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मेकांग से मलकानगिरि तक

विकास के सिलसिले को देखते हुए लोगों और बोली-भाषा के बीच गर्भनाल का संबंध होने की आम धारणा टूटती है

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बोंडा आदिवासी दक्षिणी मुंडा भाषा का इस्तेमाल करते हैं बोंडा आदिवासी दक्षिणी मुंडा भाषा का इस्तेमाल करते हैं

सुनील मेनन

प्राचीन भारतीय महाकाव्यों में राजा या राजकुमार जंगल में अक्सर भील और दूसरे आदिम नामधारी लोगों से टकराते सुने गए हैं. आनुवंशिक अध्ययन भी अब उस बात को साबित करते हैं जिसे पुरातत्वविद हमेशा से जानते रहे हैं कि उपमहाद्वीप में मनुष्य की उपस्थिति बेहद प्राचीन और स्थायी है. 'आदिवासी' शब्द तो 'आदिम' से बनाया गया हाल का चलन है, जो गहरी जड़ों और आनुवंशिक निरंतरता को स्पष्ट करता है. हम उसकी अपने हिसाब से व्याख्या करते हैं क्योंकि वास्तविक इतिहास तो कहीं महाकाव्यों के गहरे और रहस्यमय अरण्य में खोया हुआ है. हालांकि विज्ञान इसके एक पहलू पर दिलचस्प रोशनी डालता है.

भारत के आदिवासी हमारे सभी बड़े चार भाषायी परिवारों ऑस्ट्रो-एशियाटिक, तिब्बतो-बर्मी, द्रविड़ और इंडो-आर्य में पाए जाते हैं. हमारे सबसे ज्यादा आबादी वाले आदिवासी समूह की बोली भीली इंडो-आर्य परिवार की है, और इस तरह वह मारवाड़ी, गुजराती, पंजाबी, हिंदी, संस्कृत वगैरह की ही बिरादर है. दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाले आदिवासी समूह की बोली गोंडी द्रविड़ परिवार की है. मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा की मादरी जबान गारो भाषा तिब्बतो-बर्मी भाषा परिवार की अभी मौजूद गारो-बारो की बहन है, जो पूरे पूर्वोत्तर में पाई जाती है, असम के बोडो से लेकर त्रिपुरा के कोकबोरोक और सबसे बड़ी नगा भाषा कोन्याक तक (सजातीय संबंधों के बावजूद 89 नगा भाषाएं ज्यादातर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, इसी वजह से वे सार्वजनिक भाषा के रूप में असमी के अपभ्रंश नगामी का प्रयोग करते हैं).

लेकिन पूर्वोत्तर में एक अजीबोगरीब पुरानी पहेली भी है. मेघालय में खासी भाषा अपनी पड़ोसनों के उलट ऑस्ट्रो-एशियाई परिवार की है, जिसके लोग ज्यादातर देश के दूसरे हिस्सों में पाए जाते हैं. वे प्रामाणिक 'आदिवासी' समूह मुंडा, संथाल, कोल, हो वगैरह हैं, जो झारखंड, बंगाल और ओडिशा के सटे आदिवासी जिलों में पाए जाते हैं. एक और बाहरी थी निकोबारी (अंदमान के समुदाय एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न भाषाएं बोलते हैं). भारत के बाहर ऑस्ट्रो-एशियाई भाषा परिवार के बड़े प्रतिनिधि हिंद-चीन के दूसरी ओर विएतनामी और कंबोडिया के खमेर और कुछ मलय तट पर हैं. भौगोलिक तौर पर यह भाषायी परिवार काफी बिखरा-बिखरा है. यह कैसे हुआ होगा? 

इस मामले में सिद्धांतों और अनुमानों की जमीन काफी उर्वर रही  है, जिसमें एक ख्याल जमीन के रास्ते 'भारत से बाहर' जाने का है. लेकिन भाषाविद पॉल सिडवेल ने वर्षों से एक मॉडल को निखार कर हमें अकाट्य-सी मुंडा समुद्री अवधारणा से रू-ब-रू कराया है. इसके मुताबिक, प्रोटो ऑस्ट्रो-एशियाई समूह का उरहीमत या मूल देश विएतनाम की लाल नदी (रेड रिवर) का कछार (डेल्टा) था, जहां से चीनियों के अधिक प्रवाह ने उन्हें बाहर प्रवास को मजबूर कर दिया. शुरुआती रूट मलक्का जलडमरूमध्य के जरिए समुद्र था, रास्ते में छोटा ठिकाना निकोबार था और फिर महानदी का कछार. काल अवधि ईसा पूर्व 2000 है, उसी के आसपास जब वैदिक लोग उत्तर में आए.

