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आवरण कथाः क्रांति तो डिजिटल से ही होगी

जब सामान्य मीडिया सक्रियता थम गई थी, उद्यमियों और सृजनशील लोगों की एक नई पीढ़ी ने आगे बढ़कर कमान संभाल ली लेकिन डिजिटल ग्रोथ के अवसरों को विचारहीन नियम-कायदे बर्बाद कर सकते हैं

नया दौर, नई राहें 2021 नया दौर, नई राहें 2021

उदय शंकर

वर्ष 2020 अविस्मरणीय वर्ष था. जहां महामारी की यादें एक पीढ़ी को परेशान करेंगी, यह उन परिवर्तनों के लिए भी याद किया जाएगा जो हमारे जीवन में आए. यह एक ऐसा साल था जब बहुत कुछ 'थम गया' था और बहुत कुछ स्थायी रूप से बदल गया. यह लोग तय करते हैं कि वे क्या उपभोग करेंगे और मीडिया इसका कोई अपवाद नहीं है.

2020 में मीडिया और मनोरंजन ने एक द्विध्रुवीय व्यवस्था में प्रवेश किया. प्रौद्योगिकी, कल्पना और अधीरता से लैस, मीडिया उद्यमियों और दूरदर्शियों के एक समूह ने इसे बदलने की ठानी थी. मीडिया मालिकों और पेशेवरों का एक बहुत बड़ा समूह, पुरानी चीजों के साथ चिपका रहना चाहता है और लगभग कुछ भी नहीं बदलने के लिए दृढ़ है. मार्च में अचानक, सामान्य मीडिया गतिविधियां बंद हो गईं—थिएटर सबसे पहले बंद हुए. कंटेट प्रोडक्शन के लगभग सभी स्वरूप अचानक पूरी तरह ठप हो गए. विज्ञापन और व्यापक व्यवसाय बाधित हुआ.

यह एक अजीब द्वंद्व था—लोग घरों में थे और सामग्री की भूख में पहले से कहीं अधिक तड़प रहे थे, लेकिन अखबार छपने और घरों तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे थे; अधिकांश टीवी चैनल और उनके अधिकारी इस नई दुनिया में प्रासंगिक बने रहने के लिए कुछ नया खोजने को संघर्षरत थे. उनकी अब तक की जिंदगी एक ही लक्ष्य 'नए लॉन्च' में बीती थी. लेकिन अब कोई नया लॉन्च नहीं हो रहा था. पारंपरिक मीडिया में विचारों का संकट इस तरह कभी उजागर नहीं हुआ था.

यही वह समय था जब डिजिटल मीडिया और स्ट्रीमिंग सेवाएं सिनेमा स्क्रीन की जगह लेने को आगे आईं. तो, क्या हुआ? यह कैसे हुआ कि टीवी पर पुरानी सामग्री नहीं चली, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगभग विस्फोट सा हो गया? इसका उत्तर सरल है—उपभोक्ता केवल एक कहानी नहीं देखते हैं. यह समग्र अनुभव है, जो मायने रखता है—पहुंच की स्वतंत्रता, एक स्क्रीन से दूसरी स्क्रीन पर सहजता से स्थानांतरित होने की स्वतंत्रता, जितना देखना चाहें और जब चाहें तब देखने की स्वतंत्रता. मीडिया जो अब तक रचनाशीलता चालित उद्यम हुआ करता था, वह तकनीकी संचालित रचनाशील उद्यम में बदल गया. यह मौलिक परिवर्तन था और उपभोक्ताओं ने जल्द ही इसकी कीमत समझ ली.

वास्तव में, भारत में कोविड के पांव पसारने के बाद मीडिया उद्योग के सामने चुनौतियां अधिक से अधिक जटिल थीं. हॉटस्टार (अब डिज्नी+हॉटस्टार) को छोड़कर, भारतीय मीडिया उद्योग में न केवल प्रौद्योगिकी स्तर पर प्रतिस्पर्धा में कमी थी बल्कि अधिकांश भारतीय मीडिया मालिक और अधिकारी रचनाशीलता, अच्छी प्रतिभाओं, उत्पादन मूल्यों और कहानियों के रेंज में सुधार के लिए निवेश में दूरदृष्टि की कमी के मारे नजर आते थे. सोच यही थी ''जो परोसा जा रहा है वह बिक ही जा रहा है तो फिर सुधार क्यों करना?'' रचनात्मकता और कहानी कहने के पारंपरिक हुनर के बावजूद, हमारा कंटेट शायद ही कभी कक्षा में सर्वश्रेष्ठ होने के स्तर तक बढ़ा है. बेशक, मालिकान और अधिकारीगण कंटेट की दरिद्रता को अलग स्तर पर लेकर गए हैं—अखबार उद्योग में आम सहमति बनती दिख रही है कि वे विज्ञापन के व्यवसाय में हैं न कि कंटेट के. इसलिए, जहां उन्होंने विज्ञापन को आकर्षित करने के लिए अभिनव तरीके खोजे हैं, लगभग यह सब संपादकीय कंटेट की गुणवत्ता और अखंडता की कीमत पर आया है. अफसोस की बात यह है कि अखबारों के संपादक जैसे इस गिरावट के सहअपराधी बनने को तैयार बैठे थे.

