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आवरण कथाः कहीं डूब न जाए पूरा वित्तीय तंत्र

तकरीबन 9.4 लाख करोड़ रु. के डूबत कर्ज या एनपीए, धोखाधड़ी, मिलीभगत और कई बैंकों के डूब जाने से देश की बैंकिंग व्यवस्था में लोगों का भरोसा टूटा, आगे भारी वि‌त्तीय संकट की रोकथाम के लिए क्या करने की जरूरत है.

वित्तीय तंत्र वित्तीय तंत्र

लगातार देश का बैंकिंग क्षेत्र अमूमन बुरी खबरों से ही सुर्खियों में उछला रहता है. वजहें: डूबत कर्ज (जिसे बैंकों की शब्दावली में गैर-निष्पादित संपत्तियां या एनपीए कहा जाता है) के बढ़ते अंबार से लेकर निपट धोखाधड़ी, क्रोनी कैपिटलिज्म और न जाने क्या-क्या. यह बीमारी तेजी से फैलती जा रही है, जिसमें छोटे-बड़े और कुछ नामधारी बैंक भी हैं. तो, यह सड़न सिर्फ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों तक सीमित नहीं रह गई है. पंजाब नेशनल बैंक और पंजाब तथा महाराष्ट्र सहकारी बैंक (पीएमसी बैंक) जैसे सरकारी बैंकों ने अपने नाम धुमिल किए तो येस बैंक और आइसीआइसीआइ जैसे निजी क्षेत्र के बैंक भी बुरी वजहों से सुर्खियों में आए.

संदिग्ध नाम वाले बैंकों की फेहरिस्त लंबी है, जिसमें ताजातरीन मिसाल लक्ष्मी विकास बैंक (एलवी बैंक) है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) को उबारना पड़ा. कोविड-19 महामारी ने इस संकट को और घना किया. सितंबर में खत्म हुआ ब्याज पर मोरेटोरियम और सरकारी गारंटी के कर्ज से एनपीए ढेर बेहिसाब बढ़ जाने का खतरा है, जो पहले ही विकराल है (जून 2019 में यह 9.4 लाख करोड़ रु. हो चुका था, यानी देश के स्वास्थ्य बजट का तकरीबन चार गुना). इससे बैंकिंग व्यवस्था में पूंजी का अप्रत्याशित संकट खड़ा हो गया है.

इस संकट से सरकार या केंद्रीय बैंक न अनजान है, न आंखें चुराई गई हैं. लेकिन कई विशेषज्ञों को आशंका है कि प्रस्तावित समाधान मौजूदा संकट से भी बुरे हैं. आरबीआइ के एक अंदरूनी कार्यकारी समूह बैंकिंग नियमन कानून, 1949 में संशोधन का सुझाव दिया है, ताकि बड़े कॉर्पोरेट घराने बैंकों के प्रमोटर बन सकें. मोटे तौर पर इसके पैरोकारों की दलील है कि यही बैंकिंग व्यवस्था में पूंजी डालने का तरीका है और शायद देश में वृद्धि की आकांक्षाओं को पूरा करने का इकलौता तरीका है.

वहीं दूसरी तरफ खड़े लोग ‘अपने को ही कर्ज’ देने के खतरे के प्रति आगाह करते हैं (यानी कारोबारी घरानों की मिल्कियत वाले बैंक अपने समूह की कंपनियो को ही कर्ज बांट देते हैं). यह बेहद उलझाऊ समस्या है और सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण ही इकलौता उपाय है, इस पर विचार करने की जरूरत है, लेकिन हमें कुल बैंकिंग व्यवस्था—एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां) और सहकारी बैंकों समेत—की बदहाली की समीक्षा की जरूरत है.

एनपीए की दलदल
एनपीए की दलदल

एनपीए/एनबीएफसी की दलदल
रिसर्च कंसल्टेंसी फर्म कैपिटल इकोनॉमिक्स ने 29 अक्तूबर को एक रिपोर्ट में गंभीर चेतावनी दी कि पहले ही खस्ताहल भारत का बैंकिंग क्षेत्र महामारी के दौर में बैलेंस शीट में और ज्यादा नुक्सान से गंभीर चिंता का विषय है. अर्थशास्त्रियों—शिलन शाह और साइमन मैकएडम ने लिखा, ‘(भारत का बैंकिंग) क्षेत्र धीमे-धीमे डूब रहा है, खोटे कर्ज उसके मुनाफे लील लेंगे और वह कर्ज देने की ताकत खो देगा, फिर दशक भर बहाली तो भूल जाइए.’ उन्होंने भविष्यवाणी की कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी क्षमता के मुकाबले सबसे कमजोर बहाली वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगी. रिजर्व बैंक के मुताबिक, बैंकिंग क्षेत्र में जमा 65 फीसद राशि सरकारी बैंकों में है और कैपिटल इकोनॉमिक्स का मानना है कि 2018-19 में यह क्षेत्र दुनिया के सबसे अलाभकर क्षेत्रों में से एक था.

लीमन ब्रदर्स होल्डिंग इंक के ध्वस्त होने के साथ शुरू हुए 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद एक दशक से ज्यादा वक्त के दौरान भारतीय बैंकिंग क्षेत्र जबरदस्त उथल-पुथल से गुजरा. संकट से बचने की खातिर भारत अपने वित्तीय इतिहास के एक सबसे फिजूलखर्च दौर में दाखिल हुआ—केंद्र सरकार ने जमकर खर्च किया, ब्याज दरें कम करने के लिए मौद्रिक नीति ढीली-ढाली रखी गई और बैंकों ने बेहद बढ़-चढ़कर कर्ज बांटे. लिहाजा, भारतीय कंपनियों ने भारी कर्ज उठाए और बुनियादी ढांचे तथा टेलीकॉम सरीखे धन लीलने वाले क्षेत्रों में परिसंपत्तियों का अंबार लग गया. खर्च की वजह से बहाली तो तेजी से हो गई, लेकिन लंबे वक्त ने बैंकिंग क्षेत्र को एनपीए के विशाल बोझ से लदा छोड़ दिया, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की सेहत मटियामेट कर दी और नतीजतन खोटे कर्ज बढ़ते गए, जिसकी वजह से नए कर्ज देने में वाकई ठहराव आ गया.

