scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

आवरण कथाः पलायन का सच हुआ बेपरदा

उन्हें आखिर क्यों कूच करना पड़ा? इसके लिए कौन जिम्मेदार था? अब वे कहां, किस हाल में हैं? और अब आखिर इस मर्ज की दवा क्या है?

X
पलायन पलायन

अध्येता अमिताभ मट्टू कश्मीरी पंडित और जाने-माने कश्मीर विशेषज्ञ हैं. वे विवेक अग्निहोत्री की हाल में रिलीज फिल्म द कश्मीर फाइल्स को मिल रही जबरदस्त प्रतिक्रिया देखकर हैरत में पड़ गए और इसे बेमिसाल मानते हैं. बीते दिनों वे मेलबर्न में थे और वहां रह रहे 200 पंडितों को यह फिल्म दिखाई जा रही थी.

फिल्म खत्म होने पर दर्शकों में एक भी आंख ऐसी नहीं थी जो गीली न हो. कई लोग तो खुलकर रो रहे थे. मट्टू को ज्यादा अच्छा लगता अगर यह फिल्म उन उदार मुसलमानों से जुड़ी कुछ बारीकियों में भी जाती जिन्होंने उनके जख्मों पर मरहम लगाने की भूमिका अदा की थी. मगर उन्होंने पाया कि घटनाओं की अपनी स्याह-सफेद प्रस्तुति में भूरे रंग की छटाएं लाने या अपने अफसाने को 'एक तरफ’ और 'दूसरी तरफ’ के साथ संतुलित करने में निर्देशक की कोई दिलचस्पी नहीं थी.

वे कहते हैं, ''दर्शकों के लिए यह फिल्म बेहद परेशान कर देने वाला अनुभव थी. इसकी गूंज समुदाय में बहुत गहरे तक सुनाई दी, जो मानता है कि किसी भी दूसरे कलात्मक उद्यम के मुकाबले यह फिल्म उनकी तकलीफ और पीड़ा को सबसे करीब से प्रस्तुत करती है. खालिस पीडि़तों के नजरिए से यह आदिम भावनाओं का खुला प्रदर्शन थी और उन्होंने इसमें पूरी तरह अपना अक्स देखा.’’

इधर भारत में प्रतिक्रिया और भी जबरदस्त थी, जहां पूरे देश में फिल्म हाउसफुल चल रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भौंहें चढ़ाने वाले अनुमोदन के बाद फिल्म ने पहले दो हफ्तों में ही 200 करोड़ रुपए से ज्यादा बटोर लिए और अब तक की सबसे ज्यादा धन बटोरने वाली हिंदी फिल्मों में से एक बनने की तरफ बढ़ चली थी.

कश्मीरी पंडितों को उनके अधिकार और इंसाफ दिलाने के लिए घाटी में कार्यरत रूट नाम का एक्टीविस्ट संगठन चला रहे सुशील पंडित कहते हैं, ''हम कश्मीर में जिन हालात से गुजरे. जिन वजहों से हमें पलायन करना पड़ा और जिस किस्म का रक्तपात और संताप हुआ, यह फिल्म उसका अनगढ़ सत्य दिखाती है, जिसे अब तक कालीन के नीचे छुपाया जाता रहा और कभी इतने ब्योरेवार बातचीत नहीं की गई. फिल्म तमाम कसीदाकारी को उघाड़कर रख देती है और उस मानसिक सदमे को पूरी नग्नता और सत्यता से दिखाती है.’’

सभी पंडित अलबत्ता फिल्म का इतना खनखनाता अनुमोदन नहीं करते. श्रीनगर में समुदाय के राजनैतिक और प्रशासनिक अलगाव के खिलाफ अभियान चलाने वाले संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के अध्यक्ष संजीव टिक्कू कहते हैं, ''मैं सुलह के लिए उम्मीद की कोई किरण नहीं देखता, क्योंकि यह फिल्म जिस तरह बनाई गई है, उसने और भी ध्रुवीकरण पैदा किया है और नफरत फैला रही है.

आवरण कथाः पलायन का सच हुआ बेपरदा
आवरण कथाः पलायन का सच हुआ बेपरदा

सारे कश्मीरी मुसलमानों पर आतंकवादी का बिल्ला चस्पां कर दिया गया है. सरकार को नुक्सान पर नियंत्रण के कदम उठाने होंगे.’’ फिल्म कुछ असल प्रसंग जरूर दिखाती है, पर उन्हें सनसनीखेज ढंग से पेश करती है और कई प्रसंग तथ्यात्मक रूप से सटीक भी नहीं हैं. टिक्कू फिल्म के उस प्रसंग का हवाला देते हैं जिसमें आतंकवादी हिंदुओं को कतार में खड़ा करके गोली मार देता है. वे कहते हैं कि यह घटना 2003 में घटी और इसमें कोई पंडित नहीं मारा गया, क्योंकि घाटी से निकाले जाने के बाद वे जम्मू के रास्ते पर थे, जैसा फिल्म के ही एक अन्य दृश्य में दिखाया गया है.

फिल्म में पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला का नाम हालांकि कहीं नहीं है, पर जिस तरह उन्हें और दूसरे कश्मीरी मुसलमानों को दिखाया गया, उससे वे बेहद नाराज हैं. इंडिया टुडे से बातचीत में (देखें 'सत्य आयोग बनाएं...’) उन्होंने कहा, ''यह प्रोपेगेंडा फिल्म के अलावा कुछ नहीं है. इसने 1990 की उस त्रासदी को उधेड़ दिया है जिसने राज्य के हर शख्स को प्रभावित किया, न केवल हिंदू भाइयों को, जो घाटी छोड़कर चले गए, बल्कि मुस्लिम बहुसंख्यकों को भी. यह दुखद स्थिति थी, जो नस्ली सफाये में दिलचस्पी रखने वाले कुछ तत्वों की वजह से पैदा हुई थी. उन्हें बेनकाब करने की जरूरत है. मगर क्या मुसलमानों के खिलाफ देश में इतना प्रचार करना जरूरी है? जम्मू और कश्मीर के मुसलमानों को छोड़िए, भारत के बाकी मुसलमान भी वह दंश झेल रहे हैं जिससे उनका कुछ लेना-देना नहीं था. यह प्रोपेगेंडा 80 फीसद आबादी और बाकी 20 फीसद आबादी के बीच नफरत पैदा करके देश को बर्बादी की तरफ ही ले जाएगा.’’

