान से. योगी-मोदी ने परियोजनाओं को झंडा दिखाया तो बोले मेरी नींव थी. चुनावी बिगुल फूंका तो 'जिन्ना’ बयान को भाजपा तोड़-मरोड़ कर ले उड़ी. 

जब संभले तो मुहिम में बेहतरी दिखी. 2022 के लिए 2017 के साथी राहुल गांधी और 2019 की मायावती की जगह ओ.पी. राजभर, जयंत चौधरी, अपना दल कमेरावादी और महान दल जैसे दलों से छोटे मगर जमीनी गठबंधन बनाकर चुनाव में उतरे. 

उत्तर प्रदेश की जंग को चार खिलाड़ियों की जगह भाजपा बनाम सपा बनाने में जुट गए. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल से सीख लेकर मोदी की जगह योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाया. अगर योगी उन्हें बबुआ बुलाते थे तो वे योगी को बाबा. हर रैली, हर प्रेस वार्ता या संवाद में 'झूठे बाबा’ का तीर चला कर लड़ाई को राष्ट्रीय मुद्दों से लोकल पैमानों पर उतारा.

2017 में परिवार की कलह ने सपा को हाशिये पर डाला था. 2022 आते-आते अखिलेश का सपा पर दबदबा हो गया. नेतृत्व मुद्दा नहीं था तो अलग पार्टी बना कर विरोध करने को तैयार चाचा शिवपाल यादव को साथ जोड़ा. पिता मुलायम यादव को यादव गढ़ में रैली में साथ लाए और फिर इटावा में जबरदस्त रोड शो किया जिसमें पिता, चाचा और वे खुद एक फ्रेम में दिखे. 

बेरोजगारी, महंगाई, किसान, मकान को मुद्दा बना कर भाजपा के हिंदुत्व और ध्रुवीकरण के खिलाफ 'भूखे पेट भजन नहीं होय गोपाला, ले तेरी कंठी ले तेरी माला’ का मंत्र फूंका. 131 रैलियां और कई रोड शो किए. अपने चिर स्थायी 30 फीसद एमवाइ (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक को भाजपा के एमवाइ (मोदी- योगी) के खिलाफ मजबूती के लिए पिछड़ी और दलित जातियों के नेताओं को तोड़ा और जोड़ा.

मुस्लिम फोकस धीमा करने के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल इलाकों में गैर मुस्लिम उतारे. पूर्वी उत्तर प्रदेश में भाजपा के ब्राह्मण उम्मीदवारों के खिलाफ ब्राह्मण लड़वा दिए. पिछड़ों को ज्यादा टिकट दिए. सीटों का माइक्रो मैनेजमेंट किया. यानी अगर बनारस में 80,000 बंगाली रहते हैं तो शहर में ममता बनर्जी के साथ रैली की. जया बच्चन की बंगाली और कायस्थ पृष्ठभूमि का इस्तेमाल किया. भाषण दे देकर कराहते गले को रोज रात गरारों से पटरी पर लाते रहे. टीवी, अखबार और इंटरनेट के मल्ल में योगी के मुकाबले कहीं उन्नीस दिखे तो कहीं इक्कीस. 

2012 में उनका ऐसा ही बवंडर मायावती को सत्ता से बेदखल करने में सफल हुआ था. मगर 2022 में वोट बसपा का नहीं, भाजपा का लूटना था. 

लड़ाई द्विपक्षीय—सपा बनाम भाजपा हो गई तो भाजपा राशन पानी लेकर अखिलेश और सपा पर चढ़ बैठी. पहला गोला दगा परिवारवाद का. नरेंद्र मोदी ने उसे भाजपा का वज्र बनाया. इस एक शब्द के कई आयाम थे, सिर्फ मुलायम सिंह का बेटा पार्टी का मुखिया होना भर नहीं. असल में भाजपा यह संदेश देती रही कि पार्टी अगर यादव परिवार के कब्जे में रही तो गैर-यादव पिछड़ों की कोई पूछ न थी, न होगी.

