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आवरण कथाः सांस लेने का संघर्ष

खतरनाक दूसरी लहर और ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी ने कोविड के खिलाफ लड़ाई को बेहद मुश्किल बना दिया, सरकार इससे क्यों बेपरवाह बनी रही और अब नाकामी दूर करने तथा हालात पर काबू पाने के लिए क्या कर सकती है.

व्यवस्था चरमराई दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में दाखिले का इंतजार करती बाहर खड़ी कार में ऑन्न्सीजन के साथ एक कोविड मरीज व्यवस्था चरमराई दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में दाखिले का इंतजार करती बाहर खड़ी कार में ऑन्न्सीजन के साथ एक कोविड मरीज

उस 23 अप्रैल की रात स्वास्थ्य सेवा से जुड़े 53 वर्षीय सुभाष वर्मा और उनकी पत्नी अनुजा दक्षिणी दिल्ली के द्वारका स्थित अपने फ्लैट में थके-मांदे लौटे. उन्होंने अपने घर से करीब 22 किमी दूर रोहिणी में कोविड के लिए बनाए गए जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल के इमरजेंसी वार्ड में अनुजा की गंभीर रूप से बीमार बहन तनुजा को भर्ती कराने की कोशिश में दौड़-भाग करते हुए पूरा दिन बिता दिया था. करोलबाग के एक स्कूल में अध्यापिका 53 वर्षीय तनुजा का कोविड का टेस्ट 16 अप्रैल को पॉजिटिव आया था. उनके ऑक्सीजन का स्तर जब गिरकर 70 पर पहुंच गया तो उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया.

रात करीब 1.30 बजे इस दंपती के पास अस्पताल से फोन आया. तनुजा की हालत बिगड़ गई थी और उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा. अस्पताल से उन्हें बताया गया, ''हम नहीं जानते कि क्या किया जाए. कृपया आप सुबह आ जाइए.’’ पांच घंटे बाद वर्मा दंपती जब अस्पताल पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि तनुजा रात नहीं निकाल पाईं, उनकी मौत हो चुकी थी. दूसरे मरीजों के फूट-फूटकर रो रहे रिश्तेदारों को देख उन्हें एहसास हुआ कि ऐसा कैसे हो गया, ‘‘मेरी बहन अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म हो जाने से मर गई...’’

उस दिन उस अस्पताल में कम से कम 20 मरीजों की मौत हो गई थी क्योंकि अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पाइप के जरिए पहुंचने वाली ऑक्सीजन खत्म हो गई थी. मरीज धीरे-धीरे बेहोशी की हालत में पहुंच गए. उनमें से ज्यादातर के चेहरों पर अब भी मास्क लगे हुए थे. उनके खून में ऑक्सीजन खत्म हो चुकी था, इस स्थिति को हाइपोक्सिया कहा जाता है.

ऑक्सीजन चेतावनी
ऑक्सीजन चेतावनी

उस दिन अस्पताल के एक वकील ने दिल्ली हाइकोर्ट को बताया, ‘‘हम अक्षरश: सांस लेने के लिए झटपटा रहे हैं.’’ अस्पताल में लिक्विड ऑक्सीजन की आपूर्ति रात 10 बजे तक खत्म हो चुकी थी. ऑक्सीजन का जो टैंकर शाम 5.30 बजे तक पहुंचना था, वह लगभग आधी रात को पहुंचा. अस्पताल के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने जब बैकअप सिलिंडरों को चालू किया तो प्रेशर में गिरावट आने से मरीजों की मौत हो गई.

अस्पतालों ने समय पर ऑक्सीजन न मिलने के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार बताया है. इसके जवाब में राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है कि समय पर ऑक्सीजन पहुंचाने में देरी न होने को आश्वस्त नहीं किया. आरोपों का यह खेल जारी रहा, जबकि कोविड की दूसरी खतरनाक लहर ने देश को महामारी के केंद्र में तब्दील कर दिया. संक्रमण का ग्राफ जो सीधा ऊपर की ओर बढ़ता गया, 26 अप्रैल को पूरी दुनिया में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया—3,50,000 से ज्यादा नए मामले दर्ज हो चुके थे. पहली लहर के समय सबसे ज्यादा केस—पिछले साल 16 सितंबर को—भारत में नए मामलों की संख्या 96,424 तक रिकॉर्ड की गई थी.

हजारों की संख्या में गंभीर रूप से बीमार मरीज, जिनके फेफड़े सार्स-कोवी2 स्ट्रेन से खराब हो चुके थे, सबसे ज्यादा प्रभावित 12 राज्यों के अस्पतालों में भर चुके थे. मेडिकल ऑक्सीजन की मांग 10 गुना बढ़ गई थी—अप्रैल के अंत तक प्रतिदिन 700 मीट्रिक टन से बढ़कर 6,000 मीट्रिक टन तक पहुंच गई थी. देश की लचर चिकित्सा व्यवस्था बड़ी संख्या में नए मामलों के आने से चरमरा उठी है और देश भर के अस्पतालों ने मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति में खतरनाक हद तक कमी दर्ज करनी शुरू कर दी.