खोटे या डूबत कर्ज की समस्या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सबसे ज्यादा है. एनपीए का 85 फीसद हिस्सा वे खोटे कर्ज हैं जो इन्हीं बैंकों ने दिए और 2019 के वित्त वर्ष में सारे खुदरा कर्जों में जिसकी हिस्सेदारी 39 फीसद थी. अकेले एसबीआइ (भारतीय स्टेट बैंक) का एनपीए 2017-18 में 2.23 लाख करोड़ रुपए था. सकल एनपीए 2008 के वित्तीय साल में कुल कर्जों के 2.3 फीसद से बढ़कर 2019 के वित्तीय साल में 9.3 फीसद हो गया. बाकी सब छोड़ भी दें तो एनपीए नए कर्ज देना सीमित कर देते हैं, क्योंकि बैंक की परिसंपत्तियों से आमदनी होनी बंद हो जाती है और कर्ज देने की क्षमता घट जाती है. वित्तीय सलाहकार अश्विन पारेख कहते हैं, ‘‘सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए चुनौती यह है कि कई अंदरूनी सांगठनिक मुद्दे हैं जिन्हें हल नहीं किया जा रहा है. पूरी व्यवस्था ही वर्षों से धीरे-धीरे सडऩ की हालत में है.’’ 

हमारे बैंकों की हालत कैसी?
हमारे बैंकों की हालत कैसी?

कोविड-19 के संकट से हालात और बदतर हो गए हैं. आरबीआइ ने मार्च में खुदरा कर्ज चुकाने पर मोरेटोरियम का ऐलान किया और साथ ही केंद्र के 3 लाख करोड़ रुपए के जमानत-मुक्त कर्जों का वित्तीय दबाव और आन पड़ा. ऐसे में सरकारी बैंकों पर दबाव कई गुना बढ़ गया. नतीजे अगले कुछ साल के दौरान सामने आएंगे. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं कि कोरोना वायरस संकट की वजह से पैदा एनपीए 10 लाख करोड़ रुपए तक हो सकता है.

इससे लंबे वक्त से चली आ रही यह समस्या और भी जटिल हो जाती है. 2015 के आखिरी और 2016 के शुरुआती महीनों में एनपीए के मुद्दे का ओर-छोर समझने के लिए उस वक्त गवर्नर रघुराम राजन के मातहत आरबीआइ ने बैंकों को निर्देश दिया था कि वे उन कर्जों की पहचान करें जो संभवत: खोटे कर्जों में बदल सकते हैं, और ऐसा होने की स्थिति में बचाव के लिए पूंजी अलग रखें. इससे करीब 10.4 लाख करोड़ रुपए के खोटे कर्जों का खुलासा हुआ. इस साफ-सफाई का एक नतीजा यह हुआ कि बैंक उधारी देने में एहतियात बरतने लगे.

निरंतर गिरावट
निरंतर गिरावट

आरबीआइ ने उसके बाद एनपीए के गड़बड़झाले से निपटने के लिए कई हस्तक्षेप किए. इनका हमेशा मनचाहा असर नहीं हुआ. मसलन, गवर्नर उर्जित पटेल के मातहत आरबीआइ ने 12 फरवरी 2018 को 2,000 करोड़ रुपए या उससे ज्यादा के एनपीए के मामलों को सुलझाने के लिए बैंकों के लिए छह महीने की समय सीमा तय की; ऐसा नहीं कर पाने पर उन्हें ऐसे मामले ऋणशोधन क्षमता कार्रवाई के लिए फौरन एनसीएलटी (राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट) में भेज देने थे. बैंकों के लिए यह भी जरूरी था कि कर्ज चुकाने में एक भी दिन की देरी होने पर वे आरबीआइ को भुगतान में चूक की रिपोर्ट दें.

इस आदेश की चौतरफा आलोचना हुई और देश भर की अदालतों में कई याचिकाएं दाखिल कर दी गईं. ये मुख्य तौर पर बिजली, कपड़े और जहाज निर्माण क्षेत्र की फर्मों ने दाखिल की थीं. याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि आरबीआइ के आदेश में क्षेत्र विशेष के मुद्दों का ख्याल नहीं रखा गया. यह मनमाना और पक्षपातपूर्ण था. सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2019 में आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि आरबीआइ ने अपने अधिकार से आगे बढ़कर काम किया है.

बीते चार साल के दौरान सरकारी बैंकों ने करीब 6.66 लाख करोड़ रुपए के खोटे कर्ज बट्टे खाते डाले हैं. केंद्र इस मामले में उन्हें बार-बार बचाता रहा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल अपने बजट भाषण में कहा था कि केंद्र ने बीते कुछ साल में सरकारी बैंकों में करीब 3.5 लाख करोड़ रुपए की नई पूंजी डाली है. सरकारी बैंकों के एक पूर्व प्रमुख ने इंडिया टुडे से कहा कि ढांचागत बदलावों की तत्काल जरूरत है—‘‘वरना सरकारी बैंक काला गड्ढा बने रहेंगे जिनमें नियमित अंतराल पर करदाताओं का धन फूंका जाता रहेगा.’’ तिस पर भी केंद्र ने कहा है कि वह बैंकिंग क्षेत्र को सहारा देता रहेगा; इसी साल जुलाई में प्रधानमंत्री कार्यालय के एक बयान में कहा गया कि सरकार ऐसा करने के लिए कोई भी जरूरी कदम उठाएगी.

बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के चेयरमैन (इंडिया) जन्मेजय सिन्हा बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए असल चुनौती ज्यादा कर्ज की दरकार है. वे कहते हैं, ‘‘भारत का जीडीपी और कर्ज का अनुपात करीब 60 या 70 (फीसद) है, जबकि चीन के लिए यह इसका दोगुना होगा. कर्ज का प्रवाह बढ़ाने के लिए हमें ज्यादा मजबूत और सक्रिय बैंकिंग क्षेत्र की जरूरत है.’’ आरबीआइ के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के मुताबिक कर्ज-जीडीपी अनुपात 56 फीसद है, जबकि चीन में यह 150-200 फीसद के दायरे में है.

बैंकिंग क्षेत्र की मुश्किलों का जबरदस्त असर एनबीएफसी पर भी पड़ा है. 2019 के वित्त वर्ष में कुल खुदरा कर्जों में इनकी हिस्सेदारी 30 फीसद थी. अहम लाल झंडी आरबीआइ की 2014-15 की सालाना निरीक्षण रिपोर्ट में दिखाई गई. इसने बताया कि बुनियादी ढांचे में धन लगाने वाली फर्म आइएलऐंडएफएस (इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंशियल सर्विसेज) की अपनी सकल निधि का सफाया हो चुका है. जब यह अपने कर्ज चुकाने से चूक गई तब वित्तीय बाजारों को शांत करने की गरज से केंद्र ने चौतरफा घिरी फर्म के बोर्ड में रद्दोबदल कर दिए.

हालांकि सरकार ने कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन उदय कोटक की अगुआई में छह सदस्यों के बोर्ड की नियुक्ति करके मामले को संयत करने की कोशिश की, लेकिन फर्म के पतन की हिलोरों ने एनबीएफसी क्षेत्र को हिलाकर रख दिया. इसके असर में दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (डीएचएफएल) सरीखे दूसरे बड़े एनबीएफसी कर्ज चुकाने से चूकने लगे और येस बैंक से जुड़े धनशोधन के मामले में इसके प्रमोटरों की गिरफ्तारी के साथ यह भी ऋणशोधन क्षमता कार्रवाई में चला गया.

मई में घोषित 20 लाख करोड़ रुपए के अपने प्रोत्साहन पैकेज के हिस्से के तौर पर केंद्र ने कहा कि 45,000 करोड़ रुपए आंशिक कर्ज गारंटी योजना के जरिए एनबीएफसी में डाले जाएंगे. उद्योग के खिलाडिय़ों का कहना है कि इसका अब तक वांछित असर नहीं हुआ है क्योंकि एनबीएफसी का आकार या क्षमता इतनी बड़ी नहीं है कि इसका इस्तेमाल कर पाएं—वे धन उगाहने के लिए सावधिक ऋण पर अधिक निर्भर रहते हैं. वे अपने मौजूदा कर्जों के खोटे कर्ज में बदलने के जोखिम से भी घिरे हैं. स्वतंत्र बैंकिंग विशेषज्ञ एस.एस. मूंदड़ा कहते हैं कि बीते दो या तीन साल से बैंकिंग क्षेत्र के सम्मुख मौजूद चुनौतियों को देखते हुए नियामकों को परिमाण आधारित विनियमन पर विचार करना चाहिए; एक आकार में सबको फिट करने का तरीका अलग-अलग आकारों के एनबीएफसी के साथ कारगर नहीं होगा. 

थैली में छेद
थैली में छेद

खोटा कामकाज/ क्रोनी कैपिटलिज्म
एनबीएफसी क्षेत्र की नाकमियों और पीएमसी बैंक, येस बैंक तथा एलवी बैंक के संकटों ने बैंकिंग व्यवस्था में जनता के विश्वास को झकझोर दिया है. जब हाइ प्रोफाइल मामलों पर विचार करते हैं—नीरव मोदी और विजय माल्या, जो दोनों भारत में वित्तीय अपराधों के लिए ब्रिटेन में प्रत्यर्पण के आरोपों का सामना कर रहे हैं; आइसीआइसीआइ बैंक की पूर्व चेयरपर्सन चंदा कोचर और वीडियोकॉन से जुड़ा मामला; डीएचएफएल के कपिल और धीरज वाधवान का मामला, जो दोनों येस बैंक के पूर्व चेयरमैन राणा कपूर के साथ धनशोधन के आरोपों का सामना कर रहे हैं.

और एचडीआइएल (हाउसिंग डेवलपमेंट ऐंड इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड) के राकेश और सारंग वाधवान का मामला, जो जमाकर्ताओं की रकम हड़पने के लिए पीएमसी बैंक प्रबंधन के साथ साठ-गांठ के आरोपों का सामना कर रहे हैं—तब यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि क्रोनी कैपिटलिज्म यानी याराना पूंजीवाद किस तरह बैंकिंग क्षेत्र की परेशानियों की जड़ बना हुआ है. इन घटनाओं से कारोबारी घरानों को बैंकों का प्रमोटर बनने देने के आरबीआइ के कार्यकारी समूह के प्रस्ताव के आलोचकों की दलीलें और भी मजबूत हो जाती हैं. 

