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बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, लुढ़कती विकास दर पर घिरी मोदी सरकार!

बढ़ती बेरोजगारी, सुरसा की तरह मुंह फैलाती महंगाई और लुढ़कती विकास दर, अर्थव्यवस्था के हर मोर्चे पर सरकार चौतरफा आलोचना की जद में

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परवाज खान/गेट्टी इमेजेज परवाज खान/गेट्टी इमेजेज

बजट 2018-19 संसद में पेश करने से जुड़ी अंतिम दौर की तैयारियों में केंद्र सरकार जुटी हुई है. इस बीच इंडिया टुडे  का देश का मिज़ाज जनमत सर्वेक्षण आ गया है. विशेषज्ञों में इसपर सहमति दिखती है कि इस बजट में कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाली, आधारभूत ढांचे के निर्माण और रोजगार संकट जैसी समस्याओं से निबटने पर विशेष जोर होगा.

देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में भी बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे संकटों पर देश में बन रही आम राय का अंदाजा लगा. सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 32 फीसदी लोगों ने बेरोजगारी और नौकरी गंवाने की आशंका जैसे मुद्दों पर गहरी चिंता जाहिर की. कुछ समय पहले जारी किए गए सरकारी एजेंसियों के आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं. मई 2017 में, लेबर ब्यूरो ने रोजगार पर तिमाही रिपोर्ट जारी करते हुए कहा था कि अप्रैल, 2016 से दिसंबर, 2016 के बीच रोजगार सृजन के आठ प्रमुख क्षेत्रों में सिर्फ 2.3 लाख नौकरियों का सृजन हुआ. यह आंकड़ा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में हर साल एक करोड़ नौकरियों के इंतजाम के चुनावी वादे से काफी पीछे है.

कुछ लोगों का तर्क है कि लेबर ब्यूरो रोजगार के सही आंकड़े प्रस्तुत नहीं कर पाता क्योंकि यह न तो सभी क्षेत्रों को कवर करता है और न ही अनौपचारिक क्षेत्र में पैदा हुए रोजगार के अवसरों को गिनता है. बहरहाल, यह भी सच है कि नोटबंदी के कारण अनौपचारिक क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर लोगों की नौकरियां गई हैं और वे नौकरियां फिर से सृजित की जा सकीं, इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.

          

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) की पिछले साल जुलाई में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि जनवरी से अप्रैल 2017 के बीच करीब 15 लाख नौकरियां खत्म हुई हैं. क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी कहते हैं, ''निर्माण कार्य जैसे रोजगार आधारित क्षेत्रों, चमड़ा, कपड़ा और रत्न एवं आभूषण जैसे श्रम आधारित निर्यात क्षेत्रों को खासतौर पर बढ़ावा देने से ही नई नौकरियों का बड़े पैमाने पर सृजन संभव हो सकेगा.'' बजट पेश करने से पहले अपनी बातों से वित्त मंत्री भी ऐसे संकेत दे रहे हैं कि इस बार योजनाओं में नौकरियों के सृजन पर विशेष जोर रहेगा.

फिर भी, इस सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 53 फीसदी लोगों ने माना कि रोजगार के अवसर पैदा करने की दिशा में जितना प्रयास होना चाहिए, उतना इस सरकार ने नहीं किया.  58 फीसदी लोगों की राय है कि मोदी सरकार के पिछले साढ़े तीन साल के कार्यकाल में रोजगार की स्थिति बद से बदतर हुई है. जुलाई 2017 में हुए सर्वेक्षण में रोजगार सृजन के मोर्चे पर 53 फीसदी लोग सरकार के बारे में ऐसी राय रखते थे. पिछले छह महीने में सरकार के प्रति ऐसी राय में पांच फीसदी का इजाफा हुआ है. पहले की ही तरह, पूर्वोत्तर के राज्य और 18 से 24 साल के आयु वर्ग के युवा, रोजगार के अवसरों को लेकर ज्यादा चिंतित दिख रहे हैं. पूर्वोत्तर के चार राज्यों में 2018 में चुनाव होने वाले हैं इसलिए सरकार के विकास के एजेंडे में पूर्वोत्तर को भी अहमियत मिलने की संभावना है.

विशेष रूप से, आसमान छूती महंगाई ज्यादातर लोगों के लिए चिंता का सबब बन रही है. जनवरी 2017 में देश का मिज़ाज सर्वेक्षण में जहां महंगाई को लेकर 10 फीसदी लोगों ने चिंता जाहिर की थी वहीं, इस नए सर्वेक्षण में 23 फीसदी लोग इससे चिंतित दिखे. देश के विभिन्न भागों में बाढ़ और सूखे ने फसलों को एक जैसा नुक्सान पहुंचाया है. इससे पैदावार में कमी और दामों में बढ़ोतरी हुई है. वहीं सरकार जमाखोरों से निबटने में नाकाम रही है. नासिक जिले में प्याज के बड़े निर्यातकों के यहां आयकर विभाग के छापे से पता चला कि किस तरह व्यापारी प्याज का निर्यात करके मोटा पैसा बना रहे थे. इससे देश में प्याज की किल्लत पैदा हो रही थी और प्याज के दाम बेतहाशा बढ़े.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में काफी इजाफा हुआ और यह 70 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंचा जबकि एक साल पहले कच्चा तेल 60 डॉलर प्रति बैरल की दर पर मिल रहा था. तेल कीमतों में उछाल से परिवहन की लागत बढ़ी और इसने भी महंगाई बढ़ाई. सर्वे में हिस्सा लेने वाले 69 फीसदी लोगों ने माना कि आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि हुई है जबकि पिछले सर्वे में सिर्फ 62 फीसदी लोग ऐसा मानते थे.