इस पृष्ठभूमि में, कोविड-19 महामारी आई और हम सभी को चौंका दिया. जब नए कंटेट की आपूर्ति अचानक बंद हो गई और हाथ हर तरफ से तंग दिख रहे थे. महामारी ने तकनीकी नवाचार की आवश्यकताओं को उजागर किया और मनोरंजन के आर्थिक तंत्र में होने वाले परिवर्तनों को तेज किया. वे दिन लद गए जब उपभोक्ता एक क्रिकेट मैच या केवल एक अच्छी फिल्म के कवरेज से संतुष्ट हो जाते थे; वे अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप बेहतर अनुभव चाहते हैं और जो समय या स्थान की पारंपरिक सीमाओं के दायरे में बंधा नहीं हो. और उपभोक्ता इस बेहतर अनुभव के लिए भुगतान करने को तैयार हैं; यह परिवर्तन अपरिवर्तनीय है. इसके परिणामस्वरूप न केवल पारंपरिक मीडिया व्यवसायों के लिए बल्कि व्यापार के पारंपरिक तरीकों के लिए भी भारी चुनौतियां और अनिश्चितताएं हैं. जीतने के लिए जरूरत व्यापार के नए तरीके की होती है.

अपने अनुभव में मैंने आमतौर पर, पहले से मौजूद लोगों के लिए खुद को फिर से संयोजित करना मुश्किल पाया है. जब आप पहले से ही सफल हों तो खुद को बदलना अकल्पनीय और यहां तक कि अनावश्यक भी लग सकता है. भारत की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी में इस बदलाव का नेतृत्व करने के बाद, जब हम पूर्व के हॉटस्टार का निर्माण कर रहे थे तो मैंने देखा था कि यथा स्थिति को बदलना और भविष्य के लिए तैयार करना अविश्वसनीय रूप से कितना चुनौतीपूर्ण है. मीडिया और मनोरंजन उद्योग का भविष्य नई पीढ़ी के उद्यमी और रचनात्मक लोग लिखेंगे. कुछ अधिकारी नई दुनिया में विकसित और जीवित रहने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन बहुत से खतरनाक स्थिति में पहुंच गए हैं. जो लोग कंटेट में निवेश करके पूरी तरह से विकसित होना चाहते हैं, उन्हें उनसे चुनौती मिलेगी जो कंटेट और प्रौद्योगिकी दोनों में निवेश करने वाले हैं.

पारंपरिक मीडिया दफ्तर कंटेट और कमर्शियल दोनों क्षेत्रों के लोगों से भर गए हैं. हालांकि, भविष्य की किसी भी सफल मीडिया कंपनी को बराबर अनुपात में कंटेट, कमर्शियल और तकनीकी प्रतिभाओं की आवश्यकता होगी. उन्हें भविष्य के निर्माण के लिए आय के मौजूदा स्रोतों को बाधित करने के लिए तैयार रहना होगा. यह आसान नहीं है, लेकिन यही एकमात्र तरीका है. मीडिया के व्यापार मॉडल में, एक और मौलिक परिवर्तन हो रहा है—मीडिया और कंटेट के सभी रूप उपभोक्ता तक सीधे पहुंच रहे हैं और लोग भुगतान करने को तैयार हैं. लेकिन वे पैसे का भरपूर लाभ चाहते हैं. मीडिया व्यवसायों को कंटेट कंज्यूमर अनुभवों पर प्रतिस्पर्धा करनी होगी; न कि हॉकर्स और केबल ऑपरेटरों को प्रोत्साहन देने की अपनी क्षमता पर. डिज्नी+ हॉटस्टार के साथ भारत में हमारा अपना अनुभव इस बात का सबूत है कि अगर लोगों को अपने पैसे का मूल्य दिखता है तो वे भुगतान करने को तैयार रहते हैं. एक साल से भी कम समय में, डिज्नी+हॉटस्टार भारत में सबसे बड़ी डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर सेवा बन गई है.

दुर्भाग्य से, भारत में पारंपरिक मीडिया पर लगाम लगाने का कठिन कार्य, नियामक वातावरण ने और भी चुनौतीपूर्ण बना दिया है. ऐसे समय में जब उद्योग को तेजी से बढऩे और खुद को बदलने की जरूरत है, नियामक अपने नजरिये या यहां तक कि इस क्षेत्र के सामने आने वाले खतरों के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं. नियामकों की भूमिका इस क्षेत्र को उचित प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने, व्यावसायिक व्यवहार में पारदर्शिता लाने और बड़े सामाजिक हित की रक्षा करने के लिए महत्वपूर्ण है, नियामक मानसिकता में बदलाव आवश्यक है. टीवी के सामने कल्पनाशीलता और निवेश की कमी के रूप में गंभीर खतरा मंडरा रहा है, उतना ही बड़ा खतरा नियामक विचारहीनता से भी है. मेरी बड़ी चिंता यह है कि क्या डिजिटल मीडिया भी बहुत अधिक विचारहीन विनियमन के बोझ तले दबा संघर्ष कर सकता है.

प्रौद्योगिकी में परिवर्तन समाज की स्वाभाविक प्रगति है. हालांकि, समय आ गया है कि हर कोई विनियमन की प्रतिगामी भूमिका को देखे जो मीडिया उद्योग के विकास में बाधा बन रही है. कृत्रिम और अनुत्पादक अड़चनों को Mदूर करने के लिए इससे महत्वपूर्ण समय दूसरा नहीं होगा. एक नई नियामक व्यवस्था बनाने का समय अब आ चुका है!

भारत बड़े और वैश्विक मीडिया व्यवसाय बनाने के अभूतपूर्व अवसर पर खड़ा है. हमें मीडिया को ग्लैमर, प्रचार और रौब के व्यवसाय से इतर देखना है, रचनात्मकता और प्रौद्योगिकी के व्यवसाय की ओर बढ़ना है जो नौकरियों और धन का सृजन कर सकते हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक प्रमुख योगदानकर्ता बन सकते हैं. उसको लेकर राष्ट्रीय सहमति के बिना, हम इस रोमांचक बदलाव का लाभ नहीं उठा सकते जिससे वैश्विक मीडिया फिलहाल गुजर रहा है.
   
उदय शंकर फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) के अध्यक्ष हैं

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