scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

आवरण कथाः तो क्या योगी रच पाएंगे इतिहास?

योगी आदित्यनाथ भविष्य के एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जो भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकता है. वे उम्मीद और उत्साह से लबालब हैं लेकिन नए जोश से मैदान में आ डटे अखिलेश यादव उन्हें सियासी जीवन की सबसे कड़ी टक्कर दे रहे.

X
उम्मीदों का केसरी बाना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उम्मीदों का केसरी बाना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

भगवाधारी, सिर मुंड़ाए संन्यासी से राजनैतिक नेता बने योगी आदित्यनाथ अपने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती से मुकाबिल हैं, लेकिन इस विशाल चुनौती से वे कतई विचलित नहीं दिखते. उन्होंने पांच साल तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाते देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य का राजकाज भगवा दस्तानों में फौलादी हाथों से चलाया जो शायद ही कभी विवादों से दूर रह पाया.

अब वह लम्हा आ गया है, जब प्रदेश के 15.2 करोड़ वोटर यह तय करेंगे कि उन्हें दूसरा मौका दिया जाए या कुर्सी का हकदार किसी नए को बनाया जाए. लखनऊ के अपने सरकारी आवास में तीर-धनुष लिए भगवान राम की कांसे की मूर्ति और भगवान कृष्ण की पिछवाई के नीचे भगवा रंग का तौलिया बिछे सोफे पर बैठे आदित्यनाथ उम्मीद से भरे दिखते हैं. वे कहते हैं, ''मैं कभी हारा नहीं और कभी पराजय स्वीकार नहीं की.’’

यही सही भी है. वे गोरखपुर की लोकसभा सीट से लगातार पांच बार जीते. हालांकि इस बार लड़ाई का रंग-ढंग कुछ और है. 49 वर्षीय योगी आदित्यनाथ और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों के लिए दांव काफी ऊंचे हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव ही शायद वह धुरी है, जिस पर देश का लोकतंत्र घूमता है. अगर आदित्यनाथ दोबारा चुने जाते हैं तो वे एक तरह का इतिहास बनाएंगे.

उनके पहले उत्तर प्रदेश का कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार नहीं चुना गया है. (नारायणदत्त तिवारी 1985 में दूसरी बार जरूर चुने गए, लेकिन उनका पहला कार्यकाल महज सात महीने का था). अगर वे यह उपलब्धि हासिल कर पाते हैं तो आदित्यनाथ के नेतृत्व पर लोकप्रियता की मुहर लग जाएगी और वे भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी के नाते भाजपा के ज्यादातर नेताओं से आगे आंके जाएंगे.

आवरण कथाः तो क्या योगी रच पाएंगे इतिहास?
आवरण कथाः तो क्या योगी रच पाएंगे इतिहास?

भाजपा को उत्तर प्रदेश में बड़ी जीत से 2024 के लोकसभा चुनावों में लगातार तीसरी जीत की खातिर बड़ा उत्साह मिल जाएगा. उसके पहले, इससे पार्टी को यह तय करने में काफी बढ़त हासिल हो जाएगी कि जुलाई में तय चुनाव में अगला राष्ट्रपति कौन होगा.

आवरण कथाः तो क्या योगी रच पाएंगे इतिहास?
आवरण कथाः तो क्या योगी रच पाएंगे इतिहास?

(राष्ट्रपति निर्वाचन मंडल में उत्तर प्रदेश 403 विधायकों, 100 विधान परिषद सदस्यों, 80 लोकसभा सदस्यों और 31 राज्यसभा सदस्यों के साथ सर्वाधिक वोट का हकदार है). लंबी अवधि में उत्तर प्रदेश का निर्णायक जनादेश हिंदुत्व का भारी समर्थन भी साबित होगा. लिहाजा, संघ परिवार को समूचे देश के भविष्य के लिहाज से अपना वैचारिक धरातल गढ़ने में मदद मिल सकती है. 

लखनऊ के भाजपा राज्य कार्यालय में इस मौके की अहमियत का भाव तारी है. साधारण-सा दिखने वाला टिंटेड ग्लास की खिड़कियों वाला, नई साज-सज्जा में पीडब्ल्यूडी का यह बंगला वास्तुशिल्प के नजरिए से भी अपनी अहमियत को किसी भी तरह कमतर नहीं बनाता है, जो बगल के विधान भवन के भव्य औपनिवेशिक वास्तुशिल्प के आगे फीका जरूर लगता है.