जैसा कि वैदिक लोगों और ज्यादातर दूसरे प्राचीन प्रवासों में हुआ, लैंगिक मेल भी हुआ. यानी प्रमुख रूप से पुरुष फाउंडर पॉपुलेशन का प्राचीन पुश्तैनी दक्षिण भारतीयों से मिश्रण हुआ, भाषाई और आनुवंशिक दोनों ही मामलों में. दूसरी निकासी लाल नदी की उप-नदियों के किनारे से ऊपर की ओर हुई, जिससे लाओस और यून्नान में पलबंगिक और म्मुइक भाषाओं का जन्म हुआ और खासी उसकी सबसे पश्चिम में सहोदर है. इससे 'लोगों' और 'बोली-भाषा' के बीच गर्भनाल का संबंध होने की आम धारणा टूटती है. जरा सोचिए, एक मुंडारी लड़की के साथ द्रविड़ मां और दूर पूरब से आया समुद्री यात्रा से थका पिता.

कुछेक 'महान हस्तियां'

जयपाल सिंह मुंडा

झारखंड के खूंटी संभाग में मवेशी चराने वाले बालक का ऑक्सफोर्ड और 1928 में ओलंपिक स्वर्ण जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी तक का सफर. फिर भारतीय प्रशासनिक सेवा, आदिवासी महासभा के अध्यक्ष और झारखंड राज्य बनाने को लेकर पहली आवाज उठाने वाले, संविधानसभा के सदस्य. वे सचमुच 'मारंग गोम्के' (महान नेता) थे.

नांजीयम्मा
संगीत-शास्त्रियों का लंबे समय से कयास रहा है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति लोक संगीत से हुई है. लेकिन अय्यप्पानुम कोशियम (2020) फिल्म में नंजीयम्मा के इरुला भाषा में गाए गीत और फिर श्रेष्ठ पार्श्व-गायिका के राष्ट्रीय पुरस्कार के बाद ही दक्षिण का यह आदिवासी स्वर मंच पर नमूदार हो पाया.

एलिस एक्का
इस सवाल का जवाब दें: 'क्या मातहत लोग लिख सकते हैं?' वाकई हां. एक्का की हिंदी कहानियों की अनोखी मौलिक आवाज हाल में कुछ स्थानीय और पश्चिमी विद्वानों ने खोज निकाली. ये कहानियां 1950-60 के दशक में लिखी गई हैं, जो साहित्य में दलित स्वर उभरने के काफी पहले की हैं. उनकी खासियत थी: मजबूत महिला पात्र.

हुल जोहार!
भारतीय इतिहास में एक गुमनाम अध्याय या शायद पूरी लाइब्रेरी है. ब्रितानी उपनिवेशवादियों की सबसे तगड़ी लड़ाइयां आदिवासी समुदायों से हुईं. एक के बाद सशस्त्र विद्रोह करीब 150 साल तक होता रहा. यह बंगाल में चुआर विद्रोह (1771-1809) से चलकर प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कुकी विद्रोह पर ही नहीं थमा. ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ कुरिचिया के धनुष-बाण की मदद से मालाबार के पझासी राजा का लंबा गुरिल्ला युद्ध (1793-1806), 1818 में राजपूताना का भील विद्रोह, और एक के बाद एक कई हो और मुंडा विद्रोह, जिसकी परिणति 1831 के कोल विद्रोह में हुई. 1855 का संथाल हुल तो सचमुच बड़ा युद्ध था, 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वजह से वह कम चर्चित रह गया. इन लड़ाइयों के नायकों में सिदू और कान्हू मुर्मू या तांतिया भील—जो अंग्रेजों के लिए डकैत, साथियों-सहयोगियों के लिए 'रॉबिन हुड' थे—और महान बिरसा मुंडा जैसे कुछेक नाम हैं, जो हम भविष्य में बनाए जाने वाले इनके स्मारक पर दर्ज कर सकते हैं.

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