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आवरण कथाः फिर घिर आए डरावने काले बादल

कोविड के ओमिक्रॉन वैरिएंट ने फिर से सेवा क्षेत्र से जुड़े ज्यादातर कारोबारों को ठप करने का खतरा पैदा कर दिया है. मौजूदा स्वास्थ्य संकट की व्यापकता पर ही निर्भर है कि अर्थव्यवस्था को कितनी चोट पहुंचेगी.

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मुश्किल में रिटेल दिल्ली में 8 जनवरी को बंद लाजपत नगर मार्केट का नजारा मुश्किल में रिटेल दिल्ली में 8 जनवरी को बंद लाजपत नगर मार्केट का नजारा

आवरण कथा । ओमिक्रॉन अर्थव्यवस्था

समूचे देश में तीसरी लहर का प्रकोप फैल चुका है और विपदा के संकेत साफ दिखने लगे हैं. भीड़-भाड़ को रोकने के लिए रात और सप्ताहांत के कर्फ्यू तथा दूसरी पाबंदियों के साथ यात्रा संबंधी प्रतिबंधों से होटल, बार, रेस्तरां, सिनेमा हॉल और खुदरा दुकानों पर गंभीर असर पड़ चुका है. वाहन निर्माता मांग में दूसरे सूखे की आशंका से ग्रस्त हैं तो खुदरा कारोबारियों को दुकान खोलने के समय संबंधी पाबंदियों से त्योहारों के मौसम में कमाई न होने की आशंका है.

नीति-निर्माताओं को चिंता है कि सप्लाई में अड़चनों से महंगाई बढ़ सकती है और उससे उपभोक्ता के खर्च करने की क्षमता में गिरावट आएगी. नतीजतन, अर्थव्यवस्था और रोजगार बाजार में गिरावट आएगी. हालात से हड़बड़ाए निवेशकों ने शेयर बाजारों में भारी बिकवाली शुरू कर दी, जिससे बार-बार बाजार गोता लगाने लगे.

6 जनवरी को ओमिक्रॉन की चिंताओं और अमेरिका में ब्याज दरों में तेजी की आशंकाओं से बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स करीब 700 अंक गिर गया. बहुतों को यही गम सता रहा है कि कोविड की वजह से अनिश्चिता का माहौल कहीं पिछले साल जैसे हालात न ला दे, जब सेंसेक्स में 14 विभिन्न मौकों पर करीब 1,000 अंक की गिरावट देखी गई और इससे निवेशकों को लाखों करोड़ रुपए का झटका लगा. 

आवरण कथाः फिर घिर आए डरावने काले बादल
आवरण कथाः फिर घिर आए डरावने काले बादल

वर्ष 2020 की शुरुआत में महामारी की पहली लहर ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चार दशकों में पहली बार मंदी के गर्त में झोंक दिया. लिहाजा, 2020-21 की पहली तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर शून्य से 23.9 फीसद तक नीचे चली गई और दूसरी तिमाही में शून्य से 7.5 फीसद नीचे रही.

2021 की शुरुआत में दूसरी लहर का असर उतना भीषण नहीं हुआ, क्योंकि ज्यादातर प्रतिबंध स्थानीय स्तर पर ही लगाए गए. इस बार अर्थव्यवस्था पर कितना बुरा असर पड़ेगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि ओमिक्रॉन वैरिएंट का प्रकोप किस पैमाने पर फैलता है और कितनी जल्दी वह चरम पर पहुंच जाता है.

शुरुआती संकेत ज्यादा उम्मीद नहीं बंधाते हैं. हालांकि अस्पताल में भर्ती होने के मामले अभी कम हैं, लेकिन वायरस तेजी से फैला तो अधिकारियों को ज्यादा कड़े प्रतिबंध लगाने होंगे, जिससे कारोबार को और नुक्सान होगा.

उद्योग जगत पहले ही अपनी सतर्क आवाज उठा चुका है. भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ) के अध्यक्ष तथा टाटा स्टील के सीईओ टी.वी. नरेंद्रन कहते हैं, ''हमें यह तय करने की दरकार है कि प्रकोप (वायरस के) को धीमा करने के लिए सिर्फ न्यूनतम पाबंदियां ही लगें, न कि हर किस्म की पाबंदियां लगाई जाएं.’’ 

पहली दो लहरों की बड़ी सीख यही है कि लॉकडाउन/पाबंदियां लगाने का फैसला राज्यों और स्थानीय अधिकारियों पर छोड़ दिया जाए, जिससे रोकथाम कारगर ढंग से होती है और जरूरी सेवाएं भी खुली रहती हैं. इससे कारोबार को फिर से जल्दी खड़ा होने में मदद मिली और 2021-22 की दूसरी तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि दर 8.4 फीसद रही (जो महामारी के पूर्व 2019-20 की इसी अवधि से हल्का-सा बेहतर रही).

इंजीनियरिंग फर्म फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन नौशाद फोर्ब्स कहते हैं, ''पिछले साल राज्यों ने लॉजिस्टिक्स पर रोक नहीं लगाई और ज्यादातर मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां खुली रहीं. इस बार भी हम राज्यों से ज्यादा संतुलित रवैए की उम्मीद करते हैं.’’