लेकिन पिछले हफ्ते आदित्यनाथ जब अपनी सफेद फॉर्च्यूनर कारों के काफिले के साथ यहां पहुंचे तो जैसे वह जगमग हो उठा, उससे किसी को यह शक नहीं हो सकता कि संभावित भविष्य का यही नजारा है. पार्टी कार्यकर्ताओं की भीड़ ने पार्टी के नए नारे 'सोच ईमानदार, काम दमदार’ के साथ आदित्यनाथ का जोशीला स्वागत किया. अंदर कॉन्फ्रेंस रूम मीडिया वालों से भरा हुआ था.

उन्होंने पार्टी के दूसरे प्रदेश और केंद्रीय नेताओं के साथ चार मिनट का कैंपेन थीम गीत 'यूपी फिर मांगे बीजेपी सरकार’ जारी किया. उम्मीद के मुताबिक, उसमें हिंदू तीर्थ स्थलों अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज, और मथुरा की नई भव्यता को उजागर किया गया है. साथ में आदित्यनाथ सरकार की ओर से शुरू किए गए कुछ कल्याणकारी कार्यक्रमों और विकास परियोजनाओं का भी जिक्र है. 

खाता बही अतीत का
खाता बही अतीत का

महत्वपूर्ण यह भी है कि कैंपेन वीडियो के कई दृश्यों में आदित्यनाथ प्रधानमंत्री के साथ दिखते हैं. इसमें हाल में बहुप्रचारित वह फोटो भी है जिसमें मोदी अपना हाथ आदित्यानाथ के कंधे पर पितृतुल्य भाव से रखे दिखते हैं, जो मुख्यमंत्री को पूरे समर्थन पर शंकालुओं को शांत करने का संकेत देता है.

गीत बजने के बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह राज्य सरकार की उपलब्धियों की तारीफों के पुल बांधते हैं, जिसमें 'योगी सरकार’ का मुहावरा बार-बार दोहराया जाता है. सभी संकेत इसी ओर इशारा करते हैं कि आदित्यनाथ पार्टी के चुनाव अभियान के लिए मोदी और अमित शाह के बाद कितने अहम बन गए हैं, जो 2017 में राज्य में भाजपा की एकतरफा जीत के सूत्रधार थे.

यह मार्के का बदलाव है. पांच साल पहले, जब आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े राज्य में भाजपा की मुख्यमंत्री के रूप में आश्चर्यजनक पसंद की तरह उभरे थे तो बहुतों को उनकी क्षमता पर शंका थी. पांच बार के सांसद होने के बावजूद वे केंद्र या राज्य में कभी मंत्री पद पर आसीन नहीं हुए थे. 12वीं लोकसभा में तो वे 26 साल की उम्र में सबसे युवा सांसद थे.

चुनाव के चरण
चुनाव के चरण

उनका प्रबंधकीय कौशल मठ के महंत होने तक ही सीमित था. गोरखपुर में श्री गोरखनाथ मठ उत्तर प्रदेश के पूर्वोत्तर छोर पर नेपाल की सीमा से लगा है, जो नाथपंथी संप्रदाय का केंद्र है. आदित्यनाथ एक कट्टर युवा संगठन हिंदू युवा वाहिनी भी चलाते हैं, जो हिंदुत्व का आक्रामक पैरोकार है और अक्सर भाजपा की नरम भगवा एजेंडे के लिए खिंचाई करता रहा है.

जब 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कुल 403 सीटों में से 312 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की और 15 साल वनवास के बाद सत्ता में लौटी तो आदित्यनाथ आला कुर्सी के दायरे में नहीं थे. तत्कालीन केंद्रीय राज्यमंत्री, अनुभवी मनोज सिन्हा और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य इस दौड़ में सबसे आगे थे.