अब्दुल्ला चाहते हैं कि सरकार बीते तीन दशकों में घाटी में न केवल हिंदुओं बल्कि मुसलमानों और सिखों की हत्याओं की भी जांच के लिए एक सत्य आयोग का गठन करे. वे कहते हैं, ''अगर फारूक अब्दुल्ला जिम्मेदार है, तो वह देश में कहीं भी फांसी पर चढ़ाए जाने को तैयार है. मैं मुकदमे का सामना करने को तैयार हूं, पर उन लोगों को दोषी मत ठहराइए जो जिम्मेदार नहीं हैं.’’

अग्निहोत्री की फिल्म ने जहां तमाम किस्म की प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया, वहीं इसने भारतीय लोकतंत्र के एक सबसे अंधकारमय इतिहास पर ध्यान केंद्रित किया है. नस्ली सफाया—जिसे टिक्कू सांस्कृतिक जनसंहार कहते हैं—राष्ट्रीय भर्त्सना का हकदार है, तो इन जघन्य अपराधों को अंजाम देने वालों को इंसाफ के कठघरे में लाने और पीडि़तों को फिर से बसाने की जरूरत है.

यह राष्ट्रीय शर्म की भी बात है कि तीन दशक गुजर जाने के बाद भी पंडितों की कई शिकायतों का निपटारा नहीं हुआ है. फिल्म ने इतिहास को भले ही चुनिंदा ढंग से दिखाया हो और उसमें चाहे जितनी तथ्यात्मक कमियां और अतिरंजनाएं हों, वह कई परेशान करने वाले सवाल उठाती है. घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन की सचाई क्या है?

चीजों को इस त्रासद मोड़ पर पहुंचने देने के लिए कौन जिम्मेदार था? पंडितों की अब क्या हालत है? हमारी राष्ट्रीय अंतरात्मा पर इस कलंक का समाहार अब कैसे हो सकता है? क्या पंडित कभी वापस घाटी में लौटकर अपनी सरजमीन पर अपनी जगह का दावा कर सकेंगे? इन सवालों के आसान उत्तर नहीं हैं, पर शुरुआत से इसकी परतें उधेडऩा उपयोगी कवायद हो सकती है. 

पलायन का सच क्या है?

कश्मीरी पंडित भले ही जम्मू-कश्मीर की आबादी के महज 4 फीसद हों, पर राज्य के मामलों पर उनका प्रभाव उनकी तादाद से बहुत ज्यादा था. विद्वान और धनवान कश्मीरी पंडित केंद्र और राज्य सरकार में सत्ता के शीर्ष पायदानों पर अच्छी तरह रचे-बसे थे. 1950 और 1976 के भू-सुधार कानूनों से पहले राज्य की करीब 30 फीसद कृषि जोत के मालिक पंडित थे. व्यापार के बड़े हिस्से पर भी उनका कब्जा था.

कश्मीरियत की मशहूर भावना या धार्मिक मेल-मिलाप की सदियों पुरानी परंपरा और सांप्रदायिक सौहार्द एक तरफ, इस मुस्लिम बहुल राज्य के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक मामलों पर उनके दबदबे को लेकर आक्रोश भीतर ही भीतर खदबदाता रहा था. 1980 के दशक के आखिरी वर्षों में यह आक्रोश शिखर पर पहुंच गया. अशांति और उथल-पुथल की आशंका से ग्रस्त सरहदी राज्य में इसे उपजाऊ जमीन मिल गई. 

1990 में कश्मीरी पंडितों के पलायन से पहले भारत 1947 और 1965 में पाकिस्तान से दो बड़े युद्ध लड़ चुका था. ये दोनों युद्ध जेंऐंडके के भारतीय संघ में विलय को लेकर लड़े गए थे. 1971 में एक अप्रत्यक्ष बांग्लादेश का युद्ध भी लड़ा गया था. फिर विवादास्पद अनुच्छेद 370 था जिसने भारतीय संविधान के तहत जेऐंडके को न केवल विशेष दर्जे की गारंटी बल्कि ज्यादातर दूसरे राज्यों से ज्यादा स्वायत्तता भी दी थी, जो अगस्त 2019 में मोदी सरकार के इसे रद्द किए जाने तक जारी रही.

राज्य का राजनैतिक नेतृत्व एक और उलझा हुआ मुद्दा था. आजादी के बाद यह कुछ वक्त के लिए करिश्माई शेख अब्दुल्ला को सौंपा गया, पर भारत की सरकार के साथ रिश्ते बिगड़ने के बाद उन्हें सत्ता से हटा दिया गया और विध्वंसक गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप में 1953 से 1971 तक उन्होंने कई पारियां जेल में बिताईं.

अलबत्ता 1975 में इमरजेंसी के दौरान तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अब्दुल्ला के साथ एक समझौता किया, जिसमें जनमत संग्रह की अपनी मांग छोडऩे के लिए राजी होने की एवज में उन्हें फिर राजनीति में आने और राज्य के चुनाव में लड़ने दिया गया. विशेषज्ञों ने इसे भारत में कश्मीर का विलय पूरा होने के सबसे बड़े संकेत के रूप में देखा.

उधर बांग्लादेश के युद्ध में अपमानजनक हार से कसमसा रहे पाकिस्तान ने प्रतिशोध के तौर पर कश्मीर में अशांति पैदा करने की गरज से बड़े उग्रवादी धड़ों को पालन-पोसना शुरू कर दिया. भारत का यह विध्वंसक पड़ोसी जो छद्म युद्ध शुरू करने वाला था, उसने बाद में कश्मीरी पंडितों के पलायन में अपनी भूमिका निभाई.

