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आवरण कथाः महामारी के बाद की दुनिया के लिए पांच सबक

महामारी के बाद थोड़ी कम एकध्रुवीय, ज्यादा डिजिटल और पहले से अधिक तेज गति से चलती दुनिया हमारा इंतजार कर रही है. लेकिन इस परिवर्तन के कारण पैदा हुआ तनाव और बढ़ी हुई असमानता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ओर लौटने की मांग भी करेगी.

फरीद जकरिया फरीद जकरिया

नया दौर, नई राहें 2021
वैश्विक परिदृश्य

फरीद जकरिया

जब मैंने 2020 के मध्य में अपनी किताब टेन लेशंस फॉर पोस्ट-पैंडेमिक वर्ल्ड लिखी, उस समय हम कोविड-19 महामारी की पहली लहर के चरम पर थे. यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट था जिसने सरकारों को लॉकडाउन लगाने को मजबूर कर दिया—और सार्वजनिक क्षेत्र, विशेष रूप से अमेरिका में, काफी हद तक विफल रहे. वह दौर भी जल्द ही पीछे छूट जाएगा.

नए कोरोना वायरस के टीके आने शुरू हो गए हैं. इनमें से कुछ टीके नए एमआरएनए तकनीकों का उपयोग करते हुए और अंतरराष्ट्रीय टीमों की ओर से साझा रूप से जिस तेज गति से विकसित किए गए, वैसा पहले कभी नहीं देखा गया था. चिकित्सा ने मृत्यु दर में कटौती की है, और हर महीने नए और सस्ते परीक्षण विकसित किए जा रहे हैं. हमने संकट के दूसरे चरण में प्रवेश किया है, जो निजी क्षेत्र की गतिशीलता, नवाचार और क्षमता में वृद्धि करेगा. अब महामारी के बाद की दुनिया की सच्चाई हमारे सामने आने लगी है. 

निजी क्षेत्र ने अच्छी भूमिका निभाई है, लेकिन हमें सरकार की उस अपरिहार्य भूमिका की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए जो उसने ‘तूफानी गति’ से टीका अनुसंधान और विकास के लिए धन उपलब्ध कराने में निभाई है (भले ही कई सरकारों में टीके को लेकर कुछ असमंजस दिखा). केवल पूर्वी एशिया में और दूसरे मुट्ठी भर देशों में हमने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की एक प्रभावी प्रतिक्रिया देखी है. स्वास्थ्य देखभाल को लेकर अनिश्चितताओं के बीच, आर्थिक नीतियों में सरकार ने एक अहम भूमिका निभाई है और बाजार को स्थिर करने में अहम हस्तक्षेप किया है—2008 और 2009 के अलावा अतीत में कई बार की तरह.

वाशिंगटन ने, विशेष रूप से आर्थिक संकट को अच्छी तरह से संभाला. करीब 3 ट्रिलियन डॉलर के द्विदलीय राहत बिलों को पारित किया गया और फेडरल रिजर्व पर तुरंत आवश्यक कार्रवाई के लिए दबाव डाला गया. लेकिन कई देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऐसा सुरक्षा कवच बनाने में सक्षम नहीं थे. हमें दुनिया में सुविधा संपन्न लोगों और वंचितों के बीच की खाई और चौड़ी होती दिख सकती है.

कोविड ने न केवल असमानता पर बल्कि वैश्वीकरण पर भी प्रकाश डाला. मात्र नौ महीने में 95 फीसद प्रभावकारिता के साथ कोविड के टीके तैयार किए गए, यह भी आज विज्ञान के लिए एक आश्चर्यजनक उपहार है—एक सच्चा वैश्विक प्रयास. सूचना और सर्वोत्तम प्रथाएं दुनिया भर में तात्कालिक सहजता से चलती हैं. वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के कारण ही नवोन्मेष, परीक्षण, विकास और फिर टीके की अरबों खुराकों का निर्माण संभव हो सका है.

कुछ यात्रा प्रतिबंधों और व्यापार को वापस मूल देशों में लाने की काफी चर्चाओं के बावजूद, जैसा कि मैंने किताब में भविष्यवाणी की है, महामारी के दौरान वैश्वीकरण वास्तव में मरने की बजाए और मजबूत ही हुआ है. नवंबर 2020 में, 30 फीसद वैश्विक जीडीपी को कवर करने वाला एक व्यापारिक समझौता एशिया में हुआ जो नाफ्टा (उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौता) या यूरोपीय संघ से बड़ा था.