कैसे आदित्यनाथ चुने गए यह अटकलों का मामला ही बना रहा है, लेकिन बड़े हलके में यही माना जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शीर्ष नेताओं की सलाह से तय किया कि आदित्यनाथ में ही वह हिम्मत है, जो राजकाज के लिहाज से देश में सबसे मुश्किल माने जाने वाले प्रदेश को संभाल सकते हैं. दूसरे दावेदारों को खुश करने के लिए दो को उप-मुख्यमंत्री और बाकियों को मंत्री बनाया गया. विपक्ष ने भाजपा सरकार को साढ़े दस मुख्यमंत्रियों की सरकार कहकर मखौल उड़ाया, जिसमें आदित्यनाथ आधे गिने गए.

जातिगत वोट पैटर्न
जातिगत वोट पैटर्न

अपने शासन के शुरू में आदित्यनाथ हिंदुत्व के रथ पर खुलकर सवार हुए, जिसे आलोचकों ने 'अत्याचारी’ राज करार दिया. उन्होंने 'लव जेहाद’ पर युद्ध छेड़ दिया और प्यार के नाम पर धर्म परिवर्तन के खिलाफ अध्यादेश भी ले आए. वे 'ऐंटी-रोमियो स्क्वायड’ भी ले आए, जिसका जाहिर मकसद तो महिलाओं की सुरक्षा था, मगर अक्सर उसे जायज जोड़ों को ही डराने-धमकाने के लिए जाना गया.

उन्होंने राज्य पुलिस को अपराधियों को मार गिराने की भी खुली छूट दी, जिससे जल्दी ही एनकाउंटर हत्याओं का आरोप लगने लगा. उन्होंने गाय की तस्करी और गोहत्या पर भी लगाम लगाई और बड़े खर्च के साथ राज्य में गौशालाएं बनवाईं. और बाबूशाही को भी सरकारी दफ्तरों में तंबाकू, गुटखा और पान खाने पर पाबंदी लगाकर हैरान कर दिया, जबकि राज्य में पान चबाते हुए बात करना और जगह-जगह पीक थूकना संस्कृति का हिस्सा माना जाता है.

अपने कार्यकाल के पहले ही साल अपने गृहनगर गोरखपुर में बड़ी चुनावी हार से वे राज्य में राजकाज के गंभीर मसलों की ओर मुड़े, जो स्वतंत्र होता तो दुनिया में पांचवां सबसे ज्यादा आबादी वाला देश होता. आदित्यनाथ को राज्य के विकास और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर ज्यादा फोकस करने की सलाह दी गई. जैसा कि उनके एक सहयोगी कहते हैं, ''उनकी भगवा साख तो स्थापित है और उससे उन्हें ज्यादा वोट नहीं मिलेंगे.’’ आदित्यनाथ का मानना है कि उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री अच्छा काम किया है (देखें बातचीत). इस पर वोटरों का फैसला तो 10 मार्च को जाना जाएगा.

जातिगत वोट पैटर्न
जातिगत वोट पैटर्न

यही कुछ संदेह की गुंजाइश है. कुछ महीने पहले तक भाजपा शायद यह मानने की वाजिब हकदार थी कि उत्तर प्रदेश में 2022 के चुनाव पूरी तरह उसकी मुट्ठी में हैं. आखिरकार उसके पास भारी फौज है—मजबूत पार्टी इन्फ्रास्ट्रक्चर, मकसद से भरी सरकार जो पहचान और विकास दोनों की भाषा बोलने में माहिर है और करिश्माई हिंदुत्व की तिकड़ी से लैस है.

लेकिन हिंदी हृदय प्रदेश की राजनीति में चौंकाने वाले तत्व कई हैं. आदित्यनाथ के सरकारी निवास से थोड़ी दूर पर उनके पूर्ववर्ती तथा धुर विरोधी अखिलेश का ठिकाना है और युवा ऊर्जा से लबरेज समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया ने वापसी की तैयारी कर ली है.

अगर सपा के विशाल मुख्यालय (जिसमें ऐंफीथिएटर भी है) में आ-जा रही गाड़ियां वोट के रुझान का कोई संकेत हैं तो आप यह मानने के लिए माफ किए जा सकते हैं कि सपा एकतरफा जीत दर्ज करने जा रही है! हालांकि यह कुछ ज्यादा ही देहाती किस्म की राजनीति का नजारा हो सकता है.

जैसा कि एक राजनैतिक जानकार बताते हैं कि अनुशासित कार्यकर्ताओं और पार्टी ढांचे वाली भाजपा के उलट सपा के समर्थक अमूमन बेकाबू और पार्टी का ढांचा असंगठित-सा है. खासकर इसलिए कि अखिलेश पार्टी के एकमात्र सेनापति हैं और हर टिकट चाहने वाला अपने लाव-लश्कर के साथ 'नेताजी’ का आशीर्वाद लेना जरूरी समझता है.

अपनी पार्टी के 2017 में भाजपा के हाथों सफाए के बाद पांच साल तक विपक्ष में बैठे अखिलेश ज्यादा परिपक्व, ज्यादा चतुर, घाघ नेता बन गए हैं. हालांकि उनमें युवा जिज्ञासा और जोश-खरोश कायम है. अपनी पार्टी की लाल टोपी पहने, 48 वर्षीय अखिलेश ने इंडिया टुडे से कहा, ''पिछले पांच साल में मैंने यही महसूस किया कि विकास के नजरिए पर फोकस हमेशा बना रहना चाहिए.

भाजपा तो सिर्फ मेरे मुख्यमंत्री कार्यकाल में शुरू हुई परियोजनाओं का फीता काट रही है.’’ चुनाव आयोग की कोविड के खतरों की वजह से रैलियों पर बंदिश के पहले अखिलेश ने राज्य भर में कई यात्राएं कीं. इन यात्राओं में उन्होंने 'योगी सरकार’ की नाकामियां गिनाईं, जिनमें भारी भीड़ जुटी. जब वे अपना पसंदीदा नारा बोलते, ''2022 में बदलाव होगा. जनता ने मन बना लिया है इस सरकार को उखाड़ फेंकने का.’’ तो भीड़ से जोरदार आवाज उठती, ''सरकार को उखाड़ फेंकने का.’’

महिला मतदाता क्यों हैं अहम
महिला मतदाता क्यों हैं अहम

फिर, पिछले पखवाड़े, अखिलेश ने सत्तारूढ़ भाजपा को झकझोर दिया. वे आदित्यनाथ सरकार के दो प्रमुख मंत्रियों स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान तथा राज्यमंत्री धरम सिंह सैनी को इस्तीफा दिलवाकर सपा में शामिल करवाने में कामयाब हो गए. ये तीनों उत्तर प्रदेश के पिछड़े वर्गों की विशाल छतरी और उसमें अति पिछड़े वर्गों (ईबीसी) से जुड़े हुए हैं.

वे इस शिकायत के साथ बाहर आए कि भाजपा ने उनके सामुदायिक हितों की उपेक्षा की और आदित्यनाथ ने उनके मंत्रालयों के फैसले बिना उनकी सलाह के खुद कर डाले. उन्हें अपने पाले में लाकर अखिलेश ने भाजपा के 2017 के रणनीतिक सूत्र का एक धागा उधेड़ लिया. 2017 के पहले भाजपा मोटे तौर पर ऊंची जातियों की पार्टी कही जाती थी.

तब उसने पिछड़े वर्गों के बड़े दायरे को अपनी ओर लाने का आक्रामक अभियान चलाया और ऐसा अफसाना गढ़ा कि बतौर मुख्यमंत्री अखिलेश ने अपने यादव समुदाय को खूब आगे बढ़ाया और गैर-यादव ओबीसी तथा ईबीसी की उपेक्षा की. वह अफसाना काम कर गया. 2017 में भाजपा को गैर-यादव ओबीसी के 58 प्रतिशत वोट मिले. इसके अलावा दलितों का एक वर्ग भी उससे आ जुड़ा, जो पहले मायावती की बहुजन समाज पार्टी का वफादार हुआ करता था. 

इस बार इंजीनियरिंग ग्रेजुएट अखिलेश अपने गठजोड़ के इंजन का जोड़-जुगाड़ कर रहे हैं. होशियारी से किए कुछ गठजोड़ों से उन्हें उम्मीद है कि उनका अभियान काफी ताकतवर हो जाएगा और उन्हें असली मुकाम पर बैठा देगा. उनके साथ जाट समुदाय में काफी अच्छी पकड़ वाला राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी प्रभावी ओबीसी जाति राजभर समुदाय की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सभासप) और तीन अन्य छोटी पार्टियां हैं, जिनकी खास इलाकों में ओबीसी और अनुसूचित जातियों में अच्छी पैठ है.