थैली में छेद
थैली में छेद

इन्हीं घटनाओं की वजह से भारतीय संसद ने जुलाई 2018 में भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक 2018 पारित किया. इसका मकसद बड़ी वित्तीय धोखाधडिय़ों को अंजाम देने वाले अपराधियों को देश से भागने से रोकना है. इस विधेयक से उम्मीद की जाती है कि सरकार को भगोड़ों के अपराधी साबित होने से पहले भी उनकी संपत्ति जब्त करने में मदद मिलेगी. इस साल अगस्त में आरबीआइ की सालाना रिपोर्ट में कहा गया कि बैंक 2020 के वित्तीय साल में धोखाधडिय़ों की वजह से 1.85 लाख करोड़ रुपए यानी पिछले वित्तीय साल के मुकाबले 28 फीसद ज्यादा रकम से हाथ धो बैठे. इनमें से 80 फीसद नुक्सान सरकार की मिल्कियत वाले बैंकों को उठाने पड़े.

केपीएमजी साइबर जेवी-इंडिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया में पार्टनर मोहित बहल के अनुसार, ऐसी धोखाधडिय़ों को रोकने के लिए तीन किस्म के काम करने जरूरी हैं. पहली किस्म के कामों में यह भी शामिल है कि बैंक अपने मौजूदा ऋण जोखिम का आकलन करें और व्यापार आधारित उधार देने की गतिविधियों के तहत धोखाधड़ी के जोखिम की पहचान करें—यह उन जोखिमों से जुड़ा है जिनका नतीजा नीरव मोदी-पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले में हुआ था.

दूसरा है, बैंकों के अंदरूनी लेखा परीक्षण या ऑडिट कार्यों में आमूलचूल बदलाव, जबकि तीसरा है, बैंक के नियंत्रण ढांचे के अभिन्न हिस्से के तौर पर धोखाधड़ी-जोखिम आकलन ढांचे का विकास. पहले मामले में यह बेहद जरूरी है कि बैंकों के नेटवर्क के उन सभी लेन-देन का आकलन किया जाए जिनमें घोटालों में देखे गए तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है.

फिर उन सब विदेशी शाखाओं/क्षेत्रों की पहचान करनी होगी, जिन पर असर पड़ा हो सकता है और उसके बाद इन लेन-देन में अपनाई गई अंदरूनी वैधताओं और प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी होगी. इसके बाद बैंकों को व्यापारिक लेन-देन की निगरानी करने के लिए अपने मौजूदा आंतरिक नियंत्रणों की जांच-पड़ताल करनी चाहिए. जरूरी यह भी है कि बैंक कर्मचारियों की भूमिका का आकलन किया जाए और काम बदलने के दिशानिर्देशों के पालन सहित किसी भी साठ-गांठ या लापरवाही की जांच की जाए.

जानकारों का कहना है कि ये धोखाधडिय़ां व्यवस्थागत नाकामी की तरफ इशारा करती हैं. इन्हें किसी हद तक दुरुस्त किया जा सकता था अगर केंद्र ने बैंकिंग कामकाज के मुद्दों पर बनी पी.जे. नायक समिति की कुछ सिफारिशों को लागू करना चुना होता. समिति ने अपनी रिपोर्ट मई 2014 में तब आरबीआइ के गवर्नर रघुराम राजन को सौंप दी थी. 82 ढांचागत हस्तक्षेपों की सिफारिश की गई थी, लेकिन अब तक केवल छह या सात लागू किए गए हैं.

असल में, सभी स्तर के लेखा परीक्षणों—अंदरूनी, बाहरी और आरबीआइ के स्तर पर—को मजबूत करना होगा. बहल के मुताबिक, आंतरिक ऑडिट में सुधार के लिए जरूरी है कि बैंक अपने कार्यक्षेत्र और उसके हिस्सों (अमल सहित) का, जिनमें आंतरिक ऑडिट, आइटी ऑडिट, साथ-साथ किए जाने वाले ऑडिट, मैनेजमेंट ऑडिट वगैरह शामिल हैं, आकलन करें और उन्हें बदलते हुए जोखिम आकलन तथा नियम-कायदों में बदलाव के अनुरूप बनाएं.

साथ ही, एक केंद्रीयकृत लेन-देन निगरानी इकाई तैनात करने की जरूरत है, जो कर्ज के निपटान की अनदेखियों, नाकाफी मुनाफे, दिशानिर्देशों के उल्लंघन वगैरह की शुरुआती चेतावनियां दे सके. मौजूदा अंदरूनी लेखा परीक्षण ढांचे और भूमिकाओं तथा जिम्मेदारियों का बंटवारा बढ़ाने की जरूरत है ताकि कुल कामकाज में सुधार लाया जा सके और प्रबंधन को घटना के समय ही सूचना देने वाले ढांचे बनाए जा सकें.

बैंको की महामारी
बैंको की महामारी

पीएनबी घोटाले के खुलासे के बाद कुछ लोगों ने कहा कि आरबीआइ मुद्रास्फीति से लड़ने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त था और उसके पास बैंकिंग नियामक और उपभोक्ताओं के रक्षक के तौर पर अपने दूसरे अनिवार्य कामों के लिए पर्याप्त समय नहीं था. पीएनबी के साथ हुई धोखाधड़ी के मामले में, कई लोगों को हैरानी है कि आरबीआइ के ऑडिटर भी घोटाले को नहीं पकड़ सके.

आरबीआइ के जिस कार्यकारी समूह ने हाल में बैंकिंग में कॉर्पोरेट के प्रवेश की सिफारिश करके हंगामा मचा दिया है, उसने सुझाव दिया है कि ऐसी गड़बड़ चलन की रोकथाम करने और विशालकाय कंपनियों की देख-रेख के तंत्र को मजूबत करने के लिए बैंकिंग नियमन अधिनियम 1949 में संशोधन करने की जरूरत है. विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्रीय बैंक को अपनी देख-रेख में सुधार लाने के लिए निरीक्षण टेक्नोलॉजी का बेहतर फायदा उठाने की जरूरत है.