गुजरात में 350 मीट्रिक टन की कमी रिकॉर्ड की गई थी, अप्रैल के मध्य तक कम से कम 19 मरीज राजकोट, बनासकांठा, नवसारी, मेहसाणा और सुरेंद्रनगर जैसे जिलों में ऑक्सीजन की कमी के चलते जान गंवा चुके थे. यहां तक कि औद्योगिक राज्य महाराष्ट्र, जिसके आठ ऑक्सीजन प्लांट 1,250 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं, को गुजरात, छत्तीसगढ़ और दूरदराज के राज्य झारखंड और आंध्र प्रदेश से फोन पर संपर्क करना पड़ा.

देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ऑक्सीजन की मांग प्रतिदिन 2,000 मेडिकल सिलिंडरों से बढ़कर 7,000 सिलिंडरों तक पहुंच गई. वहां के एक स्थानीय निवासी रहमत अली शहर में गैस बनाने वाले दो प्लांटों में से एक मुरारी गैसेस के बाहर अपना खाली सिलिंडर लेकर पांच घंटे से लाइन में लगकर इंतजार कर रहे थे.

इस बीच वे एक फोन कॉल को याद कर रहे थे जिसमें रोते हुए उन्हें बताया गया था कि उनकी बीमार मां की मौत हो चुकी थी. प्लांट के मैनेजर सुशील सिंह ने असहाय होकर विनती करने के अंदाज में बताया, ‘‘हम प्रतिदिन 800 सिलिंडर गैस का उत्पादन करने के लिए रात-दिन काम कर रहे हैं. लेकिन मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं.’’

म्यूटेंट का वार
म्यूटेंट का वार

लेकिन सबसे बुरा हाल दिल्ली का था. राष्ट्रीय राजधानी में 27 अप्रैल को 24,149 नए मामले और 381 मौतें दर्ज की गई थीं. दिल्ली में अपना कोई ऑक्सीजन प्लांट नहीं है, इसलिए दिल्ली को मेडिकल ऑक्सीजन के लिए उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की सप्लाई पर निर्भर रहना पड़ता है. 20 अप्रैल तक दिल्ली के अस्पतालों को 700 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत थी लेकिन उसे केवल 480 मीट्रिक टन ऑक्सीजन ही मिल पाई थी.

जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल का हादसा, जिसे अब यही नाम दे दिया गया है, शहर के बाकी कई हिस्सों में भी दोहराया जा रहा था. अस्पताल वाले बेबस होकर सोशल मीडिया पर अपील कर रहे थे क्योंकि उनके यहां ऑक्सीजन का स्टॉक बड़ी तेजी से घटता जा रहा था. अस्पताल के स्टाफ मरीजों के परिजनों से ऑक्सीजन की व्यवस्था करने को कह रहे थे. लेकिन यह दशा देखकर भी सरकारी तंत्र पर जूं नहीं रेंगी.

म्यूटेंट का वार
म्यूटेंट का वार

कालाबाजारी
कालाबाजारियों ने रातोरात पैसा बनाने का मौका देखकर सिलिंडरों की जमाखोरी शुरू कर दी और सिलिंडर की कीमत 64,000 रु. तक मांगने लगे. दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के दशरथपुरी में एक कालाबाजारी करने वाले के घर से 32 ऑक्सीजन सिलिंडर जब्त किए गए. उसने उन सिलिंडरों की गैस को छोटे सिलिंडरों में डाल दिया था और उन्हें 12,500 रु. की दर से बेच रहा था.

देश भर में कुछ जगहों पर ऑक्सीजन की आपूर्ति पूरी तरह से टूट चुकी थी. रिसाव और कम दाब के चलते बहुत से मरीजों की मौत हो गई थी. मरीजों के रिश्तेदार जब सोशल मीडिया पर सहायता की मांग करने लगे तो सिविल सोसायटी के लोग और स्वयंसेवी लोग सिलिंडरों और आइसीयू की व्यवस्था करने में लग गए.

तनुजा विद्यार्थी के रिश्तेदारों ने देखा कि अस्पतालों में बिस्तर पाना बहुत कठिन काम हो गया है और यह तो उनकी परेशानी की बस एक शुरुआत है. यह तो नहीं बताया जा सकता है कि ऑक्सीजन के अभाव में कितने लोगों की जान जा चुकी है लेकिन समय पर अगर ऑक्सीजन मिल गई होती तो बहुत-से लोगों की जान बचाई जा सकती थी.

धीमी गति से काम करने वाली सरकारी नौकरशाही नींद से तब जागी जब संकट उसके मुंह के सामने आकर खड़ा हो गया. उसे एहसास हुआ कि देश के पूर्वी हिस्सों के औद्योगिक केंद्रों से अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचने में अभी कई दिन लग जाएंगे. 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में केंद्र सरकार ने 30 अप्रैल तक कोविड से प्रभावित 6 राज्यों में आपूर्ति में कमी आने की आशंका बताई (देखें ग्राफिक: ऑक्सीजन चेतावनी).