अब थोड़ा आगे बढ़कर 1984 में आ जाएं. यह जेऐंडके और देश दोनों के लिए कई लिहाज से बड़े बदलावों का साल था. 1982 में शेख अब्दुल्ला की मौत के बाद उनके बेटे और राजनैतिक वारिस फारूक अब्दुल्ला ने मुख्यमंत्री के तौर पर कमान संभाली और 1983 का चुनाव आरामदायक बहुमत से जीता. मगर एक साल बाद फरवरी में एक कश्मीरी बागी मकबूल भट को फांसी पर चढ़ा दिया गया.

उसे एक भारतीय राजनयिक की हत्या करने के लिए भारतीय अदालत ने सजा सुनाई थी. घाटी में यह व्यापक चिंता का विषय बना और इसके नतीजतन उग्रवादी धड़ों के प्रति समर्थन में उछाल आ गया. फारूक को काबू में रखने के लिए इंदिरा गांधी ने सख्त, व्यावहारिक और कड़ाई से काम लेने वाले अफसर जगमोहन को जेऐंडके का राज्यपाल नियुक्त कर दिया.

कांग्रेस के साथ गठबंधन ठुकरा देने के लिए फारूक से नाराज इंदिरा गांधी ने जुलाई में नेशनल कॉन्फ्रेंस को दोफाड़ करवाया और उनके बहनोई जी.एम. शाह को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी. कुछ ही महीने बाद अक्तूबर में उन्हीं के सिख अंगरक्षकों ने इंदिरा गांधी की हत्या कर दी, जिससे दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में सिखों के खिलाफ हिंसा की लहर दौड़ गई.

निर्णायक मोड़ 

जब राजीव गांधी 1984 के आम चुनाव में सहानुभूति लहर पर सवार होकर धूमधाम से सत्ता में आए (कांग्रेस ने वह चुनाव निरंकुश बहुमत से जीता), उनका ध्यान मुख्यत: पंजाब से निपटने पर था, जो उस वक्त आंतरिक सुरक्षा का सबसे अव्वल खतरा साबित हो रहा था. इससे पाकिस्तान की प्रमुख खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आइएसआइ) को कश्मीर में उपद्रव भड़काने की मोहलत मिल गई.

उस वक्त कश्मीर में काम कर चुके एक बड़े भारतीय खुफिया अफसर खुलासा करते हैं, ''कहीं न कहीं आत्मसंतोष का एहसास था, जिसमें तमाम सुरक्षा एजेंसियां एक दूसरे को काटते मकसदों के लिए काम कर रही थीं. किसी ने भी पाकिस्तान और उग्रवादियों के खतरे को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया. हमारा रवैया यह था कि राज्य पर हमें अच्छा नियंत्रण हासिल है और विद्रोह की बातें डर फैलाने के लिए की जा रही हैं.’’

यह महंगी गलती साबित होनी थी. फरवरी 1986 में जब केंद्र सरकार ने अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद के ताले खोल दिए, ताकि हिंदू वहां राम लला की मूर्ति की पूजा-उपासना कर सकें, तकरीबन उसी वक्त मुख्यमंत्री शाह ने जम्मू के सिविल सेक्रेटरिएट में एक हिंदू मंदिर के भीतर मस्जिद के निर्माण का ऐलान किया. उन्होंने घोषणा की, 'इस्लाम खतरे में है.’ इससे कश्मीर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे और हिंदू मंदिरों, दुकानों और घरों पर हमले होने लगे. इससे पंडितों सहित हिंदुओं के पलायन की पहली लहर शुरू हुई.

इस मुकाम पर कांग्रेस ने शाह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया और राज्यपाल शासन लगा दिया. 1987 आते-आते राजीव ने फारूक अब्दुल्ला के साथ एक समझौता किया, ताकि एनसी और कांग्रेस गठबंधन में साथ मिलकर राज्य का चुनाव लड़ सकें. गठबंधन को बहुमत तो मिल गया, पर यह चुनाव में चौतरफा धांधलियों के आरोपों के बीच मिला, जो कट्टरपंथी मुस्लिम पार्टियों और नेताओं के गठजोड़ मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) ने लगाए थे. फारूक अब्दुल्ला ने आरोपों से इनकार किया, पर इसके भीषण नतीजे हुए.

श्रीनगर के अमीरा कदल निर्वाचन क्षेत्र से एमयूएफ के उम्मीदवार मोहम्मद यूसुफ शाह ने आरोप लगाया कि वे भारी अंतर से आगे चल रहे थे, पर तभी चुनाव उनसे छीन लिया गया. उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया. यही हश्र यासीन मलिक का हुआ, जो उस वक्त इस्लामिक स्टुडेंट्स लीग के मुखिया था और जिसने यूसुफ शाह के लिए प्रचार किया था. 1989 में रिहाई के बाद यूसुफ शाह ने हिज्बुल मुजाहिदीन (एचएम) का दामन थाम लिया और अपना लड़ाकू नाम सैयद सलाहुद्दीन रख लिया.

मलिक ने तीन अन्य उग्रवादियों के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) की भारतीय शाखा की बुनियाद रखी. सलाहुद्दीन की तरह जल्द ही वह भी सीमा पार करके पाकिस्तान चला गया, जहां बताया जाता है कि आइएसआइ ने उसे हथियारों और विस्फोटकों का प्रशिक्षण दिया. वह घाटी में कहर बरपाने को लौटा और पंडित उसका मुख्य निशाना थे. फारूक पर कश्मीर का नीरो होने के आरोप लगे, जिनकी दिलचस्पी राज्य के संगीन मामलों पर ध्यान देने से कहीं ज्यादा विदेश जाने में थी. 