मुलायम के तीन मुख्यमंत्री कार्यकाल और अखिलेश के सत्ता में पांच साल से गैर-यादव पिछड़ों को आभास हुआ कि परिवार के सदस्य का राज मतलब सिर्फ यादव राज. पिछलग्गू बनकर रहने की जगह इन जातियों ने 2014 से भाजपा का दामन थामा. 2019 आते-आते यह साथ गहरा हो गया. 

यादवों से प्रदेश में अति पिछड़े और बसपा से टूटे गैर-जाटव दलितों का छत्तीस का आंकड़ा है. इस कारण वे भाजपा से नाराज होते हुए भी सपा के साथ नहीं गए. इस 40 फीसद वोट के भाजपा के साथ जुड़े रहने के और भी कारण थे.

पहला यूपी के सामाजिक पिछड़े, आर्थिक रूप से भी उतने ही पीछे हैं. कल्याण सिंह में भाजपा को मंडल और कमंडल दोनों का मजा देने वाला नेता मिला था. पर उनके बाद पिछड़े भाजपा से जुड़े कम और बिछड़े ज्यादा. मोदी ने वह मंडल-कमंडल का सियासी फ्लेवर भाजपा को लौटा दिया. मोदी के नेतृत्व में भाजपा ब्राह्मण-बनिये की पार्टी से 60 फीसद वोट की दावेदार बनने में लगी. पर पार्टी का सामाजिक आधार बदलने का काम प्रशासनिक रास्ते से भी हुआ. और सफलता मिली योजनाओं के लाभार्थी तक सटीक तरीके से पहुंचने के कारण. 

अखिलेश के योगी का किला न भेद पाने का एक और कारण उनकी पार्टी में मुस्लिम और यादवों के वर्चस्व के कारण गैर-यादव ओबीसी छिटकना रहा. यादव वोट के कारण एक और परेशानी अखिलेश के रास्ते में आई, वह थी इस वर्ग की छवि. भाजपा ने चुनाव में कानून-व्यवस्था का मुद्दा जम कर उठाया. इसी कानून-व्यवस्था में भाजपा का सांप्रदायिक एजेंडा निहित था. भाजपा ने घर-घर यह संदेह जिंदा रखा कि सपा मुसलमानों के प्रति मुलायम है. 

महिला वोट के मामले में सब पिछड़ गए. एग्जिट पोल कहते हैं कि 46 फीसद महिलाओं ने भाजपा को वोट दिया और सिर्फ 32 फीसद ने सपा को. अखिलेश ने परिवारवाद के आरोप को कुंद करने के लिए पिता और चाचा को प्रचार के दौरान ज्यादा साथ नहीं रखा. मुस्लिम उनके पीछे जमकरआए. पर यह लामबंदी बेकार गई क्योंकि यादव के अलावा कोई वर्ग सपा से नहीं जुड़ा.

यहां तक कि भाजपा, बसपा और कांग्रेस से आए नेता भी वोटों में सेंध नहीं लगा पाए. अगड़ी जातियों के पास भाजपा के साथ रहने और अखिलेश के साथ न जाने के सौ बहाने थे. राम मंदिर, विश्वनाथ कॉरिडोर, नागरिकता कानून पर हुए विरोधों में मुसलमानों पर कड़ाई जैसे अनेक इशारे थे. मगर सपा की परेशानी बनी पिछड़ों का हिंदुत्व की तरफ झुकाव. 

लगातार चार चुनावी शिकस्त किसी भी नेता के लिए बुरी खबर है, यह बात अखिलेश जानते हैं. भाजपा के कमजोर दौर में वे जीत नहीं पाए और भविष्य का रास्ता और संकीर्ण है. 

भाजपा की जीत ने पार्टी के लिए यूपी में 2024 के लिए रास्ता खोला है. केंद्र की योजनाओं को वोटर तक पहुंचाने में योगी का होना कारगर होगा. भगवाधारी योगी सरकारी मुखिया के तौर पर हिंदुत्व के बीज बोते रहेंगे. अगर भाजपा 2024 में दिल्ली जीत गई तो 2027 में दूसरों के रास्ते बंद करने में जुटेगी. ऐसे में अखिलेश को किसी भी शुरुआत से पहले नया रास्ता, नया तरीका खोजना होगा.

—राहुल श्रीवास्तव.

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