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आवरण कथाः तालिबान से आखिर किस तरह से निबटे भारत?

इस्लामी कट्टरपंथियों की वापसी ने अफगानिस्तान को अनिश्चतता के गर्त में धकेला. भारत को तालिबान की नई हुकूमत के बहिष्कार के बजाए उससे बातचीत करनी चाहिए.

15 अगस्त को काबुल के राष्ट्रपति आवास पहुंचे तालिबानी लड़ाके 15 अगस्त को काबुल के राष्ट्रपति आवास पहुंचे तालिबानी लड़ाके

अफगानिस्तान सल्तनतों की कब्रगाह रहा है. अब यहां प्रतिष्ठाएं भी दफन हैं. अमेरिका को तकलीफदेह तजुर्बे के बाद यह समझ आया. वैसे ही भारत को भी. दो-एक साल पहले तक हम उथल-पुथल से भरे इस मुल्क का भविष्य तय करने वाली अहम राष्ट्रों की मेज पर बैठते थे. मगर एक पखवाड़े पहले भारत वहां से रातोरात अपना दूतावास समेटकर कूच करने को मजबूर हो गया.

राजदूत रुद्रेंद्र टंडन और उनके साथी राजधानी काबुल से रात के अंधेरे में बचकर निकले. अगले दो हफ्ते खौफनाक रहे, जब विदेश मंत्रालय को भारतीयों और भारतीय मूल के अफगानों को सुरक्षित निकालने के लिए पूरा कूटनीतिक जोर लगाना पड़ा.

बेशक अशरफ गनी की अगुआई वाली अफगान सरकार ने जिस तेजी से तालिबान के आगे घुटने टेके, उससे हक्का-बक्का रह जाने वालों में भारत अकेला नहीं था. ज्यादा तरतीबवार सत्ता हस्तांतरण के लिए बातचीत में जुटे सर्वशक्तिमान अमेरिका और कई पश्चिमी देशों को भी अपने लोगों को वहां से निकालने के लिए बहुत हाथ-पैर मारने पड़े.

भारत के एक बड़े अफसर कहते हैं, ''सब उम्मीद कर रहे थे कि तालिबान चार विकेट से जीतेगा. किसने सोचा था कि वह कई दिनों का खेल शेष रहते पारी के अंतर से जीत जाएगा.’’

तालिबान के अलावा किसी एक चेहरे पर मुस्कान थी, तो वह पाकिस्तान था. यही वह मुल्क था जिसने उसकी वापसी का तानाबाना बुना और रास्ता तैयार किया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने ऐलान किया कि ''गुलामी की बेड़ियां’’ तोड़ दी गई हैं. उन्होंने जताया ऐसे कि मानो वही इस चढ़ाई की अगुआई कर रहे थे, पर इस वापसी का असल खाका राजगद्दी के पीछे की असल ताकत पाकिस्तानी फौज ने तैयार किया.

पुरानी प्रशियाई कहावत में थोड़ा हेरफेर करते हुए एक राजनयिक तंज से कहते हैं, ‘‘ज्यादातर देशों की एक सेना होती है. मगर पाकिस्तानी फौज के पास अब एक नहीं बल्कि दो देश हैं.’’ वे यह भी कहते हैं कि अगर हम सावधान नहीं रहे, तो ‘‘हो सकता है हमें दो टेररिस्तान से जूझना पड़े!’’

तालिबान का बटुआ
तालिबान का बटुआ

भू-राजनैतिक असर
तालिबान की वापसी का दूरगामी भू-राजनैतिक असर हो सकता है, खासकर अल कायदा सहित बड़े आतंकी संगठनों के साथ उसके रिश्तों को देखते हुए. यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ पीस के एशिया सेंटर के बड़े विशेषज्ञ असफंदयार अली मीर ने एनपीआर के एक कार्यक्रम में कहा, ''तालिबान की वापसी से दुनिया भर के जिहादियों में नया जोश भर गया है.

