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अप्रत्याशित विवाद

1998 में मुख्य सचिव ने अपनी राय दर्ज की कि 'गुरुद्वारा’ 1980 के वन संरक्षण अधिनियम और 1991 के पूजा स्थल अधिनियम दोनों का उल्लंघन करता है और बढ़ते स्थानीय विवाद की जांच के लिए एक समिति की नियुक्ति हुई.

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गुरुडोंगमर सिक्किम गुरुडोंगमर सिक्किम

काई फ्रीज

गंगटोक के वकील जोर्गे नमका जोर देकर कहते हैं, ''यह कभी गुरुद्वारा नहीं था.’’ सेवानिवृत्त कर्नल दलविंदर एस. ग्रेवाल भी उसी अंदाज में जवाब देते हैं, ''यह अभी भी गुरुद्वारा है.’’ दोनों की बातों से उस कड़वे विवाद का अंदाजा लगाया जा सकता है जो 1987 में तब शुरू हुआ जब ग्रेवाल, जो उस समय एक बैटरी कमांडर थे, ने समुद्र तल से 18,000 फुट ऊपर भारतीय सीमा क्षेत्र में स्थित तिब्बती पठार की गुरुडोंगमार झील के प्राचीन तट पर एक छोटे से 'गुरुद्वारे’ के निर्माण के लिए धन दिया था.

ग्रेवाल और उनके जवानों को लगता था कि यह सुंदर झील, इसका नाम और इसके आसपास की स्थानीय परंपराओं का संबंध गुरु नानक से है. कुछ साल बाद, क्षेत्र में तैनात एक अन्य सिख अधिकारी की देखरेख में इस इमारत का विस्तार हुआ और कथित तौर पर एक छोटे से ढांचे को जिसे संगफूर के रूप में जाना जाता है, को नष्ट कर दिया गया जहां लोग धूप और घी के दीये जलाते थे.

इस बीच, लाचेन घाटी में सड़क के नीचे, एक सिख जेसीओ ने चुंगथांग शहर में नानक लामा साहिब नामक एक गुरुद्वारा बनवाने में अहम भूमिका निभाई. यह भी मैदानी लोगों के इस विश्वास से प्रेरित था कि स्थानीय किंवंदतियों में वर्णित महान 'गुरु रिनपोछे’ का जिक्र इस बात का प्रमाण है कि घाटी में गुरु नानक ने प्रवास किया था. 

लाचेन के मूल बौद्ध शायद सैनिकों की इन बातों से चिढ़ गए होंगे. विशेष रूप से तब, जब गुरु रिनपोछे पद्मसंभव, जिन्हें आठवीं शताब्दी में वज्रयान बौद्ध धर्म को हिमालय और तिब्बत में लाने का श्रेय दिया जाता है, के साथ पारंपरिक रूप से जुड़े स्थानों को 15वीं शताब्दी के सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक के किए चमत्कारों से जोड़ा गया. यहां तक कि चांगथांग के नाम को भी बिगाड़कर अक्सर 'चंगा स्थान’ बताया जाने लगा. चंगा स्थान मतलब अच्छी जगह. 

हालांकि यह सुनने में एक बुरे पंजाबी मजाक जैसा लग सकता है, स्थानीय प्रतिनिधि अनुंग लाचेनपा, 'पिपोन ऑफ द लाचेन जोम्सा’ इससे खुश नहीं थे. 1987 में प्रकाशित उनका एक बयान, जो अब कानूनी विवाद में प्रस्तुत दस्तावेजों में से एक है, पिपोन ने ''दूसरे धर्म से संबंधित एक मंदिर के निर्माण’’ पर आपत्ति जताई, जिसने ''इस पवित्र झील की पवित्रता’’ (गुरुडोंगमर) को नष्ट कर दिया और उन्होंने लाचेन-पा आदिवासी समुदाय से आह्वान किया कि वे ''हमारी प्राचीन बौद्ध परंपरा को संरक्षित करने’’ के प्रयास करें. 

बहुत पहले राज्य के वन विभाग ने एक सर्वेक्षण किया और पवित्र झील पर बनी संरचना को ''अनधिकृत निर्माण’’ घोषित किया. 1998 में मुख्य सचिव ने अपनी राय दर्ज की कि 'गुरुद्वारा’ 1980 के वन संरक्षण अधिनियम और 1991 के पूजा स्थल अधिनियम दोनों का उल्लंघन करता है और बढ़ते स्थानीय विवाद की जांच के लिए एक समिति की नियुक्ति हुई.