उत्तर  प्रदेश, जहां मांग और आपूर्ति के बीच 400 टन का अंतर है, शायद सबसे ज्यादा प्रभावित था. ऑक्सीजन पहुंचाने वाले ट्रकों की आवाजाही की रफ्तार तेज करने के लिए हिंडन स्थित भारतीय वायु सेना के एयरलिफ्ट स्क्वाड्रन सी-17 ग्लोबमास्टर्स ने खाली ऑक्सीजन ट्रकों को पूर्वी भारत की ऑक्सीजन फैक्टरियों तक पहुंचाया.

विदेश मंत्रालय ने चिकित्सा सहायता के लिए दूसरे देशों में एसओएस भेजे. इस सहायता की सूची में क्रायोजेनिक ऑक्सीजन टैंक, सिलिंडर और ऑक्सीजन कंसेंट्रेटर शामिल हैं. लेकिन दुख से बेहाल रिश्तेदारों के लिए अब तक बहुत देर हो चुकी थी. वर्मा कहते हैं, ''मेरी साली की जान बचाई जा सकती थी. उन लोगों ने उनकी हत्या कर दी.’’

तूफान से पहले शांति
1 मार्च, 2021 को, भारत ने 12,286 नए मामले दर्ज किए. यह कोविड -19 ग्राफ में एक गिरावट थी, जो वर्ष की शुरुआत से ही सपाट थी. ऐसा लग रहा था, महामारी दूर जा रही है. भारत वापस सामान्य हो रहा था. महामारी की पहली लहर के दौरान देश भर में स्थापित किए गए चिकित्सा सुविधाओं को बंद करना शुरू कर दिया गया था. उदाहरण के लिए, फरवरी 2021 में, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले साल जून में दक्षिण दिल्ली के छतरपुर में राधास्वामी सत्संग व्यास में बनाए गए दुनिया के सबसे बड़े 10,000 बिस्तरों वाले कोविड केंद्र को बंद कर दिया था. 26 मार्च को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के लिए चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की थी.

फिर, 6 अप्रैल को भारत में सिर्फ 24 घंटों में 1,15,000 संक्रमण के मामले आ गए, महामारी की शुरुआत के बाद से यह सबसे बड़ा दैनिक मामलों का रिकॉर्ड था. कोविड सूनामी की लहरें दस्तक देने लगी थीं. 

इसी आशंका के बारे में देश के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने पिछले नवंबर में अपने फेसबुक पोस्ट में दूरदर्शी चेतावनी दी थी. ‘‘यह दूसरी और तीसरी लहर सूनामी की तरह खतरनाक है. आप सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं करते हैं, तो इसका प्रकोप फैल जाएगा.’’

चिकित्सा की प्राणवायु
चिकित्सा की प्राणवायु

जैसे ही देश के 12 राज्यों में कोरोना की दूसरी लहर ने कहर बरपाना शुरू किया, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने संक्रमण के पहले दिन से ही फेफड़े को नुक्सान पहुंचाने वाले वायरस के नए आक्रामक स्ट्रेन का पता लगाना शुरू कर दिया. सांस लेने में तकलीफ दूसरी लहर का सबसे बड़ा लक्षण है.

पश्चिमी दिल्ली के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सचिव और पल्मोनोलॉजिस्ट (श्वास रोग विशेषज्ञ) डॉ. संदीप दत्ता कहते हैं, ''नए म्यूटेंट स्ट्रेन इतने आक्रामक हैं कि आप पहले या दूसरे दिन दवा नहीं देते हैं, तो रोगी की पहले ही गंभीर स्थिति हो जाती है.’’ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली साइटोकिन को बढ़ावा देती है, जो शरीर की अपनी कोशिकाओं और ऊतकों पर हमला करती है, न कि वायरस पर.

यह 'साइटोकिन तूफान’ फेफड़ों को सूजन और गंभीर क्षति की ओर ले जाता है, जिससे हवा से ऑक्सीजन ग्रहण करने करने की फेफड़ों की क्षमता खत्म हो जाती है, जिससे हाइपोक्सिया हो जाता है. गंभीर रूप से बीमार रोगियों को सांस लेने में सहायता प्रदान के लिए चिकित्सा ऑक्सीजन की जरूरत इस प्रकार महत्वपूर्ण हो जाती है.

पहली लहर में सांस की तकलीफ वाले अस्पताल में भर्ती मरीजों की संख्या 41.7 प्रतिशत थी. दूसरी लहर में ऐसे 47.5 फीसद रोगी हैं. दूसरी लहर में वायरस का संक्रमण बहुत तेजी से हो रहा है, इसलिए ऑक्सीजन की जरूरत वाले रोगियों की संख्या भी बढ़ी है. गंभीर रूप से बीमार कोविड रोगियों को प्रति मिनट दो से आठ लीटर ऑक्सीजन की जरूरत होती है. इसलिए 7,800 लीटर की क्षमता वाला पांच फुट लंबा ऑक्सीजन सिलेंडर मात्र छह घंटे चलता है.