सहकारी बैंकों की बदहाली
पीएमसी बैंक के संकट ने, जिसने सैकड़ों हजारों खाताधारकों की जमा धनराशि को खतरे में डाल दिया, ढीले-ढाले कॉर्पोरेट गवर्नेंस और बैंक डायरेक्टरों, नेताओं और कारोबारियों के बीच कथित साठ-गांठ के बारे में सवाल खड़े कर दिए हैं. पीएमसी बैंक के मामले में खराब गवर्नेंस का खासा फायदा उठाने वालों में रियल एस्टेट कंपनी एचडीआइएल थी. बताया जाता है कि बैंक के निलंबित मैनेजिंग डायरेक्टर जॉय थॉमस ने कुबूल किया है कि एचडीआइएल को पीएमसी बैंक का असल ऋण जोखिम 6,500 करोड़ रुपए से ज्यादा था, जो आरबीआइ की तय सीमा से चार गुना और बैंक की 8,800 करोड़ रुपए की परिसंपत्तियों से 70 फीसद ज्यादा था.

(आरबीआइ के दिशानिर्देश कहते हैं कि एक ही संस्था को बैंक का ऋण जोखिम उसकी परिसंपत्तियों के 15 फीसद से ज्यादा नहीं होना चाहिए). सवाल यह भी है कि आरबीआइ के नियमों का इतना घनघोर उल्लंघन इतने लंबे वक्त तक नियामक की नजरों से छिपा कैसे रह गया.

आरबीआइ के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 2018 में 1,551 शहरी सहकारी बैंक थे, जो 2004 के 1,926 के मुकाबले कम थे. इससे इन बैंकों के नाकाम होने का ऊंचा जोखिम सामने आता है. अक्सर 25 लाख रुपए जितने बहुत छोटे पूंजी आधार से शुरू ये बैंक अक्सर राजनैतिक हितों और धोखाधड़ी के शिकार हो जाते हैं. सूचीबद्ध नहीं होने के कारण ज्यादातर सहकारी बैंक तब तक सार्वजनिक छानबीन की जद में नहीं आते जब तक कुछ गड़बड़ी सामने नहीं आती.

बैंकों के नाकाम होने के सिलसिले की ताजातरीन कड़ी है 94 साल पुरानी एलवी बैंक की कहानी. नवंबर में आरबीआइ ने इस पर मोरेटोरियम लगा दिया और खाताधारकों तथा लेनदारों के लिए रकम निकालने की अधिकतम सीमा 25,000 रुपए तय कर दी. आरबीआइ ने इसे डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड के साथ, जो सिंगापुर के डीबीएस बैंक लि. की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है, मिलाने की मसौदा योजना का भी ऐलान किया. सार्वजनिक क्षेत्र के एक पूर्व बैंकर गुमनामी की शर्त पर कहते हैं कि एलवी बैंक का पतन आठ साल पहले लाजिमी मालूम देता था.

बदनाम फेहरिस्त
बदनाम फेहरिस्त

मुंबई के एक और बैंकर बाजार में 'राणा कपूर शैली के प्रबंधन’ की कानाफूसियों की बात करते हैं और कहते हैं कि येस बैंक में बुलबुला फूटने के कई साल पहले से संकट खदबदा रहा था. और पीएमसी के जमाकर्ताओं की हालत वही थी जो एक साल पहले थी, जब आरबीआइ ने इसका नियंत्रण अपने हाथ में लिया था. रकम निकालने पर आरबीआइ के पांबदी लगा देने के बाद जमाकर्ताओं ने पूरा साल विरोध प्रदर्शन करते हुए गुजारा, लेकिन पाबंदियां कायम हैं और हाल ही में 22 दिसंबर 2020 तक बढ़ा दी गई हैं. मोदी सरकार के एक पूर्व कैबिनेट मंत्री अफसोस के साथ कहते हैं, ‘‘इन जमाकर्ताओं के पीछे कौन खड़ा है?’’ बीते दो साल में बैंक साख और जमाकर्ताओं की सुरक्षा से जुड़े कई संकटों में फंसे हैं और सुर्खियां में नियामकीय देख-रेख छाई है. 

बदनाम फेहरिस्त
बदनाम फेहरिस्त

इस बीच केंद्र की 2016 की नोटबंदी ने, जिसने 86 फीसद मुद्रा प्रचलन से बाहर कर दी थी, बैंकिंग क्षेत्र में उथल-पुथल मचा दी और काले धन की बुराई से निपटने के लिए भी कम ही कुछ किया. नोटबंदी से डिजिटल लेन-देन में बढ़ोतरी के दावों की भी जल्द ही हवा निकल गई जब भारत के लोग अपने रोजमर्रा के लेन-देन में फिर ज्यादातर नकदी ही खर्च करने लगे.

इसके उलट, कोविड-19 की वजह से लगाए गए लॉकडाउन की बदौलत डिजिटल खर्च में हाल ही में उछाल आया, तो इस बात की भी पोल खुल गई कि बैंक इतनी बड़ी तादाद में लेन-देन को संभालने के लिए तैयार ही नहीं थे. इसकी वजह से दो बड़े बैंकों—4 करोड़ ग्राहकों वाले सबसे बड़े निजी बैंक एचडीएफसी और सरकारी मिल्कियत वाले सबसे बड़े भारतीय स्टेट बैंक—में तकनीकी रुकावटें पैदा हो गईं. आरबीआइ ने भी एचडीएफसी से कहा कि वह तकनीकी मुद्दों के सुलझने तक नया क्रेडिट कार्ड जारी न करे.