आवरण कथाः फिर घिर आए डरावने काले बादल
आवरण कथाः फिर घिर आए डरावने काले बादल

सेवाओं पर संकट
कोविड की पहले की दो लहरों की तरह सबसे अधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्र हॉस्पिटालिटी, ट्रैवल और टूरिज्म तथा खुदरा कारोबार है, जिनकी पिछले दो-तीन महीने में जो कुछ कमाई हुई, वह साफ हो गई है. बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस कहते हैं, ''सेवा क्षेत्र तीसरी बार बदनसीब रहा है.’’ 

ऑनलाइन खुदरा कारोबार में वृद्धि के बावजूद अभी भी कंपनियां दुकानों में बिक्री पर ही ज्यादा दांव लगाती हैं क्योंकि लोगों में दुकानों के भीतर सामान देखकर ज्यादा खरीदने की फितरत होती है. शादी-ब्याह के मौसम और साल के अंत में छुट्टियां मनाने के दौर से होटल मालिकों को काफी उम्मीद थी. पुणे में एक होटल मालिक कहते हैं, ''अब काफी अनिश्चित-सा माहौल है.

हमें कार्यक्रम रद्द करने के संदेश मिलने शुरू हो गए हैं, खासकर इसलिए कि शादियों में मेहमानों की संख्या 50 तक सीमित हो गई है.’’ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कोविड केस बढ़ने के साथ पर्यटन उद्योग में 70 फीसद गिरावट देखी गई है. गोवा में 25 फीसद गिरावट की आशंका है, जबकि केरल में फिर मायूसी सिर उठाने लगी है, जहां 25 फीसद कार्यबल पर्यटन क्षेत्र से ही जुड़ा है.

फेडरेशन ऑफ होटल ऐंड रेस्तरां एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफएचआरएआइ) का अनुमान कहता है कि क्रिसमस और नए साल के आयोजनों समेत शादियों और मीटिंगों के रद्द होने से इंडस्ट्री को 200 करोड़ रु. का झटका लगा है. एफएचआरएआइ के प्रदीप शेट्टी कहते हैं, ''इंडस्ट्री में काफी बेचैनी है क्योंकि लगातार दो लॉकडाउन के बाद कारोबार दोबारा खोलने और शुरू करने पर अच्छी खासी रकम खर्च की गई है.’’

सबनवीस कहते हैं, ''कारोबार लोगों को अनिश्चित माहौल में काम पर नहीं रखेंगे. उनके सामने सवाल होगा कि क्या हमें इस मौके पर किसी को लेना चाहिए?’’ पिछले कुछेक महीनों में कई कारोबार में बढ़त देखी गई है, लेकिन रोजगार सृजन अभी भी थमा हुआ है.

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) का अनुमान है कि भारत में महामारी के पहले की तुलना में अभी भी 30 लाख रोजगार कम हैं. 
इसके साथ ही ऊंची महंगाई कमर तोड़ रही है. विश्लेषकों के मुतबिक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) महंगाई दर दिसंबर में 6 फीसद तक होने का अनुमान है.

दो साल से मार झेल रहा विमानन क्षेत्र एक और झटके के लिए तैयार हो रहा है. इंडिगो एयरलाइंस का कहना है कि कंपनी उड़ानें 20 फीसद तक कम कर देगी और यात्रा तारीख बदलने वालों का शुल्क माफ होगा क्योंकि यात्री तारीखें बदल रहे हैं.

विमानन रिसर्च फर्म कापा का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय यात्राएं 2019-20 के मुकाबले 2021-22 में 70 फीसद कम बनी रहेंगी. फर्म का अनुमान है कि भारतीय एयरलाइन उद्योग को 3.8 अरब डॉलर (28,120 करोड़ रु.) का नुक्सान हो सकता है.

छोटी इकाइयों को बड़ा नुक्सान
दो लहरों में सबसे ज्यादा नुक्सान झेलने वाला एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम स्तर के उद्योग) क्षेत्र रहा है. देश के 6.34 करोड़ एमएसएमई में 45 फीसद उत्पादन, 40 फीसद निर्यात होता है और करीब 12 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है. महामारी और मांग में गिरावट के साथ एमएसएमई क्षेत्र को दुनिया भर में जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी से कच्चे माल की ऊंची कीमतों और ढुलाई के खर्च में इजाफे से भी नुक्सान झेलना पड़ा है.

तीसरी लहर उनमें से अनेक को गहरे गर्त में धकेल सकती है. उनके कार्यबल पर भी ज्यादा असर पड़ेगा, क्योंकि वे भीड़भाड़ भरी बस्तियों में रहते हैं. कारोबारियों की संस्था कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के मुताबिक, 2022 के पहले सप्ताह में राज्य सरकारों और स्थानीय अधिकारियों की तरफ से लगी पाबंदियों के चलते देश के 36 शहरों में एमएसएमई और ट्रेडर्स को कारोबार में औसतन 45 फीसद का नुक्सान झेलना पड़ा.

