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आवरण कथाः लगन और कीर्ति

भारत की महिला एथलीटों ने  तमाम दुश्वारियों के बावजूद अपने जज्बे से विश्व मंच पर छोड़ी छाप.

लवलीना बोरगोहेन लवलीना बोरगोहेन

लवलीना बोरगोहेन, 23 वर्ष
बॉक्सिंग

असम के गोलाघाट जिले में बारा मुखिया गांव में अपने मां-बाप को मिलने वाले तानों को याद करती हुई बोरगोहेन कहती हैं, ''लोगों को ऐसा मानना था कि मेरे माता-पिता ने पिछले जन्म में कुछ ऐसा पाप किया होगा कि उनकी तीन बेटियां हुई हैं.’’

इन तीन बहनों ने मुए थाई जैसे मार्शल आर्ट में हाथ आजमाया, पर खास कुछ नहीं हो पाया. हालांकि, उनकी जुड़वां बहनों ने खेल छोड़ दिया, लवलीना लगी रहीं और बाद में बॉक्सिंग में जुट गईं. अब हर ओर उनके ओलंपिक मेडल और गांव में बदलाव की चर्चा हो रही है. उनके कांस्य पदक ने यह पक्का कर दिया है कि वे पक्की सड़क से कैसे गांव पहुंचे.

रानी रामपल, 26 वर्ष
हॉकी

हरियाणा के शाहबाद के एक कमरे के घर में पली-बढ़ी, रानी को शुरू में ही एहसास था कि हॉकी स्टिक के जरिए वे दो जून की रोटी के लिए जूझ रहे अपने परिवार को उबार सकती हैं.

15 साल की उम्र में वे राष्ट्रीय टीम में सबसे युवा खिलाड़ी बन गईं. वे 2010 में एफआइएच युवा खिलाड़ी पुरस्कार के लिए नामजद हुईं. 26 साल की उम्र में दिग्गज खिलाड़ी बन चुकी रानी ने लगातार दो ओलंपिक में देश की अगुआई की है. रियो ओलंपिक के एक साल बाद घर खरीदने का उनका सपना पूरा हुआ. 

कमलप्रीत कौर, 25 वर्ष
डिस्कस थ्रो

कौर खेल में जुटने से कम उम्र में शादी के दबाव से बच गईं, जो पंजाब के उनके गांव कबरवाला में लड़कियों की नियति जैसा है. इस साल शुरू में उन्होंने वेबसाइट स्क्रॉल को बताया, ''मैंने सोचा था कि नौकरी पाने और शादी से बचने के लिए खेल मेरा टिकट होगा,’’ सौभाग्य से, छह फुट एक इंच लंबी इस लड़की की पीठ पर पिता कुलदीप सिंह का हाथ था.

लेकिन वे उन पर आर्थिक बोझ नहीं डालना चाहती थीं, क्योंकि उनके संयुक्त परिवार को खेती से होने वाली मामूली कमाई का ही आसरा था. इसलिए कौर शॉटपुट की ट्रेनिंग के लिए बादल में स्पोर्ट्स अथॉरिटी सेंटर चली गईं और फिर कोच प्रीतपाल मारू के कहने पर डिस्कस थ्रो की ओर मुड़ीं.

कौर ने अंडर-20 का राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया. उन्हें रेलवे में नौकरी मिली और गो स्पोर्ट्स फाउंडेशन के राहुल द्रविड़ एथलीट मेंटरशिप प्रोग्राम में चुना गया. तोक्यो में कौर को छठा स्थान मिला. यही कृष्णा पूनिया को भी 2012 लंदन में मिला था.

मीराबाई चानू 26 वर्ष
भारोत्तोलन

बचपन में मीराबाई चानू के लिए वजन उठाना ओलंपिक खेलों के सपने से कहीं अधिक उनकी जरूरत थी. छह भाई-बहनों मे सबसे छोटी, चानू माथे पर जलावन ढोती थीं और कई बार उनका वजन उनके दोनों भाइयों से ज्यादा होता था. मां का हाथ बंटाने के लिए वे धान के खेतों में भी काम करती थीं. और मणिपुर के नांगपोक ककचिंग गांव में चाय का खोखा भी चलाती थीं.

उनका परिवार मणिपुर पब्लिक वस्त्र डिपार्टमेंट में निर्माण मजदूर रहे उनके पिता की पगार से नहीं चल पाता था. तब 12 साल की उम्र में मीराबाई ने भारोत्तोलन में जुटने का मन बनाया और प्रैन्न्टिस के लिए रोजाना इंफाल के खुमन लंपक स्टेडियम जाने लगीं. परिवार ने अपने सारे संसाधन इसमें झोंक दिए.

उनकी बहनों ने उनके आने-जाने के खर्च के लिए अपनी सारी बचत दे दी, फिर भी कई दफा चानू आधी दूरी पैदल तय करती थी. इन मुश्किलों का सिला मिलना शुरू हुआ, जब चानू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उक्वदा प्रदर्शन करने लगीं और 2017 में विश्व चैंपियन बनने वाली महज दूसरी भारतीय बन गईं.

तोक्यो में मिला रजत पदक से उन पर सौगातों की बारिश हो गई है, मणिपुर सरकार और उनके नियोक्ता रेलवे ने नकद पुरस्कारों की घोषणा की है. उनके परिवार को चलाने का उनका वजन शायद कम होता दिख रहा है. 

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