वेंटिलेटर से अधिक चिकित्सीय ऑक्सीजन वायरस के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण होने जा रहा है, जो मानव शरीर के श्वास तंत्र को पंगु बना देता है. इसे सरकार पिछले साल से ही अच्छी तरह से जानती थी. इसलिए मार्च 2020 में केंद्र सरकार के 11 अंतर-मंत्रालयीय अधिकार प्राप्त समूहों के सामने यह प्रमुख एजेंडा में से एक था.

चिकित्सीय ऑक्सीजन प्रत्येक दिन देश में तैयार होने वाले 7,500 टन औद्योगिक ऑक्सीजन का एक छोटा-सा हिस्सा होता है. विशिष्ट वायु पृथक्करण इकाइयां वायुमंडलीय हवा को सोखती हैं और इसे अपने मूल तत्वों-नाइट्रोजन और ऑक्सीजन में विघटित कर देती हैं. ऑक्सीजन को तरलीकृत करके क्रायोजेनिक कंटेनरों में विशेष टैंकरों में भेज दिया जाता है, और उसे शून्य से 183 डिग्री नीचे के तापमान पर रखा जाता है.

हर टैंकर में 17,000 लीटर तरलीकृत ऑक्सीजन होती है. भारतीय इस्पात उद्योग उस ऑक्सीजन का इस्तेमाल करता है, जो बुनियादी ऑक्सीजन प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है, या ब्लास्ट फर्नेस लोहे को स्टील में बदलने के लिए शुद्ध ऑक्सीजन को तरल ऑक्सीजन में तब्दील किया जाता है. अधिकांश बड़े ऑक्सीजन संयंत्र देश के इस्पात क्षेत्र के पास स्थित हैं—पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में.

तरल सोना
तरल सोना

चिकित्सीय ऑक्सीजन को दो तरह से भेजा जाता है-क्रायोजेनिक टैंकर में और जंबो (बड़े) सिलिंडर में. प्रत्येक ट्रक तरलीकृत ऑक्सीजन के 800 क्यूबिक मीटर के टैंक को ढो सकता है. इस तरह एक ट्रक लगभग 120 जंबो गैस सिलेंडर रिफिल (भर) कर सकता है. प्रत्येक जंबो सिलिंडर में सात क्यूबिक मीटर ऑक्सीजन होती है.

पिछले साल मार्च में, जब देश में देशव्यापी लॉकडाउन लगा दिया गया था, तो उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार (डीपीआइआइटी) विभाग के सचिव, गुरुप्रसाद महापात्रा की अध्यक्षता में एक अधिकारसंपन्न समिति को आवश्यक उपकरण की उपलब्धता आश्वस्त करने का काम सौंपा गया था, जिसमें ऑक्सीजन भी शामिल थी.

समिति ने देश में औद्योगिक गैस निर्माताओं के 95 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करने वाले ऑल इंडिया इंडस्ट्रियल गैस मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन (एआइआइजीएमए) और देश के लाइसेंसिंग प्राधिकरण पीईएसओ (पेट्रोलियम ऐंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन), के साथ बैठकों में चिकित्सीय ऑक्सीजन की मौजूदा आपूर्ति को 4,200 मीट्रिक टन तक बढ़ाया गया. जैसे-जैसे मामले बढ़े, सरकार ने अक्तूबर तक उत्पादन को बढ़ाकर 7,191 मीट्रिक टन कर दिया. 

पिछले साल 1 सितंबर को 43,022 कोविड रोगी ऑक्सीजन सपोर्ट पर थे. सितंबर के तीसरे सप्ताह तक चिकित्सीय ऑक्सीजन पर निर्भर मामलों की संख्या बढ़कर 75,098 हो गई, जब देश भर में संक्रमण के मामले प्रति दिन 97,894 हो गए थे. स्वास्थ्य मंत्रालय ने तब तक ऑक्सीजन बेड की संख्या 57,000 से बढ़ाकर 2,00,000 कर दी थी.

14 अक्तूबर को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 9.8 करोड़ रुपए में 1,00,000 मीट्रिक टन चिकित्सीय ऑक्सीजन आयात करने का फैसला किया—एक महीने के लिए बफर स्टॉक —सिर्फ सर्दियों में मांग बढ़ने की आशंका के मद्देनजर. (स्वास्थ्य मंत्रालय ने पीएसयू एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड की एक निविदा जांच निकाली गई थी. यह स्पष्ट नहीं है कि अनुबंध किया गया था या नहीं.)

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने पिछले वर्ष 20 अक्तूबर को मीडिया को बताया था, ‘‘जहां तक चिकित्सीय ऑक्सीजन की आपूर्ति की बात है, तो हम बेहद आरामदायक स्थिति में हैं. देश में पिछले 10 महीनों में न तो मेडिकल ऑक्सीजन की कोई कमी थी और न ही अब किसी कमी का सामना करना पड़ रहा है.’’

जब देश भर में कोविड-19 के मामलों में कमी आई, चिकित्सीय ऑक्सीजन की मांग भी घट गई. एआइआइजीएमए ने बताया कि फरवरी, 2021 तक इसकी दैनिक मांग 1,200 से 1,400 मीट्रिक टन तक गिर गई थी. यह देखकर केंद्र और राज्यों ने समय से पहले ही जीत की घोषणा कर दी. लेकिन जब अप्रैल की शुरुआत में दूसरी लहर के संक्रमण के मामलों में अचानक उछाल शुरू हुई, तो हालात को काबू में रखने के लिए ऑक्सीजन की ढुलाई की निगरानी शुरू कर दी गई (देखें ग्राफिक: चिकित्सा की प्राणवायु).

डीपीआइआइटी के सचिव महापात्रा की अध्यक्षता में अधिकार प्राप्त समूह ने सर्वाधिक संक्रमण वाले उन 12 राज्यों के लिए ऑक्सीजन सप्लाई के स्रोतों की पड़ताल की, जहां मामलों में बढ़त देखी गई थी. महाराष्ट्र में मांग को देखते हुए उत्पादन क्षमता बढ़ाए जाने की उम्मीद थी जबकि गुजरात, कर्नाटक और राजस्थान में भी आवश्यकताओं में तेजी देखी गई.

समिति ने राज्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करने के लिए चिकित्सीय ऑक्सीजन और उत्पादन क्षमता के स्रोतों का रेखांकन किया और आवंटन के पैमाने तय किए. इन 12 राज्यों को 6,593 मीट्रिक टन आवंटित किया गया. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ऑक्सीजन आपूर्तिकर्ताओं को अस्पतालों में ऑक्सीजन देने का निर्देश दिया.

अप्रैल के अंत तक, ऑक्सीजन संकट का विस्फोट हो गया था. स्पष्ट था कि समिति यह अनुमान लगाने में नाकाम रही कि मांग इतनी तेजी से बढ़ेगी और इसका वितरण नेटवर्क कमतर साबित होगा. भारी दबाव झेल रही फैक्ट्रियां लडख़ड़ा गईं. देश में सबसे बड़े मेडिकल ऑक्सीजन आपूर्तिकर्ताओं में एक आइएनओएक्स है जिसके संयंत्र उत्तर प्रदेश के नोएडा और मोदीनगर, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में हैं. वही उत्तर भारत के ज्यादातर अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है. उसके मुताबिक, मांग और आपूर्ति में तालमेल बिठाना आसान नहीं है.

आइएनओएक्स के प्रतिनिधि विशाल साह ने 24 अक्तूबर को दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग को एक पत्र में लिखा, ‘‘मांग तेजी से बढ़ी है और आइएनओएक्स ऐसी बढ़ी हुई मांगों को पूरा करने में सक्षम नहीं होगा, क्योंकि हमारे पास उत्पादन में कई अड़चनें हैं.’’ एआइआइजीएमए के अध्यक्ष साकेत टिकू पिछले मार्च से सप्लाई में तालमेल बनाए रखने के लिए कई सरकारी बैठकों में शामिल रहे हैं. उन्होंने बताया, ‘‘मांग तेजी से बढ़ी, और इससे पहले कि कोई जानता कि क्या हो रहा है, भारी संकट पैदा हो गया.’’

ऑक्सीजन मांग में भारी वृद्धि का अनुमान लगाने में केंद्र नाकाम रहा. वह यह भी नहीं सोच पाया कि इसके वितरण के बुनियादी ढांचे पर मांग बढ़ने का क्या असर पड़ेगा. देश में तरल ऑक्सीजन की ढुलाई के लिए केवल 1,700 टैंकर हैं, जबकि बढ़ी हुई मांग को देखते हुए इस बेड़े के आकार को दोगुना करना होगा. हर ट्रक को पूरे देश भर में जाना होगा, पूरब के उत्पादन केंद्रों से अतिरिक्त तरल ऑक्सीजन पश्चिम भारत में अधिक मांग वाले राज्यों में पहुंचाने का मतलब है कि हरेक ट्रक लगभग एक हफ्ते के लिए उसी काम में फंसा रहेगा.

ऑक्सीजन भरने के लिए 20 फुट लंबे बेलनाकार क्रायोजेनिक आइएसओ कंटेनर भी कम ही थे. यानी चाहकर भी सप्लाई दुरुस्त नहीं की जा सकती थी. सो, इस मामले में स्थिति दुरुस्त करनी पड़ी. महाराष्ट्र में आम तौर पर ट्रकों को खुले  रेल वैगन में चढ़ाया जाता है. उसने विजाग से गैस लाने के लिए सेना के बख्तरबंद ट्रकों का इस्तेमाल किया. संक्रमण के मामलों में बेतहाशा वृद्धि से ऑक्सीजन सिलेंडर उत्पादन में बढ़ोतरी भी नाकाफी साबित हुई, जो कोविड से पहले 500,000 थी लेकिन पिछले वर्ष लगभग 13 करोड़ तक पहंचा दी गई थी.

अधिकांश राज्य संकट के दौरान सोते हुए पाए गए. उदाहरण के लिए, गुजरात ने पिछले वर्ष एक भी ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र नहीं लगाया, उसने मान लिया कि मौजूदा उत्पादन किसी भी जरूरत के लिए पर्याप्त होगा. राजस्थान को मौजूदा 14 टैंकरों के मुकाबले संयंत्र से अस्पताल तक ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए 30 टैंकरों की जरूरत है.

छत्तीसगढ़ में अप्रैल के मध्य तक एक महीने में 3.5 मीट्रिक टन से 110 मीट्रिक टन तक चिकित्सीय ऑक्सीजन की खपत में बढ़ोतरी देखी गई. वहां 6,000 रोगियों को ऑक्सीजन सपोर्ट की आवश्यकता थी. जबकि राज्य में अपने उद्योग से पर्याप्त ऑक्सीजन उपलब्ध है, लेकिन ढुलाई की व्यवस्था दुरुस्त न होने से संकट जैसे हालात पैदा हो जाते हैं.

लखनऊ में निकम्मी नौकरशाही ने 42 सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन संयंत्र लगाने की राज्य सरकार की 2018 की योजना को धीमा कर दिया, हरेक संयंत्र की क्षमता 2,000 मीट्रिक टन थी, इसके लिए 2018 के बजट में 2000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए और 2019 में इसे पूरा करने की मियाद निर्धारित की गई थी.

राज्य की राजधानी के चार अस्पताल भी ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे हैं-सिविल अस्पताल, झलकारी बाई अस्पताल, बाबूराव देवरस अस्पताल और ठाकुरगंज अस्पताल. स्वास्थ्य विभाग की निविदा प्रक्रिया जल्द ही विवादों में घिर गई, जिसमें कई ब्लैकलिस्ट कंपनियां मैदान में थीं. स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. डी.एस. नेगी ने बताया, ''निविदा प्रक्रिया को लेकर सरकार की कुछ आपत्तियां थीं. विवाद के खत्म होने के बाद हम फिर परियोजना को शुरू करने के लिए अनुमति लेंगे.’’

महाराष्ट्र में, मुख्यमंत्री और उनकी सरकार में तालमेल की थोड़ी कमी नजर आई. सरकार राज्य में सालभर तक किसी अतिरिक्त ऑक्सीजन प्लांट की शुरुआत करती नजर नहीं आई. उसे हरकत में लाने के लिए 48 मरीजों को जान गंवानी पड़ी, जो राज्य भर में कथित तौर पर ऑक्सीजन की कमी का शिकार बने. 24 अप्रैल को राज्य स्वास्थ्य विभाग ने वित्त विभाग से 743.72 करोड़ रुपयों की मांग की, ताकि पीएसए (प्रेशर स्विंग एड्जाप्शन) प्लांट लगाए जा सके और रेमडेसिविर इंजेक्शन तथा ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर्स की खरीद की जा सके.

मध्य प्रदेश में, आपूर्ति आश्वस्त करने के लिए ऑक्सीजन टैंकरों को बीएचईएल प्लांट में एक मील लंबी कतार में इंतजार करना पड़ा. मौजूदा संकट का एक बड़ा कारण आपूर्ति में लगने वाली देरी है. इसके अलावा लंबी कतार के कारण एक रिफिल में 4 से 6 घंटे तक का वक्त लग रहा है.

अस्पतालों के बाहर ऑक्सीजन रिफिल के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर पकड़े लोगों का नजारा बेहद आम हो गया है. सिर्फ तमिलनाडु और केरल में अस्पतालों में भीड़ नहीं है. दोनों राज्यों ने स्क्रीनिंग की गहन प्रक्रिया के जरिए यह आश्वस्त किया कि सिर्फ गंभीर रूप से बीमार मरीजों का ही दाखिला अस्पतालों में ऑक्सीजन बेड में किया जाए, जहां उन्हें फौरन और पर्याप्त देखभाल मिल सके.

केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से, पिछले साल 14 राज्यों में 162 पीएसए प्लांट स्थापित करने की मंजूरी दी थी. जब दूसरी लहर आई, इनमें से महज 30 प्लांट की कामकाज कर रहे थे. इस बात में भी शक है कि क्या ये प्लांट इस भारी मांग को पूरा कर पाते, जिनकी औसत आपूर्ति 1 मीट्रिक टन है. फिर भी, सप्लाई नेटवर्क पर पड़े दवाब को तो ये कम कर ही सकते थे.

इस बीच, सरकार ने मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत की मांग को कम करने के लिए अन्य 100 अस्पतालों में पीएसए प्लांट लगाने की मंजूरी दे दी है. 16 अप्रैल को सरकार ने 50,000 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन के आयात के लिए निविदा निकाली है. 22 अप्रैल को ऑक्सीजन की सप्लाई का मामला गंभीर होने की दशा में सरकार ने देश के 7,500 मी. टन औद्योगिक ऑक्सीजन के सालाना उत्पादन के अधिकतर हिस्से को भी मेडिकल सेक्टर की ओर मोड़ दिया. बहरहाल, उद्योगों के प्रतिनिधियों का कहना है कि इन निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है. ऑक्सीजन ढो रहे ट्रकों को जिलों में स्थानीय प्रशासन रोक रहा है और कुछ मामलों में राज्य ट्रकों के अंतरराज्यीय परिवहन में बाधा खड़ी कर रहे हैं.

देशभर में लगातार दूसरे सप्ताह भी संक्रमण के मामले आसमान छू रहे हैं, और ऑक्सीजन की मांग में भी उछाल जारी है, ऐसे में उत्पादक एक संकट की चेतावनी दे रहे हैं. कर्नाटक और मध्य प्रदेश में संक्रमण जोर पकडऩे लगा है. एआइआइजीएमए के टीकू कहते हैं, ''पूर्वोत्तर के राज्यों को छोड़कर कोई भी ऐसा राज्य नहीं है, जहां से मुझे फोन न  आए हों.’’ दूसरी लहर के धीमे पड़ने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं और डर है कि इसका प्रसार दूसरे और तीसरे श्रेणी के शहरों और गांव-देहातों तक होगा, ऐसे में गहन चिकित्सा की स्थितियां तेजी से सुधारने की जरूरत है, जिसमें ऑक्सीजन और कंसन्ट्रेटर्स की आपूर्ति भी अहम है.

25 अप्रैल को आइआइटी के एक प्रोफेसर ने कहा कि देश में दूसरी लहर के चरम पर सक्रिय मामलों की संख्या 14 मई से 18 मई के बीच 38 से 48 लाख के बीच होगी. आइआइटी कानपुर में कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग के प्रोफेसर मनिंदर अग्रवाल ने पीटीआइ से कहा कि उनका गणितीय मॉडल बताता है कि 4 मई से 8 मई के बीच नए संक्रमणों का चरम स्थिति 4,40,000 मामले रोजाना तक पहुंच सकती है.

यह लहर जारी रही तो पहले से ही खस्ताहाल अस्पताल इन्फ्रास्ट्रक्चर के ढह जाने का खतरा है. वैश्विक मानक यह है कि हर 10,000 की आबादी पर 10-45 अस्पताल बिस्तर जरूर रहें. लेकिन हमारे देश में प्रति दस हजार आबादी महज 5 बेड हैं.

देश के विदेशी दूतावासों में पहले ही ऑक्सीजन से जुड़े बुनियादी ढांच तैयार करने में मदद की तलाश में जल्दबाजी के संदेश भेजे जा चुके हैं. लंदन में भारतीय उच्चायोग में एक भारतीय कूटनयिक ने पिछले हफ्ते ट्वीट किया, 'भारत को खाली, रिफिल करने योग्य 10 लीटर और 45 लीटर की क्षमता वाले ऑक्सीजन सिलिंडर की और अस्पतालों के लिए ऑक्सीजन उत्पादन प्लांट तथा रेमडिसिवर की जरूरत है.’

विदेशों से मदद के हाथ उठने लगे—जर्मनी से लेकर ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और यहां तक कि चीन ने भी मदद के हाथ बढ़ाए. संक्रमण के मामलों में इस बड़े उछाल के करीब एक हक्रते बाद अमेरिका ने भी पर्याप्त मदद देने का वचन दिया, जिसमें ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर्स, रैपिड डायग्नोस्टिक किट्स, वेंटिलेटर, पीपीई किट, कोविशील्ड वैक्सीन के लिए कच्चा माल और मेडिकल तथा तकनीक टीम भेजना भी शामिल है. आइएएप सी-17 सऊदी अरब, यूएई और सिंगापुर से आइएसओ कंटेनर ढोकर ले आए.

22 अप्रैल को, सरकार ने सभी औद्योगिक ऑक्सीजन को चिकित्सा इस्तेमाल के लिए जारी कर दिया. वाहनों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार ने तरल पदार्थ ढोने वाले टैंकरों को मेडिकल ऑक्सीजन के लिए अधिकृत कर दिया. यहां तक कि एलएनजी टैंकरों को भी कुछ सावधानियों के साथ तरल ऑक्सीजन ले जाने की मंजूरी दी गई है. ऑक्सीजन ढोने वाले टैंकर बेहद महत्वपूर्ण हैं. मसलन, एक टैंकर से 24 घंटे में दो अस्पतालों की ऑन्न्सीन आपूर्ति हो सकती है.

केंद्र सरकार कह रही है कि वह अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही है. एक कैबिनेट मंत्री ने इंडिया टुडे से कहा, ''फरवरी से लेकर अब तक हमने मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति को सात गुना बढ़ा दिया है. हमने सभी राज्यों में मांग का खाका तैयार कर लिया है. और उन्हें बता दिया है कि ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए उन्हें किस प्लांट के साथ बातचीत करनी है. हमने ऑक्सीजन की कीमत की सीमा तय कर दी है और ऑक्सीजन के आसान ढुलाई के लिए हरित गलियारे तैयार किए हैं.’’