भारतीय राजनैतिक और सुरक्षा प्रतिष्ठान के भीतर असहमतियों और फूट से पाकिस्तान के कायराना इरादों को शह ही मिली. 1989 के आम चुनाव में राजीव सत्ता से हाथ धो बैठे और पार्टियों का एक गठबंधन गद्दीनशीन हुआ. इसमें जनता दल भी था, जिसकी अगुआई वी.पी. सिंह के हाथ में थी जो उनके पूर्व वित्त और रक्षा मंत्री थे और कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके थे. लालकृष्ण आडवाणी की अगुआई वाली भाजपा सरकार का बाहर से समर्थन कर रही थी. वी.पी. सिंह ने प्रमुख कश्मीरी नेता और फारूक अब्दुल्ला के विरोधी मुफ्ती मोहम्मद सईद को गृह मंत्री बनाया.

उधर राजनैतिक बदहाली का फायदा उठाकर उग्रवादियों ने घाटी में एक के बाद एक आतंकी हमले शुरू कर दिए. उस साल 15 अगस्त को उन्होंने घाटी में बत्ती गुल या अंधकार दिवस घोषित किया और तमाम नागरिकों से विरोध में पूरी रात बत्ती बंद रखने को कहा. एनसी के कार्यकर्ता मोहम्मद यूसुफ हलवाई ने इस फरमान को नहीं माना और अपने घर की सारी लाइटें जला दीं.

एक हफ्ते बाद गोली मारकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया. इसके बाद प्रमुख लोगों की हत्याओं की बाढ़ आ गई, जिनमें भट को मौत की सजा सुनाने वाले जज नीलकंठ गंजू और दूरदर्शन के डायरेक्टर लासा कौल तथा कई सुरक्षाकर्मी भी थे. फारूक और मुफ्ती दोनों पर आरोप लगा कि कश्मीर जल रहा था, वे हाथ पर हाथ धरे बैठे थे. 

दिसंबर 1989 में बाजी कश्मीरी नेताओं और भारतीय राज्यसत्ता के खिलाफ निर्णायक रूप से पलट गई, जब जेकेएलएफ के उग्रवादियों ने मुफ्ती की बेटी रुबैया सईद का अपहरण कर लिया. उन्हें आजाद करने की एवज में उन्होंने जेल में बंद अपने पांच आदमियों को रिहा करने की मांग की. फारूक आतंकवादियों के साथ किसी भी समझौता वार्ता के खिलाफ थे, जबकि एक सूत्र के मुताबिक मुफ्ती समझौता करने को उतावले थे.

बावजूद इसके कि खुफिया एजेंसियों ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि उग्रवादियों के हाथों उनकी बेटी को नुक्सान पहुंचाए जाने की संभावना न के बराबर है. जेकेएलएफ के पांच उग्रवादी छोड़ दिए गए और रुबैया आजाद हो गईं. एक घुटना-टेकू सरकार दहशतगर्दों की मांग के आगे झुक गई, इससे उग्रवादियों और उनके आकाओं के हौसले बुलंद हो गए. उस वक्त कश्मीर के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख ए.एस. दुल्लत कहते हैं, ''13 दिसंबर को जब उनके लोगों को रिहा किया गया, इन धड़ों ने घाटी में पटाखे फोड़कर जश्न मनाया. उन्हें यकीन होने लगा कि अब सब मुमकिन है, आजादी भी.’’

कश्मीरी पंडित क्यों निशाना बने?

दूसरी वजहें भी अलगाववाद को हवा दे रही थीं. अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थक जेहादियों ने सोवियत फौजों को वापस होने और देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. इसी के साथ, बहुतों को यह जानकारी नहीं है कि पाकिस्तान ने चीन और उत्तरी कोरिया की मदद से 1989 में हथियार ग्रेड की परमाणु क्षमता विकसित कर ली थी. उससे उसे भारत के खिलाफ छद्म, गोपनीय युद्ध छेड़ने की आजादी मिल गई थी, क्योंकि उसे पता था कि उकसावे के बाद भी नई दिल्ली एटमी टकराव से बचने के लिए बड़ी पारंपरिक लड़ाई छेड़ने से हिचकेगा.

तीसरी वजह राज्य में खराब प्रशासन और राजनैतिक साजिशों से घाटी के मुसलमानों में उग्रवादियों का समर्थन बढ़ने की थी. पंडित सिर्फ इस वजह से प्रमुख निशाना बन गए क्योंकि उन्हें आसानी से आतंकित किया जा सकता है और उनमें कुछ के खिलाफ हमलों से वे घाटी छोड़कर भागने पर मजबूर हो जाते. तब पाकिस्तान समर्थक आतंकवादी गुट भारी खून-खराबा मचा सकेंगे और घाटी की भारत से आजादी का ऐलान कर सकेंगे. या ऐसा ही उन्होंने सोचा था.

कानून-व्यवस्था की हालत बदतर होने लगी, तो वी.पी. सिंह और मुफ्ती ने जगमोहन को राज्यपाल के रूप में वापस लाने का फैसला किया. फारूक ने कहा कि ऐसा हुआ तो वे इस्तीफा दे देंगे, लेकिन वी.पी. सिंह नहीं माने. फारूक ने इस्तीफा सौंप दिया और जगमोहन ने 19 जनवरी, 1990 को राज्यपाल पद की शपथ ली. तब तक श्रीनगर में जेहादी पंडितों के खिलाफ 'रलीव, गलीव या चलीव’ (धर्म बदलो, मरो या भागो) जैसे नारे लगाते जुलूस निकालने लगे थे. इस बीच, जगमोहन ने सुरक्षा बलों को सख्त कार्रवाई का आदेश दिया. 21 जनवरी को इंतहा हो गई, जब पुराने श्रीनगर के गावकदल में प्रदर्शकारियों पर सुरक्षा बलों ने गोली चला दी, जिसमें 50 लोग मारे गए.

