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आवरण कथाः भरोसे की डोज

आत्मविश्वास वर्धक बूस्टर शॉट की शुरुआत और कोविड के नए टीकों से ओमिक्रॉन और तीसरी लहर का असर कम होने की जगी उम्मीद.

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लगवा लिया टीका दिल्ली के दरियागंज में 15 से 18 साल के किशोरों के लिए टीकाकरण अभियान लगवा लिया टीका दिल्ली के दरियागंज में 15 से 18 साल के किशोरों के लिए टीकाकरण अभियान

आवरण कथा । ओमिक्रॉन वैक्सीन

आप इसे बूस्टर शॉट कहें या एहतियाती खुराक, पर 10 जनवरी को टीकाकरण का नया अध्याय शुरू करके भारत ने कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई जारी रखी है. और इसकी शुरुआत के लिए इससे बेहतर वक्त भला क्या होगा जब बेहद संक्रामक ओमिक्रॉन वैरिएंट महामारी की तीसरी लहर में मामलों की संख्या तेजी से बढ़ा रहा है.

तकरीबन 5.75 करोड़ लोग टीके की तीसरी खुराक के पात्र हैं: 2.75 करोड़ 60 साल से ऊपर की उम्र के, एक करोड़ स्वास्थ्यकर्मी और दो करोड़ फ्रंटलाइन वर्कर. कोविन ऐप पर देख सकते हैं कि आप पात्र हैं या नहीं और इस बारे में पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होगा. यह हो गया तो अब बस आपको तीसरी खुराक लेने के लिए मोबाइल नंबर और कोई पहचान पत्र चाहिए. बूस्टर खुराक का मकसद आपके शरीर में ऐंटीबॉडी की मजबूत प्रतिक्रिया उत्पन्न करना है.

भारत सरकार की ओर से मंजूर 'एहतियाती’ खुराक खतरे की जद में खड़े लोगों के लिए तो जरूरी है ही, वायरस वैज्ञानिक और चिकित्सा अनुसंधान से जुड़े दूसरे लोग यह भी मानते हैं कि एक तरह का टीका ले चुके लोगों को दूसरी तरह का टीका देने पर पैदा होने वाली परस्पर-प्रतिरक्षा क्षमता के आकलन के लिए भी यह अहम है. वे एहतियाती खुराक के तौर पर अलग-अलग तरह के टीके दिए जाने से पहले उसकी सेफ्टी प्रोफाइल के बारे में पूरी तरह तसल्ली कर लेने की सिफारिश करते हैं.

कोविशील्ड और कोवैक्सीन के अलावा सात और टीकों को मंजूरी दी गई है. इनमें एक एमआरएनए वैक्सीन है जिसे आसानी से बनाया और तेजी से लॉन्च किया जा सकता है. पहली दो अनिवार्य खुराक देश के सभी लोगों को अगले 4-5 महीनों में लग जाने की उम्मीद है.

ये टीके अस्पताल में भर्ती कम करने और जान की हिफाजत के लिहाज से सभी वैरिएंट के खिलाफ खासे प्रभावी मालूम देते हैं. मगर इनके इस्तेमाल से संबंधित कोई बहुत लंबे समय की जानकारी फिलहाल मौजूद नहीं है. इन टीकों को एक साल से कुछ अधिक समय में मिली जानकारी पर केंद्रित करते हुए 'यथोचित आधार’ पर आपातकालीन उपयोग अधिकार (ईयूए) की मंजूरी दी गई है.

आवरण कथाः भरोसे की डोज
आवरण कथाः भरोसे की डोज

बेंगलूरू स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ जेनेटिक्स ऐंड सोसाइटी के डायरेक्टर डॉ. राकेश मिश्र कहते हैं, ''इनमें एक भी वैक्सीन, यहां तक कि एमआरएनए वैक्सीन भी संक्रमण से सुरक्षा नहीं दे रही है. तीसरी लहर का फायदा यह है कि हमारे यहां बहुत विशाल, करीब 80 फीसद या उससे ज्यादा, सीरो-पॉजिटिविटी पैदा हो गई है और खतरे की जद में मौजूद लोगों को भी एक या दो खुराक के साथ बड़ी हद तक रोग प्रतिरोधक सुरक्षा मिल गई है, हालांकि वे संक्रमण से सुरक्षित शायद न हों.’’

शोध आधारित जानकारी हालांकि नाकाफी है, पर इतनी तो है ही जिससे पता चलता है कि टीके की दो खुराक लेने के छह महीने बाद ऐंटीबॉडी कम हो जाते हैं. इसीलिए बूस्टर डोज की जरूरत है. मगर डॉ. मिश्र बताते हैं, ''बूस्टर डोज की भी अपनी एक सीमा है. इसीलिए इन्हें एहतियाती खुराक कहते हैं.

ऐसा कोई डेटा मौजूद नहीं है जो बता सके कि इन्हें लगवाने वालों को इतने प्रतिशत सुरक्षा निश्चित तौर पर हासिल है. यह थोड़े और ज्यादा ऐंटीबॉडी देता है, पर हम पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकते. इसे बूस्टर कहने के लिए हमें जानकारी चाहिए होगी कि यह ठीक-ठीक कैसे काम करता है. अभी यह जानकारी हमारे पास नहीं है. हम बस इतना जानते हैं कि टीके सुरक्षित हैं और ज्यादा कमजोर लोगों को अतिरिक्त सुरक्षा देना अच्छा है.’’

टीकों के कॉकटेल की पहेली
केंद्र ने टीकों को मिलाने की संभावना फिलहाल खारिज कर दी है, पर एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी (एआइजी) और इससे जुड़े एशियन हेल्थकेयर फाउंडेशन के संस्थापक-चेयरमैन डॉ. डी. नागेश्वर रेड्डी का कहना है कि कोविशील्ड और कोवैक्सीन का मिश्रण स्पाइक प्रोटीन या प्रोटीन के कांटेदार उभार को बेअसर करने वाले ऐंटीबॉडी को निश्चित ही बढ़ा देता है और इसलिए ओमिक्रॉन के खिलाफ वैक्सीन का असर बढ़ जाता है. 

एआइजी का एक अध्ययन जाहिरा तौर पर इसकी तस्दीक करता है. इस अध्ययन में शामिल किसी भी व्यक्ति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिए. डॉ. रेड्डी कहते हैं, ''जब पहली और दूसरी खुराक अलग-अलग वैक्सीन की थीं, तो स्पाइक प्रोटीन ऐंटीबॉडी प्रतिक्रिया एक ही वैक्सीन की दोनों खुराकों के मुकाबले चार गुना ज्यादा थी.’’ स्पाइक प्रोटीन को बेअसर करने वाले ऐंडीबॉडी वायरस को खत्म कर देते हैं और कुल संक्रामकता में कमी लाते हैं.

एआइजी के अध्ययन से यह भी पता चला कि इसमें शामिल 87 फीसद लोगों में, जिन्होंने न वैक्सीन लगवाई थी और न कभी पॉजिटिव हुए थे, कोविड के ऐंटीबॉडी थे. डॉ. रेड्डी कहते हैं, ''डेल्टा की भीषण लहर झेल लेने की वजह से हो सकता है कि हमारी आबादी में कोविड के खिलाफ अच्छी-खासी मात्रा में ऐंटीबॉडी विकसित हो गए हों.’’

हालांकि, खतरे की जद में खड़े समूहों को दी जाने वाली तीसरी खुराक को भारत की टीकाकरण रणनीति का मुख्य आधार बनाया जाए,  महामारी विशेषज्ञ इसे लेकर थोड़ा आशंकित हैं. वे कहते हैं कि इसका महत्व सीमित ही है. उनका मानना है कि हमारी रणनीति की मुख्य बात यह होनी चाहिए कि वैक्सीन के प्रति झिझक खत्म करके लोगों को टीकों की पहली और दूसरी खुराक लगाई जाए. दूसरे देश बूस्टर शॉट इसलिए लगा रहे हैं, क्योंकि उनके पास वैक्सीन उपलब्ध हैं—इनसे ऐंटीबॉडी में होने वाली बढ़ोतरी अतिरिक्त सुरक्षा कवच का काम करती है.

डॉ. मिश्र कहते हैं, ''प्रभावी टीकाकरण के लिए समग्रता वाला एक नजरिया अपनाए जाने की जरूरत है. अगर मुझसे पूछें तो मैं सबसे पहले धरती के सभी लोगों को टीकों की दो खुराकें लगाऊंगा और फिर तीसरी खुराक के बारे में सोचूंगा. यह वायरस पर ज्यादा बड़ा हमला होगा. इससे संक्रमण कम होगा और हमें कुछ कम वैरिएंट और उनके फैलाव से निबटना पड़ेगा.’’

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के जोर देने के बावजूद नीति निर्माता इससे जुड़े जोखिम की वजह से कॉकटेल रणनीति को आजमाने को लेकर बहुत उत्सुक नहीं. टीकों की उपलब्धता और वितरण से जुड़ी बंदिशों के बावजूद सरकार की कोशिश भी यही है कि रोज करीब एक करोड़ टीकों के मूल लक्ष्य पर टिके रहें और इस साल गर्मियां खत्म होने से पहले सभी वयस्कों के अलावा 15-18 की उम्र के सभी लोगों को टीके लगा दिए जाएं.

नामुराद ओमिक्रॉन
ओमिक्रॉन के बारे में सबसे चिंताजनक पहलू है इसकी लपलपाती संक्रामकता. बहुतों को तो पता तक नहीं चलता कि वे संक्रमित हैं, खासकर जब वायरस हूबहू बुखार के लक्षण दर्शाता है. छोटे आयु समूह (3-15) के बच्चे इसके वाहक माने जाते हैं, जिन्हें संक्रमण हो जाता है और लक्षण दिखाई भी नहीं देते और फिर वे अपनी मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता की बदौलत बीमारी से छुटकारा पा लेते हैं.

अभी ये अध्ययन होने हैं कि उनके लिए कौन-सी वैक्सीन उपयुक्त होगी. हल्के लक्षणों की वजह से कई तो टेस्ट तक नहीं करवाते. इससे वायरस को रूप बदलने और नए अवतारों में प्रकट होने का ज्यादा मौका मिल जाता है. स्वास्थ्य के ढांचे पर ज्यादा बोझ आ जाता है, सो अलग. महामारी का नया फंदा भी तैयार हो जाता है. लिहाजा मास्क इसे फैलने से रोकने का सबसे प्रभावी साधन है.

राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष डॉ. जयप्रकाश मुलियिल कहते हैं, ''ओमिक्रॉन महज दो दिन में दोगुना बढ़ रहा है. यह ज्यादा तेज और इस लिहाज से डेल्टा से कहीं ज्यादा तेज-तर्रार है. यह पहले के संक्रमण या टीकों की भी जरा कद्र नहीं करता. जो कुछ उपलब्ध है, वह वुहान वायरस पर आधारित है. लिहाजा बहुत-से बूस्टर ओमिक्रॉन के खिलाफ कारगर नहीं होंगे.’’

अभी तक के अध्ययनों से पता चलता है कि यह वैरिएंट अपने पूर्ववर्ती की तरह फेफड़ों पर असर नहीं करता और मुख्य रूप से सांस तंत्र के ऊपरी हिस्से तक सीमित रहता है. बीमारी पैदा करने की क्षमता कम और मारक शक्ति भी कम है. दक्षिण अफ्रीका के अध्ययनों से पता चला है कि यह अत्यंत प्रतिरक्षाजनक है और पिछले संक्रमणों के साथ परस्पर-प्रतिक्रियाशील भी है.

यह प्रतिरक्षा पैदा करने में माहिर है. यह खुद अपने खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पैदा करता है और दक्षिण अफ्रीका में यह जितनी तेजी से ऊपर गया और नीचे आया, उससे पता चलता है कि डेल्टा जितना खतरनाक शायद न हो. इस बात पर जोर देकर बताया गया कि अस्पताल में भर्ती होने वालों में मोटे तौर पर वे लोग हैं जिन्हें टीके नहीं लगे थे.

डॉ. मुलियिल कहते हैं, ''अगर हम इसे खूंखार कोरोना की बजाय मामूली सर्दी-जुकाम मानने की अपनी मानसिकता नहीं बदलते, तो यह ज्यादा बड़ी चुनौती होगा और हमारी आबादी के आकार को देखते हुए हमारे लिए इसका सामना कर पाना आसान न होगा.’’ यही नहीं, अब वायरस की पॉजिटिविटी के आईने में ही इनके मामलों को देखना शायद ठीक न होगा.

वे बीमारी, इलाज शुरू करने और वायरस की मौजूदगी की तस्दीक के लिहाज से नए सिरे से सोचने का सुझाव देते हैं. टीके लगाने के पीछे मंशा शरीर को ऐंटीबॉडी से भर देने की नहीं है. मंशा रोग प्रतिरोधक क्षमता को संवेदनशील बनाने की है. एक बार यह संवेदनशीलता आ गई, तो जब भी इससे लड़ने के लिए कहा जाएगा, यह पलटकर पुरजोर मुकाबला करेगी.

टीकों से जुड़ी संभावनाएं
वैक्सीन निर्माता लगातार कह रहे हैं कि एकमात्र बचाव टीके लगाना है और इसलिए वे वायरस के रूप बदलने के हिसाब से उभरती परिस्थितियों के लिए नए टीकों पर काम कर रहे हैं. सभी वैरिएंट से निबटने के लिए एक टीके की संभावना से वे इनकार करते हैं. अध्ययनों के नतीजों का इंतजार करते हुए भारत बायोटेक को लगता है कि टीके की तीन खुराक ओमिक्रॉन के खिलाफ असरदार होंगी.

पेटेंट पंजीकृत करवाने का मंसूबा बना रहे सीएमडी कृष्णा एल्ला कहते हैं, ''विज्ञान की गहराई के साथ भारत में नवाचार बेहतर हो रहा है. हम नोजल (नाक से ली जाने वाली) वैक्सीन लाने के करीब हैं, जो इक्वयुनिटी तो देगी ही और संक्रमण का चक्र तोड़ने में भी मदद करेगी.’’ वे मानते हैं कि कोविड-19 के एंडेमिक या स्थानीय बीमारी में बदलने के साथ इसके वैरिएंट आते-जाते रहेंगे और इंफ्लुएंजा की तरह उनका इलाज किया जाता रहेगा, जबकि एक या दो अन्य वैरिएंट हर साल किसी एक या दूसरे इलाके में परेशान करते रहेंगे.

पिछले महीने भारत ने दो नई कोविड वैक्सीन—कोर्बिवैक्स और कोवोवैक्स—को आपातकालीन इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी. कोर्बिवैक्स को हैदराबाद स्थित बायोफार्मास्युटिकल फर्म बायोलॉजिकल ई ने अमेरिका के बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन और डायनावैक्स टेक्नोलॉजीज के साथ मिलकर विकसित किया है. यह करीब 1980 के दशक से मौजूद और हेपेटाइटिस बी टीके में प्रयुक्त रीकॉम्बिनेंट प्रोटीन आधारित टेक्नोलॉजी से बनाई गई है. 

इसमें कोरोनावायरस का एक प्रोटीन है, जो शरीर को इस वायरस को पहचानने और इसके खिलाफ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया शुरू करने के काबिल बनाता है. यह कोवैक्सीन से अलग है, जिसमें पूरा वायरस होता है पर निष्क्रिय रूप में होता है. चूंकि इसमें वायरस का एक टुकड़ा भर है, लिहाजा रोग प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूत बनाने के लिए इसमें एक सहायक जोड़ दिया जाता है.

कोवोवैक्स भी रीकॉम्बिनेंट आधारित टीका है, जिसका विकास अमेरिका की नोवोवैक्स ने किया है और इसका उत्पादन पुणे स्थित सीरम इंस्टीस्ट्यूट ऑफ इंडिया में होगा. इसे विकसित करने के लिए, कोर्बिवैक्स की तरह यीस्ट या खमीर का इस्तेमाल करने की बजाय, वैज्ञानिकों ने स्पाइक प्रोटीन उत्पन्न करने वाले वायरस के जेनेटिक अनुक्रम का एक हिस्सा अलग किया और उसे कीटों पर हमला करने वाले बैक्यूलोवायरसों या पैथोजीन से मिलवाया. तमाम वैक्सीन की तरह कोवोवैक्स रोग प्रतिरोधक प्रणाली को चकमा देकर यह विश्वास दिलाता है कि असल वायरस ने उस पर हमला कर दिया है.

टीकों के अलावा मोलनुपिरैविर को भी मंजूरी दी गई है और 13 कंपनियां इसे बनाने के लिए तैयार हैं. यह ऐंटी-वायरल दवा है, जो इसके निर्माताओं के अनुसार कोविड को हल्का करने में मदद कर सकती है. मगर भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद का कहना है कि यह दवा सुरक्षित नहीं है. 2022 के मध्य तक पूर्ण टीकाकरण हासिल के लिए उत्पादन बढ़ाया जाएगा. निर्माताओं को तैयार किया जाएगा कि वे तमिलनाडु में चेंगलपट्टु स्थित इंटीग्रेटेड वैक्सीन कॉम्प्लेक्स सरीखे पहले से उपलब्ध उत्पादन स्थलों का उपयोग करके टीके बनाएं, जहां की पूरी क्षमता का अब तक इस्तेमाल नहीं होता रहा है.

इस बीच अमेरिकी सेना के रिसर्चर एक नई ''सुपर वैक्सीन’’ विकसित कर रहे हैं, जो वायरस के तमाम म्यूटेशनों के अलावा 2003 में पाए गए सार्स-कोव-2 से भी निबट सकती है. इसे स्पाइक फेरिटीन नैनोपार्टिकल (एसपीएफएन) कहा गया है. इसे बनाने वालों का कहना है कि इसकी खुराक तमाम वैरिएंट ऑफ कंसर्न के रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन और स्पाइक प्रोटीन के खिलाफ तगड़ी ऐंटीबॉडी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करती है. अमेरिकी सेना की रणनीति एक 'ऑल-कोरोनावायरस’ वैक्सीन टेक्नोलॉजी विकसित करने की है, जो बहुत-से कोरोनावायरस स्ट्रेन और प्रजातियों के खिलाफ सुरक्षित, प्रभावी और टिकाऊ सुरक्षा दे सके.

मजबूत जन स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था विकसित करना भी इतना ही जरूरी है. महामारी विशेषज्ञों का कहना है कि हरेक राज्य में जीनोमिक निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें किसी भी बदलाव का पता लगाने के लिए सैंपलिंग की एक व्यापक रणनीति हो. इसके लिए हर राज्य के हर हिस्से से निश्चित संक्चया में नमूने लेकर नियमित टेस्ट करने की जरूरत होगी. कुछ विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि पूरी दुनिया को वायरस-रोधी टीके लगने तक कोविड-19 के नए वैरिएंट जब-तब प्रकट होते रहेंगे.

उनका कहना है कि एक दूसरे के साथ टीके बांटना न केवल परोपकारी काम है बल्कि व्यावहारिकता का तकाजा भी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों से पता चलता है कि कोविड-19 ने 2021 में 29 दिसंबर तक दुनिया भर में 54,11,759 लोगों की जिंदगियां लील लीं. ये 2020 में एचआइवी/एड्स, तपेदिक और मलेरिया से हुई कुल मौतों से कहीं ज्यादा थीं. लिहाजा आगे का एकमात्र रास्ता टीकाकरण ही है. ठ्ठ


''अगर हमने इस खतरनाक कोरोना को मामूली जुकाम समझते रहने की अपनी सोच को बदला नहीं तो यह हमारे सामने एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा होगा. हमारी जितनी बड़ी
आबादी है, उसे देखते हुए इससे निबट पाना इतना आसान न होगा’’

डॉ. जयप्रकाश मुलियिल
चेयरमैन, साइंटिफिक एडवाइजरी कमेटी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी.
 

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