बुझती हुई उम्मीदें

पिछले साल के 7.1 फीसदी विकास दर के मुकाबले इस साल की अनुमानित 6.5 फीसदी विकास दर ने आर्थिक मोर्चे पर मनमोहन सरकार के मुकाबले मोदी सरकार के प्रदर्शन की तुलना शुरू की. इससे लोगों की राय में बदलाव आना स्वाभाविक था. जहां जुलाई 2017 में 59 फीसदी लोग मानते थे कि आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार से बेहतर काम किया है वहीं आज यह आंकड़ा घटकर 56 फीसदी हो गया है. एक साल पहले 60 फीसदी लोग आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार के काम को मनमोहन सरकार से बेहतर मानते थे. वहीं 21 फीसदी लोगों का ऐसा मानना है कि आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार का कामकाज यूपीए की पिछली सरकार के मुकाबले बहुत खराब है. पिछले पांच सर्वेक्षणों में से यह अब तक का सबसे ज्यादा नकारात्मक सर्वे स्कोर है. 

मोदी सरकार के लिए राहत की भी थोड़ी गुंजाइश दिख जाती है. सरकार नाउम्मीद नहीं है और उसे लगता है कि वह अर्थव्यवस्था को संभाल लेगी. यह बात इस तथ्य से भी जाहिर होती है कि सर्वेक्षण में शामिल 46 फीसदी उत्तरदाताओं ने माना कि उनके आर्थिक स्तर में सुधार हुआ है. पिछले सर्वे में ऐसा मानने वाले लोग 44 फीसदी थे. वैसे एक साल पहले ऐसा मानने वाले लोगों का आंकड़ा इससे कहीं अधिक (53 फीसदी) था.

जुलाई 2017 से प्रभाव में आया माल एवं सेवा कर यानी जीएसटी एक और बड़ा मुद्दा रहा. आम भावना तो ऐसी ही है कि जीएसटी आर्थिक सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम है और इससे देश की मौजूदा पेचीदा कराधान व्यवस्था सरल हो जाएगी, हालांकि इसको लागू करने के तरीके पर बहुत से लोगों को आपत्ति भी है.

विभिन्न जीएसटी स्लैब में वस्तुओं के वर्गीकरण को लेकर और जीएसटी पोर्टल में आने वाली तकनीकी बाधाओं से जुड़ी शिकायतों का अंबार रहा है. सर्वेक्षण में शामिल कुल लोगों में से करीब आधे (49 फीसदी) का मानना है कि जीएसटी लागू होने के बाद से आवश्यक वस्तुओं और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के दाम बढ़ गए हैं. गुजरात चुनाव से ठीक पहले सरकार ने प्रदेश के बड़े व्यापारिक वर्ग का समर्थन गंवाने के भय से जीएसटी से जुड़ा सबसे बड़ा बदलाव किया. 200 से अधिक वस्तुओं पर टैक्स दरों में कमी की गई और रोजमर्रा इस्तेमाल की करीब 178 वस्तुएं 28 फीसदी वाले ऊंचे जीएसटी स्लैब से निकलकर 18 फीसदी टैक्स दर वाले स्लैब में शामिल हो गईं जबकि सभी प्रकार के रेस्तरां पर लगने वाले कर को घटाकर 5 फीसदी कर दिया गया. पुरानी कारों और बायोडीजल समेत विभिन्न वस्तुओं पर लगने वाले कर की दरों में कटौती का जीएसटी परिषद का प्रस्ताव एक अन्य कदम रहा है.

नोटबंदी का पेच

नोटबंदी के फैसले से अनौपचारिक क्षेत्र की नौकरियों पर आई आंच का असर अब भी पूरी तरह थम नहीं पाया है. इस सर्वेक्षण में शामिल 37 फीसदी लोगों का मानना है कि नए नोटों की आड़ में काला धन फिर से बाजार में लौट आया. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण से एक और बात सामने आई कि आम जनता अब भी भ्रष्टाचार को बड़ी समस्या मानती है. 78 फीसदी लोगों ने माना कि वे रोजमर्रा स्तर पर जिस प्रकार के भ्रष्टाचार का सामना कर रहे थे, उसमें कमी लाने में मोदी सरकार नाकाम रही है.

सुधारों पर बात करें तो काफी लोग सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण के पक्ष में हैं. बड़े पैमाने पर डूबत खातों (एनपीए) के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कार्यकलाप लोगों को खटक रहा है. 45 फीसदी लोगों ने कहा कि सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण स्वागतयोग्य कदम होगा. वैसे इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड जैसे दूरगामी सुधारों को लागू किया गया है और 2.11 लाख करोड़ रु. की बैंक पुनर्पूंजीकरण योजना लागू की जा रही है, बावजूद इसके बैंकिंग क्षेत्र का संकट कुछ समय तक जारी रहेगा.

निजता की चिंता

बैंक खातों और मोबाइल नंबर को आधार से जोडऩा मोदी सरकार के मुख्य प्रयासों में से एक रहा है. लेकिन लोगों में इसको लेकर काफी नाराजगी है. सर्वेक्षण में से 47 फीसदी लोग बैंक खातों और मोबाइल नंबर को आधार के साथ लिंक करने के कदम से खुश नहीं दिखे. लोगों की धारणा है कि जनता को इससे कोई खास फायदा नहीं होने वाला है. सबसे ज्यादा आपत्ति बेहद आम सेवाओं के लिए भी बायोमीट्रिक पहचान को जरूरी बनाए जाने और जानकारियों की गोपनीयता से जुड़ी नजर आई. सरकार के पास चिंताओं का अंबार लगा है और इससे निबटने के लिए समय बहुत कम है. देश इस बात पर नजरें गड़ाए रखेगा कि सरकार 2019 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनी प्राथमिकताओं का निर्धारण कैसे करती है.

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