अपनी किताब माइ फ्रोजेन टर्बुलेंस इन कश्मीर में जगमोहन का दावा है कि वे आतंकवादियों की गणतंत्र दिवस पर तबाही मचाने की योजना को धराशायी कर रहे थे. लेकिन ऐसे आरोप भी लगे कि राज्यपाल ने पंडितों से घाटी छोड़ने को कहा, ताकि वे आतंकवादियों पर बिना इस डर के कड़ी कार्रवाई कर सकें कि वे पंडित समुदाय से बदला लेंगे. हालांकि उस दौरान मौजूद वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि उन लोगों ने ऐसी किसी योजना के बारे में नहीं सुना था.

बहरहाल, प्रशासन की काबू पाने की तैयारी नहीं थी. न ही सुरक्षा बलों और न ही सेना को पंडितों की रक्षा के लिए बुलाया गया. खुफिया तंत्र की नाकामी भी थी. इस बीच मार्च 1990 पाकिस्तान जरब-ए-मोमिन नामक फौजी अभ्यास शुरू किया, जिसे भारत पर आक्रमण करने और कश्मीर पर कब्जा कर लेने के इरादे से तैयार किया गया था. भारत ने पाकिस्तान को ऐसे किसी दुस्साहस के खिलाफ चेताया. 

हालांकि जगमोहन के दुस्साहस जारी थे. घाटी के लोकप्रिय मजहबी लीडर मीरवायज मौलवी फारूक की 21 मई, 1990 को हत्या हो गई. कथित तौर पर उसकी जिम्मेदारी हिज्बुल ने ली. इससे आम कश्मीरी मुसलमानों में उग्रवादियों के खिलाफ भारी नाराजगी भड़क उठी. उसके बाद उग्रवादियों ने अफवाह फैलाई कि हत्या के पीछे शिवसेना का हाथ है. मौलवी के जनाजे के जुलूस में स्वत:स्फूर्त भारी भीड़ जुटी.

कोई नहीं जानता कि यह कैसे हुआ कि घबराए सीआरपीएफ के जवानों ने जुलूस पर गोली चला दी, जिसमें 52 लोग मारे गए. एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ''उदार कश्मीरी मुसलमानों को भी उग्रवादी गुटों ने निशाना बनाया, ताकि वे आगे आने से डर जाएं. ऐसी अनेक खबरें हैं कि मुसलमानों ने पंडितों को आश्रय दिया, लेकिन कारोबारी प्रतिद्वंद्विता और जमीन के झगड़ों से कई ने आंखें भी फेर लीं. वे वाकई अंधेरे दिन थे, जिसमें हम सबके भीतर का बुरा पक्ष सामने आ गया था.’’ 

हिंसा का यह चक्र लगभग साल भर चला और अनुमानित 75,000 पंडित परिवार घाटी छोड़कर मुख्य रूप से जम्मू चले गए. जगमोहन से इस्तीफा मांग लिया गया और पूर्व पुलिस अधिकारी गिरीश चंद्र सक्सेना को जिम्मेदारी सौंपी गई. हालात काबू करने में कई साल लगे. बमुश्किल 700 परिवार घाटी में रह गए. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक तो 219 पंडित मारे गए, लेकिन केपीएसएस ने हाल ही में मारे गए लोगों का व्यवस्थित सर्वे किया और संख्या 700 से थोड़ी कम बताई.

कैसे हो पटाक्षेप 

अगर कोई सोचे कि पंडितों की पीड़ा के साथ कश्मीर में तनाव का खात्मा हो गया, तो ऐसा नहीं हुआ. 1990 और 2000 के बीच राज्य में 45,000 लोग मारे गए, जिनमें 22,500 आतंकवादी, 6,000 सुरक्षाकर्मी और तकरीबन 17,000 आम लोग थे. यह संख्या किसी तरह त्रासदी या पंडितों के साथ हुए गलत को कम नहीं करती. हालांकि उनके पुनर्वास के प्रति एक के बाद एक सरकारों की उदासीनता से हालात सुधारने में कोई मदद नहीं मिली.

ज्यादातर पंडित जम्मू पहुंचे, जहां वे कई साल से जैसे-तैसे बनाए क्वार्टरों में गुजर-बसर करते, और ज्यादातर शहर के बाहर लगे टेंटों में रहते. नकद और राशन की मद में राहत मुहैया होती, लेकिन कभी संपन्न रहे लोगों को खैरात पर गुजारा करना उनके गरिमा को चोटिल करता था.

आखिर 2004 में मनमोहन सिंह सरकार सत्ता में आई तो केंद्र ने न सिर्फ जम्मू में पंडितों के लिए पक्के घर की कॉलोनी बनाई, बल्कि घाटी में उनकी वापसी के लिए 3,000 नौकरियों और रहने के अस्थायी आवास की भी व्यवस्था की. 2015 में मोदी सरकार ने इस फेहरिस्त में 6,000 और नौकरियां जोड़ीं और 17 जगहों पर उनके लिए अस्थायी आवास भी बना रही है. हालांकि प्रगति काफी धीमी है.

अपने उद्यम और लगन के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देकर पंडितों ने अपनी हालत सुधारी और फिर तरक्की करने लगे. जब मुख्यमंत्री मुफ्ती से पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल मिला तो कहते हैं कि उन्होंने कहा, ''आप आबाद हो गए, हम बर्बाद हो गए.’’ अपने पैर जमा लेने के बाद पंडितों की अपने ऊपर हुए अत्याचार की आवाज उठाने की फितरत घटने लगी. वे अब कमजोर या बिखरे समुदाय नहीं हैं. कश्मीर फाइल्स ने वह दुखती रग फिर छेड़ी है, जिससे फिर इंसाफ और वापसी की मांग उठी है.

हालांकि उनके प्रतिनिधियों की इस बारे में राय बटी हुई है कि आगे की राह क्या हो. मट्टू कहते हैं, ''पंडितों को वापस जाकर मुसलमानों के साथ ही रहना होगा. इसलिए मुसलमान अगर यह मानें कि गलती हुई और पंडित सिरे से उनकी निंदा न करें तो दोनों के मिलजुलकर रहने का रास्ता निकल सकता है.’’