इस नए समूह से विशेष रूप से अनुपस्थित देशों में भारत और अमेरिका थे. वर्षों से, लोकलुभावन नेता पलटी मारते रहे हैं और वैश्विक रुझानों का विरोध या अनदेखी करते हुए अपने दृष्टिकोण को स्वार्थ की राष्ट्रवादी अवधारणा तक सीमित करते आ रहे हैं. एक नई सरकार के तहत, जो बाइडन के अमेरिका के पास व्यापार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रगति करने और सशक्त होने के मौके हैं—जो कि हमारी दुनिया को लगातार बदल रहे हैं.

हम अभी भी जब इस बीमारी से जूझ रहे हैं, कोविड से परे एक दुनिया भी तेजी से उभर रही है. इसकी जटिलता से जूझने में मदद करने के लिए, मैंने अपनी नई पुस्तक में कुछ सबक तैयार किए हैं. यहां वे पांच सबक हैं जो हमारी महामारी के बाद की दुनिया के लिए हैं.

(निम्नलिखित को टेन लेशंस फॉर अ पोस्ट-पैंडेमिक वर्ल्ड से लिया गया है)

कमर कस लें
अब हम सभी जानते हैं कि चीन के हुबेई प्रांत में एक चमगादड़ से फैले एक छोटे से वायरल कण ने दुनिया को अपने घुटनों पर ला दिया है—असल जीवन में बटरफ्लाइ इफेक्ट का उदाहरण है जो कहता है कि दुनिया के एक कोने में तितली के पंखों के फडफ़ड़ाने के पैटर्न से दुनिया के दूसरे कोने में मौसम बदल जाता है. छोटे बदलावों के बड़े नतीजे हो सकते हैं. पावर ग्रिड या कंप्यूटर नेटवर्क में, अगर एक छोटा तत्व टूटता है तो वह अपने लोड को दूसरे में शिफ्ट कर देता है और जब वह भी टूट जाता है, तो यह एक चेन रिएक्शन पैदा कर सकता है जो कहीं बड़ा हो जाता है. उसी तरह जैसे एक छोटी सी तरंग, गरजती लहर बन जाती है. इसे 'परिवर्तनशील विफलता’ कहा जाता है.

इस महामारी के नतीजे क्या हैं? कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि यह आधुनिक इतिहास की सबसे लंबी घटना साबित होगी, एक ऐसा पल जिसने हमेशा के लिए रास्ते बदल दिए हैं. दूसरों का मानना है कि टीके की खोज के बाद, हम जल्दी से पहले की तरह काम-धंधे में लौट आएंगे. फिर भी कई लोगों का यह तर्क भी है कि महामारी इतिहास को फिर से नहीं लिखेगी बल्कि उसकी गति तेज कर देगी.

यह अंतिम परिदृश्य सबसे संभावित परिणाम लगता है. माना जाता है कि लेनिन ने एक बार कहा था, ''ऐसे दशक होते हैं जब कुछ नहीं होता है, फिर कुछ ऐसे हफ्ते होते हैं जिनमें कई दशकों से अधिक घटनाएं घट जाती हैं.’’ महामारी के बाद की जो दुनिया होने वाली है वह कई मायनों में, उस विश्व का एक तीव्र संस्करण होगा जिसे हम जानते थे. 

हमारी दुनिया, विशेष रूप से शीत युद्ध के अंत के बाद से, खुली और तेज है—और इस प्रकार, परिभाषा के मुताबिक लगभग अस्थिर. हमने इसे 21वीं सदी के तीन महान संकटों—9/11, आर्थिक संकट और कोविड-19 के रूप में देखा है जिसमें से पहली एक राजनैतिक, दूसरी आर्थिक और तीसरी प्राकृतिक आपदा है.

