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अब न रहा वह मालिक मुख्तार

उत्तर प्रदेश के माफिया मुख्तार अंसारी को पहली बार कोर्ट से सजा दिलवाकर योगी आदित्यनाथ सरकार ने अपराधियों को सख्त संदेश देने की कोशिश की है. बेटे अब्बास की गिरफ्तारी के बाद मुख्तार के परिवार पर जांच एजेंसियों का शिकंजा कस रहा, मगर इस पूरी प्रक्रिया को लेकर कुछ सवाल भी खड़े हुए

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वक्त का बदला मिजाज:  मऊ न्यायालय में 15 सितंबर, 2022 को पेशी के बाद भारी पुलिस सुरक्षा के साथ वापस बांदा जेल जाता मुख्तार अंसारी
वक्त का बदला मिजाज: मऊ न्यायालय में 15 सितंबर, 2022 को पेशी के बाद भारी पुलिस सुरक्षा के साथ वापस बांदा जेल जाता मुख्तार अंसारी

बता रहा हूं आपको, यह बात है 2002 की. लखनऊ जेल से कुछ कैदी फरार हो गए थे. राज्य सरकार ने अलग-अलग जिलों में तैनात तीन अधिकारियों को लखनऊ जेल में तैनात किया. उनमें से एक मैं भी था. मैं सीतापुर जेल से आया था.'' 69 वर्षीय एस.के. अवस्थी यादों के गलियारे में जा पहुंचे हैं. उनकी आंखें भी उस मंजर से जुड़ गई हैं. लखनऊ में जहां कभी पुरानी जेल हुआ करती थी, वह जगह अब ईको गार्डन में तब्दील हो गई है. गार्डन की बगल में कैलाशपुरी इलाके के भुइयनदेवी मंदिर के ठीक सामने जो तिमंजिला मकान है, उसी में रहने वाले अवस्थी यह किस्सा सुना रहे हैं. नौ साल पहले वे जेलर के पद से रिटायर हुए. जेल महकमे में 37 साल की नौकरी के दौरान उनकी छवि दुर्दांत अपराधियों से पंगा लेने की रही. और फिर वे पहुंचते हैं मुख्तार अंसारी पर: ''अप्रैल, 2003 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का सत्र शुरू हुआ.

मऊ सदर से निर्दलीय विधायक मुख्तार अंसारी दिल्ली जेल में बंद था. सत्र में शामिल होने के लिए वह लखनऊ जेल शिफ्ट हुआ था. 23 अप्रैल, 2003 का वाकया बताता हूं आपको. कुछ लोग सुबह साढ़े दस बजे मुख्तार से मिलने लखनऊ जेल आ पहुंचे. मैं जेल में अपने दफ्तर में बैठा था. मुख्तार वहीं आ गया और मुलाकातियों को बिना तलाशी भीतर करने को कहा.'' अवस्थी बाहर निकले तो देखा कि मुख्तार के मुलाकाती जेल के मुख्य गेट के भीतर थे. उन्होंने सुरक्षाकर्मियों को सभी की सघन तलाशी लेने का आदेश दिया. अवस्थी के ही शब्दों में, ''मुख्तार तो बौखला गया. अपने एक मुलाकाती से रिवॉल्वर लेकर मेरे ऊपर तान दी और गरियाते हुए बोला, 'तुम जेल से बाहर आओ जरा, तुम्हारा काम तमाम करता हूं.'' मौके पर मौजूद जेलकर्मियों ने बीच-बचाव कर मुख्तार को उसकी बैरक में वापस भेजा. अवस्थी ने दफ्तर पहुंचकर ऊपर के अफसरों को घटना के बारे में बताया. ''मैं मुख्तार के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने पर अड़ा था जबकि कई अधिकारी ऐसा न करने का दबाव डाल रहे थे,'' लंबी सांसें छोड़ते हुए अवस्थी बताते हैं. आखिरकार अगले दिन वे लखनऊ के आलमबाग थाने में मुख्तार के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने में कामयाब रहे. दो महीने बाद जून, 2003 में मजिस्ट्रेट ने भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 353, 504, 506 के तहत अपराध के लिए मुख्तार पर आरोप तय किए.