2001 तक एक स्पष्ट समाधान निकल गया था कि गुरुडोंगमर की इमारत को (बौद्ध) लाचेन मठ को सौंप दिया जाए जो गॢमयों के महीनों में इस की देखरेख के लिए एक कार्यवाहक भिक्षु नियुक्त करेगा जब यह स्थान रहने योग्य होता है (अत्यधिक ऊंचाई को देखते हुए) जबकि सेना इसे ''लॉजिस्टिक मदद’’ प्रदान करेगी.

हालांकि यहां से, दोनों पक्षों के आख्यानों ने 'मंदिर-मस्जिद’ जैसे प्रचलित विवादों का स्वरूप ले लिया. बौद्ध पक्ष का दावा है कि जब गुरुडोंगमर संरचना खाली पड़ी थी, तब कुछ अज्ञात लोगों ने वहां सिख धर्म से जुड़ी सामग्री जमा करनी शुरू कर दी. सिखों ने स्थानीय लोगों पर आरोप लगाया कि उन्होंने पवित्र चीजों को चुंगथांग में सड़क पर रखकर और तीर्थयात्रियों को पवित्र झील तक पहुंचने से रोककर धार्मिक बेअदबी की है.

साल 2017 तक यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, जिसने यथास्थिति बहाल करने का आदेश दिया. इसके बाद 'श्री गुरु सिंह सभा’ की ओर से सिक्किम के उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की गई, जिसमें वे दावा करते हैं कि यह एक गुरुद्वारा था और उसका फिर से निर्माण कराया जाए. वहीं, 'सिक्किम राज्य और अन्य’ ने इस याचिका का विरोध किया. 

इसके बाद से ही विवाद लगातार बढ़ता ही जा रहा है. साल 2019 में सिक्किम सरकार ने ''राष्ट्रीय सुरक्षा’’ का हवाला देते हुए, अदालती कार्यवाही के लाइव प्रसारण का विरोध किया जबकि ग्रेवाल का आरोप था कि लाचेनपास को उकसाने में ''चीनी जासूसों’’ की भूमिका है.

साल 2020 में तत्कालीन केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इसे ''ऐतिहासिक गुरुद्वारा गुरुडोंगमर साहिब’’ बताते हुए ट्वीट कर इसकी सुरक्षा की अपील की थी. और, इसी साल फरवरी में, पंजाब में विधानसभा चुनावों के पहले, गृह मंत्री अमित शाह ने कथित तौर पर अमृतसर में अकाल तख्त के जत्थेदार के साथ बैठक की, जिसमें गुरुद्वारा गुरुडोंगमर पर भी चर्चा हुई.  

इस बीच, गुरुडोंगमर से 500 किमी पूर्व में स्थित अरुणाचल प्रदेश के मेचुका शहर में, मूल मेम्बा समुदाय के प्रतिनिधियों, जो बौद्ध भी हैं, ने एक पवित्र गुफा 'पेमा शेल्फू’ को फिर से अपने कब्जे में लेने के लिए अपनी सरकार की सहायता मांगी है. उनका दावा है कि सेना के लोगों ने यहां अवैध रूप से सिख धार्मिक प्रतीक लगा दिए हैं और इसे 'तपोस्थन पेमोशुभू’ बता रहे हैं.

हिमालय के दूसरे छोर पर सुदूर लद्दाख में, इसी तरह के धार्मिक स्थान स्थानीय बौद्धों और सिख प्रतिनिधियों के बीच शांत लेकिन निरंतर संघर्ष का केंद्र बने हैं. एक पवित्र चट्टान—जिसे कभी बौद्ध लोग 'लामा गुरु’ कहते थे अब सेना की ओर से संचालित 'पत्थर साहिब गुरुद्वारा’ हो गया है. और, एक पेड़, जिसकी कभी एक प्रसिद्ध लामा की छड़ी मानकर 'त्सुग तोर’ के रूप में पूजा होती थी, उसे अब पास के गुरुद्वारा दातून साहब से जोड़कर गुरु नानक के चमत्कारी दातून के पेड़ के रूप में वर्णित किया जाता है.

शायद इन सभी स्थानों: एक झील, एक गुफा, एक चट्टान, एक पेड़ को एक से अधिक भगवान या गुरु के रूप में चुपचाप पूजा जा सकता था. लेकिन इनके साथ कोई आख्यान या दर्शन जोड़ने की क्या जरूरत थी? चाहे सिख हों या बौद्ध, वे अब ईंट और गारे, पेंट और संगमरमर से बने स्मारकों में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते प्रतीत होते हैं, जो हमारे देश में चल रही सांप्रदायिक प्रतिस्पर्धा की झलक अधिक देता है.

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