दूसरा तरीका वह है, जिसकी वकालत प्रमुख कश्मीरी पंडित संगठन पनुन कश्मीर करता है. पंडितों के लिए घाटी में विशेष सुरक्षा वाले एनकलेव बनाएं जाएं, ताकि वे भरोसे से लौट सकें. पंडितों की दशा पर कई किताबें लिखने वाली चर्चित हिंदी लेखिका क्षमा कौल कहती हैं, ''हम सिर्फ 6,000 पंडित नहीं हैं, हम सात लाख हैं. इसलिए सरकार घाटी के कुछ जिलों में पंडितों के लिए बस्तियां बनाए और हम वहां जा सकते हैं.’’

सुशील पंडित के मुताबिक, ''पूरी घाटी में पंडितों की जायदाद को एक जगह इकट्ठा किया जाए और आकार के हिसाब से जिले बनाए जाएं.’’ कुछ को डर है कि इससे कश्मीर में फिलस्तीन जैसे हालात बन जाएंगे, जिसमें लगातार तनाव रहेगा. इसके बदले सरकार सेना और सुरक्षा अधिकारियों के ठिकानों के आसपास विशेष एनकलेव बनाने की सोच रही है, ताकि पर्याप्त सुरक्षा मुहैया हो.

कुछ दूसरे लोगों का मानना है कि घाटी में रहने के अनुभव या यादों के बोझ से मुक्त युवा कश्मीरी शायद कश्मीर वापस न जाना चाहें और देश या विदेश में अपनी जगह बनाना मुनासिब समझें. खासकर इसलिए भी कि कश्मीर अभी भी सुरक्षा के मसलों से घिरा है और आर्थिक मौकों की कमी है. उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा आर्थिक हालत सुधारने पर फोकस कर रहे हैं. पिछले हफ्ते ही उन्होंने एक बैठक की, जिसमें यूएई के कारोबारियों को निवेश करने को न्योता दिया.

लेकिन उनका फल मिलने में वक्त लगेगा. ज्यादातर पंडित चाहते हैं कि उनके खिलाफ हिंसा भड़काने वालों को सजा मिले. सुशील पंडित का कहना है कि सरकार उनकी दुर्दशा को कत्लेआम की श्रेणी में डाले. इससे विशेष अदालत स्थापित की जा सकेगी. फारूक अब्दुल्ला के सत्य आयोग के गठन के प्रस्ताव में भी दम है. यह जरूरी है कि सचाई बाहर आए, ताकि किसी को कभी कश्मीरी पंडितों जैसी दुर्दशा न झेलनी पड़े. 

कश्मीरियत की मशहूर भावना के बावजूद इस मुस्लिम बहुल राज्य के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक मामलों में पंडितों के दबदबे को लेकर आक्रोश भीतर ही भीतर खदबदाता रहा था

कुछ लोग कश्मीर में पंडितों के लिए अलग एनक्लेव बनाने की बात करते हैं पर इससे वहां फिलस्तीन जैसे हालात बनने का डर है.

प्रदीप कौल, 62वर्ष
नैंसी कौल, 61 वर्ष
अब जम्मू के कबीर नगर में रह रहे हैं; मूल निवासी श्रीनगर के हब्बा कदल के
1990 में घाटी से निकलकर गए

प्रदीप कौल विलिमय फॉकनर को उद्धृत करना पसंद करते हैं: ''अतीत कभी नहीं मरा. बल्कि वह तो अतीत भी नहीं हुआ है.’’ उनकी जिंदगी पर अतीत का लंबा, गहरा साया है जो उनका पीछा छोड़ने का नाम नहीं ले रहा है. वे अभी भी श्रीनगर के बीचोबीच हब्बा कदल में अपने विशाल घर को याद करते हैं.

शहर के बाहरी इलाके में उनके माता-पिता का एक बड़ा बाग भी था जहां वे हफ्ते के आखिर में जाकर खेलते थे. उनके पिता एक कॉलेज में साहित्य पढ़ाते थे. प्रदीप ने भले ही कृषि में डिग्री हासिल की हो, लेकिन उन्हें अंग्रेजी की रोमांटिक कविता में महारत हासिल है और वे आसानी से उनकी पंक्तियां उद्धृत कर सकते हैं. नैंसी से शादी करने के बाद कृषि महकमे में उन्हें सरकारी नौकरी मिल गई. इस दंपती की दो बेटियां हैं.

हालांकि 2 फरवरी, 1990 को उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. वे उड़ी में एक यात्रा पर थे जब उन्हें पता चला कि उनके साले सतीश टिक्कू की श्रीनगर में उनके घर में गोली मारकर हत्या कर दी गई. टिक्कू अपने सामाजिक कार्यों के लिए मशहूर थे. बाद में उन्हें पता चला कि टिक्कू की हत्या का दोषी बिट्टा कराटे है. सतीश की हत्या के बाद कश्मीरी पंडितों में डर फैल गया. प्रदीप और उनके परिवार को आनन-फानन में भागकर जम्मू के एक तंबू वाले शिविर में बसेरा लेना पड़ा जहां का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था. वहां कोई शौचालय भी नहीं था. 

वे अपनी इस विडंबना पर मुस्कुराने की कोशिश करते हैं और कहते हैं: ''हमारे पीछे 5,000 वर्षों की अविरल संस्कृति और रोमांटिक कविता का मेरा सारा ज्ञान था. और अचानक हमें वहां एक ऐसी जगह में धकेल दिया गया जहां हमें खुले में निवृत्त होने के लिए सुबह 4 बजे उठना पड़ता था.’’ प्रदीप ने सबसे पहले जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा खरीदा और एक शौचालय बनवाया ताकि न केवल उनका परिवार बल्कि शिविर के उनके दोस्त भी उसका इस्तेमाल कर सकें.

वे मिशावली में छोटे-छोटे मकानों वाली बस्ती में रहने चले गए और एक घर किराए पर ले लिया ताकि उनके बच्चे पढ़ सकें. उनकी दोनों बेटियां अब अपने लिए बेहतर कर रही हैं. प्रदीप और नैंसी श्रीनगर के अपने घर में वापस जाने के लिए तरसते हैं, लेकिन उनके पुराने घर खंडहर बन चुके हैं. 