सरकार को बैंकों का मालिक होना चाहिए?
सरकारी बैंकों के सामने मौजूद ढेरों मुश्किलों के मद्देनजर कई लोग सवाल करते हैं कि क्या देश को अब भी सरकार के नियंत्रण वाले बैंकों की जरा भी जरूरत है. 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण और निजी क्षेत्र के 14 बैंकों के केंद्र के हाथ में आ जाने के पांच दशक बाद यह यकीन बढ़ रहा है कि सरकार व्यावसायिक संस्थाओं की तरह बैंक नहीं चला सकती. पिछले साल 5 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में आरबीआइ के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बाराव ने सवाल उठाया था कि क्या सरकारी बैंकों की अब भी जरूरत है.

उन्होंने लिखा, ‘‘50 साल पहले एक अलहदा जमाने, अलहदा परिप्रेक्ष्य में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था. सरकारी बैंकों ने दूर-दराज के इलाकों में पैठ बनाई और तमाम किस्म के गरीबी-विरोधी कार्यक्रमों को लागू करके देश की सराहनीय सेवा की.’’ वे कहते हैं कि अलबत्ता ऐसे काम अब पूरे हो चुके हैं और इसलिए आगे बढऩे का वक्त आ गया है. ‘‘क्या अब भी हमें सरकारी बैंकों की जरूरत है?’’

असल में सरकारी बैंक अपनी बाजार हिस्सेदारी निजी बैंकों के हाथों गंवा रहे हैं. आरबीआइ के आंकड़े बताते हैं कि कर्ज में सरकारी बैंकों की बाजार हिस्सेदारी 2015 में 74.3 फीसद से घटकर 2020 में 59.8 फीसद पर आ गई, जबकि निजी बैंकों की 21.3 फीसद से बढ़कर 36 फीसद पर पहुंच गई. सरकार ने 10 सरकारी बैंकों का चार में विलय करने को मंजूरी दी है और इससे सरकारी मिल्कियत वाले बैंकों की तादद घटकर 12 पर आ जाएगी. लेकिन सुब्बाराव मानते हैं कि ये विलय ‘‘अर्थव्यवस्था का कायापलट करने की दिशा में कोई योगदान नहीं देंगे. बदतर यह कि विलय की प्रशासनिक और लॉजिस्टिक चुनौतियों की वजह से बैंक प्रबंधनों का ध्यान सबसे जरूरी एनपीए की साज-संभाल और कर्ज देने के मौकों की तलाश से भटक जाएगा.’’

कॉर्पोरेट बैंकिंग
क्या निजीकरण बैंकिंग क्षेत्र की मुश्किलों का जवाब है? विशेषज्ञों का कहना है कि निजीकरण के जहां अपने फायदे हैं, वहीं अगर अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो यह भी बराबर से विनाशकारी हो सकता है. वे बताते हैं कि कॉर्पोरेट के प्रवेश की इजाजत देने का आरबीआइ के कार्यकारी समूह का हालिया सुझाव देश की ग्रोथ में पैसा लगाने के लिए पूंजी की जरूरत को देखते हुए बिल्कुल वाजिब है. हालांकि कुछ लोग इसे बैंकिंग क्षेत्र में बड़े कारोबारी घरानों को पिछले दरवाजे से घुसाने की कारस्तानी बताते हैं.

बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 में संशोधन के जरिए बड़े कारोबारी घरानों को बैंक प्रमोटर बनने की इजाजत देने की सिफारिश आरबीआइ के कार्यकारी समूह ने इसलिए की है ताकि बैंकों और दूसरे वित्तीय और गैर-वित्तीय समूहों के बीच याराना पूंजीपतियों को कर्ज देने की प्रवृत्ति और ऋण जोखिमों को रोका जा सके और एकजुट देख-रेख सहित बड़ी कंपनियों के लिए निरीक्षण के तंत्र को मजबूत बनाया जा सके.

उसने यह भी कहा है कि अच्छे-भले ढंग से चलाए जा रहे बड़े एनबीएफसी को, जिनकी परिसंपत्तियां 50,000 करोड़ रुपए या उससे ज्यादा हैं और जिनमें कॉर्पोरेट घरानों की मिल्कियत वाले एनबीएफसी भी शामिल हैं, बैंकों में बदलने पर विचार किया जा सकता है, बशर्ते उन्हें 10 साल हो चुके हों और वे कसौटियों पर खरे उतरते हों. यह भी सिफारिश की है कि प्रमोटरों की हिस्सेदारी की अधिकतम सीमा लंबे वक्त (15 साल) में बैंक की चुकता वोटिंग अंशपूजी की मौजूदा 15 फीसद से बढ़ाकर 26 फीसद कर दी जाए.

आरबीआइ के अफसरों का कहना है कि शीर्ष 100 एनबीएफसी (उन 10,000 में से जिनकी आपसी कुल परिसंपत्तियां 32 लाख करोड़ रुपए हैं) 80 फीसद परिसंपत्तियों को नियंत्रित करते हैं. अगर कुछ को बैंकिंग लाइसेंस दे दिए जाते हैं, तो आरबीआइ उन्हें सीधे रकम उधार दे सकेगा और वे जनता से भी जमा धनराशियां उगाह सकेंगे. नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक काउंसिल ऑफ इंटरनेशनल इकोनॉमिक अंडरस्टैंडिंग के एरिया चेयर रमन अग्रवाल कहते हैं, ‘‘इससे एनबीएफसी के लिए जगह भी खाली हो जाएगी और इस क्षेत्र के लिए ज्यादा जरूरी नियम-कायदे कायम किए जा सकेंगे.’’

आरबीआइ की सिफारिशों ने बैंकिंग हलकों में बड़ी बहस छेड़ दी है. रघुराम राजन और आरबीआइ के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने भी इन सुझावों की कटु आलोचना की है. आचार्य ने लिखा है, ‘‘यह एक अहम सवाल खड़ा करता है—अभी क्यों? क्या हमने ऐसा कुछ सीख लिया है जो हमें औद्योगिक घरानों को बैंकिंग में आने की इजाजत देने को लेकर पहले की तमाम एहतियातों की अवहेलना करने की इजाजत देगा? हम कहेंगे कि नहीं.’’ वे कहते हैं कि बैंकिंग में कॉर्पोरेट की भागीदारी के मामले में पहले से आजमाई हुई सीमाओं पर अडिग रहना आज और भी ज्यादा जरूरी है.