एफएमसीजी में 35 फीसद, इलेक्ट्रॉनिक्स में 45 फीसद, मोबाइल फोन की बिक्री में 50 फीसद और फुटवियर की बिक्री में 60 फीसद की कमी दर्ज की गई. शादियों के सीजन (अक्तूबर-मार्च) में बिजनेस अनुमानित 4 लाख करोड़ रु. से घटकर 1.25 लाख करोड़ रहने की आशंका है. हालांकि ये मसले सिर्फ छोटे उद्योगों तक ही सीमित नहीं हैं. 

गुड़गांव की ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली बड़ी कंपनी लूमैक्स इंडस्ट्रीज के सीएमडी दीपक जैन कहते हैं, ''वायरस का प्रकोप बढ़ने से इस बार बड़ी चुनौती भारी गैर-हाजिरी है. हमें यह दिखने लगा है.’’ वे कहते हैं, ''पिछले दो साल ने हमें जोखिम से निपटने का तरीका बनाने की समझ दे दी है.’’ 

आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों ने तरीके विकसित कर लिए हैं और उनमें महारत हासिल कर ली है कि मौके पर ही उत्पादन करो, ताकि बाजार में हेरफेर से फौरन निपटा जा सके. ज्यादातर कंपनियों ने मिलीजुली व्यवस्था बना ली है, रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआइएल) जैसी कंपनियों ने रिफाइनरी, मैन्युफैक्चरिंग या खुदरा बिक्री वाली दुकानों के अलावा अपने सभी स्टॉफ से घर से काम करने को कह दिया है. 

इससे ज्यादातर अछूती रहने वाली कंपनियां ऑनलाइन स्टार्ट-अप हैं. भारत में वर्ष 2021 में 42 यूनिकॉर्न (स्टार्ट-अप जिनका बाजार मूल्य 1 अरब डॉलर या 7,400 करोड़ रु. है) और जुड़ गए, जो 2020 में जुड़े महज 11 यूनिकॉर्न से करीब चार गुना इजाफा है. 

तकलीफ कम करना
वायरस से छुटकारे का तो कोई तरीका नहीं है, मगर उद्योग जगत और विशेषज्ञ कई नीतिगत बदलावों की पैरवी करते हैं, जिनसे कष्ट दूर हो सकता है. सरकार कमजोर की मदद में आगे आए, चाहे गरीब हों या छोटे उद्योग और खुदरा क्षेत्र, जो कोविड से सबसे बुरे फंसे हैं. क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डी.के. जोशी कहते हैं, ''कॉन्टैक्ट आधारित उद्योगों को मदद की दरकार है और शहरी गरीबों को भी.’’

वे कहते हैं कि शहरी रोजगार गारंटी योजना की मांग तेजी से उठ रही है, इसके लाभार्थियों की पहचान सरकार के ई-श्रम पोर्टल से की जा सकती है, जिसमें पहले ही 20 करोड़ लोगों का पंजीकरण हो चुका है. आपात कर्ज गारंटी योजना के तहत एमएसएमई को लाने की बात पहले ही हो चुकी है, जिसमें उन्हें मार्च के बाद तक सरकारी मदद वाले कर्ज मिलेंगे.

इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश का असर काफी होगा. लेकिन सिर्फ फंड के प्रावधान से ही बात नहीं बनेगी, इसे जमीन पर उतारने की क्षमता भी बढ़ानी होगी. पश्चिमी भारत होटल और रेस्तरां संघ के वाइस-प्रेसिडेंट प्रदीप शेट्टी के मुताबिक, उससे जुड़े होटल मालिकों ने स्टाफ को राहत देने के लिए ''प्रत्यक्ष वेतन हस्तांतरण और वैधानिक शुल्क, टैक्स तथा यूटिलिटी बिलों की मद में छूट’’ की मांग भी की है.

सीआइआइ के नरेंद्रन कहते हैं कि हॉस्पिटालिटी तथा ट्रैवल से जुड़े क्षेत्रों और इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण क्षेत्र को मदद की दरकार होगी, इसके अलावा लक्षित 13 क्षेत्रों वाले प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन योजना को जारी रखना उद्योग की बहाली के लिए जरूरी होगा. दो साल के उथल-पुथल के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था लचीली साबित हुई है, वह गर्त से उछलकर मजबूत हुई है.

हालांकि यह सभी क्षेत्रों के उद्योगों के मामले में नहीं हुआ है, कुछ को अभी राहत की दरकार है जिससे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें. फिर भी इससे यह उम्मीद बंधती है कि देश तीसरी लहर के बुरे दौर से भी तेजी से बाहर आ जाएगा.

‘‘हमें प्रकोप (वायरस का) को धीमा करने के लिए न्यूनतम पाबंदियां ही लगाने की जरूरत है, न कि हर किस्म की पाबंदियां लगाई जाएं’’
टी.वी. नरेंद्रन
सीआइआइ अध्यक्ष और सीईओ, टाटा स्टील.

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