तालिबान के साथ यह अल कायदा के लिए भी बड़ी फतह है. तालिबान के नजरिए से, इस कारगर बगावत का झंडा उसने ही बुलंद किया. उन्होंने एक विदेशी कब्जेदार को निकाल फेंका और उनसे जबरदस्ती छीन ली गई सरकार फिर बहाल की. वहीं अल कायदा के नजरिए से, उसने तालिबान की बगावत का समर्थन करके अपने मुख्य दुश्मन यानी अमेरिका को धूल चटा दी.’’

तालिबान की बगावत का समर्थन करने वाले रूस, चीन और ईरान सरीखे देशों में भी गहरी चिंता पैदा हो गई है कि उनके हितों के दुश्मन दूसरे आतंकी गुटों पर इस जीत का क्या असर होगा. ये तीनों देश खुश हैं कि तालिबान ने अमेरिका को नाकों चने चबा दिए पर उनमें से हरेक ने तालिबान नेताओं से गारंटी मांगी है कि वे अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल ऐसे गुटों के पनपने और फलने-फूलने के लिए नहीं होने देंगे.

कारनेगी एंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में सीनियर फेलो एश्ले जे. टेलिस कहते हैं, ''अब सब कुछ मूलत: इस पर टिका है कि तालिबान इस नए अवतार में क्या रवैया अपनाता है. अगर वे अपने देश से दूसरे देशों को होने वाले खतरों को कड़ाई से काबू में रखते हैं, तो अपने देश में वे चाहे जो करें और उस पर हम कितनी भी नाक-भौं सिकोड़ें, लोग उसकी हर अच्छी-बुरी करतूत को गवारा करेंगे और साथ रहना सीख लेंगे. लेकिन अगर वे 1990 के दशक के तालिबान ही बनते हैं और जिहाद निर्यात करते हैं तो हम सब वाकई मुश्किल में पड़ जाएंगे और इसके गंभीर भू-राजनैतिक नतीजे होंगे.’’

टकराव नस्लीय अस्मिताओं का
टकराव नस्लीय अस्मिताओं का

भारत के लिए दोहरी चुनौती
तालिबान की वापसी भारत के लिए दोहरी चुनौती लेकर आई. अफगानिस्तान पर अमेरिका के नियंत्रण के वक्त हमारा वास्ता देश पर हुकूमत कर रही लोकतांत्रिक सरकारों से था. अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और अशरफ गनी पाकिस्तान को दुश्मन की तरह देखते थे और प्रतिसंतुलन के लिए भारत को बढ़ावा देते थे.

बीते दो दशकों में 3 अरब डॉलर (22,000 करोड़ रुपए) खर्च करने के बाद विकास कार्यक्रमों के सबसे बड़े दानदाताओं में होने के नाते हमारी इज्जत थी और रौब-दाब भी. अब बाजी उलट गई है. ड्राइविंग सीट पर पाकिस्तान है और हम हाथ मलते रह गए हैं. भारत को अब न केवल नई ताकत से उठ खड़े हुए तालिबान और उसके साथ आए अनेक स्वछंद कट्टरपंथियों से बल्कि जीत की खुशी से सराबोर पाकिस्तान से भी निबटना है. उस पाकिस्तान से जो अब कश्मीर में मुश्किल पैदा करने के लिए पूरी ताकत झोंकने का जतन करेगा.

आलोचकों का कहना है कि अमेरिका की वापसी के साथ ही हालात बिगड़ने के साफ संकेत थे. तब भी भारत सरकार ने तालिबान से रिश्ते बनाने की संजीदा कोशिश नहीं की. वे कहते हैं कि भारत को वहां हुकूमत के ढहने का इंतजार करने के बजाए नतीजे तय करने के तरीके निकालने चाहिए थे. तभी हम आज सांप की इस बांबी में नहीं होते. अफगानिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत राकेश सूद कहते हैं, ''हमने अपने सारे अंडे एक टोकरी में रख दिए.