आरबीआइ ने अपने कार्यकारी समूह की सिफारिश पर अगले साल की 15 जनवरी तक विचार मांगे हैं. इन सिफारिशों का मसौदा तैयार करने वाली कार्यकारी समिति के एक सदस्य सचिन चतुर्वेदी ने कहा है कि इसका कुल मकसद 2024 तक 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए पूंजी जुटाना, आर्थिक गतिविधि के लिए पूंजी जुटाने में औद्योगिक घरानों को और ज्यादा अवसर प्रदान करना और पूंजी मुहैया करने में एनबीएफसी को ज्यादा बड़ी भूमिका देना है.

केयर रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस कहते हैं, ‘‘सवाल यह है कि हम यह कैसे पक्का करेंगे कि कॉर्पोरेट अपने बैंकों का धन अपनी दूसरी कंपनियों में नहीं ले जाएंगे? कॉर्पोरेट ढेरों सहायक कंपनियां चलाते हैं. किसी को पता नहीं चलेगा कि वे किन कंपनियों को उधारी देंगे या उन कंपनियों की मिल्कियत का ढांचा क्या है.’’ यहां तक कि कॉर्पोरेट के हाथों संचालित एनबीएफसी के मामले में भी, वे दूसरी समूह कंपनियों के प्रोडक्ट में पैसा लगाते हैं, इसलिए संभावना यही है कि उल्लंघन हो सकते हैं. एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ‘‘बैंकिंग क्षेत्र धन की कमी से परेशान नहीं है. उसे और ज्यादा दक्ष होने की जरूरत है.’’

अगर आरबीआइ के कार्यकारी समूह की सिफारिशें स्वीकार कर ली जाती हैं, तो यह 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के अंतिम दौर के बाद बैंकिंग क्षेत्र में कॉर्पोरेट का फिर से प्रवेश होगा. हालांकि यह जल्द नहीं भी हो सकता है—आरबीआइ को पहले यह पक्का करना होगा कि निगरानी का तंत्र कायम हो.

हालांकि नकदी से भरपूर निजी खिलाडिय़ों को बैंकिंग क्षेत्र में लाने के पक्ष में भी खासी दलीलें हैं, लेकिन यह कदम भारी-भरकम एनपीए पैदा करने वाले क्रोनी कैपिटलिज्म और सीधी धोखाधड़ी को देखते हुए राजनैतिक तौर पर विवादास्पद साबित हो सकता है.

एनआइपीएफपी (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी) में प्रोफेसर और भारत की प्रिंसिपल इकोनॉमिक एडवाइजर के तौर पर पहले काम कर चुकीं इला पटनायक कहती हैं कि बैंकों के निजीकरण या इस क्षेत्र में कॉर्पोरेट के प्रवेश पर चर्चा करने से पहले केंद्र को वित्तीय समाधान और जमा बीमा विधेयक (एफआरडीआइ) जरूर लाना चाहिए. मौजूदा बैंकिंग कानून और दिशानिर्देश आरबीआइ को बैंक प्रबंधन में बदलाव करने, या मोरेटोरियम आयद करने और अनिवार्य विलय की सिफारिश करने का अधिकार देते हैं.

येस बैंक, एलवी बैंक, आइडीबीआइ बैंक और पीएमसी बैंक के मामलों में समाधान के ये तौर-तरीके इस्तेमाल किए गए थे. एनडीए की हुकूमत ने जमा बीमा की सीमा तय करने के प्रावधान पर राजनैतिक विवाद खड़ा होने के बाद 2018 में एफआरडीआइ विधेयक वापस ले लिया था. पटनायक कहती हैं, ‘‘कुछ सुधारों के साथ इस विधेयक की जरूरत है.’’ इससे अमेरिकी फेडरल डिपोजिट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन की तर्ज पर समाधान प्राधिकरण की शक्ल में अतिरिक्त सुपरवाइजर लाया जा सकता है.

बैंकिंग में कॉर्पोरेट घरानों के सीधे प्रवेश को पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है और उन्हें विपक्षी दलों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है, लिहाजा ज्यादा आसान तरीका यह होगा कि पहले बड़े एनबीएफसी को इस क्षेत्र में दाखिल होने दिया जाए. कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बैंकिंग में बड़े एनबीएफसी को आने की इजाजत देकर आरबीआइ नियामकीय नजर रख पाएगी.

आरबीआइ ने 2016 में सार्वभौम बैंकिंग लाइसेंस के लिए 'ऑन टैप’ लाइसेंसिंग मॉडल जारी किया था. इसके मुताबिक, बैंकिंग और वित्त में वरिष्ठ स्तर पर 10 साल के अनुभव वाला व्यक्ति और 10 साल के सफल ट्रैक रिकॉर्ड वाले एनबीएफसी लाइसेंस के लिए आवेदन कर सकते थे, बशर्ते उस व्यक्ति या संस्था के पास कम से कम 500 करोड़ रुपए की चुकता अंशपूंजी हो. अलबत्ता इसे उतने हाथोहाथ नहीं लिया गया. इसके पीछे चिंता की एक बात प्रमोटर की मिल्कियत के 15 फीसद होने की सीमा रही हो सकती है.

