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आवरण कथा-ग्रामीण विकास-भारत का मार्ग प्रशस्त

ग्रामीण विकास सचिव अमरजीत सिन्हा का कहना है कि ''लाभार्थियों का चयन सरकार की ओर से तैयार की गई व्यापक सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना सूची की मदद से किया जाता है."

 टिकाऊ सड़क प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना-1 के लिए अब केंद्र और राज्य 60:40 के अनुपात में धन देते हैं टिकाऊ सड़क प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना-1 के लिए अब केंद्र और राज्य 60:40 के अनुपात में धन देते हैं

एनडीए शासनकाल में ग्रामीण विकास मंत्रालय से होने वाले खर्च में लगातार बढ़ोतरी हुई और 2019 के चुनावों के लिए भाजपा के घोषणा-पत्र में भी ग्रामीण विकास पर 25 लाख करोड़ रु. के निवेश का वादा किया गया है. देखते हैं कि खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों पर केंद्रित नरेंद्र मोदी सरकार की तीन प्रमुख योजनाओं में कैसा कामकाज हुआ.

प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण)

सरकार ने जून 2015 में एक महत्वाकांक्षी घोषणा की जिसमें दावा किया गया कि आजादी के 75वें वर्ष 2022 तक प्रत्येक भारतीय परिवार के पास अपना पक्का घर होगा. इन घरों में शौचालय के अलावा खाना पकाने की गैस, पीने का पानी और बिजली भी उपलब्ध होगी. इस वादे की नींव में प्रधानमंत्री आवास योजना है जिसके तहत ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कम लागत के आवासों के निर्माण के लिए सब्सिडी दी जाती है.

सरकार इस योजना के माध्यम से 2022 तक 2.95 करोड़ ग्रामीण आवासों और 1.2 करोड़ शहरी आवासों का निर्माण पक्का करना चाहती है. इससे पहले यूपीए शासनकाल में इस योजना का नाम इंदिरा आवास योजना था. नवंबर 2016 में शुरू की गई मोदी सरकार की अग्रणी योजना 'सबको आवास' के अंतर्गत आवासहीन अथवा जीर्ण-शीर्ण और कच्चे घरों में रहने वाले ग्रामीण परिवारों को मूलभूत सुविधाओं से युक्त पक्के मकानों के निर्माण के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है.

लगभग 25 वर्ग मीटर आकार के आवास के लिए मैदानी या पहाड़ी क्षेत्र के आधार पर 70,000 रु. से 1.3 लाख रु. के बीच बजट आवंटित किया जाता है. सरकार की तीन-चरणों वाली जियो-टैगिंग न केवल पात्र व्यक्तियों को दी जाने वाली मदद का दस्तावेजीकरण करती है, बल्कि फोटोग्राफ के रूप में साक्ष्य के साथ कार्य की प्रगति की निगरानी भी करती है.

ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार देश भर में स्मार्टफोन की सहायता से आंकड़े एकत्र करने में प्रशिक्षित 3,50,000 से ज्यादा लोग ग्रामीण क्षेत्रों में मंत्रालय के विभिन्न कार्यक्रमों के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं. मंत्रालय का दावा है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले इन लोगों को सूचनाएं अपलोड करने के लिए प्रति एंट्री 20 रु. ऊपर से मिलते हैं. इसके अलावा एक निगरानी तंत्र का विकास भी किया गया है, जिसकी मदद से योजना के लाभार्थियों का पता लगाने, पोर्टल पर उनके पंजीकरण और उनके बैंक खातों को जोड़े जाने का काम किया जाता है. योजना को गति देने के लिए ग्राम रोजगार सेवकों को छह माह के भीतर आवास का निर्माण पूरा करवाने में मदद के वास्ते प्रति आवास 300 रु. दिए जाते हैं.

ग्रामीण विकास सचिव अमरजीत सिन्हा का कहना है कि ''लाभार्थियों का चयन सरकार की ओर से तैयार की गई व्यापक सामाजिक-आर्थिक-जाति जनगणना सूची की मदद से किया जाता है." उनके मुताबिक, ''इस सरकार ने कुल 1.43 करोड़ ग्रामीण आवास बनवाए हैं जिसमें 20 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री की ओर से शुरू की गई प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत बनवाए गए 72.50 लाख मकान शामिल हैं. जियो-टैगिंग और आंकड़ों के अपलोड करने में 10 से 15 दिन का समय लगता है इसलिए हम मार्च तक के आंकड़ों को 15 अप्रैल तक अंतिम रूप दे सकेंगे."

तथ्यों की पड़तालः सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के एक स्वतंत्र आकलन के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत वित्त वर्ष 2016-17 से 2017-18 के बीच स्वीकृत हुए कुल आवासों में से 67 प्रतिशत का निर्माण पूरा हो चुका था. लेकिन इनमें से केवल 60 प्रतिशत लाभार्थियों को सहायता की अंतिम किस्त मिली थी. प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत आवास निर्माण पूरा कर लेने वाले 7,00,000 लाभार्थियों को 31 दिसंबर, 2018 तक सहायता की अंतिम किस्त नहीं मिली थी.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा)

सन् 2005 में शुरू हुई मनरेगा मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का प्रमुख कार्यक्रम थी. इसके तहत ग्रामीण कृषि मजदूरों को श्काम के अधिकार्य की गारंटी दी गई थी. यूपीए-।। के कार्यकाल में यह योजना इतनी सफल रही थी कि 2009 में मनमोहन सिंह सरकार की वापसी के बड़े कारणों में इसकी गिनती होती थी. लेकिन बाद में इसका क्रियान्वयन करने वाले अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ इस योजना की कड़ी आलोचना भी हुई.