जानवरों से मनुष्यों में पहुंचती महामारी जैसी बीमारियां मानव बस्तियों के फैलने के कारण दुनियाभर में विभिन्न प्रजातियों के प्राकृतिक आवासों में आ रही लगातार कमी के दुष्परिणामों का एक स्वरूप है. जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले तूफान, सूखे और जंगल में आग की भी यही वजह है. संयुक्त राष्ट्र की 2019 की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि पृथ्वी के 75 फीसद भूभाग और महासागरों के 66 फीसद हिस्से में मानव विकास के कारण 'गंभीर बदलाव’ आए हैं.

वामपंथ और दक्षिणपंथ दोनों धड़ों के बहुत से लोगों ने विकास को धीमा करने या लोगों तथा वस्तुओं के वैश्विक प्रवाह को रोकने का आह्वान किया है. लेकिन खुलेपन और गति की जगह स्थिरता का चयन करना न तो संभव है और न ही वांछनीय, और मानकर चलिए कि दुनिया के सबसे गरीब अरबों लोग गरीबी से मुक्त होने की आस लिए विदा हो जाएंगे. अगर मानव समाज इस तेजी से विकास करता रहा, तो लोगों को सदमों से बचाने के लिए सुरक्षा, लचीलापन और भंगुरता के खिलाफ ताकत प्रदान करनी होगी—वरना वे उस खुलेपन और गतिशीलता के विरोध में खड़े हो जाएंगे जो विकास को गति देते हैं.

असमानता बहुत बढ़ जाएगी 
1990 के बाद से, वैश्विक असमानता में गिरावट चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों में निरंतर आर्थिक प्रगति के कारण हुई, जो विकसित देशों की तुलना में तेजी से बढ़ी और इससे सैकड़ों करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए. महामारी, इस प्रगति का बहुत कुछ लील सकती है. कई विकासशील देशों में, आबादी के बड़े हिस्से बस इतना ही कमाते हैं कि वे किसी तरह अपना पेट भर सकें. इसलिए सरकारों को एक दुविधा का सामना करना पड़ा.

अगर वे अर्थव्यवस्था को बंद करते हैं, तो लोग भूखे मरेंगे. अगर वे इसे खुला रखते हैं, तो वायरस फैलता है. इन सरकारों के पास इतना पैसा नहीं है कि वे इन लोगों को घर पर रहने के लिए पैसे दे सकें या फिर व्यवसायों को बंद रखने के लिए सब्सिडी दे सकें, इसलिए शायद सबसे समझदार रास्ता एक पूर्ण लॉकडाउन के लिए न जाना हो सकता था.

लॉकडाउन के नतीजतन, भारत की अर्थव्यवस्था 2020 में करीब 10 फीसद सिकुड़ी और यह अब तक की सबसे खराब गिरावट की राह पर है. फिर भी, दिसंबर 2020 तक, कोविड-19 से मरने वाले भारतीयों की संख्या लगभग 1,44,000 थी, जो कि हर तीन महीने में कुपोषण से मरने वाले 1,80,000 भारतीय बच्चों की तुलना में कम है.

यह भयावह आंकड़ा कोविड-19 को विकासशील दुनिया के परिप्रेक्ष्य में रखता है. लॉकडाउन जीवन बचाने के इरादे से लगाया गया था, पर इससे भारी आर्थिक नुक्सान हुए. इसने अनकही कठिनाई को जन्म दिया है और इसने भूख से लेकर अवसाद तक कई स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ा दिया. 

डिजिटल लाइफ ही सच है 
कोविड-19 डिजिटल क्रांति, विशेषकर मोबाइल क्रांति को गति देगा. आइफोन 2007 में लॉन्च किया गया, और स्मार्टफोन अब दुनिया के अधिकांश हिस्से को इंटरनेट से जोड़ते हैं. ज्यादातर लोगों के लिए, फोन ही उनका कंप्यूटर है. इस बदलाव को भारत से समझें. अधिकतर गरीब देशों की तरह, हाल तक सूचना क्रांति में भारतीय भी पीछे छूट गए थे. कंप्यूटर महंगे हैं और वाइ-फाइ दुर्लभ हैं.

2010 में, भारत की एक अरब आबादी में से अधिकांश अपने फोन से ऑनलाइन नहीं जा सकते थे, क्योंकि उनके पास आमतौर पर साधारण हैंडसेट थे. फिर 4जी आया, जिसने 30 डॉलर के स्मार्टफोन को आसानी से इंटरनेट से जुडऩे में सक्षम बनाया. अब भारत में 55 करोड़ से अधिक लोगों के हाथों में एक मिनी कंप्यूटर है.

वे इसका उपयोग उत्पादों को खरीदने-बेचने, समाचार देखने, मनोरंजन, समूहों में शामिल होने और दूर बैठकर काम निपटाने के लिए करते हैं. भारत ने आश्चर्यजनक गति से इस डिजिटल खाई के पार छलांग लगाई. 2015 में यह मोबाइल ब्रॉडबैंड पैठ में दुनिया में 155वें स्थान पर था. 2017 तक, यह किसी भी अन्य देश की तुलना में ज्यादा मोबाइल डेटा का उपभोग कर रहा था.

कोविड-19 इसके बीच आया और उसने एक डिजिटल भविष्य के सामने मानव व्यवहार के रूप में मौजूद, एकमात्र अंतिम बाधा को दूर कर दिया. कई लोग अपने पुराने तरीकों में ही फंसे थे. कुछ लोग अभी भी इंटरनेट पर क्रेडिट कार्ड की जानकारी भेजने से हिचक रहे थे. कुछ अन्य ऑनलाइन क्लास की कल्पना भी नहीं कर सकते थे. अधिकांश लोग वीडियो चैट से डॉक्टर से परामर्श के लिए कभी राजी नहीं होते. पर महामारी और लॉकडाउन ने न सिर्फ लोगों बल्कि व्यवसायों के भी इस व्यवहार में बदलाव कर दिया. सभी वर्जनाएं टूट गई हैं.

वैश्वीकण अभी मरा नहीं है 
महामारी से पहले, वैश्वीकरण फल-फूल रहा था, विशेष रूप से विकासशील दुनिया में. जैसा कि अर्थशास्त्री सुजैन लुंड और लॉरा टायसन लिखती हैं, ‘‘सामान के सभी अंतरराष्ट्रीय व्यापार के आधे से अधिक में कम से कम एक विकासशील देश शामिल है और विकासशील देशों के बीच सामान का व्यापार कथित दक्षिण-दक्षिण व्यापार—साल 2000 में वैश्विक के सात फीसद से बढ़कर 2016 में 18 फीसद तक हो गया.’’

पर महामारी के दौरान जरूरी सामान की कमी ने कई सरकारों को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन पर विचार करने और उन्हें वापस उनके ‘मूल उद्गम क्षेत्र’ में लाने के लिए प्रेरित किया. मुख्य रूप से, डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी जैसे लोकलुभावन राष्ट्रवादियों ने महामारी के दौरान किसी भी प्रकार के वैश्विक प्रयासों या बहुपक्षीय समाधानों को अविश्वास से देखा. मोदी ने भारतीयों को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के खतरों की याद दिलाई और आग्रह किया कि वे ‘वोकल फॉर लोकल’ हों.

पर जब दुनिया भर में विकास की गति धीमी हो रही है, उस बीच टैरिफ और सब्सिडी बिल्कुल गलत उपाय होंगे. संरक्षणवाद की तुलना में एक बेहतर लक्षित समाधान, दवाओं, मास्क और अन्य व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों का रणनीतिक भंडारण होगा, जैसा कि पूर्व एशियाई देशों ने सार्स के बाद किया था. किल्लत आम तौर पर अल्पकालिक होती है, उसके बाद निजी क्षेत्र मांग को पूरा करने कूद पड़ता है. कोविड-19 महामारी के दौरान ठीक ऐसा ही हुआ.

महामारी आने से पहले वैश्वीकरण के मानवीय पैमाने पर विचार करें, 50 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्र, 27 करोड़ प्रवासी, 15 लाख पर्यटन यात्राएं. क्या यह सब बदल जाएगा? ज्यादा संभावना तो यह है कि दुनिया चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को एक खास तरीके से कम करेगी. भारत, वियतनाम और मेक्सिको जैसे अन्य अपेक्षाकृत कम लागत वाले निर्माता देशों को इसका लाभ होने की विशेष संभावना है जो बड़े पैमाने पर वैश्वीकरण को गले लगाते हैं. अधिक संभावना इसी बात की है कि वैश्वीकरण अनर्थकारी गोता नहीं लगाएगा, हां, इसमें एक अस्थायी गिरावट आ सकती है. 