नैंसी बोलती कम ही हैं और जब भी उन बीते दिनों के बारे में सोचती हैं फूट-फूट कर रोने लगती हैं. प्रदीप का मानना है कि इन चीजों का पटाक्षेप तभी होगा जब उनकी साले समेत कश्मीरी पंडितों के हत्यारों को सजा मिलेगी; और सरकार श्रीनगर में सुरक्षित एनक्लेव बनाएगी जहां पंडित वापस लौट सकें. प्रदीप दुर्लभ पांडुलिपियों का भी संग्रह करते हैं और वे चाहते हैं कि घाटी के मंदिरों का भी जीर्णोद्धार कराया जाए. उनके लिए, अतीत भी अभी बीता नहीं है, लेकिन वे बेहतर भविष्य की उम्मीद कर रहे हैं.
—राज चेंगप्पा

''हमारी 5,000 साल से चली आ रही एक जीवित-जीवंत संस्कृति-परंपरा थी... एकाएक हमें उठाकर एक शरणार्थी शिविर में फेंक दिया गया’’


राकेश भट्ट, 43वर्ष
अब नवी मुंबई में रह रहे; 
मूल निवासी श्रीनगर में फतेह कदल के

मार्च 1990 में घाटी से भागकर आए थे

श्रीनगर के फतेह कदल में राकेश भट्ट के घर की एक खिड़की से सीमा सुरक्षा बल की एक चौकी दिखती थी. वहीं से झेलम का मनमोहक दृश्य भी नजर आता था. लेकिन उसी खिड़की से सीमा सुरक्षा बल की चौकी पर आतंकवादियों के गोलियां चलाने और ग्रेनेड फेंकने के दृश्य भी दिखते थे.

अब 43 साल के हो चुके और नवी मुंबई में रहने वाले भट्ट कहते हैं, ''मैं आतंक के साये में पला-बढ़ा हूं’’. श्रीनगर में भट्ट अपने पिता हृदयनाथ, मां सरला और छोटे भाई रोहित के साथ रहते थे. उनका कहना है कि 1989 का अंत आते-आते स्थितियां बेहद खराब हो गई थीं जब पास की मस्जिदों के लाउडस्पीकरों से 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान. बताव रोस्तुय, बतेनिएं सान’ जैसे नारे लगने शुरू हो गए थे, जिसका मतलब था कि कश्मीर पाकिस्तान बनेगा, पंडित पुरुषों के बिना, पंडित महिलाओं के साथ.

मार्च 1990 में उनके परिवार ने श्रीनगर छोड़ दिया. भट्ट कहते हैं, ''हमारे पास सिर्फ 2,300 रुपए थे जो मेरे पिता के पास थे.’’ शुरू में वे जम्मू में एक तंबू में रहे और बाद में 500 रुपए प्रति माह पर घर की शक्ल दिए गए एक मवेशीखाने को किराए पर लिया. भट्ट कहते हैं, ''हमें गरीब बनने को बाध्य किया गया.’’

1997 में वे मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए महाराष्ट्र के जलगांव आए क्योंकि तत्कालीन भाजपा-शिवसेना सरकार ने हर इंजीनियरिंग कॉलेज में कश्मीरी पंडितों के लिए दो सीटें आरक्षित की थीं. भट्ट कहते हैं, ''इस डिग्री की वजह से मैं महाराष्ट्र में बसा और आराम से रह सका.’’

इन दिनों वे पंडितों की दुर्दशा उजागर करने में लगे हुए हैं. उनके प्रयासों में 10 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली शॉर्ट फिल्म एक्सोडस ऐंड एग्जाइल: द नीड का निर्माण भी शामिल है. उन्होंने कश्मीरी पंडितों के पलायन और उनकी दुर्दशा पर  छह नाटक भी लिखे हैं. उनका कहना है कि ''सरकार को हमें पुनर्वास के लिए अलग भूमि प्रदान करनी चाहिए जहां हम बहुमत में होंगे.’’

वे पूरी घाटी में फैले कश्मीरी हिंदुओं के लिए एक अलग केंद्र शासित प्रदेश 'पनुन कश्मीर’ के विचार का जोरदार समर्थन करते हैं. ''मेरी पीढ़ी ऐसी आखिरी पीढ़ी है, जो कश्मीर वापस जाना चाहती है. मेरा किशोर बेटा तो शायद महाराष्ट्र छोड़कर कभी नहीं जाना चाहेगा.’’
—किरण डी. तारे

ज्योति टूटू, 57 वर्ष
राजाजी टूटू, 59 वर्ष
वे अब जम्मू में नगरोटा के जगती कॉलोनी में रहते हैं; मूल रूप से श्रीनगर के निवासी
अप्रैल 1990 में घाटी से भागना पड़ा

जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग से बस थोड़ा-सा हटकर नगरोटा में जगती टाउनशिप दो कमरों वाले 4,000 से ज्यादा मकानों की एक विशाल कॉलोनी है. विस्थापित कश्मीरी पंडितों को जम्मू में बसाने के लिए इसे राज्य सरकार ने 2008 में बनवाया था. यह टाउनशिप ऐसी तीन बस्तियों में शामिल है जिन्हें केंद्र की मदद से बनाया गया है—अन्य दो जम्मू शहर के पास मुट्ठी और पुरखू में हैं.

राजाजी और ज्योति किस्मत वाले थे कि उन्हें जगती में एक फ्लैट आवंटित हो गया और वे अपनी दो बेटियों के साथ वहां 12 साल पहले रहने चले आए. यहां के कमरे भले छोटे हैं पर ज्योति का कहना है कि तंबू वाले शिविर से तो बेहतर हैं.

राजाजी और ज्योति दोनों 1990 में श्रीनगर में शिक्षक थे जब पंडितों के लिए हालात तेजी से खराब हुए. ज्योति याद करती हैं कि कोई क्रिकेट मैच होने पर मुसलमानों का एक तबका जोरों से पाकिस्तान का समर्थन करता था. पाकिस्तान अगर हारता तो हिंदू घरों पर पत्थरबाजी होती. जान से मारने की धमकियां बढ़ने के बाद उन्होंने भागकर जम्मू जाने का फैसला किया जहां उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

फिर भी उन्होंने पक्का किया कि बेटियों को अच्छी शिक्षा मिले. ज्योति कहती हैं, ''मोदी जी के बेटी पढ़ाओ अभियान से बहुत पहले हम ऐसा कर रहे थे. हमें इसके लिए नारों की जरूरत नहीं थी.’’ वे अब तक घाटी में वापसी नहीं कर पाए हैं और करना भी नहीं चाहते. ज्योति बताती हैं, ''हम पहले की तरह डर के साये में नहीं रहना चाहते. न मैं अपने बच्चों को डर के एहसास से गुजरने दूंगी. हम यहां शांतिपूर्वक बैठेंगे और भगवान राम का नाम जपेंगे.’’

राजाजी का कहना है कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत उम्मीदें थीं लेकिन उन्हें निराशा हुई क्योंकि मोदी सरकार ने कश्मीरी पंडितों की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया. उनके शब्दों में, ''मैं साफ कह सकता हूं कि 370 को हटाना बहुत बड़ी भूल थी. यह हमारे किसी काम का नहीं है. कई कश्मीरी पंडित अभी भी घरों और नौकरी की तलाश कर रहे हैं और इन दोनों ही मोर्चों पर हमारे लिए कुछ खास नहीं किया गया है.’’ राजाजी का मानना है कि पाकिस्तान के रहते कश्मीर समस्या का हल मुमकिन नहीं. वे निराशा से कहते हैं, ''शांति से रहना हमारे नसीब में नहीं.’’

—राज चेंगप्पा

''हम नहीं चाहते कि (घाटी में वापस जाएं और) खौफ में जीएं. अब हम अपने बच्चों को भी खौफ में नहीं जीने देना चाहते’’

विजय रैना, 55 वर्ष
अब दिल्ली में रहते हैं;
मूल निवासी श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके के
8 मार्च 1990 को घाटी से निकले

राजधानी दिल्ली के मयूर विहार इलाके के एक अपार्टमेंट में अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ रह रहे विजय रैना कहते हैं, ''चाहे कितना ही समय क्यों न बीत जाए, कोई उन घटनाओं को कैसे भूल सकता है जो उसे अपने घर से भागने के लिए मजबूर करती हैं?’’

इन दिनों एक निजी फर्म में कार्यरत रैना बताते हैं कि 32 साल पहले माता-पिता के साथ घाटी से पलायन करने के बाद वे कभी वापस नहीं गए. उनका कहना है कि ''वापसी के बारे में सोचने भर से ही मैं डर से कांपने-सा लगता हूं. वैसे भी, मैं किस चीज के लिए लौटूंगा? वहां मैंने कुछ भी नहीं छोड़ा.’’ दूसरी ओर, दिल्ली को आज वे अपना घर मानते हैं जिसने उन्हें सुरक्षा और स्थिरता दी है.

रैना के पिता दूरदर्शन में थे और उनका परिवार श्रीनगर के हब्बा कदल में रहता था. रैना बताते हैं कि 7 मार्च, 1990 को उनके पिता के एक सहकर्मी की गोली मारकर हत्या किए जाने की अगली रात कुछ लोग उनके पिता के बारे में पूछताछ करने घर आए थे. उस घटनाक्रम को याद करते हुए वे कहते हैं, ''मैंने बहाना किया कि वे जम्मू गए हैं. वे अजनबी लोग या कोई अफगानी नहीं थे. वे हमारे पड़ोसी थे, वही पड़ोसी जिनके साथ हम बड़े हुए, जिनके साथ गलियों में क्रिकेट खेला था और साथ स्कूल गए थे.’’

यही वह निर्णायक घड़ी थी जब परिवार ने घाटी छोड़ने का फैसला किया. उस वक्त रैना 24 साल के थे. उनका परिवार जम्मू में गीता भवन के पास शरणार्थी शिविर में पहुंचा, जहां वे लोग लगभग महीने भर तक रहे. रैना के पिता का दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र में समायोजन हो गया था. रैना के लिए त्रासदी का सबसे कठिन हिस्सा मानसिक और भावनात्मक चोटों से उबरना था.

आज भी कश्मीरी पंडितों की खास पसंद वाली सब्जी गांठ गोभी से रैना को खून और मौत की याद आ जाती है. वे एक किलो गांठ गोभी खरीदने के लिए ही स्थानीय बाजार गए थे, जब इलाके में एक भयावह विस्फोट हुआ था.

वह भारत की आजादी का 42वां साल था. रैना को याद है कि इस घटनाक्रम में वे डर से पागल जैसे होने के बाद बेहोश हो गए थे. वे बताते हैं, ''वहां अंधेरा और खून था. जब मैंने नीचे अपने पैर की तरफ देखा तो पाया कि उसमें एक सिलेंडर फंसा हुआ था.’’ यह बताने के बाद वे एक उर्दू अखबार की धुंधली पड़ती क्लिपिंग निकालते हैं जिसमें उनकी तस्वीर छपी है.

वे याद करते हैं, ''मैं अस्पताल में भर्ती था.’’ तब से अब तक शारीरिक चोट का असर तो कम हो गया है, लेकिन भावनात्मक खरोंचे स्थायी हो गई लगती हैं. ''पीड़ित और शरणार्थी होना, आपके अस्तित्व का हिस्सा बन जाता है. आप कभी भी अपने आप को इस भाव से पूरी तरह से अलग नहीं कर सकते.’’
—सोनाली आचार्जी

''वापसी के बारे में सोचने भर से ही मुझे कपकपी-सी छूटने लगती है. वैसे, लौटना ही क्यूं है. वहां मैं कुछ भी छोड़ के नहीं आया’’
 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें