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न्यायपालिकाः आपदा के समय इंसाफ

वैश्विक महामारी में बदल चुके कोरोना का असर अदालतों पर ही पडऩा ही था. शीर्ष अदालत ने ऐसे में जरूरी मामलों में सुनवाई के लिए लिया वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का सहारा. अदालतों में स्थिति सामान्य होने में लगेगा लंबा वक्त.

सुप्रीम कोर्ट में पहली बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में पहली बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई

राजधानी दिल्ली में जनता कक्रर्यू से बजी खतरे की घंटी के बाद सुप्रीम कोर्ट में वकीलों के चैंबर सील हो गए, साकेत जिला न्यायालय भवन के बाहर मुकदमों की अगली तारीख की सूची चिपका दी गई ताकि कोई व्यक्ति अंदर न आ सके. इसके साथ ही 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई का शुभारंभ भी हो गया जिसका इंतजार लंबे समय से हो रहा था. ये सब कदम उठाए गए कोरोना वायरस का फैलाव रोकने के लिए. कोरोना का कोर्ट पर असर यह है कि देश की सभी अदालतें बंद हैं और सिर्फ अत्यंत आवश्यक मामलों की ही सुनवाई निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में हो रही है. पूरे न्यायिक सिस्टम को थाम लेने वाले कोरोना लॉकडाउन का व्यापक असर देखने को मिलेगा. फिलहाल, बेहद जरूरी मामले निपटाए जा रहे हैं.

छह महीने पिछड़ जाएगी अदालत

कोरोना वायरस के अदालत पर असर से पहले जजों और मुकदमों की स्थिति स्पष्ट कर लेना जरूरी है. संसद के बजट सत्र में सरकार ने बताया था कि हमारे देश में 10 लाख की आबादी पर 20 जज हैं. विधि आयोग ने 1987 में ही कहा था कि 10 लाख की आबादी पर 50 जज होने चाहिए. 2018-19 के आर्थिक सर्वे में कहा गया कि निचली अदालत का एक जज सालभर में औसतन 746 केस निबटाता है. लंबित तीन करोड़ मुकदमों (देखें ग्राफिक्स) का ढेर पांच साल में निबटाने के लिए 8,152 जजों की जरूरत होगी. नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के मुताबिक, देश में कुल लंबित मामलों में से 74 फीसद से ज्यादा आपराधिक मामले हैं. लॉकडाउन के दौरान कोर्ट भले ही बंद हों पर मुकदमे दाखिल होना बंद नहीं हुआ है. कुछ कोर्टों में ई-फाइलिंग भी हो रही है.

जाने-माने वकील और राज्यसभा सांसद के.टी.एस. तुलसी कहते हैं, ''लॉकडाउन से न्याय की गति पर गहरा असर पड़ेगा. कोर्ट 14 अप्रैल को खुली तो भी हम छह से आठ महीने पीछे हो जाएंगे.

हर केस इतना पीछे चला जाएगा. और लॉकडाउन बढ़ा तो हम साल भर पीछे चले जाएंगे. अदालत की एक-एक तारीख का बहुत असर पड़ता है.

वायरस के प्रकोप में किसी को यह नहीं मालूम कि अगले हक्रते क्या होगा. पॉजिटिव केस बढ़ते जा रहे हैं. लॉकडाउन बढ़ा तो बहुत मुश्किल होगी.''

एक तबके का तर्क अलग है. इलाहाबाद हाइकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एस.आर. सिंह का मानना है कि लंबित मामले उस तादाद में नहीं बढ़ेंगे क्योंकि ज्यादा केस दाखिल ही नहीं हो रहे.

''केस निबटाने के लिए छुट्टियां कम की जा सकती हैं. इलाहाबाद हाइकोर्ट में 210 दिन काम होता है पर इसे बढ़ाया जा सकता है ताकि काम जल्दी निबटे.'' सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय की राय में, ''पांच सौ से ज्यादा मामले संविधान पीठ के सामने लंबित हैं. ये निबट जाएं तो हाइकोर्ट और निचली अदालतों के तमाम मामले जल्द निबट जाएंगे.'' अभी जस्टिस सिस्टम में ट्रेन जैसा हाल हो जाएगा: जो लेट हुई, और लेट होती जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट के एक और वकील डी.के. गर्ग इसमें अपना पक्ष यूं जोड़ते हैं, ''हर कोर्ट में रोज 4-5 नए केस आते हैं, शुक्रवार को कम से कम 30-40 केस लगते हैं. सुप्रीम कोर्ट 7 मार्च से बंद है. पेंडेंसी देखी जाए तो 3,000-4,000 केस बढ़ेंगे. कोर्ट 14 अप्रैल को खुलने पर अर्जेंट केस चीफ जस्टिस की कोर्ट में लगेंगे.

उनका एक घंटा इन्हीं में लगेगा. यानी दो जजों का एक घंटा रोज बर्बाद होगा. फिर गर्मी की छुट्टियां आ जाएंगी, हो सकता है ये टल भी जाएं, तो भी काम का बोझ तो रहेगा. कुल मिलाकर जस्टिस सिस्टम छह महीने पीछे चला गया. बंदी 15 दिन भी बढ़ी तो जो केस 2020 में तय होना है, समझिए कि वह 2021-22 में ही निबटेगा.''

वकीलों की दलील है कि जब इसरो, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर या अस्पताल काम कर रहे हैं तो कोर्ट क्यों न करे. उपाध्याय का मानना है कि साल में 185 दिन काम करने वाले सुप्रीम कोर्ट में लॉकडाउन के दौरान भी काम होना चाहिए. पर गर्ग सुप्रीम कोर्ट में ज्यादा छुट्टियों को जायज ठहराते हैं. ''देखिए, सुप्रीम कोर्ट के फैसले हजारों निचली अदालतों समेत सभी हाइकोर्ट के लिए नजीर होते हैं इसलिए उनमें कोई चूक नहीं होनी चाहिए.

उसमें भारतीय कानूनों की भी व्याख्या होगी और विदेश के कानूनों की भी. कई मामले जो पूरे देश को प्रभावित करते हैं उनमें क्वालिटी ऑफ जस्टिस दिखना चाहिए. अगर इनमें कोई चूक हुई तो इन फैसलों की व्याक्चया करने वाली अदालतें मनमाने ढंग से इनकी व्याख्या कर सकती हैं. न्याय की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जजों को ज्यादा छुट्टियां मिलनी चाहिए.''

कैदी छोड़ना ठीक

कैदियों को छोडऩे वाले अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देश की 1,339 जेलों में इस वक्त करीब 4.66 लाख कैदी हैं और इनमें खासी तादाद विचाराधीन कैदियों की है. कोर्ट उन कैदियों को जमानत और पैरोल पर रिहा करने का आदेश दे चुकी है जो बेवजह बंद हैं और उनके अपराधों में सात साल से कम सजा का प्रावधान है.

तुलसी और गर्ग कहते हैं कि पहले भी विचाराधीन कैदियों को जमानत देने का आदेश अदालत दे चुकी है. लेकिन इतनी बड़ी आपदा के दौरान सरकार के लिए भी इतने ज्यादा कैदियों की देखरेख मुश्किल थी. इलाहाबाद हाइकोर्ट ने अग्रिम जमानतों और जमानतों को बढ़ा दिया है. इस मुद्दे पर तुलसी का तर्क है कि हर किसी को जल्द से जल्द न्याय पाने का हक है और उस लिहाज से यह फैसला उचित ही है. गर्ग याद दिलाते हैं कि पहले के आदेश में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था: किसी व्यक्ति को अनंत काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता.

तकनीक का पहली बार इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट इन दिनों वीडियो कॉन्फ्रेसिंग से आवश्यक मुकदमों की सुनवाई कर रहा है. हालांकि इसकी मांग काफी पहले से की जा रही थी. सवाल यह है कि क्या कोरोना लॉकडाउन के बाद भी यह जारी रहेगा? तुलसी कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट ने वीडियो कॉन्फ्रेसिंग का जो कदम उठाया है वह जारी रहना चाहिए. इस तकनीक को पूरी तरह अपनाने का वक्त आ गया है. अगर कोई वकील मद्रास में बैठकर बहस कर सकता है और सुप्रीम कोर्ट फैसला दे सकता है तो ऐसा क्यों न किया जाए? इतनी दूर से एक-एक केस के लिए गरीब आदमी आ ही नहीं सकता. वकील भी बहुत महंगे हैं. तकनीक न्याय की रफ्तार बढ़ाने में मददगार होगी.''

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता मामले में एक दिलचस्प पहलू जोड़ते हैं: ''देखिए, अब सुप्रीम कोर्ट न तो बंद है और न ही खुला है. सरकारी आदेश और कोर्टों की व्यवस्था के बीच का जो संकट है उसमें केवल सांकेतिक तौर पर अदालत चल रही है. काम रोकना न पड़े, इसका समाधान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई के रूप में आया है. न्यायपालिका को अपने आपको तकनीकी क्रांति से लैस करना पड़ेगा. कछुए की चाल से चल रहे सिस्टम में इससे रफ्तार आएगी. इसे लॉकडाउन के बाद भी जारी रखना चाहिए.''

सुप्रीम कोर्ट के ही वकील ज्ञानंत सिंह लॉकडाउन के अच्छे पहलुओं की ओर इशारा करते हैं: ''न्यायपालिका की सबसे बड़ी समस्या टेक्नोलॉजी को ठीक से न अपना पाने की थी. मजबूरी में ही सही व्हाट्सऐप या अन्य माध्यमों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई होने लगी है. इससे पेंडेंसी भी घटेगी. मुल्जिम को जेल से अदालत तक ले जाने में संसाधनों की बर्बादी होती है. रुटीन केसों में भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग अपनाई गई तो दूसरे शहरों की जेलों में बंद कैदियों को लाकर पेश करने का झंझट खत्म होगी.'' सुप्रीम कोर्ट से पहले पटना हाइकोर्ट ने 18 मार्च को वर्चुअल कोर्ट शुरू कर दी थी. कोरोना लॉकडाउन से पहले ऐसा क्यों नहीं हुआ?

न्यायिक क्षेत्र में काम करने वाले संगठन दक्ष के प्रोग्राम डायरेक्टर सूर्यप्रकाश बी.एस. कहते हैं, ''इसकी वजह वकीलों और जजों का तकनीक के बारे में न सोचना है. दक्ष की स्टडी कहती है कि न्यायिक प्रशासन के लिए जज के पास टाइम नहीं है.'' वे बताते हैं, निचली अदालतों में कामकाज के लचर रवैये के चलते वादियों को उत्पादकता या वेतन का जो नुक्सान होता है वह देश की जीडीपी का आधा प्रतिशत से ज्यादा होता है. रकम में देखें तो यह 50,000 करोड़ रु. से एक लाख करोड़ रु. के बीच बैठती है. इसलिए निचली अदालतों के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंस जैसी तकनीकी व्यवस्थाएं ज्यादा जरूरी हैं.

वकीलों पर असर

अगर हम सिर्फ दिल्ली की बात करें तो यहां सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट के अलावा आधा दर्जन निचली अदालतें, एनसीएलटी, लेबर कोर्ट, अनेक ट्रिब्यूनल, कंज्यूमर कोर्ट आदि हैं और लॉकडाउन से इन सभी जगह प्रैक्टिस करने वाले वकीलों को बहुत नुक्सान उठाना पड़ रहा है. इस पर तुलसी कहते हैं, ''99 फीसद वकील हैंड टु माउथ हैं. वे किराया नहीं दे पा रहे, रोजमर्रा के खर्चे पूरे नहीं कर पा रहे. वकीलों के लिए बार एसोसिएशन और सरकार को जरूर कुछ न कुछ करना चाहिए. मोटे अनुमान के मुताबिक, देश में करीब 17 लाख वकील हैं और इनमें से एक लाख तो अकेले दिल्ली-एनसीआर में ही हैं.'' वकीलों ने बार काउंसिल और केंद्र और राज्य सरकार से मदद मांगी है.

सुनवाई फिलहाल अहम मामलों की

सवाल उठता है कि लॉकडाउन के दौरान जनता को न्याय मिलेगा कैसे? जिसका केस चल रहा है उसे तो पता है कि 15 दिन में फैसला आना नहीं है. लोग लॉकडाउन में भी गिरफ्तार हो रहे हैं और जमानत पर छूट भी रहे हैं. इस पर स्थिति साफ करते हुए ज्ञानंत सिंह कहते हैं, ''बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसे बेहद महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हो ही रही है. हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कोरोना से जुड़े मामले भी फौरन सुने जा रहे हैं क्योंकि इन्हें बाद में नहीं सुना जा सकता. जमानत और हिरासत से जुड़े मामलों की सुनवाई निचली अदालतों में ड्यूटी मजिस्ट्रेट की अदालत में हो रही है. निचली अदालतों में वही व्यवस्था लागू है जो छुट्टी के दिनों में होती है.''

फिलहाल अर्जेंट मैटर ही सुने जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट और कई हाइकोर्ट ने जो अंतरिम आदेशों की तारीखें बढ़ा दी हैं, इससे उस शख्स को फायदा होगा जिसके पक्ष में वह अंतरिम आदेश था.

ज्ञानंत सिंह के मुताबिक, खासकर वित्त से जुड़े मामलों में फायदा हो जाएगा. हालांकि अंतरिम आदेश भी पर्याप्त आधार के बगैर नहीं मिल जाता. जैसे किसी कंपनी की डिमांड आई और कोर्ट से स्टे हो गया तो दूसरी पार्टी को भी नोटिस गया लेकिन उसकी तारीख पर कोर्ट बंद है तो इससे उसे फायदा हो गया जिसे स्टे मिला है.

लेकिन ऐसा चुनिंदा मामलों में ही होता है. वकील एक और अंदेशा जताते हैं कि जिन मुकदमों की तारीख लगी थी उन्हें अपने आप आगे बढ़ा दिया गया. इसका फायदा घोटालों के आरोपी सुबूत मिटाने के रूप में उठा सकते हैं. लिहाजा अदालत को इस मामले में सतर्क रहने की जरूरत है.

सवाल उठता है कि अब किसी को अगर अपने मुकदमे की अगली तारीख जाननी है तो वह क्या करे? कैसे इसका पता करे? ज्ञानंत सिंह इसका सीधा-सा उपाय सुझाते हैं, वह यह कि ई-कोर्ट सर्विसेज का ऐप डाउनलोड कर मुकदमे की अगली तारीख जानी जा सकती है. यह बात बिल्कुल सच है कि लंबे समय बाद जब कोर्ट खुलेंगे तो नए मुकदमों का अंबार लग जाएगा.

लेकिन कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए जो पाबंदियां लगाई गईं वे भी जरूरी हैं. रिटायर्ड जस्टिस एस.आर. सिंह साफ कहते हैं, ''जिंदगी रहेगी तो अदालतों का भी कोई मकसद है, वरना क्या फायदा. लॉकडाउन के अलावा कोई विकल्प नहीं था. यह व्यापक जनहित का मामला है.''

सुप्रीम कोर्ट में पहली बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई. जज अपने घर पर और वकील अपने घर. 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट परिसर में पहली बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई हुई जिसमें जज अदालत कक्ष में और वकील दूर किसी कमरे में बैठकर दलील दे रहे थे. 27 मार्च को दो बेंचों ने अदालत परिसर से बाहर सुनवाई की.

न जज कोर्ट में थे न वकील. याची के वकील को ई-मेल पर वीडियो लिंक दिया जाता है जो सिर्फ उसी के लिए एक्टिव होता है.

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