सभासप के नेता ओमप्रकाश राजभर योगी मंत्रिमंडल से 2019 में बाहर निकल गए. वे कहते हैं, ''भाजपा ने हमें झांसा दिया. अब हमारा सपा के साथ गठजोड़ उसे हराने जा रहा है. मेरी बात को गांठ बांध लीजिए. योगी गोरखपुर लौट रहे हैं और 10 मार्च को वोटर जपेंगे 'चल संन्यासी मंदिर में’.’’ अखिलेश ने अपने चाचा शिवपाल यादव से भी सुलह कर ली है.

उनके पिता तथा सपा के दिग्गज मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई ने टूटकर अपनी पार्टी प्रगतिशील समाज पार्टी (लोहिया) बना ली. सबसे अहम यह है कि मुख्यमंत्री रहने के दौरान जो हालात थे, उससे अखिलेश ने सपा को अपने नेतृत्व में एकजुट कर लिया और अब वे खुद बॉस हैं.  

2017 में उन्हें गद्दी से उतार देने वाली भाजपा की रणनीति को उलटने के लिए अखिलेश की अपनी इंजीनियरिंग और उसकी वजहें हैं. उनका यादव समुदाय कुल ओबीसी वोटों का (जो कुल मतदाताओं के करीब 40 फीसद हैं) महज कोई 25-30 फीसद है. बाकी अन्य जातियों से आते हैं, जिनमें कई और भी ज्यादा वंचित जातियां हैं.

भाजपा के प्रमुख ओबीसी चेहरों को अपने पाले में लाकर और एमबीसी तथा ईबीसी दोनों के साथ गठजोड़ कायम करके वे अफसाना खड़ा कर रहे हैं कि भाजपा के साथ जाकर पिछड़ों को नुक्सान ही हुआ. ऐसा करते हुए अखिलेश को उम्मीद है कि वे विभिन्न ओबीसी समुदायों में अपने वोट करीब 20-25 फीसद बढ़ा लेंगे. ये उन वोटों के अलावा हैं जो वे विकास, बेरोजगारी और महंगाई पर आदित्यनाथ सरकार की आम (और तीखी) आलोचना के साथ सत्ता विरोधी भावना के सहारे हासिल करने की जुगत में हैं.

जब मायावती इस चुनाव में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं, वे बसपा के छाते से कुछ गैर-जाटव अनुसूचित जाति समुदायों को भी अपनी तरफ लाने की उम्मीद कर रहे हैं. (उत्तर प्रदेश में दलितों के कुल 20 फीसद वोट हैं). 2007 में बहुमत हासिल करने के लिए मायावती ने दलितों, मुसलमानों और ब्राह्मणों का कामयाब गठजोड़ बनाया था, जो अब काफी हद तक बिखर चुका है. 

बसपा के 17 विधायकों में से दस, जो मुख्यत: गैर-दलित समुदायों के थे, पाला बदलकर समाजवादी पार्टी के खेमें में आ चुके हैं. हालांकि बसपा प्रवक्ता फैजान खान कहते हैं कि बहनजी अपना वोट आधार कायम रखने के लिए चुपचाप काम कर रही हैं और मानते हैं कि 10 मार्च आने दीजिए, वे किंगमेकर की भूमिका में होंगी.

उधर अखिलेश 20 फीसद मुस्लिम वोटों के समर्थन की उम्मीद भी कर रहे हैं, क्योंकि भाजपा के खिलाफ उन्हें सबसे अच्छा दांव माना जा रहा है. इस तरह रणक्षेत्र को नए सिरे से तय करते हुए उन्होंने 2022 के चुनाव को सपा और भाजपा के बीच द्विध्रुवीय मुकाबला बनाया है, बजाए इसके कि वह बसपा और कांग्रेस को भी शामिल करते हुए बहुध्रुवीय लड़ाई हो.

वे कुल वोटों के 40 फीसद तक पहुंच सकें, तो यह उन्हें जीत की तरफ ले जा सकता है. 2017 में भाजपा को कुल जमा 39.67 फीसद वोटों की बदौलत भारी जीत हासिल हुई थी. अखिलेश की रणनीति सिलसिलेवार ढंग से उसमें सेंध लगाते हुए अपनी ईंटों को एक पर एक जमाकर इतना ऊंचा उठाना है कि सत्ता का छींका उनके हाथ आ सके.

भाजपा का ताकतवर खेमा भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है और अखिलेश को अपने ही पहिए पंक्चर करते देख रहा है. इस ताकतवर खेमे ने पलट हमला करते हुए उनकी राह में रोड़े बिछाने के लिए एक के बाद एक चालें चलीं. उन्होंने अखिलेश के सौतेले भाई प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा को अपने पाले में लाकर यादव परिवार की भुरभुरी एकता का पर्दाफाश कर दिया.

तभी राज्य के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कह सके, ''जब वे अपना परिवार ही साथ नहीं रख सके तो इतने बड़े प्रदेश को एकजुट होकर कैसे चला सकते हैं?’’ उन्होंने यादवों के बाद ओबीसी वोटों के दूसरे सबसे बड़े हिस्से कुर्मी समुदाय की नुमाइंदगी करने वाले प्रधान धड़े अपना दल के साथ अपना गठबंधन पुख्ता किया. यही उन्होंने निषाद पार्टी के साथ भी किया, जिसे पूरब की नदी किनारे बसी पट्टियों के ईबीसी मछुआरे समुदाय में अच्छा-खासा समर्थन हासिल है.

केंद्रीय मंत्री और अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल कहती हैं, ''सपा ने गैर-यादव ओबीसी को रिझाने में देर कर दी. हम भाजपा के साथ पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं और उसके साथ हमारा अच्छा तालमेल है.’’ फिर भाजपा ने गांधी परिवार के पूर्व विश्वासपात्र आर.पी.एन. सिंह को लुभाकर कांग्रेस में सेंध लगाई. अब उन्हें ओबीसी चेहरे के तौर पर पेश किया जा रहा है. जाट समुदाय को समझाने-बुझाने और सपा-आरएलडी के गठजोड़ को कमजोर करने के लिए शाह ने आनन-फानन प्रमुख जाट नेताओं की बैठक भी बुलाई.

भाजपा कई दूसरे दांव-पेचों का सहारा भी ले रही है. उसका तुरुप का पत्ता मोदी ही हैं और ''डबल इंजन की सरकार’’ का वह विचार भी, जो केंद्र और राज्य दोनों में एक ही पार्टी की सरकार होने से अच्छे तालमेल पर जोर देता है. महामारी से बरपी आर्थिक तबाही का जवाब देने के लिए  राज्य सरकार ने, देर से ही सही, केंद्र की खैरातों के साथ अपनी तरफ से भी गरीबों को मुफ्त राशन दिया.

यही नहीं, आदित्यनाथ दावा करते हैं कि उन्होंने मुफ्त गैस कनेक्शन और किसानों की कर्ज माफी के अलावा मकान और साफ-सफाई से जुड़ी अनेक केंद्रीय योजनाओं को जोर-शोर से लागू किया. प्रयागराज के जी.बी. पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर बद्री नारायण कहते हैं, ''लाभार्थी भाजपा के अहम वोट बैंक बन गए हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी योजनाओं के जरिए गरीबों में भी सबसे गरीब लोगों के साथ रिश्ता कायम किया.’’

विकास के मोर्चे पर आदित्यनाथ पांच नए एक्सप्रेसवे और नौ हवाई अड्डों सहित अपनी सरकार के बनाए विशाल बुनियादी ढांचे का जिक्र करते हैं और 4 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित करके औद्योगिक वृद्धि को तेज रफ्तार देने का भी, जिनमें से कई परियोजनाओं में उत्पादन शुरू हो गया है. वे कहते हैं कि बेरोजगारी की दर घटकर सालाना 5 फीसद पर आ गई, जो औसतन 14 से 16 फीसद थी.

इन दावों की सच्चाई की पड़ताल कर पाना मुश्किल है. खासकर महामारी के बाद, केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि अखिलेश की सरकार के अंतिम तीन सालों में प्रति व्यक्ति आय मौजूदा कीमतों पर औसतन सालाना 7.8 फीसद बढ़ी, वहीं कोविड की मार पड़ने से पहले भी आदित्यनाथ के कार्यकाल के पहले तीन सालों के दौरान वृद्धि सुस्त होकर 5.2 फीसद पर आ गई. (उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 73,792 रुपए है जो 99,694 रुपए के अखिल भारतीय औसत से खासी कम है).

इसी तरह, अखिलेश के कार्यकाल के अंतिम तीन सालों में मौजूदा कीमतों पर जीएसडीपी की वृद्धि औसतन 9.1 फीसद रही जबकि आदित्यनाथ के शासन के पहले तीन सालों में यह मात्र 6.4 फीसद थी. ईमानदारी से कहें तो महामारी से पहले के तीन साल में कमतर आर्थिक वृद्धि राष्ट्रीय परिघटना थी और केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं थी.

कोविड महामारी की वजह से आदित्यनाथ का आर्थिक कामकाज मिला-जुला रहा, वहीं कानून और व्यवस्था के मामले में उनके बेहद कठोर तौर-तरीकों और कभी प्रदेश में हावी रहे माफिया गिरोहों पर थोड़ा-बहुत काबू पाने की धारणा से पार्टी को वोट मिलना संभावित है. इसकी तुलना सपा सरकार के कार्यकाल से कीजिए जो इस धारणा से दागदार थी कि उसकी सरपरस्ती में माफिया खुले आम सक्रिय थे और भ्रष्टाचार अंधाधुंध फैला था.

भ्रष्टाचार भले भारत में सर्वव्यापी हो, पर मोदी की तरह आदित्यनाथ भी इस मोर्चे पर बेदाग हैं. अभी तक उनके ऊपर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं है और संन्यासी पहनावा व्यक्तिगत शुद्धता के एहसास में इजाफा करता है. दंगाइयों और अपराधियों पर भी वे कहर बनकर टूटे. ''सरकारी संपत्तियों को नष्ट करने वालों’’ की संपत्तियां जब्त करने की नीति में कभी-कभी ज्यादती की गुंजाइश और आशंकाएं देखी गईं, भले ही उसे अदालतों के मार्फत लाया गया हो.

मगर कुल मिलाकर यह कारगर रही और खासकर व्यापारियों ने चैन की सांस ली. इस मोर्चे पर कुछ चमक 2021 की लखीमपुर खीरी की घटना से फीकी पड़ी, जब केंद्रीय मंत्री के बेटे की अगुआई में वाहनों के काफिले से चार किसानों को कथित तौर पर कुचलकर मार डाला गया और खासकर जब उसके खिलाफ कार्रवाई में देरी की गई.

साल 2020 की हाथरस की घटना में भी, जब दबंग जाति के चार लोगों ने 19 बरस की एक दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया और बाद में उसकी मृत्यु हो गई, उसके शव की जबरन अंत्येष्टि कर देने के लिए राज्य मशीनरी की व्यापक भर्त्सना की गई. योगी आदित्यनाथ ने बाद में इस मामले की सीबीआइ जांच के आदेश दिए पर उनके दामन पर यह दाग तो बना ही रहा.

आदित्यनाथ को श्रेय देना होगा कि उन्होंने भ्रष्टाचार पर सख्ती से शिकंजा कसा और पूरी कड़ाई से पार्टीजनों को तलवे चाटकर न तो फायदे लेने दिए और न ही कीमती ठेके हथियाने दिए. शुचिता के लिए जहां लोगों ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की, उनके ही कई विधायक उन्हें पहुंच से बाहर और घमंडी और काम करवाने के लिए अफसरशाहों पर बहुत ज्यादा निर्भर मानते थे. जहां भाजपा के 42 फीसद विधायक दबंग जातियों के हैं, योगी आदित्यनाथ पर, जो ठाकुर हैं, ब्राह्मणों से अधिक अपनी जाति के लोगों की तरफदारी करने का आरोप लगा, जिससे आदित्यनाथ ने बार-बार इनकार किया.

आदित्यनाथ और भाजपा को बढ़त देने वाला एक बड़ा कारक है उनके सांगठनिक ढांचे की ताकत. आरएसएस के सहारे पार्टी ने चुनाव लड़ने के विज्ञान में महारत हासिल करके मजबूत सांगठनिक मशीनरी खड़ी की है जिसका पूरा ध्यान जमीनी प्रबंधन पर है.

भाजपा के कुशाग्र संगठन सचिव सुनील बंसल ने 2017 में भी जीत पक्की करने के लिए शाह के मातहत काम किया था और अभी भी वे सीटों के चयन के साथ चुनाव अभियान की जमीनी गतिविधियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं. 2017 में प्रदेश अध्यक्ष रहे मौर्य कहते हैं, ''हमारी चुनाव मशीनरी उसके बाद और भी काफी निखारी और सुधारी गई है. बूथों पर हमारी त्रिदेव व्यवस्था है—अध्यक्ष, प्रभारी और बूथ समिति. 

हर समिति में पन्ना प्रमुख हैं, जो 60 वोटरों पर नजर रखते हैं और उनके घर जाकर हमें वोट देने का आग्रह करते हैं. इससे हम अपना संदेश हर घर में पहुंचा पाते हैं.’’ भाजपा के पास एक और चीज है जो उसका सांस्कृतिक तुरुप का पत्ता है—अयोध्या में निर्माणाधीन मंदिर और हाल में पूरा हुआ काशी विश्वनाथ धाम गलियारा. वोटरों की सद्भावना हासिल करने में हिंदुत्व के प्रतीकवाद की ताकत को कभी कम नहीं आंका जा सकता.

अखिलेश की जातिगत जमावट के नतीजे दिखने लगे हैं तो पूरी संभावना है कि भारतीय जनता पार्टी हिंदू वोटों को एकजुट करने के लिए ध्रुवीकरण पर पूरा जोर लगाएगी. एक संकेत यह है कि शाह ने अपना घर-घर अभियान कैराना से शुरू किया, जहां अखिलेश के कार्यकाल के दौरान सांप्रदायिक दंगे हुए थे. दूसरा आदित्यनाथ का ''80:20’’ का मुहावरा है, जो उनके लाख इनकार के बावजूद साफ तौर पर धार्मिक एकजुटता का आह्वान है.

अखिलेश बहुत एहतियात बरत रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय का बढ़-चढ़कर समर्थन करके भाजपा के हाथों में न खेलें. वे कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि ध्रुवीकरण होगा, क्योंकि लोग बेरोजगारी और महंगाई से आजिज आ गए हैं. वे विकल्प चाहते हैं. हम 2022 में सरकार बनाते हैं, तो मैं दोगुनी रफ्तार से काम करके अर्थव्यवस्था को तिगुना करूंगा.’’ योगी आदित्यनाथ भी अंतत: हर चीज में आर्थिक वादों का टेका लगाते हैं.

अपने दूसरे कार्यकाल में वे उत्तर प्रदेश को एक खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदलने का वादा करते हैं (फिलहाल यह 17.4 लाख करोड़ रु. की है और वह दर्जा हासिल करने के लिए उसे चार गुना बढ़ाना होगा). उनका कहना है कि इससे राज्य के लोगों की प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो जाएगी. अखिलेश को उनका संदेश है—''10 मार्च को धूल-धूसरित करने वाली हार का सामना करने के लिए तैयार रहें.’’ लेकिन अगर चीजें भारतीय जनता पार्टी के मंसूबों के मुताबिक नहीं होती हैं तो उन्हें भी तैयार रहना होगा—महंती की अपनी पुरानी भूमिका में लौटने के लिए.

भाजपा के हाथों 2017 में अखिलेश की समाजवादी पार्टी बुरी तरह हारी थी. उसके बाद विपक्ष में पांच साल बिताकर अब वे एक संजीदा और चतुर सुजान नेता के रूप में मंझ गए हैं. अब वे किसी दूसरे के दिशानिर्देशों पर न चलकर पूरे आत्मविश्वास से अपने फैसले खुद ले रहे हैं

मायावती ने दलितों, मुसलमानों और ब्राह्मणों को साथ जोड़कर 2007 में बहुमत हासिल किया था. वह गठजोड़ तो कमोबेश खत्म ही हो गया पर आशावादियों को लगता है कि 10 मार्च के बाद वे ही किंगमेकर होंगी

प्रबल प्रतिद्वंद्वी
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव 22 जनवरी को लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान

अखिलेश ने जातियों को जिस तरह से जोड़ा है, अगर कहीं वह कारगर होता दिखा तो फिर हिंदू वोट समेटने के लिए भाजपा ध्रुवीकरण के और गहरे खेल में उतर सकती है.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें