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ऊंची वृद्धि दर हासिल करना आसान न होगा

वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की वृद्धि धीमी रहेगी, जिसकी वजह से बार-बार इस ओर ध्यान जाएगा कि क्यों न राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों में ढील दी जाए. पर अच्छा वृहद प्रबंधन वही है जिसमें यह पता हो कि कहां रुक जाना है

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अर्थव्यवस्थाः ऐसे समय में जब विश्व अर्थव्यवस्था सुस्त है और अमेरिका मंदी की ओर बढ़ रहा है, तब ग्लोबल मार्केट का रुझान अमूमन यही रहेगा कि वे ज्यादा जोखिम मोल लेने से बचेंगे
अर्थव्यवस्थाः ऐसे समय में जब विश्व अर्थव्यवस्था सुस्त है और अमेरिका मंदी की ओर बढ़ रहा है, तब ग्लोबल मार्केट का रुझान अमूमन यही रहेगा कि वे ज्यादा जोखिम मोल लेने से बचेंगे

भारत @2023 : अर्थव्यवस्था

जहांगीर अजीज, चीफ इमर्जिंग मार्केट इकोनॉमिस्ट, जे.पी. मॉर्गन

भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में आम धारणा तो यही है कि रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से दुनिया भर में रोजमर्रा की चीजों के दाम में उछाल, चीन में आ रही तेज सुस्ती और अमेरिकी फेडरल बैंक की तरफ से आक्रामक मौद्रिक सख्ती सरीखे झंझावातों के बावजूद यह मजबूती से उबर रही है. घरेलू महंगाई अभी भी ज्यादा होने के बावजूद उतार पर है. राजस्व में मजबूत बढ़ोतरी से उत्साहित राजकोषीय घाटा मजबूती की राह पर है और मौद्रिक नीति को ठीक ही कसा गया है. अकेली भौतिक परेशानी चालू खाते के घाटे (सीएडी) में तेज इजाफा है. इसकी वजह है तेल की ऊंची वैश्विक कीमतें और घरेलू मांग में बहाली के चलते गैर-तेल आयात में भारी बढ़ोतरी. रुपए में कमजोरी चालू खाते में भारी घाटे के लिए धन जुटाने की मुश्किल से उपजी है, खासकर जब वैश्विक ब्याज दरें एकदम बहुत बढ़ गई हैं और डॉलर दशकों के सबसे मजबूत स्तर पर है. रुपए में आ रहे तीव्र उतार-चढ़ाव में नरमी लाने की कोशिश में विदेशी मुद्रा भंडार को जमकर खर्च किया गया, बुरा वक्त पीछे छूट चुका है और विदेशी मुद्रा भंडार इतना है कि किसी भी उथल-पुथल से निबट ले.

यहां पेश है एक वैकल्पिक नैरेटिव. इकॉनमिक रिकवरी की रफ्तार तो अच्छी है, फिर भी वह उस 7 फीसद से नीचे बनी हुई है जिसकी ओर महामारी से पहले के वृद्धि के रुझान ने इशारा किया था. अपने आप में यह अपूर्ण है और महामारी से हुआ आर्थिक नुक्सान भारी और स्थायी हो सकता है. ज्यादा मार्के की बात यह है कि अगली दो तिमाहियों के दौरान वृद्धि की रफ्तार बहुत धीमी होनी तय है. सरकार और आरबीआइ इस साल औसतन 6.5-7 फीसद की वृद्धि देख रहे हैं. वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में रफ्तार अगर 13.5 फीसद और 6.3 फीसद रही है, तो साल की दूसरी छमाही में वृद्धि को 4-5 फीसद तक धीमा होना चाहिए, तभी 6.5-7 फीसद का औसत आ पाएगा. यह अर्थशास्त्र नहीं, गणित का सितम है!

लिहाजा अगर अगले वित्त वर्ष में वृद्धि 6 फीसद से ऊपर रहने की उम्मीद है, जैसा कि आम राय का सुझाव है, तो इस वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में इसे मौजूदा दर के मुकाबले 2 फीसद से ज्यादा बढ़ना होगा. वैश्विक वृद्धि इस साल 2.9-3 फीसद की तरफ बढ़ रही है. अगले साल इसके करीब आधा घटकर 1.7 फीसद पर आने के आसार हैं क्योंकि अमेरिका मंदी की तरफ बढ़ रहा है और चीन में बहाली दूसरी छमाही में शुरू होगी. जब वैश्विक अर्थव्यवस्था 1.2 फीसद अंक धीमी पड़ रही हो, ऐसे में भारत से 2 फीसद अंक ज्यादा वृद्धि की उम्मीद करना, बहुत लिहाज से कहें, तो भी चुनौतीपूर्ण होगा. निजी निवेश लगातार सुस्त बना हुआ है और बैंक कर्जो में हालिया बढ़ोतरी काफी हद तक ऊंची महंगाई के कारण है और इसलिए भी कि गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं पूंजी बाजार से धन उगाहने के बजाय बैंकों से उधार लेने की तरफ जा रही हैं. दरअसल कर्ज में बढ़ोतरी और डिजिटलीकरण के विस्तार और वित्तीय समावेशन बढ़ाने की कोशिशों के बाद भी जीडीपी के हिस्से के तौर पर कुल कर्ज (बैंकों और गैर-बैंक का मिलाकर) पिछले दशक के मुकाबले कम है.

मगर ज्यादा परेशान करने वाला अफसाना वह है जो सीएडी के बढ़ने को लेकर है. सीएडी को आयात और निर्यात के बजाय धन जुटाने के स्रोत के तौर पर देखिए. अर्थव्यवस्था के राजकोषीय घाटे की भरपाई या तो स्थानीय नागरिकों या विदेशियों से उधार लेकर की जानी चाहिए. निजी क्षेत्र की बचत का निवेश के मुकाबले ज्यादा होना (बचत-निवेश अंतर) राजकोषीय घाटे का हिस्सा है जिसकी भरपाई स्थानीय लोग करते हैं, और सीएडी वह हिस्सा है जिसकी भरपाई विदेशी करते हैं. इससे फर्क नहीं पड़ता कि सरकार सीधे गैर-बाशिंदों से उधार लेती है या नहीं. मसलन, भारत सरकार ज्यादातर जरूरतों के लिए देश से ही धन जुटाती है पर निजी क्षेत्र को विदेश से उधार लेने को मजबूर करती है. फर्क इससे पड़ता है कि प्रतिस्पर्धी मांगों के लिए धन कैसे जुटाया जाता है.

इस साल का धन जुटाने का गणित कुछ इस तरह है: गिरावट के बाद भी सार्वजनिक क्षेत्र (केंद्र, राज्य और पीएसयू मिलकर) को जीडीपी का 10-10.5 फीसद उधार लेने की जरूरत है, निजी क्षेत्र की अतिरिक्त बचत (उसकी निवेश जरूरतों में धन लगाने के बाद) जीडीपी का 6.5-7 फीसद है, इतनी कि जीडीपी का 3-3.5 फीसद विदेशों से उधार लेने की जरूरत है, जिसका नतीजा सीएडी है. इसके मुकाबले, महामारी के साल 2020-21 में निजी क्षेत्र की अतिरिक्त बचत जीडीपी की 14-14.5 फीसदी जितनी ज्यादा थी, इतनी कि सार्वजनिक क्षेत्र का घाटा बहुत ज्यादा यानी जीडीपी का 13-13.5 फीसद होने के बावजूद भारत ने उधार लेने के बजाए जीडीपी का करीब 1 फीसद विदेश में निवेश किया, जिसका नतीजा उतनी ही मात्रा में चालू खाते के अधिशेष की शक्ल में सामने आया.

मसले को इस तरह देखने से आप बहसों की पेचीदा सुरंगों में जाने से बच जाते हैं कि निर्यात कम होती मांग के कारण गिरा या गैर-प्रतिस्पर्धी विनिमय दर के कारण; आयात जिंसों की ऊंची कीमतों के कारण बढ़ा या अमीर भारतीयों के विदेशी उपभोक्ता वस्तुओं पर पैसा उड़ाने के कारण; या क्या भारत के बुनियादी ढांचा निर्माण को अब पहले के मुकाबले ज्यादा विदेशी पूंजी साधन चाहिए. इसके बजाए यह समस्या को उसके मूल कारण—यानी भारत में निजी बचत में तीव्र गिरावट—पर केंद्रित करता है. रुपए का कमजोर होना विदेशी निवेशकों के यह कहने का तरीका भर है कि भारत में परिसंपत्तियों (शेयर और बॉन्ड दोनों) की कीमतें बहुत महंगी हैं, इसलिए ज्यादा सस्ती मुद्रा से इसकी भरपाई करने की जरूरत है. जब वैश्विक बाजार सीएडी की भरपाई के लिए पूरा धन नहीं दे रहे, आरबीआइ को देश की सार्वजनिक बचत यानी अपने विदेशी मुद्रा भंडार से निकालना होगा.

निजी बचत में गिरावट की क्या वजह है? अनेक वजहें हैं, पर घर-परिवारों और एसएमई की आमदनी में साफ कमी मुख्य कारण है. यह रुझान अगले साल भी उलटने के आसार नहीं हैं, इस हद तक कि सरकार को अगले साल के घाटे में अच्छी-खासी कमी लानी होगी. अगर वह ऐसा नहीं करती, तो सीएडी और भी बढ़ जाएगा. ऐसी दुनिया में जहां वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां इतनी ही सख्त बनी रहेंगी या और ज्यादा सख्त होंगी (जो इस पर निर्भर करता है कि अमेरिका अपनी नीतिगत दरों को कहां ले जाता है), भारत के लिए अपनी विनिमय दर या शेयर तथा बॉन्ड के मूल्य निर्धारणों को काफी हद तक सस्ता किए बगैर ज्यादा बड़े सीएडी के खातिर धन जुटा पाना बहुत मुश्किल होगा (बॉन्ड के लिए इसका अर्थ बहुत ज्यादा प्रतिफल और नीतिगत दर होगा).

विदेशी उधारी (और महंगाई) को काबू में रखने और वित्तीय स्थिरता की हिफाजत के लिए सख्त बजट, ऊंची ब्याज दरों, कम निवेश और धीमी वृद्धि की जरूरत होगी. विश्व अर्थव्यवस्था के सुस्त पड़ने और अमेरिका के मंदी की तरफ बढ़ने के बीच वैश्विक बाजार ज्यादा से ज्यादा जोखिम से बचने का रुख करेंगे.

इन चुनौतियों से पार पाने का समझदार तरीका अपनी जमीन पर पैर टिकाए रखकर झंझावातों का सामना करना है. वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की वृद्धि धीमी होगी और जवाब में राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों में ढील देने का प्रलोभन काफी ज्यादा होगा. मगर बच्चों की परवरिश की तरह अच्छे वृहद प्रबंधन का तकाजा यही है कि उसे पता हो कि कब नहीं कहना है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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