वह टोकरी अब टूट गई और अंडे फूट गए. पश्चिम तो सब छोड़-छाड़कर चले जाना गवारा कर सकता था. भारत इसी इलाके का हिस्सा है—हम कहां जाएं?’’ सूद की सलाह है कि हम नए निजाम से रिश्ते कायम करने की नीति बनाएं. उससे पहले इंतजार करें और देखें कि बागडोर अंतत: किसके हाथ में है. वे कहते हैं, ''आप बाढ़ से उफनाती नदी में कूदकर तैरना नहीं सीख सकते. अब चूक जाने के डर के आधार पर नीति नहीं बनाई जा सकती.’’

सरकारी सूत्र इस आरोप से इनकार करते हैं कि भारत बहुत देर से जागा. वे बताते हैं कि तालिबान के शीर्ष सरगनाओं से अनौपचारिक संपर्क कायम किए गए थे. एक बड़े अफसर ने कहा, ''अच्छी बात यह कही कि तालिबान कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच दोतरफा विवाद मानते हैं और इसमें नहीं पड़ेंगे. उन्होंने कहा कि वे अल्पसंख्यकों को नुक्सान नहीं पहुंचाएंगे और संकेत दिया कि वे चाहेंगे कि भारत विकास के जो काम कर रहा है, उन्हें जारी रखे.

चौसर पर आ जुटे महारथी
चौसर पर आ जुटे महारथी

तो हम भीतर भले न हों पर हम निश्चत तौर पर ही बाहर भी नहीं हैं.’’ कुछ हलकों में आलोचना की गई कि भारत ने दहशतजदा होकर अपने राजदूत को हड़बड़ी में काबुल से निकाल लिया. जवाब में अफसरों का कहना है कि राजधानी में अफरा-तफरी मची थी और दूसरे आतंकी धड़े इसका फायदा उठा सकते थे.

एक चिंता यह थी कि कहीं 1999 की कंधार में आइसी-814 के अपहरण सरीखी स्थिति न हो, जिसमें बंधकों के बल पर भारत को रियायतें देने के लिए मजबूर किया जाए. दूसरी वजह यह थी कि भारत को नई हुकूमत को मान्यता और वैधता देने की कोई हड़बड़ी नहीं थी, बल्कि उसने ''उचित समय पर इस कार्ड का इस्तेमाल करने’’ को तरजीह दी.

तालिबान 1.0 बनाम 2.0
क्या तालिबान 2.0 उस पुराने 1990 के दशक के अपने 1.0 अवतार की ड्रग और ठग वाली छवि से हटकर बर्ताव करेगा? राय बंटी हुई है. उसकी विचारधारा की बुनियाद भले न बदली हो, पर नेतृत्व और कमान शृंखला में बेशक तब्दीली आई है. पहले कार्यकाल में तालिबान की हुकूमत ने आदमियों और औरतों के लिए इस्लामी पहनावे और आचरण के सख्त नियम-कायदे लागू किए थे और इस्लामी कानून की अपनी व्याख्या का उल्लंघन करने वालों पर खुलेआम कोड़े बरसाए और फांसी पर लटकाया था.

सिनेमाघर बंद कर दिए, मनोरंजन के सारे साधनों पर रोक लगा दी और बामियान में छठवीं सदी की दो बौद्ध प्रतिमाओं सहित अनगिनत सांस्कृतिक कलाकृतियों को तबाह-बर्बाद किया था.

9/11 के आतंकी हमले के बाद 2001 में जब अमेरिका ने तालिबान को उखाड़ फेंका, तो उसके करिश्माई अमीर अल-मोमिनीन (सुप्रीम लीडर) मुल्ला मोहम्मद उमर सहित ज्यादातर नेता भूमिगत हो गए. इस हार के बाद पहले 10 साल अनेक कबायली सरदारों के बीच जबरदस्त लड़ाई छिड़ गई थी और तनाव आज भी कायम हैं.