मोदी सरकार शुरू में इस योजना को लेकर आशंकित थी और इसीलिए उसने इसे एक किनारे डाल दिया था. बाद में 2014-15 में पड़े सूखे के मद्देनजर इसे 2015-16 में रु. 60,000 करोड़ रु. के बजट आवंटन के साथ पुनर्जीवित किया गया. मनरेगा के अंतर्गत हर साल मिलने वाले 100 दिन के काम के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों के श्रमिक भवनों, कुओं, सड़कों आदि का निर्माण करते हैं.

दूर से इसकी प्रगति पर निगाह रखने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मनरेगा की सूचना प्रबंधन प्रणाली (एमआइएस) पर लगभग 1.5 करोड़ संपत्तियों की जियो-टैगिंग कर रखी है. योजना की मुख्य बातों में से एक है इसमें महिलाओं की भागीदारी जो वित्त वर्ष 2015-16 में 55 प्रतिशत, 2016-17 में 56 प्रतिशत, 2017-18 में 53 प्रतिशत और 2018-19 में 53 प्रतिशत रही. यह भागीदारी वैधानिक रूप से आवश्यक एक तिहाई भागीदारी के स्तर से काफी ज्यादा है.

तथ्यों की पड़तालः योजना की आलोचना का मुख्य बिंदु यह रहा है कि इसके अधीन दी जाने वाली मजदूरी न्यूनतम दैनिक मजदूरी से कम है और इसमें वार्षिक वृद्धि भी बहुत कम हुई है, खास तौर पर 2017 के बाद से. नरेगा संघर्ष समिति के बैनर तले गैर-सरकारी संगठनों के एक समूह की ओर से किए गए आकलन के अनुसार देश के 34 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में से 33 में इसके अधीन मजदूरी की दरें न्यूनतम मजदूरी से कम हैं जो 1983 में संचित राय बनाम राजस्थान सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विरुद्ध हैं.

इसके अलावा, 2019 में छह राज्यों/केंद्र शासित क्षेत्रों में तथा 2018 में 10 राज्यों में इस मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई. ज्यादातर राज्यों या केंद्रशासित क्षेत्रों में 2017 से अब तक मजदूरी में शून्य से पांच रुपए तक की वृद्धि हुई है. 28 मार्च, 2019 को मंत्रालय ने 34 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों के लिए संशोधित मजदूरी की दरें अधिसूचित की हैं.

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाइ)

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए-ढ्ढ सरकार के कार्यकाल में 25 दिसंबर, 2000 को शुरू हुई इस योजना का उद्देश्य पूरे देश में सड़क मार्ग से न जुड़ सके सभी स्थानों को हर मौसम में काम लायक पक्की सड़कों से जोडऩा था. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की शुरुआत केंद्र सरकार से 100 प्रतिशत सहायता प्राप्त योजना के रूप में हुई थी.

2014 में एनडीए-।।। के सत्ता में आने के समय तक देश में कुल 56 प्रतिशत ग्रामीण सड़कें पक्की थीं. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का तो दावा है कि मोदी के शासनकाल में 'प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का आकार तिगुना हो गया है." ग्रामीण विकास मंत्रालय का दावा है कि मार्च-अप्रैल 2019 तक 95-97 प्रतिशत गांवों को सड़कों से जोड़ दिए जाने का लक्ष्य है.

आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल (गृह मंत्रालय से चिन्हित राज्य) में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित ब्लॉकों 100 या इससे ज्यादा आबादी वाली बस्तियों को संपर्क मार्ग से जोडऩे के लिए अतिरिक्त फंड दिए गए हैं.

शुरू में इस योजना का लक्ष्य मार्च 2022 तक हासिल किया जाना था लेकिन प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना-।। के लिए लक्ष्य हासिल करने की समयसीमा घटा कर मार्च 2019 कर दी गई. ऐसा करने के पहले योजना के लिए ज्यादा धन का आवंटन और उसे बांटने के तरीके में बदलाव करते हुए केंद्र तथा राज्य की भागीदारी 60:40 के अनुपात में कर दी गई.

केवल पूर्वोत्तर के आठ राज्यों तथा तीन हिमालयी राज्यों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड) के लिए वित्तीय भागीदारी का अनुपात 90:10 का ही रखा गया.

तथ्यों की पड़तालः अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर शोध की भारतीय परिषद (आइसीआरआइईआर) के प्रो. अशोक गुलाटी का दावा है कि ''अगर हम एनडीए के कामकाज की तुलना यूपीए-।।। से करें तो हम पाएंगे कि सड़क निर्माण के मामले में एनडीए ने बेहतर काम किया है."

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