दूसरी लहर के सबक
देश में ऑक्सीजन संकट में कई महत्वपूर्ण सबक छिपे हैं. सबसे पहला तो यही है कि समस्या की पहचान हो गई. किसी जीवनरक्षक उत्पाद की मांग और आपूर्ति का बड़ा अंतर निश्चित तौर पर हर राज्य में राष्ट्रीय आपदा की तरह है. फिर भी, इसे चिकित्सकीय संकट की तरह देखा गया, जिससे निपटने का जिम्मा केंद्र और राज्य सरकारों के स्वास्थ्य मंत्रालयों पर छोड़ दिया गया और अस्पतालों तक ऑक्सीजन पहुंचाना वेंडरों के जिम्मे रह गया.

बदतर यह रहा कि कोई रीयल टाइम केंद्रीकृत व्यवस्था या ऑक्सीजन के देश भर में ढुलाई की बेरोकटोक सुविधा की निगरानी का कोई रीयल टाइम डैशबोर्ड उपलब्ध नहीं है. जरूरत थी कि देशभर में आपूर्ति के लिए एक व्यक्ति समन्वय का काम करता और इस काम में नौकरशाही को पीछे रखा जाता.

26 अप्रैल को पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश ने एक गंभीर राष्ट्रीय आपातकाल की चेतावनी दी और कहा कि सेना को बुला लेना चाहिए. वे दिसंबर, 2004 में हिंद महासागर में आई सूनामी आपदा के राहत कार्य की निगरानी कर चुके हैं. एक ट्वीट में उन्होंने सुझाव दिया कि किसी तीन सितारा अधिकारी के तहत ऑपरेशन सेंटर बनाया जाए, जिसमें सशस्त्र सेना चिकित्सा सेवा को समूचे देश की स्वास्थ्य स्थिति की निगरानी सौंपी जाए. उन्होंने प्रधानमंत्री को संसाधन प्रबंधन/ आवंटन और सैन्यकर्मियों के इस्तेमाल का सुझाव दिया.

विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर ऑक्सीजन की आपूर्ति को आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया जाता तो इसे लेकर प्रोटोकॉल के अलग कायदे तय हो जाते. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) आगे आ जाता, जो गृह मंत्रालय के तहत काम करता है. एनडीएमए की फौरी प्रतिक्रिया प्रणाली के तहत, ऑक्सीजन वितरण के तालमेल को दुरुस्त करने के लिए राज्य सरकारों के साथ एक नियंत्रण कक्ष का गठन होता और कामकाज युद्धस्तर पर होता. राज्य सरकारें ऑक्सीजन वितरण के नेटवर्क को अपने हाथ में ले सकती थीं.

उद्योगों के जानकार कहते हैं कि ऑन-साइट ऑक्सीजन उत्पादन को बेहतर करने की तत्काल जरूरत है. अहमदाबाद स्थित इनवायरो वॉटर इंटीग्रेटेड प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक आदित्य कुमार पूछते हैं, ‘‘सरकार को हर अस्पताल के पास पीएसए होना अनिवार्य बना देना चाहिए. यह वह तकनीक है जो देश में उपलब्ध है और जिसके कुछ ही हफ्तों में लगाया जा सकता है. क्या कोई अस्पताल यह कह सकता है कि उसके पास चिकित्सा उपकरण चलाने के लिए आपातकालीन बिजली व्यवस्था नहीं है?’’

मिसाल के तौर पर, महाराष्ट्र के नंदूरबार जिले में उद्यमी जिलाधिकारी राजेंद्र भारूद ने विकास फंड के 85 लाख रुपए का इस्तेमाल करके जिला अस्पताल में तरल ऑक्सीजन प्लांट लगवा दिया. उन्होंने जनवरी और फरवरी में दो और प्लांट लगवाए, जिससे उसकी क्षमता 2,400 लीटर प्रति मिनट की हो गई है. उनकी कोशिश बताती है कि किस तरह स्थानीय प्रयासों से ऑक्सीजन की मांग को पूरा किया जा सकता है.

मौजूदा दौर में कोविड-19 के संक्रमण  प्रकोप से बुरी तरह ग्रस्त राज्य महाराष्ट्र जैसे विकल्पों की तलाश कर रहे  है. महाराष्ट राज्य स्वास्थ्य विभाग ने 600 से 3,400 लीटर क्षमता वाले 132 ऑक्सीजन प्लांट को 23 जिलों में लगाने का प्रस्ताव दिया है. इससे राज्य को 500 मीट्रिक टन की ऑक्सीजन की कमी को पूरा करने में मदद मिलेगी. स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक, सुधाकर शिंदे ने विकेंद्रीकृत वितरण की सलाह दी है—ऑक्सीजन का भंडारण नासिक, पुणे, कोल्हापुर, औरंगाबाद, लातूर, अकोला और नागपुर में किया जा सकता है.

देश में ऑक्सीजन के संकट से तड़प-तड़प कर लोगों की जानें गई हैं. लिहाजा, इस संकट ने  कम से कम इस मामले में आत्मनिर्भर बनने की राह की ओर इशारा जरूर कर दिया है. अब भी नहीं चेते, तो भगवान ही बचाए. 

—साथ में, अमरनाथ के.मेनन, अनिलेश एस.महाजन, किरण डी.तारे, राहुल नरोन्हा, आशीष मिश्र, रोहित परिहार और जीमोन जैकब

 

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