रहबरी शूरा या नेताओं की परिषद को, जिसे बोलचाल में क्वेटा शूरा कहा जाता है, पाकिस्तान की आइएसआइ से जुड़े हक्कानी नेटवर्क से नियंत्रित मीरान शाह शूरा ने चुनौती दी. दो अन्य पेशावर शूरा और मशहद शूरा हाल के सालों में अपनी अहमियत गंवा बैठे.

मुल्ला उमर की 2013 में बीमारी से मौत हो गई. उसकी मौत को 2015 तक छिपाए रखा गया और उसके वारिस मुल्ला अख्तर मंसूर को सिराजुद्दीन हक्कानी और उमर के बेटे मुल्ला मोहम्मद याकूब दोनों के असंतोष को कुचलना पड़ा. 2016 में ड्रोन हमले में मंसूर की मौत के बाद मौलवी हैबतुल्ला अखुंदजादा को अमीर बनाया गया.

अफगानिस्तान का विकास
अफगानिस्तान का विकास

अखुंदजादा इज्जतदार मौलवी है पर उसे कोई खास सैन्य तजुर्बा नहीं है. तालिबान रहबरी शूरा के सदस्यों की आम राय से फैसले करता है. सैन्य मामलों की बात करें तो माना जाता है कि हक्कानी नेटवर्क के पास सबसे अच्छे लड़ाके हैं और उसने दबदबा भी हासिल किया है.

हाल के वर्षों में तालिबान का सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर प्रमुखता से उभरा. अमेरिका के साथ दोहा में हुई बातचीत में वही मुख्य वार्ताकार था. पाकिस्तान ने बरादर को आठ साल जेल में रखा, क्योंकि वह उदार माना जाता है और करजई सरकार के साथ कामकाज करने को तैयार था. उसे 2018 में बातचीत करने के लिए अमेरिकी दबाब में छोड़ा गया. अब संभावना है कि तालिबान प्रशासन को नियंत्रित करने वाली शूरा या परिषद का सदर वही होगा.

तो तालिबान कोई एकजुट संगठन नहीं है. उसमें कई धड़े हैं, अनेक किस्म के छोटे-बड़े मतभेद हैं, जिसमें एक-दूसरे पर हावी होने के लिए गुत्थमगुत्था और छलप्रपंच चलते रहते हैं. ऐसे में भारत अपने प्रति कम शत्रुतापूर्ण धड़ों के साथ रिश्ते बढ़ा सकता है. मगर अहम सवाल यह है, जैसा कि टेलिस कहते हैं, ''नेता होने का दावा कर रहे शख्स में उन तमाम धड़ों को काबू करने की क्षमता है या नहीं जिनसे मिलकर तालिबान बना है और सरकार बनने के बाद अफगानिस्तान का कौन-सा प्रभावी विजन उभरकर आता है.’’

अमीरात बनाम खिलाफत
अहम यह है कि तालिबान के ज्यादातर नेताओं को राष्ट्रवादी माना जाता है क्योंकि वे व्यापक अखिल इस्लामी खिलाफत के बजाए अफगानिस्तान में इस्लामी अमीरात की वकालत करते हैं. पाकिस्तान के विद्वान सीनेटर और रक्षा समिति के अध्यक्ष मुशाहिद हुसैन कहते हैं, ''तालिबान का डीएनए अखिल इस्लामी नहीं है.

यह अल कायदा नहीं है. ये कबायली इस्लामी पश्तून हैं जिनकी नजर अफगानिस्तान की सरहदों से आगे नहीं जाती.’’ भारत और दुनिया की नजर इस पर है कि तालिबान के नेता अपने खांटी राष्ट्रवाद पर टिके रहेंगे या अपने आप को अखिल इस्लाम की नई चालक शक्ति के रूप में देखने लगेंगे.

