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''जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दें, दिल्ली जैसा समझौता नहीं हो''

स्थानीय लोगों के लिए नौकरी में आरक्षण और भूमि हड़पने को लेकर घाटी में भारत सरकार के इरादों पर अविश्वास रोकना है

अमिताभ मट्टू 59 वर्ष, मुख्यमंत्री के पूर्व सलाहकार, पूर्व वीसी, जम्मू विश्वविद्यालय, श्रीनगर अमिताभ मट्टू 59 वर्ष, मुख्यमंत्री के पूर्व सलाहकार, पूर्व वीसी, जम्मू विश्वविद्यालय, श्रीनगर

अमिताभ मट्टू का मानना है कि कश्मीर फिर से एक महत्वपूर्ण चौराहे पर है. श्रीनगर में जन्मे प्रतिष्ठित शिक्षाविद और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के राजनैतिक सलाहकार 59 वर्षीय मट्टू कहते हैं कि घाटी ''वर्तमान में शांति की एक उल्लेखनीय भावना का अनुभव कर रही है.'' उनका कहना है कि यह माहौल भारत सरकार को अलग-थलग पड़े युवाओं तक पहुंचने और उन्हें हिंसा करने से रोकने का मौका देता है.

उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुख्यधारा के कश्मीरी नेताओं तक हालिया पहुंच चतुराई नहीं है, बल्कि 'सीढ़ी पर पहला कदम' है और आगे के कदम ''जम्मू-कश्मीर में शांति सुनिश्चित करने के लिए पीएम की रणनीतिक दृष्टि'' प्रकट करेंगे.

उनके अनुसार, सरकार आने वाले महीनों में परिसीमन, चुनाव और राज्य का दर्जा देने संबंधी मुद्दे को कैसे संभालती है, यह तय करेगा कि वह अपने कश्मीर गेमप्लान को हासिल कर सकती है या नहीं. मट्टू स्पष्ट मानते हैं कि निवार्चन क्षेत्रों का परिसीमन राजनैतिक रूप से विस्फोटक हो सकता है, इसे 'विश्वसनीय, निष्पक्ष और पारदर्शी' होना चाहिए और धर्म, क्षेत्र तथा जातीयता के संदर्भ में राजनैतिक उद्देश्यों से रहित होना चाहिए.

श्रीनगर के मध्य में स्थित मट्टू का पुश्तैनी घर उन कुछ पंडितों में से है, जो 1990 के दशक में उग्रवाद की मार झेल रहे थे. जिस तरह संसद में एंग्लो-इंडियन समुदाय को प्रतिनिधित्व दिया गया था, मट्टू को उम्मीद है कि पंडित घाटी में एक विधानसभा सीट के लिए आरक्षण की मांग कर सकते हैं. लेकिन वह स्वीकार करते हैं कि यह परिसीमन कवायद के बाहर है और इसके लिए एक संविधान संशोधन की आवश्यकता है.

आदर्श रूप से, मट्टू को उम्मीद है कि परिसीमन की कवायद के बाद राज्य का दर्जा बहाल हो जाएगा और फिर विधानसभा चुनाव होगा. हालांकि, वे दृढ़ हैं कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए, न कि दिल्ली जैसा समझौता हो. वे कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर इसलिए अलग-थलग पड़ गया, क्योंकि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती, इसकी तर्कपूर्ण परंपरा की समृद्धि सहित, राज्य में नहीं देखी गई थी.

इसलिए, हमें जमीनी स्तर पर बहस करने और लोगों को सशक्त बनाने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए और राज्य को कानून और व्यवस्था सुनिश्चित करने और लोगों को फिर से अलग-थलग महसूस करने से रोकने की जिम्मेदारी देनी चाहिए.

दूसरा मुद्दा जो उन्हें महत्वपूर्ण लगता है, वह स्थानीय लोगों के लिए नौकरी में आरक्षण और भूमि हड़पने को लेकर घाटी में भारत सरकार के इरादों पर अविश्वास रोकना है. वे इससे चिंतित हैं कि वादे के मुताबिक आर्थिक विकास अभी तक यहां नहीं पहुंचा है. ''दावोस कहां है? कहां है बड़ा निवेश? या सुशासन? लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रतिनिधि इस कमी के लिए जिम्मेदार हैं, जो नौकरशाहों को जमीन पर प्रभावी ढंग से काम करने के लिए निर्देशित कर सकते हैं. बाबू खुद ऐसा नहीं कर सकते.''

—इसके सहित आगे के पेजों की प्रोफाइल के लेखक राज चेंगप्पा हैं

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