एक्सिस बैंक के पूर्व चेयरमैन पी.जे. नायक की अगुआई में 2016 में गठित भारतीय बैंकों के बोर्ड के गवर्नेंस की समीक्षा समिति की सिफारिशों के बाद आरबीआइ में बैंक बोर्ड ब्यूरो की स्थापना की गई थी. इसके पीछे बड़ा विचार बैंक को बोर्ड की नियुक्ति प्रक्रियाओं और कामकाज को राजनैतिक नियंत्रण से आजाद करना और प्रतिभाओं को आकर्षित करने, रोककर रखने और विकसित करने के लिए क्षमता निर्माण में मदद देना था. लेकिन यह मकसद पहले दिन से धराशायी हो गया.

हालांकि इंडिया टुडे ने नायक से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर बात करना मुनासिब नहीं समझा. उसी समिति के अन्य सदस्यों ने कहा कि सरकारी नियंत्रण को उस वक्त ढीला करना तकरीबन नामुमकिन था जब सरकारी बैंक सुधार की कार्रवाइयां झेल रहे थे, एनपीए की सफाई कर रहे थे और विलय से गुजर रहे थे. पंजाब ऐंड सिंध बैंक के चेयरमैन चरण सिंह कहते हैं, ‘‘पूंजी को कॉर्पोरेट कंपनियों की जरूरत से अलग करना जरूरी है. यह टेक्नोलॉजी के साथ ज्यादा सख्त नियम-कायदों के जरिए आसानी से किया जा सकता है.’’

नए वक्त की चुनौतियां
बैंकिंग क्षेत्र अर्थव्यवस्था को ऑक्सीजन—लोगों और फर्मों को कर्ज—देता है. अर्थव्यवस्था की वृद्धि के लिए बैंकों के बकाया कर्ज को अगले पांच साल में मौजूदा 95 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर करीब दोगुना होना होगा. देश में 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए कर्ज की वृद्धि अगले पांच साल तक 15 फीसद प्रति वर्ष की रफ्तार से होने की जरूरत है. यह फिलहाल करीब 8-10 फीसद है.

सरकारी बैंकों में सुधार के कई सारे ब्लूप्रिंट के साथ भी बदलाव की र‌फ्तार अभी तक धीमी रही है. बैंक फिलहाल उधारी देने में बहुत ही ज्यादा एहतियात बरत रहे हैं. इसमें केंद्र को नेतृत्व की भूमिका में आने की जरूरत है, क्योंकि तमाम बैंकों में उसका अच्छा-खासा हित जुड़ा है. 

सिन्हा सुझाव देते हैं कि सरकार बैंकों में अपनी मिल्कियत 50 फीसद से नीचे ले आए. वे कहते हैं, ''सरकारी बैंकों को उसी तरह काम करना चाहिए जैसे उदय कोटक अपने बैंक के मालिक हैं. इससे प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा होगी.’’ कारोबारी घरानों को बैंक स्थापित करने देने के आरबीआइ के सुझाव के बारे में सिन्हा कहते हैं कि अगर औद्योगिक घराने एनबीएफसी के मालिक हो सकते हैं, तो बैंक भी उनके नक्श-ए-कदम पर जा सकते हैं.

वे यह भी कहते हैं कि औद्योगिक घरानों में जमाकर्ताओं को नाकाम करने की हिम्मत नहीं होगी. ढेरों समस्याओं से लदे खासकर सरकारी बैंक को अपने कामकाज दुरुस्त करने और नए जमाने की बैंकिंग को अपनाने की जरूरत है. लेकिन शायद पहले ही काफी देर हो चुकी है. एक पूर्व मंत्री कहते हैं, ‘‘अगले दशक में सरकारी बैंक अप्रासंगिक हो जाएंगे, बहुत कुछ उसी तरह जो उड्डयन में हुआ है.’’

सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कामकाज सुधारने, अंडरराइटिंग, निगरानी और बहाली के कदम उठाए. लिहाजा, एनपीए घटा’’
निर्मला सीतारमण, केंद्रीय वित्त मंत्री

 बैंकों को अपने जोखिम प्रबंधन को तेज करना और पूर्वानुमान के आधार पर पूंजी उगाहना पड़ेगा. उन्हें पुरानी कहावत याद रखनी चाहिए कि सतर्कता और धीरज से दिन फिरते हैं’’
शक्तिकांत दास, आरबीआइ के गवर्नर

‘‘सरकारी बैंकों की असली चुनौती उनके कई आंतरिक सांगठनिक मसलें हैं. उन पर न ध्यान दिया गया है, न उनका समाधान किया गया है’’ 
अश्विन पारिख, वि‌‌त्तीय सलाहकार

देश में जीडीपी-कर्ज अनुपात करीब 60 या 70 (फीसद) है जबकि चीन में अनुपात दोगुना होगा. हमें कर्ज के प्रवाह में सुधार लाने के लिए मजबूत और सक्रिय बैंकिंग क्षेत्र की जरूरत है’’ 
जन्मेजय सिन्हा, चेयरमैन (भारत), बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप

सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि कैसे यह तय किया जा सकता है कि कॉर्पोरेट घराने अपने बैंकों से अपनी दूसरी कंपनियों में रकम नहीं भेज पाएंगे?’’ 
मदन सबनवीस, मुख्य अर्थशास्त्री, केयर रेटिंग्स

‘‘बैंकों के निजीकरण या निजी खिलाडिय़ों को बैंक स्थापित करने की इजाजत देने से पहले सरकार वित्तीय समाधान और जमा बीमा विधेयक लेकर जरूर आए’’
इला पटनायक, फेसर,  एनआइपीएफपी

ये सुझाव (आरबीआइ की कार्यकारी समिति की) 50 खरब की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करने के लिए पर्याप्त पूंजीकरण को ध्यान में रखकर दिए गए हैं’’
सचिन चतुर्वेदी, सदस्य, आरबीआइ कार्यकारी समिति.

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