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पहाड़ के शिखर का झगड़ा

सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में इस परिसर के वंशानुगत संरक्षक सज्जादानशीन और हिंदूवादी, दोनों की इसके लिए सराहना की कि किसी भी वादी ने मंदिर को अपने-अपने समुदाय से संबंधित होने का दावा नहीं किया था. 

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चिकमगलूर/ बाबा बुदनगिरि चिकमगलूर/ बाबा बुदनगिरि

अजय सुकुमारन

कर्नाटक के चिकमगलूर में पिछले दिसंबर में सालाना दत्ता जयंती समारोह के दौरान कुछ भगवाधारी लोगों का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ, जिसमें क्षेत्र के प्रमुख भाजपा नेता कह रहे थे कि ''दत्त पीठ हिंदुओं के कब्जे में आएगी’’ और यह परिसर ''हिंदुओं का है, था और रहेगा.’’ 

शहर के उत्तर में एक घंटे की ड्राइव की दूरी पर एक पहाड़ी है जिसके शिखर पर श्री गुरु दत्तात्रेय बाबा बुदन स्वामी दरगाह स्थित है. इस गुफा स्थल पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही प्रार्थना करते हैं. विहिप, बजरंग दल और भाजपा की ओर से इस दरगाह पर ’90 के दशक और 2000 के पहले दशक की शुरुआत में आयोजित रैलियों के बाद, यह एक और अयोध्या बन गया है. 

विवाद की जड़ें ’60 के दशक में पड़ीं जब कर्नाटक सरकार ने इस संपत्ति को मुजराई विभाग (जो हिंदू धार्मिक संस्थानों का प्रबंधन करता है) से निकालकर वक्फ की सूची में डाल दिया. वक्फ बोर्ड के 1975 में दरगाह को कब्जे में लेने के बाद जिला जज के समक्ष मुकदमा दायर किया गया था.

इस अदालत ने 1980 में फैसला सुनाया कि यह वक्फ की संपत्ति नहीं है. वक्फ बोर्ड की अपील को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में इस परिसर के वंशानुगत संरक्षक सज्जादानशीन और हिंदूवादी, दोनों की इसके लिए सराहना की कि किसी भी वादी ने मंदिर को अपने-अपने समुदाय से संबंधित होने का दावा नहीं किया था. 

वर्षों से, दरगाह के कुप्रबंधन के आरोपों पर अदालतों में कई याचिकाएं दायर हैं; हिंदू समूहों ने श्री गुरु दत्तात्रेय पीठ देवस्थान संवर्धन समिति नामक ट्रस्ट के जरिए मांग की है कि यहां की पूजा पाठ और प्रार्थनाओं की देखरेख का जिम्मा सज्जादानशीन से लेकर एक हिंदू पुजारी को दे दिया जाए; उधर, बाद की घटनाओं के नया मोड़ लेने से चिंतित सिविल सोसाइटी समूहों ने भी अदालत में याचिकाएं दायर की हैं. 

 

 

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