कभी-कभी महानतम यथार्थवादी  ही आदर्शवादी साबित होते हैं
आयरिश टीकाकार फिंटन ओ’टूल ने अप्रैल 2020 में लिखा, ''दो शताब्दियों से अधिक वक्त में अमेरिका ने बाकी दुनिया में प्रेम और घृणा, भय और आशा, ईर्ष्या और अवमानना, खौफ और क्रोध जैसी कई भावनाओं को उभारा है. पर एक भावना है जिसने अब से पहले तक अमेरिका का रुख नहीं किया था, वह है दया.’’ कोविड-19 और उस पर अमेरिका की खराब प्रतिक्रिया ने न सिर्फ अमेरिकी गिरावट की चर्चा को हवा दी बल्कि इसने चीन के उदय की चिंताओं के संदर्भ में भी ऐसा ही किया.

जब मैं भारत में बड़ा हो रहा था, उस समय लोग अमेरिकी विदेश नीति की आलोचना तो करते थे, पर अमेरिकी मॉडल को सबसे उन्नत और सफल मानते थे. आज, वे उस मॉडल को संदेह के साथ देखते हैं और कभी-कभी तो उस पर तरस खाते हैं.

अमेरिका के बाद दुनिया में चीन का वर्चस्व हो जाएगा, इसकी संभावना भी नहीं है. ‘बाकियों के उदय’ के साथ, यह दुनिया अगर वास्तव में बहुध्रुवीय नहीं होगी तो भी काफी बहुपक्षीय तो होगी ही. एक नया बहुपक्षवाद अपने साथ कई फायदे लेकर आएगा-यह बड़े-छोटे सभी देशों की बढ़ी हुई भागीदारी पर आधारित होगा. यह ब्राजील से दक्षिण अफ्रीका तक और भारत और इंडोनेशिया तक, अंतरराष्ट्रीय प्रणाली के वास्तविक वैश्विक चरित्र का प्रतिनिधित्व करेगा. अगर यह काम करता है, तो एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय प्रणाली विकसित होगी जिसमें अधिक संख्या में देशों को ज्यादा तवज्जो मिलेगी, नतीजतन एक अधिक जीवंत लोकतांत्रिक प्रणाली तैयार होगी.

इस तर्कपूर्ण उम्मीद की एक वजह है. बहुपक्षीय होने की उम्मीद कोरा आदर्शवाद नहीं है. अमेरिका, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया और विशेष रूप से चीन ने खुली और नियम-आधारित प्रणाली का हिस्सा बनकर काफी लाभ प्राप्त किया है. वे सभी—यहां तक कि बीजिंग भी—उस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हर तरह का प्रोत्साहन देंगे. भारत और अन्य उभरती शक्तियों को ऐसी प्रणाली का स्वागत करना चाहिए जिसमें चीन संस्थानों और नियमों के एक जाल में घिरा विवश है, भले यह प्रणाली उन्हें भी विवश बनाती है. वे ऐसी दुनिया में अधिक स्थिरता और समृद्धि पाएंगे.

यह काल्पनिक विचार नहीं है कि परस्पर सहयोग के बूते ही दुनिया बदली जा सकती है. यह एक सामान्य समझ की बात है. 

लेखक सीएनएन के फरीद जकरिया जीपीएस कार्यक्रम के प्रस्तोता और लेखक हैं. उन्होंने हाल ही में एक किताब टेन लेशंस फॉर अ पोस्ट-पैंडेमिक वर्ल्ड (एलेन लेन पेंगुइन, 599 रु., 320 पन्ने) लिखी है

कई लोगों का तर्क है कि यह महामारी इतिहास को फिर से नहीं लिखेगी, बल्कि उसकी गति को तेज कर देगी. यह अंतिम परिदृश्य सबसे संभावित परिणाम नजर आता है

अमेरिका के बाद दुनिया में चीन का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा, इसकी संभावना भी नहीं है. बाकियों के उदय के साथ यह दुनिया अगर वास्तव में बहुध्रुवीय नहीं होगी तो भी काफी बहुपक्षीय तो होगी ही.

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