हो सकता है उसके नेता उग्र मजहबी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहें और अधिनायकवादी राजनैतिक व्यवस्था कायम करें लेकिन अगर दूसरे उग्रवादी गुटों के साथ उनके रिश्ते बने रहते हैं, तो आसार यही हैं कि वह उन देशों की दुश्मनी मोल लेगा जो अभी उसका समर्थन कर रहे हैं, चाहे रूस हो, ईरान, चीन या पाकिस्तान. मसलन, शिनजियांग के उइगर मुसलमान चीन की दुखती रग हैं और अगर तालिबान उसके यहां उग्रवाद को बढ़ावा देता दिखाई देता है तो वह पूरी ताकत से उस पर टूट पड़ेगा.

अलबत्ता तालिबान के लिए बगावत के दिनों में अपना साथ देने वाले हमवतन गुटों से रिश्ते तोड़ना आसान नहीं होगा. अफगानिस्तान में पूर्व राजदूत अमर सिन्हा कहते हैं, ''तालिबान दूसरे गुटों के इन लड़कों से यह नहीं कह सकता कि काम खत्म अब बोरिया-बिस्तर बांधो और दफा हो जाओ. ये सारे बड़े गुट तालिबान के साथ वफादारी के वादों की एक पूरी व्यवस्था में बंधे हैं और ये रिश्ते बने रहेंगे.’’ सिन्हा यह भी बताते हैं कि तालिबान के ये पैदल सिपाही 18 से 25 बरस के बीच के नई पीढ़ी के लड़ाके हैं, जो पहले से बेहतर लैस हैं. इन्हें काबू करना आसान नहीं भी हो सकता है.

इस्लामी दुनिया, खासकर खाड़ी या पश्चिम एशिया के देश, जहां उनकी हुकूमतों को कट्टरपंथियों से खतरा है, तालिबान की वापसी से आशंकित हैं. यहां तक कि पाकिस्तान भी उस दोहरे खेल को लेकर चिंतित है जो तालिबान ने पाकिस्तान-विरोधी गुट तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की पीठ पर हाथ रखकर खेला है. हुसैन कहते हैं, ''हमारी सबसे बड़ी फिक्र अफगानिस्तान में छिपे टीटीपी के 6,500 दहशतगर्द हैं, जिन पर तालिबान का असर है. उन्हें चाहिए कि इन्हें काबू में रखें.

अगर तालिबान 1990 के दशक के अपने तौर-तरीके फिर अपनाता है तो यह उनके लिए बर्बादी का नुस्खा होगा.’’ टीटीपी के मोर्चे पर तनाव और आइएसआइ की कठपुतली के तौर पर दिखाई न देने की तालिबान की जरूरत, ये दोनों ऐसी चीजें हैं जिनका भारत फायदा उठा सकता है और तुरुप के उस पत्ते की ताकत कम कर सकता है जो फिलहाल पाकिस्तान के हाथ में है. डूरंड रेखा को लेकर विवाद अब भी अनसुलझा है, हालांकि पाकिस्तान ने दोनों देशों को बांटने वाली सरहद पर बाड़ लगाना शुरू कर दिया है.

यही नहीं, अफगानिस्तान की नई हुकूमत रुपए-पैसे से मजबूत होती है तो पाकिस्तान पर उसकी निर्भरता कम होगी और इस्लामाबाद से झगड़ने की उसकी ताकत बढ़ जाएगी. टेलिस कहते हैं, ''भारत के लिए निरी मायूसी की हालत नहीं है. वह अफगानों के राष्ट्रीय मकसदों और पाकिस्तान के मकसदों के बीच मौजूद प्रबल तनाव का फायदा उठा सकता है.

भूलें नहीं कि बरादर ने पिछले दशक में पाकिस्तान से लड़ाई लड़ी है. भारत को यह एहसास होना जरूरी है कि अगर वह तालिबान की हुकूमत वाले अफगानिस्तान को पाकिस्तान की पूर्ण मिल्कियत वाला मातहत देश मानकर बर्ताव करता है, तो वह उसे अंतत: ऐसा ही देश बना देगा, फिर भले ही वह ऐसा न हो.’’