उसके बाद यह पूरा मामला जैसे अपराध दंड व्यवस्था की सुस्ती का गवाह बन गया. समय बीता और 2007 में अवस्थी मुख्तार के गृह जिले गाजीपुर की जेल में तैनात हुए. उसी जेल में बंद मुख्तार को उनके पहुंचने से पहले ही आगरा जेल में शिफ्ट कर दिया गया. अवस्थी ने देखा कि जेल के भीतर मुख्तार के लिए बैडमिंटन कोर्ट बनवाया गया था, जहां जिले के अधिकारी उसके साथ खेलने आते थे. अवस्थी ने जेल के भीतर मुख्तार की मौज-मस्ती की एक विस्तृत रिपोर्ट सरकार को भेजी. गाजीपुर से इटावा स्थानांतरित होकर वहीं से वे 30 जून, 2013 को रिटायर हो गए. मुख्तार ने न्याय प्रणाली की खामियों का पूरा फायदा उठाते हुए 30 जनवरी, 2014 को लखनऊ अपर जिला न्यायाधीश (एडीजे) कोर्ट में अर्जी देकर जेलर अवस्थी से दोबारा जिरह कराने की मांग की. उन्हें बुलाया गया. 25 फरवरी 2014 को 'क्रॉस एग्जामिनेशन' हुआ. सेवानिवृत्ति के करीब आठ महीने गुजरने के बाद अवस्थी 10 साल पहले के मूल बयान पर कायम न रह सके. 23 दिसंबर, 2020 को एडीजे कोर्ट ने मुख्तार को बरी कर दिया. इससे उत्तर प्रदेश सरकार की बड़ी किरकिरी हुई.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गृह विभाग को एडीजे कोर्ट के निर्णय के खिलाफ हाइकोर्ट में अपील करने और उन कारणों की पड़ताल करने के निर्देश दिए, जिनकी वजह से मुख्तार के खिलाफ सरकार का पक्ष कमजोर पड़ा. 27 अप्रैल, 2022 को इलाहाबाद हाइकोर्ट में एडीजे कोर्ट के निर्णय के खिलाफ अपील दायर की गई. इस दौरान अभियोजन विभाग ने अंदरूनी जांच शुरू की तो पता चला कि मुख्तार मामले की निगरानी करने वाले अपर जिला शासकीय अधिवक्ता (एडीजीसी) मुनेश यादव ने न केवल सरकार को सही जानकारियां नहीं दीं, बल्कि ''एक्विटल रिपोर्ट'' में उन्होंने यह भी लिखा कि मुख्तार के खिलाफ जेलर को धमकी देने वाला मामला हाइकोर्ट में अपील योग्य है ही नहीं. न्याय विभाग ने मुनेश को हटा दिया. अब नए और काबिल वकीलों की एक टीम हाइकोर्ट में सरकार की तरफ से मुख्तार के खिलाफ कोर्ट में उतरी. छह महीने बाद 21 सितंबर को इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ ने जेलर को धमकाने के मामले में मुख्तार को दोषी करार देते हुए उसे सात साल की जेल की सजा सुनाई और उस पर 37,000 रु. का जुर्माना लगाया. उसे किसी आपराधिक मामले में मिलने वाली यह पहली सजा थी. हाइकोर्ट ने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की उन टिप्पणियों का जिक्र किया, जिनमें वह स्पष्ट कर चुका है कि गवाहों के मुकरने का यह आशय नहीं कि उनके पूरे बयान को ही खारिज कर दिया जाए, बल्कि ''होस्टाइल'' होने से पूर्व उसने अभियोजन कथानक का समर्थन किया है तो उसका महत्व है.

सख्त हुआ न्यायालय

इसी साल विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से दोबारा सरकार बनाने के बाद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने पुलिस और न्याय विभाग को मुख्तार के मामले में पैरवी तेज करने के आदेश दिए थे. उसका असर अब दिखने लगा है. मऊ जिले के सराय लखंसी थाने में मुख्तार और चार अन्य के खिलाफ दर्ज एफआइआर में विधायक निधि के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया था. इस मामले में अभियोजन विभाग की पैरवी के बाद मुख्तार को 14 जून को इलाहाबाद हाइकोर्ट से तगड़ा झटका लगा. न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी की पीठ ने मुख्तार की जमानत अर्जी खारिज करते हुए उसे कानून व्यवस्था के लिए चुनौती करार दिया. कोर्ट ने कहा, ''याची की पहचान बताने की जरूरत नहीं. उसे भारत के हिंदी भाषी राज्यों में कथित तौर पर 'रॉबिन हुड' की छवि के तौर जाना जाता है. वह हार्डकोर और आदतन अपराधी है, जो 1986 से अपराध में है.

यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि 1986 से अपराध की दुनिया से जुड़ा एक व्यक्ति जिस पर विभिन्न प्रकार के 50 से अधिक आपराधिक मामले हैं, लेकिन उसने अपने बचाव के लिए ऐसा प्रबंध कर रखा है कि उसके खिलाफ एक भी दोष सिद्ध नहीं हुआ.'' यह पहली बार था कि कोर्ट ने मुख्तार के बारे में इतनी तल्ख टिप्पणी की थी. जेलर को धमकाने के मामले में मुख्तार को सजा सुनाने के दौरान हाइकोर्ट ने इस टिप्पणी का भी संज्ञान लिया था. इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ ने गैंगस्टर ऐक्ट में मुख्तार को पांच साल कैद-ए-बामशक्कत और 50,000 जुर्माने की सजा सुनाई. मुख्तार और उसके गैंग के खिलाफ 1999 में लखनऊ के हजरतगंज थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था. 23 दिसंबर, 2020 को ट्रायल कोर्ट ने जेलर को धमकाने वाले मामले के साथ इस केस में भी मुख्तार को बरी कर दिया था. इलाहाबाद हाइकोर्ट में फौजदारी के वकील अभिषेक मिश्र कहते हैं, ''जिस तरह से योगी सरकार ने मुख्तार और अन्य अपराधियों के खिलाफ कोर्ट में सक्षम पैरवी करके सजा दिलवाई है, वह अभूतपूर्व है. सजा मिलने से न केवल अपराधियों में कानून का भय बढ़ेगा, बल्कि जनता में कानून के प्रति विश्वास भी पैदा होगा.''

पैरवी ने किया कमाल

योगी आदित्यनाथ की 2017 में सरकार बनने के बाद 62 माफियाओं को चिह्नित कर उनके खिलाफ अभियान चलाया गया. इन अपराधियों में 50 की गृह विभाग से और 12 की पुलिस मुख्यालय से निगरानी कर इन पर हो रही कार्रवाई की जांच की जाती है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. अपर पुलिस महानिदेशक, कानून और व्यवस्था, प्रशांत कुमार बताते हैं, ''केवल अपराधी के खिलाफ ही नहीं, बल्कि उसके पूरे गैंग और उनके आर्थिक तंत्र के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है. इससे माफियाओं का मनोबल टूटा है.'' 

मुख्यमंत्री ने यूपी के अभियोजन विभाग को हाइटेक बनाया है. अपराधि‍यों के खिलाफ कोर्ट में प्रभावी पैरवी में तेजी लाने के लिए अभियोजन अधिकारियों को टैबलेट दिए गए हैं. यूपी पहला प्रदेश है जहां अभियोजन विभाग का पूरा काम 'पेपरलेस' हो गया है. अपर पुलिस महानिदेशक अभियोजन आशुतोष पांडेय बताते हैं, ''मुख्तार समेत अन्य चिह्नित अपराधियों के खि‍लाफ कोर्ट में प्रभावी पैरवी के लिए योजनाबद्ध तरीके से हर हफ्ते वेबि‍नार से मीटिंग की जा रही है, अपराधि‍यों पर कौन-कौन से मुकदमे हैं, किन मुकदमों का ट्रायल चल रहा है, कोर्ट में क्यों तारीख बढ़ रही है, गवाहों के सामने क्या दिक्कतें है, ऐसे कई बिंदुओं का चार्ट बनाकर अध्ययन किया गया. हर हफ्ते चार्ट को अपडेट किया जा रहा है. कोर्ट में हर तारीख पर क्या हुआ, इसकी पूरी जानकारी भी दर्ज की जा रही है.'' पहली बार अभियोजन और न्याय विभाग में सामंजस्य भी बनाया गया है. यह पक्का किया गया कि कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजन अधिकारी भी सरकारी वकील के साथ मौजूद रहें. पहली बार कोर्ट में वरिष्ठ अधिकारियों की गवाही के लिए विशेष प्रबंध किए गए हैं.

पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन 1990 में गाजीपुर के जिलाधिकारी थे. मुख्तार पर उनके फर्जी हस्ताक्षर से शस्त्र लाइसेंस लेने का आरोप है. रंजन का गाजीपुर की भ्रष्टाचार निवारण कोर्ट में 7 जुलाई को बयान कराया गया. इसी तरह पूर्व मुख्य सचिव और अभी उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के चेयरमैन आर.के. तिवारी 1999 में आगरा के जिलाधिकारी थे. तब उन्होंने जेल में मुख्तार की बैरक से मोबाइल बरामद किया था. इस मामले में भी सितंबर में तिवारी की गवाही कराई गई. आशुतोष पांडेय बताते हैं, ''गवाही के लिए वरिष्ठ अधि‍कारियों को सम्मान के साथ कोर्ट में लाकर वापस गंतव्य तक पहुंचाने के लिए अभियोजन विभाग के संयुक्त निदेशकों को बाकायदा जिम्मेदारी सौंपी गई है.''
 
घिर गया पूरा परिवार

बांदा जेल में बंद मुख्तार अंसारी और उसका परिवार जांच एजेंसियों के निशाने पर है. पिछले अगस्त में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम ने मुख्तार और उसके संबंधियों के 12 ठिकानों पर छापे मारे. दिल्ली में मुख्तार के भाई सांसद अफजाल अंसारी के आवास, लखनऊ में मुख्तार के साले के आवास समेत चार जगहों और गाजीपुर में मुख्तार के घर और पांच जगहों पर गहन तलाशी ली गई. इस छापेमारी में ईडी को मुख्तार की कंपनी ''विकास कन्स्ट्रक्शन'' के नाम से फर्जीवाड़ा करने की जानकारी मिली थी. कंपनी में 60 प्रतिशत शेयर मुख्तार की पत्नी अफ्सा अंसारी और 40 प्रतिशत उसके साले सरजील रजा उर्फ आतिफ और अनवर के नाम थे. मुख्तार के लोगों ने मऊ जिले में सरकारी जमीन पर कब्जा करके उस पर विकास कन्स्ट्रक्शन के नाम से एक बिल्डिंग बना ली थी और उसी को भारतीय खाद्य निगम को किराए पर दे दिया गया था. यानी सरकारी जमीन पर अवैध बिल्डिंग और सरकार से ही अब तक करीब 15 करोड़ रुपए का किराया वसूला जा चुका था. विकास कन्स्ट्रक्शन ने फर्जीवाड़ा करके जालौन में भी सर्कल रेट से काफी कम पर प्रॉपर्टी खरीदी, जिसमें कई बिल्डरों ने निवेश किया था. ईडी को जांच में पता चला कि कंपनी से लाभांश न केवल शेयर होल्डरों को गया, बल्कि विधायक अब्बास समेत औरों ने भी मोटी रकम पर हाथ साफ किया.

मुख्तार के ससुर जमशेद रजा की कंपनी आगाज इंटरप्राइजेज और विकास कन्स्ट्रक्शन के बीच लाखों का लेनदेन हुआ. दोनों कंपनियों पर फर्जीवाड़े से कमाई का आरोप है. आगाज इंटरप्राइजेज से भी लाखों रुपए मऊ के विधायक अब्बास अंसारी के खाते में ट्रांसफर करने का प्रमाण ईडी के पास है. मऊ और गाजीपुर में अब्बास के नाम लगभग 10 बैंक खाते बताए जाते हैं. कंपनी का खाता अलग है. मुख्तार के खिलाफ दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग केस में ईडी ने प्रयागराज में अब्बास अंसारी से एक-एक ट्रांजैक्शन को लेकर 10 घंटे तक पूछताछ की लेकिन उसने किसी भी सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दिया. बस कुछ मोटे लेनदेन के बारे में उसे याद था. बाद में 5 नवंबर को ईडी ने अब्बास को गिरफ्तार कर लिया. पहली बार मुख्तार के परिवार का कोई सदस्य गिरफ्तार हुआ. मुख्तार के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज करने के बाद ईडी ने उसकी पत्नी अफ्सा, बेटे अब्बास, दोनों साले और दोनों भाइयों सिबगतुल्लाह और अफजाल को समन भेजकर बयान के लिए बुलाया था. मुख्तार के भाइयों का बयान हो चुका है. मुख्तार के साले आतिफ को भी ईडी ने गिरफ्तार कर लिया है. लेकिन अभी तक मुख्तार की पत्नी अफ्सा ईडी के शिकंजे में नहीं आ सकी हैं. ईडी की ओर से अब कानूनी कार्रवाई तेज होने वाली है क्योंकि मनी लॉन्ड्रिंग के मुकदमे में सबसे ज्यादा फर्जीवाड़े का आरोप अफ्सा पर ही है.

सीधे रीढ़ पर चोट

योगी सरकार अपराधियों की संपत्ति कुर्क कर उनके आर्थिक तंत्र को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रही है. गाजीपुर की मोहम्मदाबाद कोतवाली पुलिस ने 17 अक्तूबर को पुलिस अधीक्षक रोहन पी. बोत्रे को आख्या रिपोर्ट दी थी. इस रिपोर्ट में मुख्तार के बड़े भाई और गाजीपुर से सांसद अफजाल की पत्नी के नाम लखनऊ में मौजूद एक संपत्ति को अपराध से हासिल बताया गया था. इस रिपोर्ट पर पुलिस अधीक्षक की सिफारिश पर गाजीपुर की जिलाधिकारी आर्यका अखौरी ने 23 अक्तूबर को कुर्की का आदेश दिया. चार दिन बाद 27 अक्तूबर को लखनऊ के जिलाधिकारी ने भी कुर्की का आदेश जारी कर दिया. इस पर कार्रवाई करते हुए लखनऊ पुलिस ने डालीबाग मुहल्ले के तिलक मार्ग, राममोहन राय, वार्ड 15 में बटलरगंज एक्सटेंशन बंधा स्थित सांसद की पत्नी फरहत अंसारी के नाम से दर्ज जमीन पर बने भवन को कुर्क कर लिया. बाजार में इसकी कीमत 12.50 करोड़ रुपए आंकी गई है.

इससे पहले नवंबर 2020 में गाजीपुर में अफ्सा के महुआबाग स्थित होटल गजल के अवैध निर्माण को गिराकर योगी सरकार ने माफियाओं के अर्थतंत्र को कमजोर करने का प्रयास शुरू किया था. अब तक मुख्तार और उसके संबंधियों की 500 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति कुर्क की जा चुकी है. योगी सरकार की इस कार्रवाई से मुख्तार के करीबियों में खलबली मची हुई है. अपराधि‍यों के अवैध कब्जे से जमीन मुक्त कराने के लिए सरकार ने एक खास रणनीति बनाई है. योगी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम-1986 या गैंगेस्टर ऐक्ट में संशोधन किया था. हाइकोर्ट में फौजदारी वकील शैलेंद्र प्रताप बताते हैं, ''गैंगस्टर ऐक्ट में पहले भी संपत्ति जब्त करने का प्रावधान था पर वह वैकल्पिक होता था. मामले की प्रकृति के आधार पर निर्णय लिया जाता था. संशोधन के बाद इसके तहत अपराधी की संपत्ति‍ जब्त करने के जिलाधिकारी के अधिकार में भी इजाफा किया गया है. अब जिलाधिकारी के पास यह अधिकार है कि एक ही अपराध करने पर आरोपी पर गैंगस्टर ऐक्ट की कार्रवाई की जा सकती है. पहले इसके लिए आरोपी पर कम से कम दो मुकदमे दर्ज होना अनिवार्य था.'' पहले कार्रवाई उसी पर होती थी जिसका नाम गैंग चार्ट में दर्ज होता था. जांच के दौरान विवेचक नाम नहीं बढ़ा सकता था. नई नियमावली में अपराध में लिप्त पाए जाने या अपराधी का सहयोग करने का सबूत मिलने पर जिलाधिकारी की अनुमति से किसी का भी नाम बढ़ाया जा सकता है.

जेल में खौफ

जेलर को धमकी देने के मामले में सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट में सरकार की ओर से पेश वकीलों का तर्क था कि मुख्तार प्रदेश में सबसे बड़ा बाहुबली है. उसके नाम से आम आदमी के अलावा सरकारी लोग भी भय खाते हैं. जेलर एस.के. अवस्थी से पहले रहे जेलर आर.के. तिवारी की हत्या भी कथित रूप से इसी वजह से हुई थी क्योंकि वहां जेल में मुख्तार को रोक-टोक पसंद नहीं थी. और जेल में मुख्तार का खौफ अभी भी कोई कम थोड़े ही हुआ है. पिछले साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मुख्तार को पंजाब की रोपड़ जेल से लाकर बांदा मंडल कारागार में बंद किया गया था. उसके आने के बाद से बांदा जेल हाइ सिक्योरिटी जेलों में शुमार हो गई. 16 मई, 2021 को उन्नाव के जेल अधीक्षक ए.के. सिंह का बांदा ट्रांसफर हुआ. वे 17 अक्तूबर को मेडिकल लीव पर चले गए, फिर लौटकर नहीं आए. उसके बाद 12 नवंबर, 2021 को बरेली से विजय विक्रम सिंह का तबादला बांदा जेल किया गया. उन्होंने जॉइन ही नहीं किया और 29 नवंबर को उन्हें सस्पेंड कर दिया गया. उसके बाद से बांदा जेल की व्यवस्था प्रभारी जेल अधी‍क्षक के हवाले है. यूपी के कारागार मंत्री धर्मवीर प्रजापति बताते हैं, ''इस मामले को मैंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने रखा है. उम्मीद है कि जल्द ही इसमें कोई निर्णय हो जाएगा.''

पंजाब की रोपड़ जेल में मुख्तार की कथित खातिरदारी पर सियासी तापमान बढ़ गया है. भगवंत मान सरकार की जांच में यह बात सामने आई है कि पूर्व में कांग्रेस की अमरिंदर सिंह सरकार ने पंजाब की जेल में बंद मुख्तार को वीआइपी ट्रीटमेंट दिया था. मान सरकार की जांच के मुताबिक, सरकार ने उसका केस लड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकील को हायर किया. वकील को हर सुनवाई के एवज में 11 लाख रुपए फीस के तौर पर दिए. इस तरह पंजाब की कांग्रेस सरकार ने 55 लाख रुपए एक अपराधी की सुनवाई के लिए खर्च कर दिए. मान सरकार ने मुख्तार के वकील के बिलों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है, जिसके बाद अब पेच फंसा हुआ है. यूपी की जेल में भी मुख्तार के मददगार कम नहीं हैं. जून में बांदा जिला प्रशासन ने मंडल जेल कारागार में छापेमारी की थी. उस दौरान कई जेल कर्मचारी मुख्तार की आवभगत मं  लगे मिले. बांदा के तत्कालीन जिलाधिकारी अनुराग पटेल और पुलिस अधीक्षक अभिनंदन की संयुक्त जांच रिपोर्ट पर डिप्टी जेलर वीरेश्वर प्रताप सिंह और चार बंदी रक्षक निलंबित कर दिए गए थे.

गौरवशाली विरासत पर गहरा दाग

विडंबना देखिए कि मुख्तार अंसारी का नाम अपराध की दुनिया में कुख्यात है, लेकिन उसके परिवार का इतिहास उतना ही गौरवशाली रहा है. उसके दादा डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान 1926-27 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे. दिल्ली में एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया है. मुख्तार के पिता सुब्हानुल्लाह अंसारी एक कम्युनिस्ट नेता थे. इतना ही नहीं, पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में मुख्तार के चाचा लगते हैं. 30 जून, 1963 को जन्मा मुख्तार अपने तीन भाइयों में सबसे छोटा है. उसके सबसे बड़े भाई सिबगतुल्ला अंसारी और फिर अफजाल अंसारी हैं. मुख्तार की शुरुआती पढ़ाई गाजीपुर में युसूफपुर के गवर्नमेंट इंटरमीडिएट कॉलेज में हुई. इसके बाद उसने गाजीपुर गवर्नमेंट पीजी कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल की. इसी कॉलेज के पूर्व छात्र और आजमगढ़ में वकालत करने वाले अजीजुल हलीम कहते हैं, ''कॉलेज के समय से ही मुख्तार की पहचान एक अच्छे निशानेबाज के रूप में होती थी. वह गुलेल से बढ़िया निशाना लगाता था.

मुख्तार ने कॉलेज की ओर से कई क्रिकेट टूर्नामेंट भी खेले.'' उस दौर में पूर्वांचल में एक साथ कई विकास योजनाएं शुरू होने पर मुख्तार अपराध की दुनिया में सक्रिय हो गया. इन योजनाओं के ठेके लेने के लिए अलग-अलग गिरोह भी सामने आए. उस समय के दो गिरोह पूर्वी यूपी में प्रमुख थे. एक तरफ मकनू सिंह गैंग और दूसरी तरफ साहिब सिंह गैंग. मुख्तार मकनू सिंह गैंग का मुख्य गुर्गा था और वाराणसी का बृजेश सिंह साहिब सिंह गिरोह का मुख्य गुर्गा हुआ करता था. बाद में मुख्तार और बृजेश दोनों ने अपना अलग गिरोह बना लिया और रेलवे और बिजली विभाग के टेंडर को हथियाने की दौड़ में शामिल हो गए. '80 के दशक में मऊ में तैनात रहे सब-इंस्पेक्टर प्रदीप सिंह 2003 में डिप्टी एसपी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. वे बताते हैं, ''1985 में एक प्लॉट पर कब्जे को लेकर मकनू सिंह और साहिब सिंह गिरोह आमने-सामने आ गए. वहीं से पूर्वांचल में मुख्तार और बृजेश सिंह के बीच आपराधिक वर्चस्व की जंग शुरू हुई थी.''

जहां तक मुख्तार के पुलिस रिकॉर्ड की बात है तो उसके खिलाफ पहला आपराधिक मामला 1988 में गाजीपुर सदर कोतवाली में ठेकेदार सच्चिदानंद राय की हत्या का दर्ज किया गया था. प्रदीप सिंह बताते हैं, ''राय की हत्या के बाद पूर्वी यूपी में मुख्तार की पहचान एक अपराधी के रूप में हो गई. मुख्तार ने हर जिले में गुर्गे तैयार करने शुरू कर दिए, जिन्हें सरकारी ठेकों में हिस्सेदारी मिलती थी.'' मुख्तार ने जेल से अपराध करने का तंत्र विकसित किया, जिसने उसके खौफ में और इजाफा किया. पूर्व डीजीपी बृजलाल उसकी कार्यशैली की परतें खोलते हैं, ''मुख्तार बेहद शातिर दिमाग अपराधी है. आम तौर पर वह खुद कोई अपराध नहीं करता, बल्कि करीबी लोगों के हाथों अंजाम दिलाता है. गवाहों को मारकर, खरीदकर या डराकर वह पक्ष में माहौल बनाता है. नवंबर, 2005 में पूर्व भाजपा विधायक कृष्णानंद राय हत्याकांड और जेल अधीक्षक आर. के. तिवारी हत्याकांड के दौरान मुख्तार जेल में बंद था.''

सियासत को बनाया सुरक्षा की ढाल

दूसरे कई गैंगस्टरों की तरह मुख्तार ने भी अपनी सुरक्षा के लिए सियासत को ढाल बनाया. पूर्वी यूपी में जमीन और तालाबों के अवैध कब्जे के खिलाफ लड़ रहे मऊ के सामाजिक कार्यकर्ता छोटेलाल गांधी के शब्दों में, ''अपनी आपराधिक करतूतों को कवच देने के लिए मुख्तार ने 1995 से मऊ विधानसभा सीट पर राजनैतिक सक्रियता बढ़ाई थी. इस सीट पर 30 फीसद से ज्यादा मतदाता मुसलमान हैं, जिनका समर्थन मुख्तार को था.'' 1996 में इसी सीट से मुख्तार ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. उसके बाद वह इस सीट से लगातार पांच बार विधायक बना. 

गौरतलब है कि 1996 में पहला चुनाव जीतते ही मुख्तार बसपा से अलग हो गया. 2002 और 2007 में वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर विधायक बना. उसने मऊ और गाजीपुर में रॉबिनहुड की तरह अपनी छवि बनाई, जो बड़े सरकारी ठेकों में वर्चस्व स्थापित कर गरीबों की मदद करता था. इस रणनीति से मुख्तार के समर्थकों की संख्या बढ़ती चली गई. 2002 के विधानसभा चुनाव में मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी पूर्वी यूपी के तत्कालीन प्रमुख भाजपा नेता कृष्णानंद राय से मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट से हार गए थे. इसमें राय को माफिया बृजेश सिंह का भी साथ मिला. इस चुनाव के बाद गाजीपुर और मऊ में हिंदू-मुसलमान वोटों का ध्रुवीकरण होने लगा. 2005 में जब मऊ में दंगे हुए थे तब मुख्तार खुली जीप में घूम रहा था. अक्तूबर 2005 में मुख्तार को दंगा करने के आरोप में जेल जाना पड़ा था.

तब से वह जेल में है. 2008 में वह फिर बसपा में आ मिला. 2009 के लोकसभा चुनावों की तैयारी कर रहीं तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने मुख्तार को ''गरीबों का मसीहा'' बताया और दावा किया कि उसे आपराधिक मामलों में झूठा फंसाया गया है. 2009 के लोकसभा चुनाव में मुख्तार जेल में रहते हुए वाराणसी सीट से उम्मीदवार बना लेकिन भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से हार गया. 2010 में मायावती ने मुख्तार के आपराधिक मामलों में लिप्त होने की बात स्वीकारी और उसे पार्टी से निकाल दिया. उसके बाद मुख्तार ने अपने भाइयों के साथ मिलकर कौमी एकता दल नाम से नई पार्टी बनाई. इसी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर 2012 में वह मऊ का विधायक बना. 2014 में उसने वाराणसी संसदीय सीट से नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ने का ऐलान किया पर बाद में यह दलील देकर पीछे हट गया कि इससे सांप्रदायिक आधार पर वोटों का विभाजन हो जाएगा.

मुख्तार को 2016 में जब सपा में शामिल करने की बात आई तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसका कड़ा विरोध किया. तमाम कोशिशों के बाद भी अखिलेश उसे सपा में शामिल करने को राजी नहीं हुए. उसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्तार के भाई अफजाल ने अपनी पार्टी कौमी एकता दल का बसपा में विलय कर दिया. 2019 के लोकसभा चुनाव में अफजाल गाजीपुर से बसपा के टिकट पर सांसद बने. हालांकि अब अंसारी परिवार का बसपा से मोहभंग हो चुका है.

मऊ और गाजीपुर के साथ ही पूर्वांचल की राजनीति पर बड़ा असर डालने वाले अंसारी परिवार की दूसरी पीढ़ी भी सियासत में सक्रिय हो चुकी है. 2022 के विधानसभा चुनाव में सिबगतुल्ला अंसारी के बेटे मन्नू अंसारी मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर विधायक चुने गए तो मुख्तार की सीट मऊ सदर से उसके बड़े बेटे अब्बास ने ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) से चुनाव जीतकर अंसारी परिवार की जनता पर पकड़ का एहसास करवाया है. लेकिन विधायक अब्बास के ईडी के शिकंजे में आते ही सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजभर के भी सुर बदल गए हैं. वे कहते हैं, ''अब्बास अंसारी हमारे विधायक नहीं हैं. दरअसल, वे अखिलेश यादव की पार्टी के हैं. केवल कानूनी तौर पर सुभासपा का चुनाव चिन्ह लेने के कारण ही वे हमारी पार्टी के विधायक कहला रहे हैं. अब्बास सपा का ही झंडा लगाकर घूमते थे.'' अब देखना है कि अंसारी परिवार की नई पीढ़ी अपने ऊपर लगे आरोपों से बचकर पुरखों के गौरवशाली इतिहास को वापस लाती है या वह भी अपराध की उसी अंधी गली में जा फंसती है?ठ्ठ

माफिया पर कसी नकेल

अवनीश अवस्थी: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सलाहकार और यूपी के पूर्व अपर मुख्य सचिव (गृह). मुख्यमंत्री योगी के निर्देश पर मुख्तार के खि‍लाफ अभियान की रूपरेखा बनाकर उसकी शुरुआत की

संजय प्रसाद: मुख्यमंत्री कार्यालय के प्रमुख सचिव के साथ गृह विभाग का भी जिम्मा. यूपी के 50 चिन्हित अपराधि‍यों पर कार्रवाई की निरंतर निगरानी के साथ गृह और कानून विभाग के साथ समन्वय

आनंद कुमार:  डीजी जेल के रूप में यूपी की जेलों में बदलाव के जनक. जेल में बंद मुख्तार और दूसरे दुर्दांत अपराधियों की वीडियो वाल के जरिए प्रभावी निगरानी का तंत्र विकसित किया

प्रशांत कुमार: यूपी के एडीजी कानून और व्यवस्था. मुख्तार समेत 12 दुर्दांत अपराधि‍यों और अन्य माफि‍याओं के खिलाफ पुलिस के सख्त अभियान और निरंतर निगरानी का तंत्र विकसित किया

आशुतोष पांडेय: एडीजी अभि‍योजन के रूप में अपराधि‍यों के खिलाफ प्रभावी पैरवी करके कोर्ट से सजा दिलाने के मामले में यूपी को देश भर में पहचान दिलाई. पहली बार अभि‍योजन विभाग पेपरलेस हुआ

अमिताभ यश: एडीजी, एसटीएफ के रूप में मुख्तार के गुर्गों की धरपकड़ का अभियान चलाया. अत्याधुनिक सर्विलांस तकनीक से लैस करके एसटीएफ को देश की सबसे सक्षम फोर्स बनाया

मुख्तार के अपराध का फुलप्रूफ तरीका

रॉबिन हुड छवि: पूर्वांचल के गाजीपुर और मऊ जिलों में मुख्तार की छवि रॉबिन हुड की है. गरीबों की हरसंभव मदद करके मुख्तार ने बेरोजगार युवाओं को अपने साथ जोड़ा जो उसके लिए मर-मिटने को तैयार 

शूटर की फौज: मुख्तार ने सीधे तौर पर अपराध करने से परहेज किया. शूटर की फौज तैयार की. उन्हें ठेकों में हिस्सेदार भी बनाया. उनकी मदद से डरा-धमकाकर या हत्याएं कराकर दहशत पैदा की

ठेकों पर कब्जा: मुख्तार ने पूर्वांचल के जिलों में अपने गुर्गों और शूटरों की मदद से सरकारी अधिकारियों और प्रतिद्वंद्वी ठेकेदारों को धमकाया और हत्याएं कराकर सरकारी ठेकों पर कब्जा जमाया

जमीन पर नजर: ग्राम समाज और नजूल की जमीन पर अवैध कब्जा किया. सरकारी नजूल की जमीन को हथियाकर अपने समर्थक बिल्डरों की मदद से हाउसिंग सोसायटी का निर्माण करवाया 

जेल से नेटवर्क: मुख्तार जिस जेल में बंद होता है उसके गुर्गे भी छोटे मुकदमों में जमानत कटाकर उसी जेल में बंद हो जाते. उन गुर्गों के बल पर जेल के भीतर रहकर नेटवर्क संचालित होता है 

बैरक को हाइजैक: दबंगई के बल पर जेल में बंद छोटे अपराधियों का समर्थन जुटाकर पूरी बैरक हाइजैक कर लेता है. छोटे अपराधियों के तंत्र का उपयोग अपहरण और हत्या के लिए करता है

रिश्वत का जाल: जेल के भीतर हथियार, मोबाइल जुटाने, गोपनीय सूचनाएं पहुंचाने के लिए मुख्तार और उसके गुर्गे भ्रष्ट जेल कर्मचारियों को मुंहमांगी रिश्वत देते हैं

विश्वसनीय कैदी: मुख्तार मोबाइल या हथियार को जेल में अपने विश्वसनीय कैदी के पास रखता है, ताकि पकड़े जाने पर बच सके. कई बार हथियार को जमीन में गाड़ कर भी रखता है

मुखबिर तंत्र: सभी महत्वपूर्ण कार्यालयों में मौजूद मुख्तार के मुखबिर अधिकारियों के मूवमेंट की जानकारी पहुंचाते हैं. सर्विलांस से बचने के लिए मुख्तार अपने गुर्गों से कोडवर्ड में बात करता है 

मेडिकल रिपोर्ट: किसी प्रकार के अंदेशे की सूचना पर कारागार में बंद मुख्तार जेल डॉक्टर या अन्य कार्यरत टीमों से गलत मेडिकल रिपोर्ट बनवाकर कोर्ट में पेशी से बच निकलता है

आरोप से बचाव: बड़े मुकदमे की पेशी से बचने के लिए मुख्तार छोटे मुकदमे की पेशी में दूसरे कोर्ट में हाजिर होता है. इस तरह कोर्ट में आरोप तय होने की प्रक्रिया (चार्ज फ्रेमिंग) से बच जाता है 

वकीलों से दबाव: कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्तार की तरफ से 12 से 15 वकीलों की एक टीम पैरवी के लिए मौजूद रहती है. इससे कोर्ट के भीतर दूसरे पक्ष पर काफी दबाव बनता है 

गवाह तोड़ना: कानूनी प्रक्रिया की खामियों का लाभ उठाकर मुख्तार कोर्ट में चल रहे मुकदमों को लंबित करवाता है और इस दौरान गवाहों को डरा-धमकाकर या दूसरे तरीकों से तोड़ने की कोशिश होती है

पूरे परिवार पर मुकदमे ही मुकदमे

मुख्तार अंसारी, 60 वर्ष

मुख्तार अंसारी गैंग का पंजीकरण नंबर इंटरस्टेट (आइएस)—191 और हिस्ट्रीशीट नंबर 16बी है. उस पर प्रदेश और उसके बाहर कुल 59 मुकदमे दर्ज हैं. मुख्तार अभी यूपी की बांदा जेल में बंद है

गाजीपुर जिले के सैदपुर, मुहम्मदाबाद, शहर कोतवाली, करंडा में हत्या, हत्या का प्रयास, धमकी देने, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका), आर्म्स ऐक्ट समेत कई मामलों में सबसे ज्यादा कुल 23 मुकदमे दर्ज हैं

मऊ जिले के शहर कोतवाली, दक्षि‍ण टोला, सरायलखंची थाने में गैंगस्टर ऐक्ट, हत्या, हत्या का प्रयास, बलवा जैसे मामलों में कुल 9 मुकदमे दर्ज हैं

लखनऊ के हजरतगंज, कृष्णानगर, आलमबाग, कैंट थाने में आर्म्स ऐक्ट, हत्या, हत्या का प्रयास, आपराधिक षड्यंत्र में शामिल होने समेत कई मामलों में कुल 8 मुकदमे दर्ज हैं

वाराणसी जिले के कैंट, बड़ागांव, चेतगंज, भेलूपुर थाने में हत्या, हत्या का प्रयास, बलवा समेत कई मामलों में कुल 8 मुकदमे दर्ज हैं

नई दिल्ली के तिलकमार्ग, के.जी. मार्ग, लोदी कॉलोनी थाने में अपहरण, जबरन वसूली, मकोका ऐक्ट, टाडा के तहत कुल 3 मुकदमे दर्ज हैं

आजमगढ़ के थाना तरवां में हत्या, हत्या का प्रयास, आपराधिक षड्यंत्र और गैंगस्टर ऐक्ट समेत कई मामलों में 2 मुकदमे दर्ज हैं

बाराबंकी जिले की शहर कोतवाली में बलवा, गैंगस्टर ऐक्ट, आपराधिक षड्यंत्र करने समेत कई मामलों में 2 मुकदमे दर्ज हैं

चंदौली जिले के मुगलसराय थाने में हत्या और हत्या के प्रयास का मुकदमा

सोनभद्र जिले के अनपरा थाने में हत्या के लिए अपहरण मामले में मुकदमा

आगरा के जगदीशपुर थाने में अपराध के लिए उकसाना, आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी समेत कई मामलों में मुकदमा

पंजाब के मोहाली में माठौर थाने में डराकर वसूली, आपराधिक धमकी का मुकदमा

अफ्सा अंसारी, 53 वर्ष

मुख्तार की पत्नी अफ्सा अंसारी पर गाजीपुर की शहर कोतवाली और थाना नंदगंज में कुल मिलाकर 6 मुकदमे दर्ज. इनमें गैंगस्टर ऐक्ट, सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम, आपराधिक षड्यंत्र, चोरी, आपराधिक अतिचार जैसे कई मामले शामिल. अफ्सा के भाई सरजील रजा और अनवर शहजाद पर गाजीपुर की शहर कोतवाली में गैंगस्टर ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज

अब्बास अंसारी, 30 वर्ष 

मुख्तार अंसारी का बड़ा बेटा और मऊ सदर विधानसभा सीट से विधायक. राष्ट्रीय स्तर का निशानेबाज. अब्बास पर मऊ की शहर कोतवाली और दक्षिण टोला थाने में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, महामारी ऐक्ट का उल्लंघन, धमकी, अवैध कब्जा, आपराधिक षड्यंत्र जैसे कई मामलों में 3 मुकदमे दर्ज हैं. लखनऊ के महानगर थाने में आर्म्स ऐक्ट, सार्वजनिक संपत्ति नुक्सान निवारण अधिनियम, दस्तावेजों में हेरफेर समेत कई मामलों में 2 मुकदमे दर्ज हैं. गाजीपुर की शहर कोतवाली में आपराधिक षड्यंत्र, फर्जी दस्तावेज से धोखाधड़ी जैसे मामलों में मुकदमा दर्ज है. विधानसभा चुनाव के दौरान अब्बास अंसारी पर मऊ में 'हेट स्पीच' मामले में मुकदमा दर्ज हुआ था. कोर्ट ने इस मामले में अब्बास को भगोड़ा घोषित किया था. 21 अक्तूबर को अब्बास ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया. इससे पहले 19 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने आर्म्स ऐक्ट में अब्बास को अंतरिम जमानत दी है

उमर अंसारी, 24 वर्ष 

मुख्तार अंसारी के छोटे बेटे उमर अंसारी पर लखनऊ के महानगर थाने में आर्म्स ऐक्ट, सार्वजनिक संपत्ति नुक्सान निवारण अधिनियम, आपराधिक षड्यंत्र, फर्जी दस्तावेज से धोखाधड़ी समेत कई मामलों में कुल 2 मुकदमे दर्ज हैं. मऊ जिले की शहर कोतवाली में चुनाव में अनुचित प्रभाव डालने, धमकी, लोक सेवक के कार्यों में बाधा डालने जैसे मामलों में 2 मुकदमे दर्ज हैं. गाजीपुर की शहर कोतवाली में आपराधिक षड्यंत्र, कूटरचना, फर्जी दस्तावेज से धोखाधड़ी जैसे मामले में मुकदमे दर्ज हैं

अफजाल अंसारी, 69 वर्ष

मुख्तार अंसारी के बड़े भाई और गाजीपुर से बसपा सांसद. गाजीपुर की शहर कोतवाली, नोनहरा, मुहम्मदाबाद, भावरकोल थाने में कुल 6 मुकदमे हैं. इनमें गैंगस्टर ऐक्ट, लोक प्रतिनिधि अधिनियम, हत्या, हत्या का प्रयास, आपराधिक षड्यंत्र जैसे कई मामले हैं. चंदौली जिले के चकरघट्टा थाने में भी अफजाल के खिलाफ लोक प्रतिनिधि‍ अधिनियम, महामारी ऐक्ट के उल्लंघन जैसे मामलों में मुकदमे दर्ज है

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