एक अलग अफगानिस्तान 
यह भी स्पष्ट है कि 2001 में तालिबान को जिस अफगानिस्तान से भागना पड़ा, वह अब पहले जैसा नहीं रहा. इस मुल्क ने दो दशकों तक लोकतांत्रिक शासन का आनंद लिया और इस दौरान अमेरिका तथा अन्य देशों से अपार धन भी आया. इन वर्षों में अकेले अमेरिका ने 2 ट्रिलियन डॉलर अफगानिस्तान को दिए जिससे इसके प्रमुख शहरों ने विकास और स्वतंत्रता का कुछ स्वाद चखा है.

स्कूलों और कॉलेजों में दाखिला बढ़ा और पुरुषों और महिलाओं दोनों की साक्षरता दर में 43 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई. स्वास्थ्य संकेतकों में, विशेष रूप से शिशु मृत्यु दर में, सुधार हुआ. सड़क संपर्क और बिजली की उपलब्धता में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ. अमेरिकी हस्तक्षेप के पहले 10 वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद में सालाना औसतन 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन पिछले पांच वर्षों में बनी अनिश्चितता की स्थिति के कारण यह गिरकर औसतन 2 प्रतिशत रह गई. इससे भी बदतर, एक विश्वसनीय सर्वेक्षण ने बताया कि गरीबी दर 2011-12 में 38 प्रतिशत से बढ़कर 2016-17 में 55 प्रतिशत हो गई थी.

सुरक्षा की बिगड़ती स्थिति इसकी एक वजह है. हालांकि, इससे भी बुरी बात यह है कि सरकार में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी देखी गई है जो करजई और गनी शासन के दौरान ही शुरू हो गई थी. यही कारण था कि तालिबान की वापसी के खिलाफ प्रतिरोध, खासकर ग्रामीण अफगानिस्तान में, कम रहा.

इन कमियों के बावजूद, तालिबान को विरासत में एक कार्यात्मक सरकार मिली है और उसे उन लोगों की बढ़ती आकांक्षाओं से निपटना होगा जो स्वतंत्रता का स्वाद चख चुके हैं और अपने अधिकारों का आनंद लिया है, खासकर महिलाओं ने. लेकिन नस्ली प्रतिद्वंद्विता और वफादारी बनी हुई है. तालिबान मुख्य रूप से पश्तून हैं और देश की 3.8 करोड़ आबादी में पश्तूनों का हिस्सा 42 प्रतिशत है.

27 प्रतिशत आबादी ताजिक है तो वहीं 9 प्रतिशत उज्बेक हैं और ये भारी-भरकम संख्या वाले अल्पसंख्यक समूह बनाते हैं. इसलिए, नई व्यवस्था को अगर देश को एकजुट रखना है तो उसे सही मायने में समावेशी होना होगा.

पहले ही अपदस्थ उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह के नेतृत्व में ताजिक अपने गढ़ पंजशीर घाटी में चले गए हैं और ऐलान किया है कि वे तालिबान से लडऩे के लिए एक नेशनल रेजिस्टेंस फ्रंट बना रहे हैं. भारत नॉर्दर्न एलायंस के मुख्य समर्थकों में से एक था जिसमें ताजिक भी शामिल थे जब उन्होंने तालिबान 1.0 के खिलाफ एक प्रतिरोध समूह बनाया था. सालेह का प्रतिरोध अभी बहुत छोटा है लेकिन अगर तालिबान एक समावेशी सरकार नहीं बनाता और भारत और उसके हितों के प्रति शत्रुतापूर्ण रहता है तो भारत भविष्य में इस कार्ड को खेल सकता है.

अपने सार्वजनिक बयानों में तालिबान नेताओं ने समझौतावादी लहजा रखा है. बरादर ने कहा है कि तालिबान ‘‘एक ऐसी इस्लामी व्यवस्था में विश्वास करता है जिसमें राष्ट्र के सभी लोग बिना किसी भेदभाव के भाग ले सकते हैं और भाईचारे के माहौल में एक-दूसरे के साथ सद्भाव से रह सकते हैं.’’

हक्कानी ने फरवरी 2020 में लिखा था कि समूह ''एक ऐसी इस्लामी व्यवस्था का निर्माण कर रहा है जिसमें सभी अफगानों के समान अधिकार हों, जहां महिलाओं के वे अधिकार जो इस्लाम की ओर से दिए गए हैं—शिक्षा के अधिकार से लेकर काम करने के अधिकार तक—सुरक्षित हों.’’ यह निश्चित रूप से ’90 के दशक के मध्ययुगीन गुफाओं और कंदराओं में रहने वाले लोगों जैसी सोच से इतर तो है, लेकिन दुबई जैसे अमीरात के निर्माण से कोसों दूर है. 

बेशक, तालिबान के पूरी तरह सत्ता संभाल लेने के बाद ही उसके इन बयानों का इम्तिहान होगा. कंधार अपहरण और 2008 में भारतीय दूतावास के बाहर बम विस्फोट जिसमें दो भारतीय अधिकारियों सहित 58 लोग मारे गए थे, इस समूह का भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का इतिहास रहा है. भारत के पास ऐसी कोई वजह नहीं है कि जिसके आधार पर यह भरोसा बने कि वर्तमान व्यवस्था अपने उसी पुराने ढर्रे पर नहीं लौटेगी.

एक वर्ग का मानना है कि भारत को तालिबान के साथ संबंध नहीं रखना चाहिए क्योंकि यह आतंक का स्रोत है. पाकिस्तान के साथ संवाद न रखने के पीछे भी यही तर्क दिया जाता है. लेकिन पाकिस्तान में उच्चायुक्त रह चुके टी.सी.ए. राघवन आगाह करते हैं, ''हमें अचानक किसी निष्कर्ष पर पहुंचकर फैसले नहीं करने चाहिए या उन्हें उनके अतीत या फिर पाकिस्तान के चश्मे से देखकर राय नहीं बनानी चाहिए.

हमें उन्हें बताना चाहिए कि हम उन्हें एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह देखेंगे और हम उनसे ताल्लुकात रखने को भी तैयार हैं, बर्शते वे हमारी सीमाओं में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की हमारी चिंताओं को दूर करें. और हमें नई व्यवस्था को मान्यता देने की जल्दी भी नहीं दिखानी चाहिए, बल्कि उन्हें वे सारे वादे निभाने तक इंतजार करना चाहिए जो उन्होंने किए हैं.’’ 

वैधता की इच्छा 
भारत और अन्य देशों की तालिबान पर पकड़, इन देशों की तरफ से उसकी अपनी सरकार को मान्यता की तलाश तक सीमित है. तालिबान के पहले कार्यकाल में केवल तीन देशों ने उसकी सरकार को मान्यता दी थी: पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब. जहां रूस, ईरान और चीन के लिए तालिबान को सहायता देना एक मजबूरी है क्योंकि वे अमेरिकियों को वहां से बाहर निकालना चाहते हैं जो तालिबान ही कर सकते हैं, लेकिन उन्होंने इसे अभी मान्यता नहीं दी है क्योंकि वे पहले तालिबान से यह गारंटी चाहते हैं कि वह उनके हितों की रक्षा करेगा.

अमेरिका के पास दबाव बनाने का एक मौका था और उसने न्यूयॉर्क फेडरल बैंक में रखे अफगानिस्तान के 7 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर दिया है. यह रकम अफगानिस्तान की सरकार को तभी मिल पाएगी अगर वहां एक ऐसी समावेशी सरकार बनती है जो महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करे और आतंक को बढ़ावा देना बंद कर देती है.

आइएमएफ ने अफगानिस्तान को दिए गए 40 करोड़ डॉलर के विशेष आहरण अधिकार रोक दिए हैं. और यूरोपीय देश अगले चार वर्षों के लिए 3 अरब डॉलर की सहायता के अपने वादे को तब तक के लिए रोक रहे हैं जब तक कि वे तालिबान सरकार के उचित व्यवहार को लेकर आश्वस्त नहीं हो जाते.

तालिबान को अगर एक अलग तरह की सरकार बनानी है और बड़े पैमाने पर आसन्न मानवीय संकट का सामना करना है, जिसका सरकार भंग होने के कारण पैदा होना एक तरह से निश्चित लगता है, तो उसे विदेशी धन की सख्त जरूरत होगी. एक विद्रोही संगठन के रूप में यह नशे के अवैध धंधे, चोरी-छुपे खनन और जबरन वसूली के साथ विदेशी मदद के रूप में सालाना 1.6 अरब डॉलर जुटाता था.

हालांकि, अब सरकार चलाने के लिए इसे अपनी बजटीय आवश्यकताओं को पूरा करने की खातिर सालाना 6 अरब डॉलर से अधिक की आवश्यकता होगी. इसके साथ विकास में भारत की सहायता की भी बहुत जरूरत होगी. यह एक ऐसा लाभ जिसे नई दिल्ली सही समय पर भुना सकता है. 

अगर यह फिर से आतंकवाद का गढ़ बन जाता है तो यहां तक कि चीन भी इसके साथ खड़े होने से हिचकेगा. जैसा कि पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत शरत सभरवाल कहते हैं, ‘‘1990 के दशक में जब तालिबान की हुकूमत थी, तब की दुनिया और आज की दुनिया में बहुत बदलाव आ चुका है. आज, दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ एक आम सहमति है, और अगर वे तबाही मचाते हैं तो दुनियाभर के देश उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेंगे.’’

भारत के लिए फायदे की एक और बात यह है कि यह वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और संयुन्न्त राष्ट्र प्रतिबंध समिति का अध्यक्ष है और दिसंबर 2023 तक सुरक्षा परिषद में रहेगा. यह तालिबान को भारतीयों के साथ जुड़ने और विश्वास बहाली के लिए एक बीच रास्ता खोजने में अधिक सक्षम बना देगा.

इस बीच, भारत को कश्मीर में अपनी सुरक्षा बढ़ा देनी चाहिए और एक राजनैतिक प्रक्रिया शुरू करने और जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा जल्द से जल्द बहाल करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए ताकि उत्साहित पाकिस्तान और जिहादी तत्वों को नए सिरे से विद्रोह को भड़काने से रोका जा सके. सिन्हा कहते हैं, ''मेरा मानना है कि तालिबान सरकार में पाकिस्तान का दखल ज्यादा रहेगा और वह अपने हितों को आगे बढ़ाएगा.

हमें धैर्य रखने और अफगानिस्तान में धीरे-धीरे अपना प्रभाव फिर से हासिल करने की जरूरत है.’’ अनुभवी राजनयिक सतिंदर लांबा का मानना है कि अब भारत के लिए वक्त आ गया है कि वह अफगानिस्तान को लेकर एक अलग और स्वतंत्र रवैया अपनाए. वे कहते हैं, ''इस बार हमें किसी का पिछलग्गू नहीं दिखना चाहिए बल्कि नई व्यवस्था के साथ व्यवहारिक दृष्टिकोण और स्वतंत्रता के साथ काम करना चाहिए.’’ अफगानिस्तान के साथ अपने संबंधों में भारत को जो असफलता मिली है और भारत को जिस कठिन दौर का सामना करना पड़ रहा है, उससे उबरने में लांबा की यह सलाह लाख टके की साबित होगी. 

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